सियासी गणित: निर्विरोध चुनाव के पीछे की रणनीति
छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 सीटों में से भाजपा के पास 54 और कांग्रेस के पास 35 विधायक हैं। नियमानुसार, एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 31 प्रथम वरीयता मतों की आवश्यकता थी। भाजपा एक सीट आसानी से जीत रही थी, वहीं कांग्रेस के पास भी अपनी एक सीट सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त विधायक थे। किसी तीसरे निर्दलीय या डमी उम्मीदवार के मैदान में न होने के कारण चुनाव प्रक्रिया निर्विरोध संपन्न हुई।
भाजपा ने इस बार ओबीसी कार्ड खेलते हुए राज्य महिला आयोग की सदस्य और अनुभवी संगठन नेता लक्ष्मी वर्मा पर भरोसा जताया। वहीं, कांग्रेस ने अपनी मौजूदा राज्यसभा सांसद और बस्तर की कद्दावर आदिवासी नेता फूलोदेवी नेताम को दोबारा मौका देकर अपने आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश की है।
“नाम वापसी की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद केवल दो ही वैध उम्मीदवार मैदान में थे। प्रक्रिया पूरी होने के बाद लक्ष्मी वर्मा और फूलोदेवी नेताम को राज्यसभा के लिए निर्वाचित घोषित कर प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए हैं।”
— निर्वाचन अधिकारी, छत्तीसगढ़ विधानसभा
लक्ष्मी वर्मा और फूलोदेवी नेताम का कार्यकाल 10 अप्रैल, 2026 से शुरू होगा। वर्तमान में कांग्रेस के केटीएस तुलसी और फूलोदेवी नेताम का कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो रहा है। इस निर्वाचन के बाद राज्यसभा में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व अब और संतुलित हो गया है। लक्ष्मी वर्मा की जीत के साथ ही रायपुर के राजनीतिक गलियारों में जश्न का माहौल है। उनके समर्थकों ने विधानसभा के बाहर आतिशबाजी कर बधाई दी। आगामी दिनों में दोनों नवनिर्वाचित सांसद दिल्ली में शपथ ग्रहण करेंगी। जानकारों का मानना है कि इन दोनों महिला चेहरों के आने से संसद में छत्तीसगढ़ के स्थानीय मुद्दों, विशेषकर महिला सशक्तिकरण और जनजातीय अधिकारों की गूंज और तेज होगी।
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