चैत्र नवरात्रि आज से शुरू होने वाला है. नवरात्र के दौरान मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इसी कड़ी में नवरात्रि के पहले दिन मां के शैलपुत्री स्वरूप की आराधना का विधान है। शैलपुत्री अपने अस्त्र त्रिशूल की भांति हमारे त्रीलक्ष्य (धर्म, अर्थ और मोक्ष) के साथ मनुष्य के मूलाधार चक्र पर सक्रिय बल है।

मांमां शैलपुत्री की पूजा विधि

नवरात्रि के पहले दिन प्रातः स्नान कर निवृत्त हो जाएं।
फिर मां का ध्यान करते हुए कलश स्थापना करें।
कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री के चित्र को स्थापित करें।
मां शैलपुत्री को कुमकुम (पैरों में कुमकुम लगाने के लाभ) और अक्षत लगाएं।

मां शैलपुत्री को सफेद रंग के पुष्प अर्पित करें।
मां शैलपुत्री की आरती उतारें और भोग लगाएं। शैलपुत्री के स्वरूप की बात करें तो इनका वरण सफेद है। माता ने श्वेत रंग के वस्त्र ही धारण किये हुए हैं। माता की सवारी वृषभ यानी कि बैल है। मां शैलपुत्री ने दाएं हठ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल धारण किया हुआ है। मां का यह रूप सौम्यता, करुणा, स्नेह और धैर्य को दर्शाता है। तो आइये जानते हैं फिर महामाया मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला के अनुसार, माँ शैलपुत्री की पूजा विधि प्रिय रंग व भोग एवं उनकी उत्पत्ति की कहानी.

मां शैलपुत्री का ध्यान करें और उनके मंत्रों का जाप करें।

मां शैलपुत्री के पूजा मंत्र

ऊँ देवी शैलपुत्र्यै नमः ।।

या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।।

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

मां शैलपुत्री का प्रिय भोग

मां शैलपुत्री को सफेद दिखने वाले खाद्य पदार्थ जैसे कि खीर, चावल, सफेद मिष्ठान आदि का भोग लगाना चाहिए।

मां शैलपुत्री का प्रिय रंग

मां शैलपुत्री का वर्ण श्वेत है ऐसे में मां का प्रिय रंग सफेद है। इसी कारण से मां को नवरात्रि के पहले दिन सफेद रंग की वस्तुएं अर्पित करनी चाहिए।

मां शैलपुत्री की उत्पत्ति

पौराणिक कथा के अनुसार, चिरकाल में प्रजापति दक्ष ने आदिशक्ति की कठिन तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने पुत्री रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कालांतर में जब उनका जन्म प्रजापति दक्ष के घर सती रूप में हुआ तो वह सब कुछ भूल गई। जब वह बड़ी हुईं तो एक रात उनके स्वप्न में शिव जी आए और उन्हें स्मरण दिलाया।

इसके बाद मां सती शिव जी की पूजा-उपासना करने लगी। इसी समय प्रजापति दक्ष उनके विवाह हेतु वर ढूंढने लगे, लेकिन मां सती शिव जी को अपना पति मान चुकी थीं। अतः उन्होंने पिता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके पश्चात मां सती की शादी भगवान शिव से हुई। हालांकि, उनके पिता प्रसन्न नहीं थे। इसी बीच एक बार प्रजापति दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमें मां सती और भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया।

जब मां सती को इस बात की जानकारी हुई तो वह शिव जी से यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं। उस समय भगवान शिव ने कहा-हे देवी! इस यज्ञ में समस्त लोकों को आमंत्रित किया गया है, किन्तु केवल आपको आमंत्रित नहीं किया गया है। इसका अर्थ है कि आप उस यज्ञ में शामिल न हों। आपके लिए यह उत्तम होगा कि आप वहां न जाएं, लेकिन मां सती नहीं मानीं तो शिव जी ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी।

जब मां सती यज्ञ में शामिल हुईं तो किसी ने उनका आदर-सत्कार नहीं किया। साथ ही शिव जी के प्रति अपमानजनक बातें भी होने लगीं। तब मां सती को आभास हुआ कि उन्होंने यहां आकर गलती कर दी। इसके बाद उन्होंने यज्ञ वेदी में अपनी आहुति दे दी। कालांतर में मां सती शैलराज हिमालय के घर जन्म लेती हैं। अतः इन्हें मां शैलपुत्री कहा जाता है।

घट स्थापन मुहुर्त ज्योतिषाचार्य पंडित दत्तात्रेय होस्केरे के अनुसार :-

अभिजीत मुहुर्त प्रात : 11.36 बजे से 12.24 बजे तक|

सभी इच्छाओं की पूर्ती के लिए इस मुहूर्त में माता जी का आव्हान करें|

वृषभ लग्न में : प्रात: 7.48 बजे से 9.47 बजे तक

कर्ज से मुक्ति और आय बढाने के लिए महाकाली महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन नौ दिनों के लिए प्रारम्भ करें|

सिंह लग्न में : दोपहर 2.15 बजे से 4.25 बजे तक|

न्यायिक सफलता,शान्ति और राजनीतिक सफलता और परीक्षा में सफलता के लिए दुर्गा सप्त शती के 11वें अध्याय का पाठ नौ दिन करें|

वृश्चिक लग्न में : रात्रि 8.47 बजे से 11.02 बजे तक|

संतान प्राप्ति और सभी क्षेत्र में सफलता के लिए देवी कवच का नौ दिनों के लिए पाठ


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