अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट 

रायपुर (गंगा प्रकाश)- हिन्दू पंचांग के अनुसार आज ही के दिन प्रतिवर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। रक्षाबंधन का पर्व आस्था और विश्वास का पर्व है , इस दिन बहनें भाईयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उनकी लंबी आयु और सुख समृद्धि की कामना करती हैं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूर्व दिशा में और बहन का पश्चिम दिशा में होना उत्तम माना जाता है। बहनें रोली , अक्षत का टीका अपने भाई को लगायें , घी के दीपक से आरती उतारें , उसके बाद मिष्ठान खिलाकर भाई के दाहिने कलाई पर राखी बांधें। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट रिश्ते और प्रेम का प्रतीक है। रक्षाबंधन का त्योहार सदियों से चला आ रहा है। धार्मिक मान्यता है कि यमराज की बहन यमुना ने उनकी कलाई में राखी बांधी थी जिसके बदले यमराज ने यमुना को अमरता का वरदान दिया था। भाई बहनों के अटूट स्नेह पर्व आज उल्लासपूर्वक पुण्य वातावरण में सम्पन्न होगा। इस बार रक्षाबंधन पर एक नहीं बल्कि चार शुभ योग एक साथ बनने जा रहे हैं यानि आज सर्वार्थ सिद्धि योग , शोभन योग , रवि योग और श्रवण नक्षत्र का संयोग बन रहा है। वहीं आज रक्षाबंधन पर भद्रा का भी साया रहेगा। ज्योतिषियों की मानें तो भद्रा में शुभ कार्य करने से बचना चाहिये इसलिये इस काल में राखी भी नहीं बांधनी चाहिये। रक्षाबंधन पर राखी हमेशा भद्रा रहित काल में ही बांधी जाती है। इस बार दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक भद्राकाल रहेगी , ऐसे में राखी बांधने का सही समय दोपहर के बाद ही है। भारत में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर को संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है। श्रावणी पूर्णिमा अर्थात् रक्षा बन्धन ऋषियों के स्मरण तथा पूजा और समर्पण का पर्व माना जाता है। वैदिक साहित्य में इसे श्रावणी कहा जाता था। इसी दिन गुरुकुलों में वेदाध्ययन कराने से पहले यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। आज संस्कृति दिवस पर शुक्ल यजुर्वेदीय पुराणों के प्रणेता महर्षि वेद व्यास जी का सम्मान करते हुये हम सब भारतीय संस्कृति भाषा के विकास का संकल्प लेवें और परंपरा को आगे बढ़ावें। रक्षाबंधन भाई बहन के पवित्र रिश्ते का त्यौहार है , जो आदर और सम्मान देता है। आज के दिन भाई बहन दोनों सुख दु:ख में हमेशा साथ रहने का विश्वास दिलाते हैं। साथ ही भाई भी अपनी बहनों को सदैव उनकी रक्षा का वचन देते हैं। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे , रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है। रक्षा का मतलब सुरक्षा और बंधन का मतलब बाध्य है। रक्षाबंधन के दिन बहनें भगवान से अपने भाईयों की तरक्की के लिये भगवान से प्रार्थना करती है। राखी सामान्यतः बहनें भाई को ही बाँधती हैं परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बंधियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को) भी बाँधी जाती है। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बाँधी जाती है। आज के दिन बहनें अपने भाई के दायें हाथ पर राखी बाँधकर उसके माथे पर तिलक करती हैं और उसकी दीर्घ आयु की कामना करती हैं। बदले में भाई उनकी रक्षा का वचन देता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंगबिरंगे धागे भाई-बहन के प्यार के बन्धन को मज़बूत करते है। भाई बहन एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और सुख-दुख में साथ रहने का विश्वास दिलाते हैं। यह एक ऐसा पावन पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को पूरा आदर और सम्मान देता है। धर्म , जाति और देश की सीमाओं से परे रक्षाबन्धन का पर्व भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री के निवास पर भी मनाया जाता है। जहाँ छोटे छोटे बच्चे जाकर उन्हें राखी बाँधते हैं। रक्षाबंधन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता या एकसूत्रता का भी सांस्कृतिक उपाय है। बहनों को अपने भाई की कलाई पर काले रंग की राखी कभी नहीं बांधनी चाहिये क्योंकि काले रंग की राखी बांँधने से अशुभ समय शुरू हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार काले रंग का सीधा संबंध शनि देव से है। शनि देव को कार्य में विलंब करने वाला ग्रह माना जाता है। ऐसे में रक्षाबंधन पर काले रंग की राखी भूलकर भी ना बांधे। रक्षाबंधन पर बहनों को भाई की कलाई पर टूटी या खंडित राखी नहीं बांधनी चाहिये। माना जाता है कि ऐसी राखी बांधनी से अशुभ फल मिलता है। भाई की कलाई पर प्लास्टिक की राखियों को भी नहीं बांधना चाहिये। कहा जाता है कि प्लास्टिक अशुद्ध चीजों से बनती है, ऐसे में प्लास्टिक की राखी बांँधने से जीवन में दुर्भाग्य शुरू हो सकती है। अक्सर लोग राखी खरीदते समय डिजाइन या अशुभ चिन्हों का ध्यान नहीं देते हैं। लेकिन रक्षाबंधन पर कभी भी भाई के कलाई पर अशुभ चिन्हों वाली राखी नहीं बांँधनी चाहिये , ऐसा करने से अशुभ समय शुरू हो जाता है। भाई की कलाई पर भगवान वाली राखी भी नहीं बांँधनी चाहिये , इसके पीछे का कारण है कि अगर राखी खुलकर जमीन पर गिर जाती है और किसी के पैरों पर पड़ सकती है। जिसके कारण अनजाने में भाई को पाप का भागीदार होना पड़ सकता है , ऐसे में भगवान की प्रतिमा वाली राखी नहीं खरीदनी चाहिये। रक्षाबन्धन आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से रिश्तों को मज़बूती प्रदान करने का पर्व है। यही कारण है कि इस अवसर पर ना केवल बहन भाई को ही अपितु अन्य सम्बन्धों में भी रक्षा (या राखी) बाँधने का प्रचलन है। गुरु शिष्य को रक्षासूत्र बाँधता है तो शिष्य गुरु को। रक्षाबंधन के दिन भाई अपने बहन को राखी के बदले कुछ उपहार देते है। रक्षाबंधन एक ऐसा त्यौहार है जो भाई बहन के प्यार को और मजबूत बनाता है। अब तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को भी राखी बाँधने की परंपरा प्रारंभ हो चुकी है। हिन्दू धर्म के सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में एक श्लोक का उच्चारण करते हैं जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। भविष्यपुराण के अनुसार इन्द्राणी द्वारा निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इन्द्र के हाथों बांधते हुये निम्नलिखित स्वस्तिवाचन किया –

येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: ।

तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।।

इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है – जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था , उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी) ! तुम अडिग रहना (तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित ना हो।)। आज भी किसी धार्मिक विधि विधान से पूर्व पुरोहित यजमान को रक्षासूत्र बाँधता है और यजमान पुरोहित को। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के सम्मान की रक्षा करने के लिये परस्पर एक दूसरे को अपने बन्धन में बाँधते है।


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