प्रकाश कुमार यादव
रायपुर(गंगा प्रकाश )।
कभी-कभी, महानतम ज्ञान अतीत की अंतर्दृष्टि में निहित होता है। गोस्वामी तुलसीदास ने शक्ति  के बारे में परम सत्य कहा हैं कि “नहिं कोऊ अस जन्म जग माहीं, प्रभुता पै जाहिं मद नाहीं”। इस संसार में ऐसा कोई प्राणी पैदा नहीं हुआ, जिसे शक्ति ने नशा न दिया हो। ऐसा क्यूँ होता है? क्या सत्ता के संचालन के तरीके में कुछ आंतरिक है, या व्यक्ति में भेद्यता छिपी हुई है, या क्या यह वह बुराई है जो दोनों के मिलने पर घटित होती है?सत्ता कई प्रकार की हो सकती है – कॉर्पोरेट, पारिवारिक, नौकरशाही या किसी संगठन के भीतर; लेकिन शायद इसकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए सबसे प्रतीकात्मक क्षेत्र राजनीति है। कई राजनेता, जब सत्ता के आकांक्षी होते हैं, तो वास्तव में विश्वास करते हैं कि वे इसके विकृत प्रलोभनों या दुरुपयोग के प्रति अजेय रहेंगे। लेकिन नरक का मार्ग अच्छे इरादों से प्रशस्त होता है।अच्छे इरादों के कवच में पहली कमी अहंकार है। जैसे-जैसे राजनीतिक प्रधानता मजबूत होती है, सत्ताधारी यह मानने लगता है कि वह कोई गलत काम नहीं कर सकता। दृष्टिकोण में एक जिज्ञासु लेकिन घातक परिवर्तन होता है। पहले की धारणा कि जनता सबसे अच्छा जानती है, उसकी जगह इस अहंकार ने ले ली है कि मैं जानता हूं कि जनता के लिए सबसे अच्छा क्या है। शासक का अहंकार जितना अधिक होगा, उसका यह विश्वास उतना ही अधिक होगा कि वह अकेले ही सार्वजनिक भलाई का भंडार है। यह लोगों के लिए वास्तव में क्या अच्छा है यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक अनिवार्य परामर्श प्रक्रियाओं के लिए जगह को सीमित कर देता है, जिससे मनमाने, निरंकुश और मनमौजी निर्णय लेने को बढ़ावा मिलता है।
दूसरा परिणाम आंतरिक पार्टी लोकतंत्र का क्षरण है। सर्वोच्च नेता अपने अधिकार की आभा तभी कायम रख सकता है जब वह खुद को सभी सवालों से ऊपर रखे। जो लोग सवाल उठाते हैं या सलाह देते हैं, उनकी निष्ठा कम स्पष्ट होती है, यहाँ तक कि विध्वंसक भी। कामकाज की जो कॉलेजियम प्रणाली होनी चाहिए थी, उसे फिर व्यक्तिगत केंद्रित आदेशों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है, जिससे सहकर्मी उन लोगों में विभाजित हो गए हैं जो आँख बंद करके अनुसरण करते हैं और वे – बहुत, बहुत कम – जो ऐसा न करने की कीमत चुकाने को तैयार हैं।दरबारियों को जल्दी ही यह एहसास हो जाता है कि उनका व्यक्तिगत लाभ यह कहने में है कि नेता को क्या पसंद है, न कि जो उन्हें सही लगता है। परिणाम एक प्रतिध्वनि कक्ष है – तीसरी विशेषता। एक राजा और उसके वज़ीर के बारे में एक लोकप्रिय लोक कहानी इस बात को अच्छी तरह दर्शाती है। राजा बैंगन खाते-खाते थक गया था। एक दिन उसने अपने वजीर से कहा कि बैंगन बिल्कुल बेकार सब्जी है। वज़ीर पूरी तरह से सहमत हो गया, और ख़राब सब्जी की जोरदार निंदा की। कुछ दिनों बाद, राज वैद, शाही चिकित्सक, ने राजा के विचारों को न जानते हुए, उनसे बैंगन खाने के उत्कृष्ट स्वास्थ्य लाभों के बारे में बात की। अब राजा ने अपने वजीर से सब्जी की सिफारिश की।वज़ीर इससे अधिक सहमत नहीं हो सका। उन्होंने तुरंत सहमति जताई कि बैंगन वास्तव में सब्जियों का राजा है। अचानक राजा को याद आया कि वजीर ने अभी हाल ही में इस सब्जी की निंदा की थी। गुस्से से उसने पूछा कि वह दो बिल्कुल विरोधाभासी राय कैसे रख सकता है। वज़ीर का उत्तर पीढ़ियों के आसुत ज्ञान से आया। उन्होंने कहा: ‘हे भगवान, मैं आपके लिए काम करता हूं, बैंगन के लिए नहीं। अगर मैं आपसे असहमत हो जाऊं और बैंगन की तारीफ करूं तो इससे मुझे क्या फायदा होगा?’चापलूस मंडली का उदय और लोगों के हित में वस्तुनिष्ठ सलाह का अभाव, सत्ता का चौथा परिणाम है। तुलसीदास ने फिर इसे खूबसूरती से समझाया है: ‘सचिव बैद गुरु तिनि जौन, प्रिय बोलहिं भय आसा, राज धर्म तन तिनि कारा, होइ बेगिहिं नासा।’ जब एक मंत्री, एक चिकित्सक और एक धार्मिक गुरु केवल भय या पुरस्कार की आशा से सुखद शब्द कहते हैं, तो राज्य, स्वास्थ्य और विश्वास – तीनों ही कुत्तों के पास जाते हैं।जब नेता प्रतिष्ठान के भीतर केवल वही सुनता है जो वह सुनना चाहता है, तो वह लोगों से भी यही अपेक्षा करता है कि वे भी इतने आज्ञाकारी हों। जब ऐसा नहीं होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया – उसके चारों ओर गूंज कक्ष द्वारा प्रबलित – असहमत लोगों के साथ दुश्मनों के रूप में व्यवहार करना है। उन्हें राष्ट्र-विरोधी, देशद्रोही, विदेशी एजेंट, देशद्रोही और देशद्रोही करार दिया जाता है – और उनसे तदनुसार निपटा जाना चाहिए। राज्य की सारी शक्ति उन्हें चुप कराने के लिए उपयोग की जाती है। किसी भिन्न राय को स्वीकार करना कमजोरी के साथ जुड़ा हुआ है – एक मजबूत शासक के लिए अभिशाप। इस देशद्रोह से निपटने के लिए उच्च सिद्धांतों – मातृभूमि की महिमा, राज्य सुरक्षा, विश्वास की सुरक्षा – का आह्वान किया जाता है। यह सत्ता के नशे का पांचवां नतीजा है।छठा गुण है बढ़ता हुआ आत्म-प्रेम। शक्तिशाली नेता अपनी छवि को लेकर अधिक सचेत हो जाता है। वह अपनी पोशाक, अपने रूप, अपने बालों के स्टाइल, अपनी वाक्पटुता, यहां तक ​​कि अपने शारीरिक आकार को लेकर भी जुनूनी है। इस आत्ममुग्धता से सातवां परिणाम उत्पन्न होता है: ऐतिहासिक स्थायित्व की इच्छा। वह अपनी विरासत को इतिहास के पन्नों पर अंकित करना चाहते हैं। अतीत में ऐसा करने वालों की आलोचना करते हुए, अब वह उनका अनुकरण करते हैं: शहरों का पुनर्निर्माण किया जाता है, पुराने कबाड़ को नष्ट कर दिया जाता है, और उनकी स्मृति में इमारतों का नाम बदल दिया जाता है। भावी पीढ़ी को अपने युग की महानता को याद करने के लिए प्रतीक दिए जाने चाहिए – चाहे आवश्यक हो या नहीं।अंतिम परिणाम किसी भी तरह सत्ता से चिपके रहने का दृढ़ संकल्प है। इस उद्देश्य के लिए कोई भी तरीका उचित है, जिसमें अनैतिक धन शक्ति और लोगों को विभाजित करने के लिए धर्म का निंदनीय उपयोग शामिल है। मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखा: ‘हर बुलंदी के नसीबों में है अतीत एक दिन।’ हर शिखर में उसके पतन का बीज छिपा होता है। आम आदमी, धैर्यवान लेकिन बुद्धिमान, इस ऐतिहासिक अनिवार्यता को प्रकट होते देखता है।

देव और दानवों की भूमि में प्राप्त शक्तियों का दुरूपयोग एक स्वाभाविक क्रिया हैं?प्राप्त शक्तियों का दुरुपयोग राक्षसी गुण हैं,मानवता के लिए शक्ति का सदुपयोग हो न कि दुरुपयोग…

वर्तमान समय का यदि ठीक से मूल्यांकन एवं विश्लेषण किया जाये तो स्पष्ट रूप से देखने में आ रहा है कि किसी को भी किसी भी प्रकार की शक्ति चाहे वह सत्ता के रूप में, अर्थ के रूप में, धार्मिक शक्ति के रूप में या कानून के रूप में,बाहुबल के रूप में या किसी अन्य रूप में प्राप्त हो रही है तो उसका उपयोग मानवता की रक्षा के लिए कम, अपनी ताकत को और अधिक बढ़ाने के लिए अधिक हो रहा है।यदि यह कहा जाये कि यदि कोई भी व्यक्ति, समूह, समाज या राष्ट्र सिर्फ अपनी ताकत को और अधिक बढ़ाने में हमेशा लगा रहे तो उस ताकत के दुरुपयोग की संभावना सदैव बनी रहती है। जैसे कि आपने धार्मिक टीवी सीरियलों में देखा होगा या सनातन धर्म ग्रंथ में पढ़ा होगा राक्षसो को जब जब भी घोर तपस्या करने के बाद दिव्य  शक्तियां प्राप्त हुई उन्होंने उन शक्तियों का हमेसा दुरुपयोग ही किया चाहे वहां भस्मासुर हो या कोई और किन्तु जितने भी देवपुत्र हुए उनको भी घोर तपस्या करने के बाद दिव्य शक्ति प्राप्त हुई तो उन्होंने उन शक्तियों को समाज और धर्म की रक्षा में सदुपयोग किया यही मुख्य कारण रहा जिस बजह से आज हम उन देवपुत्रो की पूजा करने के साथ ही उन्हें अपना आदर्श भी मानते हैं।किन्तु प्राप्त शक्तियों का दुरुपयोग करने बाले राक्षसों को कोई भी अपना आदर्श नही मानता हैं। उदाहण के तौर पर वर्तमान समय मे कुछ जाति विशेष को भी क़ानून की पुस्तक में अपनी रक्षा हेतु कई तरह की शक्तियां प्रदान की हैं किंतु उन शक्तियों का उपयोग अपनी रक्षा की बजाय लोग अन्य जाति के लोगों को कष्ट और पीड़ा देने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है।जिस बजह से आज का सामाजिक माहौल पूरी तरह से दूषित हो चला हैं इस देश के नीतिनिर्माताओं को भी आज बड़ा ही दुख होता होगा?कि जिस शक्तियों को उन्होंने स्वयं की रक्षा के लिए क़ानून की पुस्तक द्वारा दी गई थी आज वही शक्तियां लोगो के लिए एक हथियार के रूप में उभर कर सामने आई हैं।चलिए छोड़ते हैं। ऐ भारत भूमि हैं यंहा तो देव और दानवों की भूमि अनादि काल से रही हैं यंहा देव और दानवों के गुण पाए जाना एक स्वाभाविक  क्रिया हैं।
जब मानवता की रक्षा एवं उसके लिए कुछ करने की बात आती है तो भारत सहित पूरे विश्व की राजनैतिक, सामाजिक आर्थिक, धार्मिक एवं अन्य सभी परिस्थितियों का आंकलन किया जाये तो स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है कि इन हालातों में जिसके पास शक्ति आ रही है, अधिकांशतः उसका दुरुपयोग ही हो रहा है। अब सवाल यह उठता है कि किसी भी समस्या का समाधान हमें वर्तमान में ही रहकर ढूंढ़ना होता है तो ऐसी स्थिति में वर्तमान में इस दिशा में कोई रास्ता दिखा पाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है तो अतीत से सीख लेते हुए वर्तमान एवं भविष्य को सजाया-संवारा जा सकता है।यदि हम अपनी गौरवमयी सनातन सभ्यता-संस्कृति, प्रकृति एवं महापुरुषों से कुछ जानना एवं सीखना चाहें तो सब कुछ आसान हो जाायेगा। सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में तो ऐसे-ऐसे उदाहरण हमें देखने-सुनने को मिलेंगे कि यदि उस पर अमल कर लिया जाये तो उससे सीख लेते हुए वर्तमान में शक्ति का उपयोग मानवता के लिए होने लगेगा और बिल्कुल असहाय, लाचार एवं निराश्रित व्यक्तियों का भी जीवन आसानी से कट जायेगा।
अब हम अपनी गौरवमयी सनातन संस्कृति की तरफ चलें। ते्रता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हमारे लिए सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत हैं। उन्हें दैवीय कृपा से जब शक्ति मिली तो उन्होंने शक्ति का दुरुपयोग करने के बजाय अपनी शक्ति का उपयोग मानवता की रक्षा के लिए किया। चैदह वर्ष तक जंगलों में रहकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने राक्षसों एवं दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों का वध करके ऋषियों-मुनियों एवं जनता-जर्नादन को शांति और सुखमय जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त किया। यदि वे चाहते तो माता कैकेयी की बात न मानकर अयोध्या का राजा बनकर ऐशो-आराम की जिंदगी बिताते किन्तु उन्होंने समाज एवं राष्ट्र का मार्गदर्शन कर बताया कि शक्ति का सदुपयोग मानवता की रक्षा के लिए होना चाहिए, न कि उसका दुरुपयोग होना चाहिए। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति का उपयोग मानवता की रक्षा के लिए किया। बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान देकर समाज को एक आदर्श जीवन जीने का रास्ता भी बताया। भगवान श्रीकृष्ण ने साफ तौर पर यह भी कहा है कि मानवता की राह पर चलते हुए यदि आप को कष्ट ही कष्ट मिलें तो भी उस पर चलते रहना चाहिए क्योंकि सद्मार्ग पर चलना स्वयं में मानवता की रक्षा ही है।

महात्मा बुद्ध, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, सम्राट अशोक, चंद्र गुप्त मौर्य जैसी महान विभूतियों ने अपने त्याग एवं आचरण से सर्वदा यह बताने का कार्य किया है कि लोग जिस ऐशो-आराम एवं रुतबे के लिए अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने में लगे हैं, उससे कभी न कभी मन ऊब जाता है और मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न हो जाता है तो ऐसी स्थिति में बिना लाग-लपेट के यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति को सदा वही कार्य करना चाहिए जिससे उसका मन कभी न ऊबे और वह सदा उस काम में लगा रहे। इस दृष्टि से यदि देखा जाये तो वह काम मात्र मानवता की रक्षा और उसकी सेवा ही है।

महान संत वाल्मीकि पहले डाकू थे किन्तु जब उन्हें यह ज्ञात कराया गया कि वे जिस रास्ते पर जा रहे हैं, वह अनीति एवं अधर्म का है तो उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया और सद्मार्ग पर चलकर मानवता की रक्षा में लग गये। यह सब लिखने के पीछे मेरा मकसद मात्र यही है कि मानवता के रास्ते पर आने और उस पर कार्य करने के लिए हमारी गौरवमयी सनातन संस्कृति बहुत मददगार साबित हो सकती है। हमारे वेद-पुराण और धार्मिक ग्रन्थ हमें यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि मानवता की राह पर चलकर न सिर्फ हमारा वर्तमान अच्छा बनता है अपितु भविष्य भी उज्जवल बनता है और पूर्व के पापों का भी निवारण होता है।

मानवता की रक्षा के लिए यदि हम कुछ सीखना चाहें तो प्रकृति हमारे लिए सबसे बेहतर शिक्षक की भूमिका निभा सकती है। प्रकृति की तमाम चीजों को भले ही नजर अंदाज कर दें किंतु यदि पंच तत्वों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु को ही अपना शिक्षक मान लें तो अपनी शक्ति का उपयोग मानवता के लिए करने लग जायेंगे। शक्ति की बात यदि की जाये तो मानव इन पंच तत्वों के आगे कहीं टिकता भी नहीं है।

उदाहरण के तौर पर पृथ्वी यदि यह कह दे कि मेरा उपयोग मात्र कुछ लोग ही कर सकते हैं तो क्या होगा? इस बात का अंदाजा बिना किसी के समझाये ही लगाया जा सकता है किन्तु पृथ्वी की महानता देखिये, इतना शक्तिशाली होते हुए भी उसका भाव अमीर-गरीब, शक्तिशाली एवं कमजोर सभी के लिए एक जैसा ही है। इसी प्रकार हवा ने भी कभी यह नहीं कहा कि मेरा उपयोग सिर्फ अमीर कर सकते हैं, गरीबों के लिए मैं हवा नहीं प्रदान कर सकती तो क्या होगा? किन्तु हवा का इतना शक्तिशाली होने के बावजूद उसका नजरिया ब्रह्मांड के सभी प्राणियों के लिए एक जैसा है। इसे कहते हैं, शक्तिशाली होने के बावजूद अपने अस्तित्व को सिर्फ मानवता के साथ जोड़कर रखना। इसी प्रकार अग्नि, आकाश और जल जो सर्वशक्तिमान हैं, जिनके आगे कोई टिक नहीं सकता है, यदि ये अपनी ताकत का उपयोग अपनी इच्छानुसार करने लगें और यह कह दें कि उनका उपयोग सिर्फ वही लोग करें जिन्हें वे इजाजत दें तो पूरे विश्व में त्राहिमाम मच जायेगी।

यह सब लिखने का मेरा आशय मात्र इतना ही है कि वास्तव में जो ताकतवर है, उसका जीवन समाज में मानवता की रक्षा के लिए होना चाहिए। उसकी ताकत का प्रयोग प्राणि मात्र की भलाई एवं कल्याण के लिए होना चाहिए किन्तु आज शक्ति का उपयोग किस लिए हो रहा है, इसका उदाहरण कदम-कदम पर देखा जा सकता है। अभी कोरोना की दूसरी लहर में देखने को मिला कि किस प्रकार लोगों ने आक्सीजन और दवाइयों के लिए बीमार एवं परेशान लोगों के साथ किस स्तर तक जाकर छल किया। साइबर क्राइम वाले तो अनवरत लूट का नया-नया कीर्तिमान बनाते जा रहे हैं। राजनीति एवं शासन-प्रशासन में जिसकी चल रही है, वह अपनी खूब चला रहा है। बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो बिना किसी स्वार्थ के लाचार एवं बेबश लोगों की मदद कर रहे हैं।

आज तो ऐसा वातावरण बना हुआ है कि ‘काम बनता है अपना तो भाड़ में जाये जनता’ मगर यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम चरित मानस में लिखा है कि ‘समरथ को नहिं दोष गुंसाईं’ यानी जो व्यक्ति अपने आप में समर्थ है, उसका कोई दोष नहीं है परंतु उसी राम चरित मानस में यह भी कदम-कदम पर वर्णित है कि आप की ताकत का उपयोग यदि जन कल्याण एवं सर्व सामान्य के लिए हो रहा है तो उसका सर्वत्र स्वागत है अन्यथा उस ताकत को कहीं भी न तो सम्मान मिल पाता है और न ही कहीं स्वीकार किया जाता है।

वर्तमान समय की बात की जाये तो जैन संत आचार्य विद्या सागर, उद्योगपति रतन टाटा, अजीम प्रेम जी एवं बिल गेट्स जैसे लोग मानवता के लिए निहायत ही सराहनीय कार्य कर रहे हैं।

अपनी सनातन संस्कृति के आधार पर यदि वर्तमान भारतीय राजनीति की बात की जाए तो जनसंघ के संस्थापक सदस्य एवं जनसंघ के दूसरे अध्यक्ष पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी का ‘अंत्योदय’ का सिद्धांत भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को रास्ता दिखाने का कार्य कर सकता है।

गौरतलब है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारतीय राजनीति में ‘अंत्योदय’ का सिद्धांत दिया था। इस सिद्धांत के अनुसार ‘अंत्योदय’ यानी समाज में अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति ही हमारे चिंतन एवं कार्य करने का केन्द्र होना चाहिए और सरकारें जो भी नीति बनायें, समाज में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति यानी ‘अंत्योदय’ को ही ध्यान में रखकर बनायें। कमोबेश,अब बड़ा सवाल उठता हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी और उसके कार्यकर्ता क्या आज भी उसी सिद्धांत पर चलते हुए उसी पर अमल कर रही है?प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बात कही थी, उसके बाद उसमें ‘सबका विश्वास’ भी जुड़ गया किन्तु प्रधानमंत्री जी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से उसमें एक शब्द और ‘सबका प्रयास’ भी जोड़ दिया। अब वह पूरा वाक्य इस प्रकार हो गया है कि ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास और सबका प्रयास।‘
इस पूरे वाक्य का यदि विश्लेषण किया जाये तो स्पष्ट होता है कि इसमें सर्व सामान्य के हित की बात कही गई है। अब यह अलग बात है कि राजनीति में सर्वत्र इसका कितना उपयोग होता है या दुरुपयोग? किन्तु यदि नीयत पाक-साफ हो तो उसका कुछ न कुछ सकारात्मक परिणाम तो आ ही जाता है। वैसे भी हर दौर में अच्छे-बुरे लोग हुए हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि अच्छे लोग अपनी सकारात्मक भूमिका का निर्वाह अच्छी तरह कर दें तो उनको देखकर बुरे लोगों को भी अच्छी राह पर आना पड़ता है, इसलिए अच्छे लोगों को आगे आकर अपनी सकारात्मक एवं सक्रिय भूमिका का निर्वाह स्वयं तो करना ही होगा और ऐसा करने के लिए अन्य लोगों को भी प्रेरित करना होगा। इसी मार्ग पर ही चलकर मानवता का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं है।

सीएम के सामने भाजपाइयों की दबंगई पत्रकार की कर दी पिटाई।

छत्तीसगढ़ में भाजपा अपनी जीत से उत्साहित होकर सभी संभागों में कार्यकर्ताओं का सम्मान कर रही है।सीएम विष्णुदेव साय अपने मंत्रियों के साथ कार्यकर्ताओं का अभिनंदन कर रहे हैं।लेकिन शायद इस अभिनंदन से भाजपा कार्यकर्ता अति उत्साहित हो गए है।अंबिकापुर में कार्यक्रम के दौरान मीडियाकर्मी ने भाजपा कार्यकर्ता पर पिटाई का आरोप लगाया है।

सरगुजा में सीएम के सामने पत्रकार की पिटाई सरगुजा

अंबिकापुर में कार्यकर्ताओं का अभिनंदन करने भाजपा प्रभारी ओम माथुर, सीएम विष्णु देव साय समेत दोनो डिप्टी सीएम, मंत्री और विधायक पहुंचे हुये थे. यहां संभाग भर से कार्यकर्ताओं को बुलाया गया था।प्रभारी ओम माथुर ने कार्यकर्ताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, मुख्यमंत्री समेत लगभग पूरे मंत्री मंडल को खड़े कराकर कार्यकर्त्ताओं का अभिवादन कराया, इस दौरान दो बार ओम माथुर ने कार्यकर्ताओं को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और सुरक्षा कर्मियों को तल्ख लहजे में हिदायत भी दी,कार्यकर्ता उत्साह से भर गये, लेकिन कुछ कार्यकर्ता अति उत्साह में गलती कर बैठे,सम्मान पाने में उन्माद में भाजपा कार्यकर्ताओं ने मीडिया कर्मी को ही पीट दिया।आपको बता दें कि पत्रकार के साथ मार पिटाई की यह घटना तब हुई।जब पत्रकार सीएम की बाइट लेने वाले थे। पत्रकरों ने मामले की शिकायत सीएम से करते हुये नाराजगी जाहिर की है। इतना ही नहीं स्थिति इतनी बिगड़ गई की पत्रकारवार्ता को बहिष्कार करने की नौबत तक आ गई।हलाकि वरिष्ठ भाजपा नेताओं के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हो गया।सूत्रों की मानें तो जिस पत्रकार के साथ घटना हुई है. वह अंबिकापुर बताया जा रहा है। वही घटना को अंजाम देने वाले भाजपा कार्यकर्ता सूरजपुर जिले है।जिनका नाम अजय अग्रवाल उर्फ़ अज्जू, संस्कार अग्रवाल और रंजन सोनी बताया जा रहा है।
घटना के बाद जैसे ही मुख्यमंत्री साय वहां पहुंचे पत्रकारों ने एक सुर में घटना को लेकर कड़ा विरोध जताया। इससे पहले प्रवेश द्वार में पत्रकारों एवं भाजपा कार्यकर्ताओं से भी काला कोट या जैकेट उतारने को कहा गया।जिस पर हंगामे की स्थिति निर्मित हो गई. प्रशासनिक व्यवस्था के ढीले वाले रवैए की वजह से कार्यक्रम अवस्थित भी हो गया।
कुछ ही देर पहले मंच से भाजपा प्रदेश प्रभारी ओम माथुर ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया था।जीत के लिए शाबासी दी थी थोड़ी ही देर में हौसला इतना बढ़ गया कि स्थिति मार पिटाई तक पहुंच गयी।

मीडियाकर्मियों ने सीएम से जताई नाराजगी

घटना उस समय हुई जब मुख्यमंत्री इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बयान देने के लिए बनाए गए डायस के पास पहुंच रहे थे।कैमरे में दिखने में चक्कर मे सीएम के आने से पहले ही डायस के आसपास भाजपा नेताओं ने भीड़ लगा ली। एक इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार ने उनसे जगह देने के लिए कहा तो इससे भड़के सूरजपुर के एक भाजपा नेता अजय अग्रवाल सहित साथियों ने पत्रकार के साथ मारपीट कर दी. जिसके बाद तनाव की स्थिति बन गई।मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से घटना को लेकर पत्रकारों ने नाराजगी जताई, लेकिन मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री ने घटना पर कुछ नहीं कहा। मीडिया कर्मी ने घटना की शिकायत गांधीनगर थाने में दर्ज कराई है।कांग्रेस ने कहा- शुरू हुई गुंडागर्दी:कांग्रेस ने इस घटना को दुखद बताते हुए निंदा की है।कांग्रेस जिलाध्यक्ष राकेश गुप्ता ने कहा कि “सरकार में आते ही भाजपा नेताओं ने गुंडागर्दी शुरू कर दी है।आदिवासी पत्रकार पर हमले के दौरान पुलिस अधिकारी मूकदर्शक बने रहे, यह निंदनीय है।सरगुजा संभाग से पहले मुख्यमंत्री की अंबिकापुर में पहली सभा में इस तरह की घटना से सरगुजा शर्मसार हुआ है।

एक महा में ही चढ गया भाजपाईयों को सत्ता का नशा?

समाज में कई  प्रकार का नशा है। हर नशा अपने आप में बहुत खास  होता है, जैसे की देश को सुधारने का नशा। आज हर कोई देश को सुधारने की बात करता है, जैसे वह देश सुधारने के लिए पैदा ही हुआ है। मगर खुद सुधरने को कोई तैयार नहीं है।  काम करने का नशा-  की इनके काम करने से ही देश चलेगा। खाकी  वर्दी का नशा- यह खौफ पैदा करने के लिए जरुरी है , यह नशा जब चढ़ता है तो उतरता बड़ी मुश्किल से है, जब तक की मोटी  कमाई  न कर ले या किसी को फर्जी रूप से फँसा  न ले। धन कुबेर होने का नशा- जब यह नशा परवान चढ़ता है तो तो फिर व्यक्ति ताजमहल और टैतेनिक तक को खरीदने का ख्वाब देखने लगता है। जबकि यह सच्चाई है की वह निस्वार्थ भाव से धन खर्च नहीं करना चाहता है। प्रेम का नशा- इस जूनून में न जाने कितने आशिक अपने आप को बर्बाद कर डाले, न जाने कितनी सियासते बदल गई। समाज सेवा का नशा- जो दिल की गहराई  से नहीं बल्कि ज्यादातर लोगों द्वारा नाम चमकाने के लिए किया जाता है ।दारू का नशा, भांग का नशा, चरस, अफीम का नशा, शुर्ती, बीड़ी का नशा और न जाने इतने सारे नशों  के बीच  में सत्ता का नशा।  और अब हम बात कर रहे है इसी नशे की यानी  सत्ता का नशा। ”सत्ता” नाम में ही कुछ ऐसा है, जिसे सुनकर ही कुछ -कुछ होने लगता है , चाल में कड़क आ जाती है, आवाज में खनक आ जाती है, और दिमाग में एक अलग तरह का सुरूर चढ़ने लगता है ।
यह सच है की दुनिया का सबसे बड़ा नशा सत्ता में होता है। इसके सामने सारे नशे  फीके है। शराब का नशा शराब पीने के बाद शुरू होता है। पीते ही नशा चढ़ने लगता है और आदमी कुछ  देर तक आय-बाय-साय और न जाने क्या-क्या बडबडाने लगता है। और कुछ ही पल के बाद नशा उतर जाने के बाद व्यक्ति को अपने द्वारा किये गये कृत्य याद ही नहीं रहता  है। भाँग का नशा भी पीने के बाद ही सुरु होता है। शराब की वैरैटिया भी बहुत किस्म की है। किसी का नशा बहुत होता है तो किसी का बहुत कम। कोई भी शराब कितनी भी स्ट्रोंग क्यों न हो, बोतल या गिलास पकड़ने से नशा कभी नहीं करती, जब तक शराब गले में नीचे नहीं उतरती, तब का कोई असर नहीं दिखाती है। ऐसे ही कई प्रकार के नशे पाउचों में या पुडियों में  होती है। हिरोइन हो या चरस ये भी जब तक गले के नीचे  नहीं जाती अपना असर नहीं दिखाती है। किन्तु ये सब नशे सत्ता मद की नशे के आगे बेकार ही है, क्योकि  सत्ता का नशा की बात ही कुछ निराली है।  हवा में थोडा सा सत्ता का गंध आते ही अपना असर दिखाना सुरु कर देती है।

पुरानी  कहावत भी है –
कनक-कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय ।
या खावै बौराय जग,वा  पावै बौराय ।।

सत्ता का नशा कोई आज का नया नशा नहीं है बल्कि प्राचीन काल से चला आ रहा है। सत्ता के नशे का तो इतिहास गवाह है कि इस सत्ता के नशे ने न जाने कितने लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। शाहजहाँ ने भी मजदूरों के हाथ कटवाकर बेकार कर दिया। सत्ता के मद में न  जाने कितने जानवरों के सिर काटे गए ,कितने आखेटो के शिकार हुए , कितने इन्सान मारे गए, कितनो की बलि चढ़ाई गई । इतिहास गवाह है की सत्ता को बनाये रखने के लिए समय-समय पर युद्ध होते रहे है। चाहे वह वाक युद्ध ही क्यों न हो। दूसरों को भूखा देखने का नशा अपने आप को बड़ा ही सुकून देता है। दुसरे की थाली की रोटी मुझे ही चाहिए भले ही ओ फेकनी ही क्यों न पड़े । ताकत का नशा भी बड़ा सुकून देने वाला होता है।छीनने में अपनी ताकत का एहसास होता है। इस तरह के लोगों का सबसे बड़ा दुःख यह नहीं की वह अपने दुःख से दुखी है। बल्कि सबसे बड़ा दुख यह है की दूसरा सुखी क्यों है।
सत्ता का नशा भी कुछ इस प्रकार है। जिसके पास सत्ता है वह उसका प्रयोग करेगा ही। चाहे वह करे या सही। जैसे की सत्ता में आने के एक माह बीत जाने पर ही आजकल भाजपाईयों की सत्ता का नशा भी ऐसा ही कुछ है जो आजकल अपने पावर का उपयोग पत्रकारों की पिटाई कर रहे है।अभी तो साहब एक माह बीता है अभी पूरे पांच साल बचे हैं।भाजपा के कार्यकर्ता सत्ता के नशे में आकर गलत निर्णय लेकर सरकार को भी बदनाम कर रहे है? जिसके पास सत्ता है, वह उसका प्रयोग करेगा ही और सच्चाई भी यही है।

चाहे वह उसका प्रयोग अच्छाई के लिए करे या बुराई के लिए। सुख प्राप्त करने के लिए दुसरे का गला क्यों न घोटा जाय। अपने से कमजोर लोगो को दुःख पहुचाकर ही इन लोगो को सुख मिलता है। जबकि कबीर दास जी ने भी कहा था-

दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय।

मरी  खाल की साँस से, लौह भस्म हो जाय।।

कुर्सी पर विराजमान लोग यही तो करते है। अपने अधिकारों का दुरूपयोग और है। और इसमें कुर्सी पर बैठे लोगों को बड़ी ही तसल्ली,संतुष्टि ,शान्ति  और राहत मिलती है। जब सत्तासीन व्यक्ति सत्ता विहीन व्यक्ति को दीन और निरीह हालात में देखता है तब, उसे बड़ी आनंद की प्राप्ति होती है। कुछ सुख ऐसे होते है, जो  पैसे के बल पर नहीं ख़रीदे जा सकते है और न ही इन सुखों को प्रत्येक व्यक्ति भोग सकता  है, क्योकि प्रत्येक व्यक्ति की मानसिकता एक सी नहीं होती है। ऐसा नहीं की सत्ता का नशा उतरता नहीं। जैसे शराब का नशा उतरता है वैसे ही सत्ता का नशा भी उतरता है। जिस प्रकार शराब का नशा उतरने के साथ ही अनिद्रा, सिर दर्द , चिडचिडापन ,थकान का उपहार देकर जाता है, उसी प्रकार जब सत्ता का नशा उतरता है तो चिडचिडापन, डिप्रेशन, पागलपन जैसी बीमारी देकर जाता है, क्योकि जो चमचा वर्ग स्वार्थ के लिए कुर्सी से चिपका रहता था, वह सत्ता के जाते ही दूर छिटक जाता है। वह अब नये आने वाले की चमचागिरी शुरू कर देता है।
आज भी समाज में आपको ऐसे नेता, अभिनेता, प्रशासनिक वर्ग इत्यादि लोग मिल जायेगे, जब तक वे सत्ता में रहे, अपनो से कटे रहे, अब अपने उनसे कटे हुए है। इसलिए अच्छा है की व्यक्ति समय रहते ही संभल जाय।अहंकार से दूर रहे और शुरू से ही अच्छा व्यक्ति बने रहने का प्रयास करे । स्वार्थी और चमचा टाईप के लोगो से दूर रहे, तभी उनकी सोच स्वस्थ रहेगी ।और तभी बनेगा उत्तम प्रदेश और देश ।

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