गरियाबंद/फिंगेश्वर(गंगा प्रकाश)। राज्य शासन द्वारा भू-राजस्व संहिता 1959 छ.ग. की धारा 109, 110 एवं बंटवारा एवं अन्य त्रुटि सुधार 115, 116, 117 में दिनांक 04.05.2022 के द्वारा संशोधन कर नामांतरण कि प्रक्रिया को ई-नामांतरण पोर्टल के द्वारा निश्पादित किया जाना संशोधित किया गया है। इससे ग्रामीणों को काफी कठिनाई हो रही है। इससे प्रकरण के बारे में न्यायालयीन प्रक्रिया की जानकारी ग्रामीण समझ नहीं पा रहे है। संशोधन अनुसार ऑनलाईन प्रक्रिया में नामांतरण किया जाना न्यायलयीन प्रक्रिया के अनुसार न होकर इसके विपरीत है। ऑनलाईन नामांतरण की प्रक्रिया खुले न्यायालय में नहीं किया जाता है जिसके कारण संहिता में उल्लेखित प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया जा रहा है। केवल कार्यवाही करते हुए वास्तविकता से परे कार्यवाही की जाती है। खुले न्यायालय के बजाय बंद कमरे/अंधेरे की कार्यवाही हो रही है। न्यायलयीन प्रक्रिया विधि अनुसार खुले न्यायालय एवं बोलता हुआ आदेश के विपरीत है। धारा 110 के नियम 3 के उप नियम ख एवं ग के अनुसार समस्त हितबद्ध पक्षकारों को व्यक्तिशः नोटिस जारी किया जाना एवं आम सूचना ईश्तहार का प्रकाशन कार्यालयीन सूचना पटल, संबंधित ग्राम-नगर में निर्धारित स्थान एवं विभागीय वेब पोर्टल पर किया जाना उल्लेखित है जिसका नियम 27 का पूर्णतः पालन नहीं किया जाता है। जिसके कारण आवश्यक पक्षकारों को नियम समयावधि में सूचना प्राप्त नहीं हो पाती है। ग्रामीणों ने बताया कि ई-नामांतरण एवं बंटवारा अन्य त्रुटि सुधार 115, 116, 117 प्रक्रिया में सभी कार्यवाही किए जाने से संबंधित पक्षकारों को उक्त संबंध में विशय से संबंधित तथ्यों के परे में जानकारी नहीं होने से नामांतरण विशयक तथ्यों में अनभिज्ञता बनी रहती है। ऑनलाईन प्रक्रिया होने की वजह से तहसीलदार एवं संबंधित पटवारी द्वारा उक्त प्रक्रिया में उल्लेखित किये गये तथ्य/प्रतिवेदन कि किसी भी प्रकार से संबंधित लोगों को जानकारी नहीं दी जाती जिसके कारण आदेश होने के पश्चात् कई विसंगतिया परिलक्षित होती है जो कि ग्रामीणों के लिए अनावश्यक परेशानी का कारण बनता है। ऑनलाईन नामांतरण प्रक्रिया में साक्ष्य अनुप्रमाणन विशयक दस्तावेजों का भी संचालन/निश्पादन किया जाता है जो कि विधि एवं साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है। नामातंरण के लिए केवल ऑनलाईन व्यवस्था होने के कारण साक्ष्य विशयक दस्तावेज जैसे दान-पत्र एवं वसीयत आदि के प्रावधानों का पालन नहीं हो पाता। ऐसे दस्तावेजा को खुले न्यायलयन प्रक्रिया में विधिनुसार साबित/अनुप्रमाणित किये जाने के पश्चात् नामांतरण का आदेशदिया जाता है जो कि ऑनलाईन प्रक्रिया में किया जाना प्रावधानों के विपरीत है। समुचित नोटिस एवं ईश्तहार के अभाव में साक्ष्यगत दस्तावेजों को विधि विपरीत तरीके से ऑनलाईन प्रक्रिया में निपटाया जा रहा है। इससे प्रकरणों में प्रगति की जानकारी आवेदक को स्पश्ट नहीं हो पाती। ऑनलाईन प्रक्रिया के नियम 5 में उल्लेखित अनुसार सुनवाई का युक्ति युक्त अवसर देने एवं आवश्यक जांच करने के पश्चात् आदेश करेगा एवं राजस्व अभिलेखों में संशोधन करेगा। किसी प्रकार पालन नहीं किया जा रहा है। आदेश के बाद भी हल्का पटवारी द्वारा संबंधित नक्शा में आवश्यक संशोधन नहीं किया जा रहा है क्योंकि नक्शा काटने या संशोधन करने के लिए पटवारी, आरआई (राजस्व निरीक्षक) से अप्रुवल अनुमति लेनी होती है। जो कि विरोधाभाश एवं पेचदगी से भरी है। जिसकी वजह से तहसीलदार के आदेश के बाद भी नक्शा काटने या संशोधन नहीं हो पा रहा है। न्यायालय शब्द का अतिलंघन है यह ऑनलाइन व्यवस्था जो कि शोशण करने का एक माध्यम बन गया है। इसममें संशोधन अथवा सुधार के लिए आवेदकों को पटवारी-वकील के चक्कर लगाने पड़ते है। जबकि व्यवहार न्यायालय में पारदर्शिता पूर्ण तरीके से पक्षकारों के संज्ञान में लिया जाकर संचालित किया जाता है उसके विपरीत राजस्व न्यायालय में ऑनलाईन प्रक्रिया को संचालित किया जा रहा है। उपरोक्त गंभीर विसंगतियों को दुर करते हुये ऑनलाईन व्यवस्था को व्यवहार न्यायालय की तरह खुले न्यायालय के रूप में क्रियान्वयन कराने की जरूरत है। जिससे राजस्व मामले में ग्रामीणों को बेवजह परेशान न होना पड़े।


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