रिपोर्ट:मनोज सिंह ठाकुर
नई दिल्ली (गंगा प्रकाश)।
यह वामपंथी सोच ही है कि कांग्रेस जातिगत जनगणना करने और आरक्षण सीमा को 50 प्रतिशत से ज्यादा करने का वादा कर रही है। 1951 की जनगणना के दौरान भी जातिगत गणना कराने की मांग रखी गई थी लेकिन तब पं. नेहरू और सरदार पटेल ने इसे खारिज कर दिया था। सरदार पटेल का मानना था कि इससे जातीय तनाव बढ़ेगा।
पिछले दिनों कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपना घोषणा पत्र जारी किया। पार्टी ने इसे न्याय पत्र-2024 नाम दिया है। 48 पृष्ठों के इस दस्तावेज को पढ़कर ऐसा लगता है कि कांग्रेस दुविधा में है। इसमें पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर मोदी सरकार की नीतियों का मौन समर्थन करती नजर आ रही है। आर्थिक मोर्चे पर अपनी गलतियों को सुधारती दिख रही है। साथ ही सामाजिक मुद्दों पर वामपंथी वैचारिकी से पूरी तरह ओतप्रोत नजर भी आ रही है।

उसके द्वारा मुस्लिम पर्सनल लॉ का समर्थन भी इसी का विस्तार लगता है। शायद इसी वजह से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि कांग्रेस के न्याय पत्र पर मुस्लिम लीग और वामपंथ की छाप दिखती है। कांग्रेस ने घोषणा पत्र में पांच न्याय और 25 गारंटियों के जरिये न्याय देने-दिलाने का वादा किया है। आजाद भारत के 77 में से करीब 55 साल तक कांग्रेस का ही शासन रहा है, तो क्या यह मान लिया जाए कि उसके शासन काल में न्याय की गारंटी कभी नहीं रही?

वास्तव में कांग्रेस नेतृत्व के सलाहकारों में वामपंथी सोच से ग्रस्त लोगों का दबदबा बढ़ा है, जिसका असर न्याय पत्र में भी दिखता है। पुरानी पेंशन योजना की मांग इसी का नतीजा थी। पिछले कुछ विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी ने इसे लागू करने का जोर-शोर से वादा किया था। माना गया कि कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश चुनाव में कांग्रेस को इसी मुद्दे पर जीत मिली, लेकिन न्याय पत्र में पार्टी ने इस पर चुप्पी साध ली।

शायद उसे लगने लगा है कि आर्थिक रूप से यह उचित नहीं। उधर कर्नाटक में पांच गारंटियों को ही लागू करने के चलते बीस हजार करोड़ रुपये की योजनाएं ठप करनी पड़ी हैं। हिमाचल की कांग्रेस सरकार भी इस मोर्चे पर कठिनाई महसूस कर रही है। राजस्थान में सत्तारूढ़ रही गहलोत सरकार ने इसे लागू करने का एलान किया था, लेकिन वह भी धन के अभाव के कारण परेशान रही। शायद इसी कारण से कांग्रेस ने अब इस मुद्दे को टाल दिया है।

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने न्यूनतम न्याय योजना का वादा किया था, लेकिन इस बार पार्टी ने इससे किनारा कर लिया है। लगता है कांग्रेस समझने लगी है कि न्यूनतम न्याय या पुरानी पेंशन योजना को लागू कर पाना आसान नहीं है। न्याय पत्र में पार्टी ने बेरोजगारी को मुद्दा तो जरूर बनाया है, लेकिन इसे दूर करने की दिशा में उसने सिर्फ सरकारी क्षेत्र में तीस लाख नौकरी देने का ही वादा किया है।

सरकारी नौकरी के सोच के मूल में वामपंथी सोच है, जिसे नेहरूवादी समाजवादी व्यवस्था ने भी स्वीकार किया था। कांग्रेस इस मोर्चे पर वामपंथी सोच के साथ नेहरूवादी समाजवाद से ग्रस्त है, लेकिन सवाल है कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों से इतने विशाल देश को रोजगार के मोर्चे पर सफलता मिल सकती है?

यह वामपंथी सोच ही है कि कांग्रेस जातिगत जनगणना करने और आरक्षण सीमा को 50 प्रतिशत से ज्यादा करने का वादा कर रही है। 1951 की जनगणना के दौरान भी जातिगत गणना कराने की मांग रखी गई थी, लेकिन तब पं. नेहरू और सरदार पटेल ने इसे खारिज कर दिया था। सरदार पटेल का मानना था कि इससे जातीय तनाव बढ़ेगा। मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण का प्रविधान किया है। कांग्रेस ने इस आरक्षण के दायरे में भी हर वर्ग को शामिल करने का वादा किया है। बीते कुछ वर्षों से आंदोलित कुछ किसान संगठन स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुकूल एमएसपी की गारंटी मांग रहे हैं।

आर्थिक दबाव में इसे पूरी तरह स्वीकार करने से सरकारें बचती रही है। चूंकि कांग्रेस उनके आंदोलन को समर्थन देती रही है, ऐसे में इसका असर न्याय पत्र पर भी दिख रहा है। वामपंथी सोच के चलते कांग्रेस भूल गई है कि मनमोहन सिंह की अगुआई वाली सरकार इस मांग से मुकर गई थी। कांग्रेस ने जीएसटी को भी खत्म करने का वादा किया है। वैसे जीएसटी का विचार मनमोहन सिंह सरकार के दौरान ही आया था, लेकिन वामपंथ के प्रभाव में आकर कांग्रेस अब इसे नकार रही है। अपने पिछले घोषणा पत्र में पार्टी ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अफस्पा जैसे कानून तक का विरोध किया था, लेकिन इस बार इसके साथ-साथ अनुच्छेद-370 और नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए पर भी पार्टी ने चुप्पी साध ली है। लगता है वह इन मसलों पर केंद्र सरकार के फैसले का विरोध करने की स्थिति में नहीं है।

इन दिनों चुनाव आयोग पर भी कांग्रेस की नजरें टेढ़ी हैं। वामपंथी अक्सर न्यायपालिका पर भी सवाल उठाते रहे हैं। परिणामस्वरूप न्याय पत्र में कांग्रेस ने चुनाव आयोग को स्वायत्त बनाने के साथ न्यायपालिका में भी जाति और महिला हिस्सेदारी बढ़ाने की बात कही है। पार्टी ने निजी स्वतंत्रता का हनन करने वाले कानूनों को भी खत्म करने का वादा किया है। निजी कानून ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय खासकर मुस्लिमों से जुड़े हैं। साफ है पार्टी एक तरह से पर्सनल ला का समर्थन और तीन तलाक जैसे कानूनों का विरोध करती दिख रही है।

हाल के वर्षों में ईवीएम पर सवाल उठाने में वामदल और कांग्रेसी आगे रहे हैं, लेकिन न्याय पत्र में पार्टी ने ईवीएम का समर्थन किया है। हालांकि वीवीपैट की गिनती पर जोर दिया है। इसके अलावा कांग्रेस एक ऐसे दलबदल विरोधी कानून के समर्थन में है, जिसमें दल बदलते ही सांसद या विधायक की सदस्यता अपने आप खत्म हो जाएगी। अब लोकसभा चुनाव के नतीजे ही बताएंगे कि मतदाताओं ने कांग्रेस के न्याय पत्र पर कितना भरोसा किया।

कांग्रेस के किन तीन वादों की तुलना मुस्लिम लीग के घोषणा पत्र से कर रही बीजेपी?

बीजेपी इस चुनावी समर में कांग्रेस पर हमले का कोई मौका हाथ से जाने देना नहीं चाहती। यही वजह है कि कांग्रेस का घोषणा पत्र जैसे ही सामने आया बीजेपी ने उस पर मुस्लिम लीग की छाप का दावा कर दिया। यही नहीं पार्टी ने अपनी बात साबित करने के लिए मुस्लिम लीग का 88 साल पुराना घोषणा पत्र भी लेकर आ गई। हालांकि, कांग्रेस ने चुनाव आयोग में इसकी शिकायत की है। जानिए पूरा मामला।लोकसभा के चुनावी रण में जैसे-जैसे वोटिंग की तारीख करीब आ रहा सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज होती जा रही है। हाल ही में कांग्रेस ने इस चुनाव को लेकर पार्टी का घोषणा-पत्र जारी किया। कांग्रेस ने इसका नाम न्याय पत्र दिया है, जिसमें 5 ‘न्याय’ और 25 ‘गारंटी’ का जिक्र किया गया है। हालांकि, कांग्रेस का न्याय पत्र सामने आते ही बीजेपी ने इस पर सवाल खड़े कर दिए। केंद्र की सत्ताधारी पार्टी ने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में ‘मुस्लिम लीग की छाप’ नजर आ रही। पीएम मोदी ने पहले बिहार के नवादा, फिर यूपी के सहारनपुर और इसके बाद पुष्कर रैली में भी इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में वही सोच झलकती है, जो आजादी के समय मुस्लिम लीग में थी। जैसे ही ये मुद्दा उठा तो कांग्रेस ने इसे लेकर चुनाव आयोग से शिकायत कर दी।

कांग्रेस के न्याय पत्र पर बीजेपी ने उठाए सवाल

कांग्रेस ने चुनाव आयोग से कहा कि पीएम मोदी ने नवादा, सहारनपुर और पुष्कर की रैलियों में कांग्रेस के घोषणा-पत्र (न्याय पत्र) को पूरी तरह से मुस्लिम लीग की छाप वाला बताया था। साथ ही यह भी कहा था कि न्याय पत्र का जो हिस्सा बचा हुआ है, उस पर वामपंथियों का प्रभाव है। इसे लेकर विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग को छह शिकायतें दी हैं। इनमें दो शिकायत पीएम मोदी को लेकर भी है। कांग्रेस ने भले ही अपनी शिकायत चुनाव से कर दी है। दूसरी ओर बीजेपी ने भी स्पष्ट किया कि उन्होंने किन मुद्दों के आधार पर कांग्रेस के घोषणा-पत्र में मुस्लिम लीग की छाप होने का जिक्र किया है। पार्टी ने इसके लिए मुस्लिम लीग का 88 साल पुराना मेनिफेस्टो पेश किया है।

बीजेपी ने बताए मुस्लिम लीग के घोषणा पत्र से तुलना के 3 प्वाइंट्स

बीजेपी ने मुस्लिम लीग के 1936 में आए घोषणा-पत्र और कांग्रेस के 2024 लोकसभा चुनाव को लेकर आए न्याय पत्र में उठाए गए मुद्दों की तुलना की। इसमें उन्होंने तीन प्वाइंट्स को फोकस किया।

  • बीजेपी ने कहा कि 1936 में आए मुस्लिम लीग के घोषणा-पत्र में कहा गया था कि मुस्लिमों के लिए शरिया पर्सनल लॉ की रक्षा की जाएगी। अब 2024 में कांग्रेस के घोषणा-पत्र में पार्टी ने वादा किया है कि अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ हों।

1936 में आए मुस्लिम लीग के घोषणा पत्र में उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी बहुसंख्यकवाद के खिलाफ लड़ेगी। कुछ ऐसा ही जिक्र 2024 चुनाव को लेकर आए कांग्रेस के घोषणा-पत्र में भी देखने को मिला है। कांग्रेस ने इसमें कहा है कि भारत में बहुसंख्यकवाद के लिए कोई जगह नहीं है।

  • बीजेपी ने बताया कि 1936 के मुस्लिम लीग की ओर से जारी मेनिफेस्टो में उन्होंने कहा था कि हम मुसलमानों के लिए खास छात्रवृत्ति और नौकरियों के लिए संघर्ष करेंगे। वहीं 2024 लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने जो घोषणा पत्र निकाला है उसमें वादा किया है कि मुस्लिम छात्रों को विदेश में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिले, इसे इंश्योर किया जाएगा।

शिकायत लेकर चुनाव आयोग पहुंची कांग्रेस

उधर, कांग्रेस ने उसके चुनावी घोषणा़पत्र में ‘मुस्लिम लीग की छाप’ होने संबंधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी को लेकर सोमवार को चुनाव आयोग का रुख किया। इस मामले में कार्रवाई की मांग की। पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल ने आयोग के समक्ष इस विषय के साथ कुछ और मुद्दों को रखा। इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक और सलमान खुर्शीद, कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा और कांग्रेस कार्य समिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य गुरदीप सप्पल शामिल थे। प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार के नवादा जिले में रविवार को एक चुनावी सभा में कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया था कि उसके चुनाव घोषणापत्र में मुस्लिम लीग की छाप है। उसके नेताओं के बयानों में राष्ट्रीय अखंडता और सनातन धर्म के प्रति शत्रुता दिखाई देती है।

पीएम मोदी के कमेंट्स पर उठाए पर सवाल

सलमान खुर्शीद ने कहा कि पीएम मोदी ने अपने भाषणों में कांग्रेस के घोषणा पत्र को झूठ का पुलिंदा कहा है, यह काफी दुखद है। आप किसी भी पार्टी से मतभेद रख सकते हैं, लेकिन एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के घोषणा पत्र के बारे में ऐसा कहना दुखी करने वाली बात है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि यह उन पार्टियों का घोषणा पत्र लगता है, जो हमारे धर्मनिरपेक्ष समाज की आजादी का विरोध कर रहे हैं। हम समझते हैं कि प्रधानमंत्री को ऐसी बात कहने का कोई अधिकार नहीं है। खुर्शीद ने कहा कि हमने इस मामले को चुनाव आयोग के समक्ष रखा है और उनसे विशेष अनुरोध किया है कि वे इसे गंभीरता से लें और इस पर कार्रवाई करें।

भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी उठाए सवाल

कांग्रेस के घोषणापत्र पर बीजेपी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की है।सुधांशु त्रिवेदी ने घोषणापत्र में इस्तेमाल हुई तस्वीरों पर कांग्रेस को घेरते हुए दावा किया कि ये तस्वीरें विदेश की हैं।सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि राहुल गांधी अब एक लाख रुपये महिलाओं को हर साल देने की बात कर रहे हैं। राहुल गांधी ने 2019 में कहा था कि 72 हज़ार रुपये देंगे,कांग्रेस शासित कितने राज्यों में दिए हैं?
त्रिवेदी बोले कि कितनी मज़ेदार बात है कि इन्होंने अपने घोषणापत्र को न्याय नाम दिया है. अब मान लिए हैं कि 55 साल तो अन्याय किए,लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी 400 से ज़्यादा सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है और अबकी बार 400 पार नारा दे रही है।वहीं, कांग्रेस इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। हालांकि इस गठबंधन के तहत कई राज्यों में इसके सहयोगियों के बीच ही मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।


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