वर्तमान सत्तासीन भाजपा ने अवैध रेत खनन पर लाई थी विधान सभा में “स्थगन प्रस्ताव”अब हो रहा हैं अवैध रेत खनन “साय-साय”


गरियाबंद(गंगा प्रकाश)। रेत माफियाओं ने अवैध नदी खनन को एक संपन्न उद्योग में बदल दिया है, रंगरूट युवाओं और ग्रामीणों को पैसा और पावर वादे के साथ लुभाया जा रहा है।अपराध और गड्ढायुक्त नदियां एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।गरियाबंद जिला के अंतर्गत ग्राम हथखोज में महा नदी के किनारों से अवैध रूप से रेत उत्खनन करवाए जाने का कार्य बदस्तूर जारी है। जिन्हें रोकने में प्रशासनिक स्तर के आला अधिकारी इन माफिया के आगे बेबस नजर आ रहे हैं। ऐसा नहीं बल्कि सारा खेल खनिज अधिकारी की सांठ – गांठ ही  चल रहा हैं।जिसका नजारा वर्तमान समय में आसानी से हथखोज में अवैध रूप से रेत उत्खनन का नजारा  दिखलाई देता है। वहीं इन रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद है कि नदियों से रेत का अवैध उत्खनन कर रहे हैं।
अधिकारियों की मिलीभगत व लापरवाही से नदियों में अवैध उत्खनन व परिवहन धड़ल्ले से हो रहा है इन दिनों गरियाबंद जिला में रेत माफिया काफी सर्कीय हो गये हैं।बारिश थमने के बाद से अचानक रेत माफियाओं में इजाफा हो गया है। नदियों को खोखला करने का खेल धड़ल्ले से चल रहा है। अवैध उत्खनन कर सैंकड़ों हाइवा ट्रक रेत का परिवहन कर रहे हैं। जिसमें नए-नए रेत माफिया नगर में घूमते फिरते हुए बड़े पैमाने पर रेत सप्लाई कर माल कमा रहे हैं जिसके चलते रेत के रेट आसमान छू रहे हैं। शासन प्रशासन समय-समय पर कार्रवाई करता है लेकिन अवैध रेत माफियाओं पर रोक लगाने में नाकाम साबित हो रहा है जिससे उनकी कार्यशैली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अब सवाल यह है कि राजस्व खनिज सहित शासन प्रशासन सफेदपोश नेता का खुला संरक्षण क्या शासन को क्षति नहीं पहुंचा रहा है? निरंतर प्रकाशन समाचार पर भी जिला खनिज विभाग के अधिकारियों सहित स्थानीय प्रशासन इस ओर कोई ठोस पहल क्यों नहीं करता क्या कारण है? कि इस अवैध व्यवसाय की कड़ी को तोड़ने में स्थानीय प्रशासन सहित जिला प्रशासन कार्रवाई न करने पर नाकामियों सिद्ध हो रहा है। अब देखना यह है कि जो अवैध व्यवसाय प्राप्त संरक्षण के आधार पर यह व्यापार में लाखों की चांदी काट रहे हैं शासन को हो रही छती को प्रशासन रोकने में कहां तक कामयाबी हासिल करता है?

स्वीकृत रकबा से कई एकड़ अनाधिकृत स्थानों से अवैध खनन जारी प्रशासन बना मूक दर्शक

बताते चले कि छत्तीसगढ़ राज्य से भूपेश की भ्रष्ट सरकार को तो जनता ने उखाड़ फेका हैं किंतु भ्रष्ट नौकरशाह आज भी अपनी कुर्शियो में चिपके हुए है।जो की अब भाजपा नीत “विष्णु सरकार” के लिए एक बड़ा सरदर्द बने हुए हैं।जिसका नतीजा यहा है कि छत्तीसगढ़ के अधिकांश जिलों में प्राकृतिक संसाधनों को गिद्ध की तरह नोचने वाले रेत माफिया भ्रष्ट अधिकारियों से सांठ  गांठ बदौलत खुलेआम नदियों का सीना चीर कर रेत का अंधाधुंध अवैध खनन करते रहते हैं।सवाल उठता है कि आखिर कर्ज में डूबे छत्तीसगढ़ का राजस्व को कब तक लूटा जाएगा? अवैध रेत उत्खनन व परिवहन का कार्य? कब तक सत्ता पक्ष व विपक्ष के लोग गुंडागर्दी,दादागिरी,मारपीट,खौफ व प्रभाव का इस्तेमाल कर रेत और गौण खनिज का उत्खनन अवैध तरीके से करते रहेंगे? हथखोज में दिनरात चैन माउंटेन(पुकलेण्ड)से रेत की अवैध खुदाई कर सैकड़ों ट्रीप परिवहन हो रहा है।जिससे राजस्व को एक बड़ी हानि हो रही हैं तो वंही दूसरी ओर एनजीटी के सारे नियमो और सारे कानून कायदा को सरेआम ठेंगा दिखाते हुए चैन माउंटेन मशीन से  महा नदी का सीना छलनी किया जा रहा है और  जिम्मेदार मौन साधे हुए है।  दिनदहाड़े कानून की धज्जियां उड़ाते हुए हो रहे रेत के अवैध कारोबार में क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों,ओहदे पदो पर बैठे जिम्मेदारों सहित छुट भैया और चुरकुट नेताओं का नाम सामने आ रहा है।जिसके वजह से प्रशासन अपना रोना रोने में लगे है।गरियाबंद में हो रहे रेत के गोरखधंधे का तार रायपुर और भिलाई के ओहदेदार पदो पर बिराजमान जिम्मेदार से जुड़ने का खबर सामने आ रहीं हैं जो कि अवैध रेत खनन पर खनन माफियाओं को जिला प्रशासन की खुली छूट मिली हुई है।नतीजन सरकार को लाखो रुपए का राजस्व का चूना लगाया जा रहा है।गौरतलब है कि शासन द्वारा अवैध रेत खनन रोकने तरह-तरह के नियम बनाकर प्रशासन को लगातार निर्देश दे रहे है।तो दूसरी ओर गरियाबंद जिले में जिला प्रशासन कि नाक के नीचे खुलेआम नियमों को ताक में रखकर नदीयों में रेत खनन का अवैध कारोबार खूब फल फूल रहा है।इस पूरे मामले में जिम्मेदार की संलिप्तता,तगड़ी सेटिंग और भिलाई के रेत माफियाओं को खुला संरक्षण साफ तौर पर नजर आ रहा है।जिसके कारण बेरोकटोक रेत की अवैध खुदाई और परिवहन लगातार जारी है।कभी कभार दिखावे की कार्यवाही कर जिम्मेदार अपना पल्ला झाड़ लेते है।खनन माफिया की पहुंच और पैसों के दम पर सारे नियम और कानून कायदों को जेब में रख लिए है।जिसे प्रशासन भी रोकने में बेबस नजर आ रहे है।जिसके कारण खनन माफिया की दबंगई खुलकर सामने आ रहा है।
अवैध रेत खुदाई में खनन माफियाओं को संरक्षण के चलते इनके हौसला इतना बुलंद है कि इसे किसी भी कानून का डर नहीं है।जिसके कारण बेधड़क चैन माउंटेन से रेत खुदाई कर कानून के विपरीत कार्य कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में भी कोई गुरेज नहीं कर रहे है। हथखोज  रेत खदान में छापेमारी के बाद भी रेत उत्खनन धड़ल्ले से चैनमाऊटिंग मशीन से शुरू हो गया है। बकायदा फोन में व्हॉटसप के माध्यम से ट्रांसपोर्टरों को रेत लोडिंग की जानकारी एवं रेत लोडिंग की दर 10 चक्का हेतु 2200, 12 चक्का 2700, 14 चक्का 3200 एवं 16 चक्का 3700 तथा रॉयल्टी 10 घनमीटर की 2000, 12 घनमीटर 2500 दी गई। ग्रामीणों का कहना है कि इन दिनों रेत माफिया विभागीय अधिकारी एवं राजस्व अधिकारियों से मिलीभगत एवं सेटिंग कर धड़ल्ले से रेत उत्खनन कर लाखें रूपयों की अवैध कमाई कर रहे है। शिकायत करना, अनियमियता सार्वजनिक होना यह सब अपनी जगह होता रहता है। मामूली दिखावटी कार्यवाही के बाद फिर रेत माफिया अपनी नियमित अवैध उत्खनन एवं परिवहन में लिप्त हो जाता है।  ग्रामीणों ने कहा कि रेत माफिया अधिकारियों से सेटिंग कर जब चाहें जहां चाहें मनमाने ढंग से अवैध खनन करते है और प्रतिदिन मनमाने ढंग से हाईवा गाड़ी से रेत का परिवहन कर जहां शासन को हजारों रूपयों की रायल्टी की चोरी तो करते है साथ ही पर्यावरण का नुकसान, ग्राम्यांचल की सड़कों के साथ साथ दुर्घटनाओं को आमंत्रित करते है। हथखोज  में अवैध रूप से खनन दिन रात चल रहा है। उन्हीं रेत खदानों से बिना पिटपास के हाईवा में लोडिंग दी जा रही है। इतना ही नहीं बिना अनुमति के ही कई रेत घाटों से दिन रात अवैध खनन कर लाखों रूपए की रेत बेची जा रही है। शासन द्वारा रेत लोडिंग एवं रायल्टी का मूल्य 980 रूपए निर्धारित किया गया है। सभी रेत घाटों में 2500 से 3000 रूपए लोडिंग चार्ज लिया रहा है। रेत की रॉयल्टी का मूल्य 650 रूपए है। गाड़ी मालिकों से 2000 रूपए अतिरिक्त लिया जा रहा है। इसके बाद भी रॉयल्टी पर्ची नहीं दी जा रही है। बता दें कि खनिज विभाग की छूट के कारण जिले में अवैध रेत खनन अब भी तेजी से चल रहा है। इसकी वजह से अवैध परिवहन लगातार किया जा रहा है।   धड़ल्ले से काफी ऊंची कीमत में हाईवा लोड की जाती है। ग्रामीणों ने क्षेत्र के रेत खदानों में नियमानुसार खनन एवं परिवहन किए जाने की मांग की है। ताकि हर समय ग्रामीण संशय में न रहे। और अवैध खनन परिवहन में अंकुश रखा जा सकें।

कार्यवाही के बाद भी ठेकेदार प्रशासन को दिखा रहा हैं ठेंगा

बताते चले की हथखोज रेत खदान में मनमाने स्तर पर दिन रात 24 घंटे बड़ी बड़ी अनेकानेक चैन माऊंटिग मशीनों से धड़ल्ले से नदी के बीचों बीच पानी के अंदर से, स्वीकृत रकबा से कई कई एकड़ अनाधिकृत स्थानों से खनन एवं जब चाहें तब बड़ी बड़ी हाईवा वाहनों से किया जा रहा बेताहा मात्रा में रेत का परिवहन इन दिनों क्षेत्र की सुर्खियों में है। इस तरह खुले आम बड़े बड़े जनप्रतिनिधियों, विभागीय अधिकारियों, पुलिस, खनिज विभाग के नाक के नीचे किया जा रहा यह अवैध एवं अनैतिक कृत्य रेत माफिया अपने दम पर कर रहा हो यह संभव प्रतीत नहीं होता। यदा-कदा झुटपुट कार्यवाही, ग्रामीणों की शिकायत, छत्तीसगढ़ सरकार को अवैध खनन के नाम पर कोसती मिडिया की हेडलाईन के चलते अधिकारी कार्यवाही की औपचारिकता तो करते है। परंतु ऐसी बनावटी और दिखावटी कार्यवाहियों से अभ्यस्त रेत माफिया रूकने का नाम नहीं ले रहे है। इन दिनों फिंगेश्वर विकासखंड की हथखोज रेत खदान भ्रष्टाचार, अनियमितता एवं अवैध खनन तथा परिवहन के मामले में सारी हदें पार कर रहे है। ग्रामीणों ने बताया कि यहां लंबे समय से स्वीकृत रेत खदान काफी अनियमितता एवं भ्रष्टाचार के बल पर निर्बाध रूप से चल रही है। यहां 50 एकड़ से भी ज्यादा क्षेत्र में बेदर्दी से खनन किया जा रहा है। एक-दो नहीं 4-4 बड़ी बड़ी चैन माऊटिंग से लगातार 24 घंटे खनन कर प्रतिदिन बड़ी मात्रा में हाईवा गाड़ी भरी जा रही है। ग्रामीणों ने कहा कि रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद है कि ग्रामीणों की कोई भी बल, शिकायत, कठिनाई समझता तो दूर सुनना ही नहीं चाहते। मनमाने जहां चाहे वहां खनन से नदी का स्वरूप ही बदलने लगा है। बरसात का पानी समीप के खेतों में गांव में घुसने की आशंका बढ़ती जा रही है। गांव वालो की बात कोई सुनने वाला नहीं है। अधिकारियों को कई कई बार शिकायत करो, मिडिया के पास जाओ तो कभी कभार अधिकारी औपचारिक कार्यवाही करने के प्रोग्राम से ही आते है। उनके जाने के दूसरे दिन से ही फिर वही अवैध खनन, मनमाना, परिवहन, दिन-रात 24 घंटे और ज्यादा बेदर्दी से खदान का दोहन शुरू हो जाता है। लगता है कि रेत माफिया शिकायत करने वालों को चिढ़ा रहा है और कार्यवाही से होने वाले नुकसान का कई गुना वसूल कर शासन को लाखों रूपयों का नुकसान पहुंचाने आपदा है। इतनी ज्यादा, इतनी बड़ी टैक्स चोरी में रेत माफिया को अधिकारियों की राह एवं मिलीभगत न हो ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता। बीच नदी में खनन करती चैन माऊंटिग, हाईवा गाड़िया कई कई बार कार्यवाही के बाद भी अधिकारियों से सेटिंग के कारण हर बार मामूली कार्यवाही कर फिर उसी काम में लग जाती है। ग्रामीणों ने मांग की है कि अवैध खनन-परिवहन में पकड़ी गई गाड़ियों को राजसात जैसी सख्त कार्यवाही करने से ही इस प्रकार की अनियमियता पूर्ण गतिविधि से अंकुश लगाया जा सकता है। वरन इस प्रकार के कुत्ते बिल्ली के लुकाछिपी का खेल चलता ही रहेगा। जिसमें आर्थिक क्षति के साथ पर्यावरण की हानि तथा नदी का सीना छतनी होता ही रहेगा। इस प्रतिनिधि ने हथखोज रेत खदान में जब एक चैन माऊटिंग देखा तो चैन माऊटिंग नदी के बीच में खड़ी थी और उसमें जब्ती किए जाने सील लगा हुआ था। इस बारे में जब खनिज अधिकारी से जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा कि अवैध खनन के कारण चैन माऊटिंग की जब्ती की गई है। जब अवैध खनन नदी के बीच में करते चैन माऊंटिग जब्त हुई है तो इसे राजसत क्यों नहीं किया जाता मात्र मामूली फाईन करके छोड़ दिया जाता है। इस बारे में खनिज अधिकारी ने कहा कि हम कोर्ट में यह सिद्ध नहीं कर पाते कि चैन माऊटिंग अवैध खनन के उद्देश्य से नदी में उतारी गई है। समझा जा सकता है कि मिलीभगत एवं भ्रष्टाचार की राह पर खनिज अधिकारी किस प्रकार की कार्यवाही करवाते है?

कलेक्टर के निर्देश के बाद भी नहीं रुक रहा अवैध खुदाई

आपको बता दे की हाल ही में अवैध खनन को लेकर टास्क फ़ोर्स की बैठक में छत्तीसगढ के समस्त कलेक्टरों ने अधिकारियो को निर्देश देते हुए कहा था कि अवैध रेत व मुरूम की खुदाई पर पुलिस विभाग के साथ टीम बनाकर कार्यवाही करे।लेकिन कलेक्टरों के निर्देश और आदेश का पालन नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़ के अधिकांश जिलों में  में जगह जगह अवैध खनन से जंहा शासन को राजस्व की क्षति हो रही है तो वहीं पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है।दूसरी ओर  खनिज विभाग खनन माफियाओं और रेत के अवैध कारोबार में जुड़े नेताओं के दबाव का दंश भी झेल रहा है।ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि इन खनन माफियाओं को आखिर सरंक्षण कौन दे रहा है ?क्या इस अवैध कारोबारियों पर कोई कानून लागू नहीं?ये सवाल भी अब छत्तीसगढ़ कि जनता पूछ रही है।क्षेत्र में रेत चोर रातों में सक्रिय हो जाते है और रात भर  नदियों से पुकलेण्ड मशीन से लोडिंग कर  रेत चोरी करते हैं और सुबह होते ही नदी से मशीन निकाल ली जाती हैं। रेत को जमाकर मनमाने दाम पर बेचकर भारी अवैध मुनाफा लिया जा रहा है।रेत माफियाओं की इन हरकतों से खनिज विभाग को इन दिनों रेत की रायल्टी का जबरदस्त नुकसान हो रहा है,और ऐसा भी नही की प्रशासनिक अमला को इसकी जानकारी ना हो सारा खेल जिम्मेदारों की जानकारी में होने के बाबजूद भी रेत चोरी का खेल धड़ल्ले से जारी हैं जिससे रोजाना सरकार को लाखों रुपये का चूना लग रहें है।मिली जानकारी के अनुसार फिंगेस्वर क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली नदियों के किनारे बसे रेत माफियाओं की नजर अब हर वर्ष की तरह रेत का नियमों को धता बताकर अवैध खनन कर डंपिंग कर भारी मूल्य में बेचकर चांदी नहीं बल्कि सोना काटने पर उतारू है। हर वर्ष की तरह खनिज विभाग भी इन रेत चोरों पर लगाम लगाने की तैयारी में उडनदस्ता तैयार किया है उसके बाबजूद भी रेत चोरों द्वारा भी तु डाल-डाल तो मैं पांत -पांत कहते हुए भारी मात्रा में अवैध खनन लगातार किया जा रहा है।जिला प्रशासन द्वारा रेत की खुदाई बंद करने का आदेश खनिज विभाग के लोग मानने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि रेत चोरों के साथ सांठगांठ कर हथखोज में अभी भी धड़ल्ले के साथ नदी से रेत की खुदाई और अर्वध परिवहन दोनों ही चल रहा है।ग्रामों में तो और भी हद हो गई है।वहां गांव के सरपंच और पंचों द्वारा मना करने के बावजूद रेत चोर तथा उनके छूट भैये नेता पूरी तरह से दादागिरी करते हुए नदी से रेत निकालने का काम खुलेआम कर रहे हैं।खनिज विभाग के अधिकारियों को अवैध रेत उत्खनन तथा अवैध परिवहन दोनों की ही पूरी जानकारी रहती है।लेकिन किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की जा रही है।इससे  स्पस्ट होता है कि रेत चोरी का सारा खेल में खनिज विभाग के अधिकारी की सांठगांठ से सारा खेल खेला जा रहा हैं वंही राजस्व विभाग का भी अपना शेयर तय हैं  जानकारी होने के बाबजूद राजस्व विभाग भी मूकदर्शक बना हुआ हैं।वहीं दूसरी ओर रेत चोरों द्वारा अवैध उत्खनन रोकने वालों के खिलाफ ही थाने में फर्जी शिकायतें दर्ज कराने की धमकी दी जा रही है।तो कंही पत्रकारों को भी धमकी दी जा रही है। खनिज विभाग की छत्रछाया में चल रहे इस धंधे के कारण जिला प्रशासन कि न केवल छवि खराब हो रही है।वरन उसकी बदनामी भी हो रही है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा में रेत के अवैध खनन पर बीजेपी का स्थगन।

बताते चले की पूर्ववर्ती कांग्रेस नीत भूपेश सरकार में  रेत के अवैध खनन का मामला सदन में उठा था बीजेपी ने इस पर स्थगन प्रस्ताव दिया और चर्चा कराये जाने की मांग की थीं।
गौरतलब हो कि तत्कालीन
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा था कि पूरे प्रदेश में रेत माफिया सक्रिय है,रेत का अवैध खनन चल रहा है। अवैध रेत का भंडारण किया जा रहा है।बारिश में प्रतिबंध के बावजूद अवैध खनन धड़ल्ले से जारी है,नदी किनारे रेत मफ़ियाओ ने टीले बनाकर रख दिया है,अधिकारियों की हिम्मत नहीं है की कार्रवाई कर सके,सूरजपुर में कार्रवाई करने गए ज़िला खनिज अधिकारी के साथ मारपीट की गई थी अधिकारी दबे कुचले नज़र आ रहे हैं,सरकार के संरक्षण में रेत का अवैध खनन हो रहा है।
शिवरतन शर्मा ने कहा था कि अब तक शराब माफिया,भू मफ़ियाओं की चर्चा होती थी अब राज्य में रेत माफिया भी आ गये हैं,शराब माफिया रेत के अवैध खनन में भी आ गये हैं।अब देखना है की भाजपा खुद सत्ता में हैं अब रेत माफियाओ पर कार्यवाही होगी या संरक्षण दिया जाएगा।

सदन में भी अवैध खनन का मुद्दा गूंजा था जिसमें बीजेपी (भाजपा) ने शून्यकाल में स्थगन प्रस्ताव लाया।

छत्तीसगढ़ विधानसभा (छत्तीसगढ़ विधानसभा) सदन में  अवैध खनन का मुद्दा गूंजा था जिसमें बीजेपी  ने शून्यकाल में स्थगन प्रस्ताव लाया था स्थगन प्रस्ताव स्वीकार किया जाए या नहीं इस पर चर्चा के दौरान बीजेपी विधायक शिवरतन शर्मा ने कहा था कि प्रदेश में रेत का अवैध उत्खनन किया जाएगा। लोगों के पास एक्सपैंड्स खरीदने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है।मामले में बीजेपी विधायक अजय चंद्राकर ने कहा था कि एनजीटी के नियमों का पालन नहीं हो रहा है। सरकारी रेत माफिया को निर्देशित कर रही है या रेत माफिया सरकार को निर्देशित कर रहे हैं। सरकारी संरक्षण में रेत का अवैध उत्खनन हो रहा है।अधिकारी झूठ नहीं बोलते हैं।
जेसीसीजे के पूर्व विधायक धर्मजीत सिंह ने कहा था कि सरकारी संरक्षण में सत्ता पक्ष के लोगों के लोग अवैध उत्खनन कर रहे हैं। रेत के नाम पर जंगलराज कायम हो गया है। शराब माफिया पहले से सक्रिय हैं।अधिकारी ट्रांसफर के डर से उन्हें कुछ नहीं बोलते।पूर्व सीएम रमन सिंह ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा था कि- नियम कायदों को ताक पर रखा जा रहा है।हाल ये है कि अवैध रेत उत्खनन की वजह से शिवनाथ नदी की दिशा बदल रही है। पुलिस-प्रशासन के संरक्षण में रेत का अवैध उत्खनन हो रहा है। सभी शराब के गुंडेन्ड पर उतर चुके हैं। इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए।

तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष ने भी सवाल उठाया था

तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा था कि अवैध उत्खनन को प्रोत्साहित करने के लिए टेंडर की प्रक्रिया की गई है। पूरे प्रदेश में रेत का अवैध उत्खनन हो रहा है। अधिकारी की हिम्मत नहीं है कि घाट पर जाकर कार्रवाई करें।गांव वालों के खिलाफ माफिया बर्बरता पूर्वक व्यवहार कर रहे हैं।इस चर्चा के बाद आसंदी ने स्थगन की सूचना को विचाराधीन रखा और फिर असंतुष्ट विधायकों ने सदन में जमकर नारेबाजी की।नरेड़ी के बीच आसंदी ने व्यवस्था देते हुए कहा था कि- किसी न किसी माध्यम से इस विषय पर चर्चा की जाएगी।किन्तु बार बार सदन मुद्दे गूंजते तो है किंतु अबैध रेत खनन और परिवहन करने बालो पर कोई ठोस कार्यवाही नही होती हैं जो लोकतंत्र में दुर्भाग्यपूर्ण हैं।

धमतरी विधायक श्रीमती रंजना साहू ने भी विधानसभा में उठाया था महानदी में हो रहे अवैध उत्खनन का मुद्दा,भूपेश बघेल ने कहा था हो रही है जांच

पूर्व की भूपेश सरकार में छत्तीसगढ़ रेत चोरों का राज चल रहा था छत्तीसगढ़ में अबैध रेत खनन एक दो जिलों की नही बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में रेत चोरों का राज चलते रहा हैं गौरतलब हो कि धमतरी विधायक श्रीमती रंजना साहू ने भी विधानसभा मानसून सत्र के प्रथम दिवस सदन में तारांकित प्रश्न के माध्यम से वर्षा काल में प्रतिबंधित अवधि पर महानदी में हो रहे अवैध उत्खनन का मुद्दा उठाया था उन्होंने बताया था कि निर्धारित मात्रा व क्षेत्र  से अधिक रेत का भंडारण कर शासन प्रशासन को इस कारोबार से संबंधित लोग आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस पर निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उत्तर देते हुए कहा था कि रायपुर संभाग में सस्टेनेबल सैड माइनिंग मैनेजमेंट की गाइड लाइन (केन्द्र सरकार) के अनुसार 10 जून से 15 अक्टूबर तक नदी में रेत खनन पर लगाया प्रतिबंध का पालन किया जा रहा हैं। जांच समिति बनाकर औचक निरीक्षण पश्चात जांच करते हुए अवैध उत्खनन,जहां भी पाया जाता है वहां कार्रवाई की जा रही है तथा आगे भी जारी रहेगी। निवर्तमान मुख्यमंत्री ने बताया था कि रायपुर संभाग में 15 जून की स्थिति मे 114 चिन्हाअंकित जगह पर भंडारण की अनुमति दी गई है,जिसका क्षेत्र एवं मात्रा भी निर्धारित की गई है।उन्होंने बताया था कि अवैध भंडारण के 4 प्रकरण बनाए गए हैं, जिसमें 43,000 रुपए का अर्थदंड आरोपित किया गया है।



पर्यावरण के लिए तबाही बन सकता है बेतहाशा रेत खनन

निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली रेत की मांग बढ़ती ही जा रही है लेकिन अंधाधुंध रेत-खनन पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है।
रेत का उपयोग हर तरफ है,घर से लेकर मोबाइल फोन तक,घरों की कंक्रीट में रेत लगती है,सड़कों के डामर में,खिड़कियों के कांच में और फोन की सिलिकॉन चिपों में भी रेत है। लेकिन आधुनिक जीवन के निर्माण की जरूरत ये रेत विनाशकारी और बाजदफा गैरकानूनी उद्योग की धुरी भी बनती जा रही हैं। हालांकि मुहावरों में बेकार लेकिन वैसे बेशकीमती रेत हैं।
रेत दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली खनिज संपदा है दूसरे बहुत से उत्पादों से अलग नीति निर्माताओं के पास रेत की सालाना खपत का कोई ठोस अनुमान भी नहीं है। 2019 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट में सीमेंट के डाटा की मदद से रेत की खपत का अंदाजा लगाया गया है क्योंकि सीमेंट में रेत और बजरी इस्तेमाल होती है और इस आधार पर सालाना 50 अरब टन रेत की अनुमानित मात्रा निकाली गई हैं।शोधकर्ताओं का कहना है कि यह मात्रा हर साल जिम्मेदारी से उपयोग की जाने वाली रेत से ज्यादा है,जबकि चट्टानों को कूटकर और रेत बनाई जा सकती है।कुछ इलाकों में रेत की कमी से जो लूट और झपटमारी शुरू हुई है,उसका निशाना पर्यावरण और वन्यजीव बन रहे हैं।उनकी रिहाइशें तबाह हो रही हैं।इस रिपोर्ट की सह लेखक और जेनेवा में ग्लोबल सैंड ऑब्जरवेटरी से जुडीं लुईस गालाघेर कहती हैं कि”संकट कुछ ऐसा है कि हमें ठीक से इस सामग्री के बारे में पता भी नहीं है। हमें उस असर का भी अंदाजा नहीं है जहां से इसे निकाला जा रहा है। हम तो यह भी नहीं जानते हैं यह आती कहां से हैं।नदियों से कितनी रेत आती है, हमे नहीं पता है।

बेतहाशा रेत खनन का मतलब बेतहाशा बर्बादी

विशेषज्ञ यह जरूर जानते हैं कि बेतहाशा मात्रा में रेत निकाली जाती है तो इसकी कीमत लोग ही चुकाते रहेंगे और यह धरती चुकाएगी,रेत खनन से हैबिटैट बर्बाद हो जाते हैं,नदियां गंदली और तटों में दरार आ जाती हैं,इनमें से कई तट तो समुद्र के जलस्तर में बढ़ोत्तरी से पहले ही गुम होने लगे हैं।जब रेत की परतें खोदी जाती हैं तो नदी के तट अस्थिर होने लगते हैं।प्रदूषण और पानी में अम्लता यानी एसिडिटी आ जाने से मछलियां मारी जा सकती हैं और लोगों और फसलों को पानी नहीं मिल पाता है।यह समस्या तब और सघन हो जाती है,जब बांध के नीचे गाद भरने लगती हैं। रेत संकट के समाधानों पर किताब लिख चुकीं स्वतंत्र शोधकर्ता किरन परेरा का कहना है कि”और भी बहुत सारे प्रभावों को नहीं देखा जाता है।रेत की कीमत दिखती है लेकिन ये असर बिल्कुल नहीं दिखते हैं।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर द कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) में खनन उद्योगों पर शोध की अगुवाई कर रहे स्टीफन एडवर्ड्स के मुताबिक सबसे खराब यह है कि बहुत सारा असर तो तत्काल नहीं दिखता है,जिसके चलते यह जानना कठिन है कि वह असर कितना है।यह मामला इतना अधिक चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है कि हमें इस पर और करीब से ध्यान देने की जरूरत है।

एनजीटी का रेत खनन के लिए जारी पर्यावरण मंजूरी में कुछ अनिवार्य शर्ते का नहीं किया जा रहा पालन

– माइनिंग करने वाले को कम से कम संख्या में पोकलेन का उपयोग करना चाहिए और यह एक परियोजना स्थल में दो से अधिक नहीं होनी चाहिए।

– जिला प्रशासन को पहले वर्ष के अंत में माइनिंग पर जाकर उसके पर्यावरण पर पड़ रहे असर का आंकलन करना चाहिए। जिसके आधार पर काम जारी रखना है या नहीं उसकी अनुमति देनी चाहिए।

– खनन क्षेत्र को ठीक से भर दिया गया है इस पर अधिकृत एजेंसी द्वारा हर साल रिपोर्ट तैयार करके निर्धारित प्राधिकारी को दी जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो उसके अनुसार खनन के काम को रोका या कम किया जा सकता है।

– वर्तमान प्राकृतिक नदी तल स्तर से अंतिम कार्य की गहराई कम से कम 1 मीटर होनी चाहिए और जिस जगह रेत खनन करना है वहां रेत की मोटाई 3 मीटर से अधिक होनी चाहिए।

– किसी भी हालत में ग्राउंडवाटर लेबल से नीचे रेत खनन नहीं किया जाना चाहिए। यदि भूजल का स्तर 1 मीटर के अंदर है तो खनन को तुरंत रोका जाना चाहिए।

– रेत खनन से किसी भी तरह नदी के पानी की गुणवत्ता में गिरावट और वेग पर असर नहीं होना चाहिए। साथ ही इससे नदी के प्रवाह और उसके पैटर्न पर भी असर नहीं पड़ना चाहिए।

– महीने में एक बार तालुक स्तर के अधिकारियों द्वारा खनन कार्य की स्वयं जाकर जांच की जानी चाहिए।

– खनन बंद करने के बाद जिसे माइनिंग का लाइसेंस दिया गया है उसके द्वारा खदान पर डाले गए सभी शेड को तुरंत हटा देना चाहिए। साथ ही खनन के संचालन के लिए उपयोग किए जाने वाले सभी उपकरणों, सड़कों और रास्तों को समतल किया जाना चाहिए ताकि नदी बिना किसी कृत्रिम अवरोध के अपने सामान्य मार्ग पर फिर से बह सके सके।

– जहां खनन किया गया है वहां बने गड्ढों को तुरंत भर देना चाहिए। साथ ही उस जगह को जितना हो सके पुरानी स्थिति में लाना चाहिए, जिससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को सीमित किया जा सके।

पर्यावरण के लिए तबाही बन सकता है बेतहाशा रेत खनन

निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली रेत की मांग बढ़ती ही जा रही है लेकिन अंधाधुंध रेत-खनन पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है।
रेत का उपयोग हर तरफ है,घर से लेकर मोबाइल फोन तक,घरों की कंक्रीट में रेत लगती है,सड़कों के डामर में,खिड़कियों के कांच में और फोन की सिलिकॉन चिपों में भी रेत है। लेकिन आधुनिक जीवन के निर्माण की जरूरत ये रेत विनाशकारी और बाजदफा गैरकानूनी उद्योग की धुरी भी बनती जा रही हैं। हालांकि मुहावरों में बेकार लेकिन वैसे बेशकीमती रेत हैं।
रेत दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली खनिज संपदा है दूसरे बहुत से उत्पादों से अलग नीति निर्माताओं के पास रेत की सालाना खपत का कोई ठोस अनुमान भी नहीं है। 2019 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की एक महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट में सीमेंट के डाटा की मदद से रेत की खपत का अंदाजा लगाया गया है क्योंकि सीमेंट में रेत और बजरी इस्तेमाल होती है और इस आधार पर सालाना 50 अरब टन रेत की अनुमानित मात्रा निकाली गई हैं।शोधकर्ताओं का कहना है कि यह मात्रा हर साल जिम्मेदारी से उपयोग की जाने वाली रेत से ज्यादा है,जबकि चट्टानों को कूटकर और रेत बनाई जा सकती है।कुछ इलाकों में रेत की कमी से जो लूट और झपटमारी शुरू हुई है,उसका निशाना पर्यावरण और वन्यजीव बन रहे हैं।उनकी रिहाइशें तबाह हो रही हैं।इस रिपोर्ट की सह लेखक और जेनेवा में ग्लोबल सैंड ऑब्जरवेटरी से जुडीं लुईस गालाघेर कहती हैं कि”संकट कुछ ऐसा है कि हमें ठीक से इस सामग्री के बारे में पता भी नहीं है। हमें उस असर का भी अंदाजा नहीं है जहां से इसे निकाला जा रहा है। हम तो यह भी नहीं जानते हैं यह आती कहां से हैं।नदियों से कितनी रेत आती है, हमे नहीं पता है।

बेतहाशा रेत खनन का मतलब बेतहाशा बर्बादी

विशेषज्ञ यह जरूर जानते हैं कि बेतहाशा मात्रा में रेत निकाली जाती है तो इसकी कीमत लोग ही चुकाते रहेंगे और यह धरती चुकाएगी,रेत खनन से हैबिटैट बर्बाद हो जाते हैं,नदियां गंदली और तटों में दरार आ जाती हैं,इनमें से कई तट तो समुद्र के जलस्तर में बढ़ोत्तरी से पहले ही गुम होने लगे हैं।जब रेत की परतें खोदी जाती हैं तो नदी के तट अस्थिर होने लगते हैं।प्रदूषण और पानी में अम्लता यानी एसिडिटी आ जाने से मछलियां मारी जा सकती हैं और लोगों और फसलों को पानी नहीं मिल पाता है।यह समस्या तब और सघन हो जाती है,जब बांध के नीचे गाद भरने लगती हैं। रेत संकट के समाधानों पर किताब लिख चुकीं स्वतंत्र शोधकर्ता किरन परेरा का कहना है कि”और भी बहुत सारे प्रभावों को नहीं देखा जाता है।रेत की कीमत दिखती है लेकिन ये असर बिल्कुल नहीं दिखते हैं।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर द कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) में खनन उद्योगों पर शोध की अगुवाई कर रहे स्टीफन एडवर्ड्स के मुताबिक सबसे खराब यह है कि बहुत सारा असर तो तत्काल नहीं दिखता है,जिसके चलते यह जानना कठिन है कि वह असर कितना है।यह मामला इतना अधिक चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है कि हमें इस पर और करीब से ध्यान देने की जरूरत है।

रेत खनन के जरिए नदी का पेट नहीं, अपना भविष्य ही खोद रहा है आधुनिक समाज



मानव सभ्यता नदियों के किनारे जन्मी, नदी तटों की गोद में फलती-फूलती रही। ये सारी नदियां अपने पेट में हजारों छोटी नदियों का जल समाहित करती थीं।बीते दशक में हमारे देश की हजारों छोटी नदियां लुप्त हो गईं।लगभग यही हाल विश्व के सत्तर से ज्यादा देशों का है,जहाँ दम तोड़ती छोटी नदियों की वजह से बड़ी नदियां भी संकट से दो-चार हैं। नदियों को हमने विकास के वर्तमान प्रारूप के रास्ते में ला खड़ा किया है।नदियों को, अपने अपशिष्ट जल-मल और कचरों के निस्तारण का उपादान बना देने और नदियों से सारा पानी खींच लेने की हमारी प्रवृत्ति ने विश्व भऱ की नदियों के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

नदियों से रेत निकालने की प्रवृत्ति बेलगाम

इन सब के अलावा पिछले कुछ दशक में निर्माण कार्यो के लिए जल के साथ-साथ नदियों से रेत भी निकाल लेने की प्रवृत्ति बेतहाशा और बिना किसी रोक-टोक के बढ़ी है।मौसमी छोटी नदियों की समाप्ति के मूल में बेतहाशा रेत को निकालना है, जिसकी वजह से उनका अपने उद्गम व बड़ी नदियों से मिलन का रास्ता बंद हो गया और देखते ही देखते वहां का पानी सूखता चला गया।येल स्कूल ऑफ़ एनवायरनमेंट की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक नदी सहित अन्य स्रोतों से रेत खनन का दायरा इस कदर बढ़ा है कि रेत खनन विश्व का सबसे बड़ा खनन व्यवसाय है,और वर्तमान में कुल खनिज खनन में 85% से अधिक योगदान रेत खनन का है। बालू खनन के मौजूदा परिदृश्य को देखे तो ये संभवतः बेतरतीब, क़ानूनी रूप से सबसे कम नियंत्रित और पर्यावरण  के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक खनन प्रक्रिया है।कहीं-कहीं तो नदियों के प्राकृतिक रूप से रेत जमा करने की गति से पचासों गुना ज्यादा गति से बालू का दोहन हो रहा है। बड़े स्तर पर सर्वव्यापी इस्तेमाल, और इससे पर्यावरण पर होने वाले बड़े पैमाने पर नुकसान  के बाद भी रेत खनन की क़ानूनी प्रक्रिया बहुत ही लचर है, इसके लिए कोई स्थानीय या अंतर्राष्ट्रीय मानदंड भी नहीं है।

रेत का है महत्त्व, पर पर्यावरण का कहीं अधिक

विकासशील देशों में रेत के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।रेत का उपयोग मुख्य रूप से कंक्रीट, सड़क निर्माण, शीशा उद्योग, और प्राकृतिक गैस और सेल के खनन में होता है, पर अब रेत खनन  कई महत्वपूर्ण रेयर अर्थ मेटल जैसे टाइटेनियम आदि के लिए भी होने लगा है।रेत का सबसे अधिक इस्तेमाल कंक्रीट निर्माण में होता है जहां इसे सीमेंट के मुकाबले छ: से सात गुना ज्यादा जरुरत होती है. कंक्रीट के लिए सबसे उपयुक्त रेत नदी में बहने वाली रेत होती है जो अपने असमान आकार के कारण सीमेंट में अच्छे से मिल कर कंक्रीट को मजबूती देती है। वहीं मरुभूमि की रेत गोलाकार होने और समुद्रतल की रेत घुलनशील होने के कारण सर्वथा अनुपयुक्त होती है।मौजूदा परिदृश्य में विकासशील देशो में जहां कंक्रीट आधारित निर्माण कार्य में अभूतपूर्व रूप से वृद्धि हुई है, वैसे देशों में रेत और सीमेंट की मांग भी उसी अनुरूप बढ़ी है, भारत में ही पिछले दो दशक में ही रेत और सीमेंट की खपत में कम से कम तीन गुनी वृद्धि दर्ज की गयी है। चीन, जिसने वर्तमान सदी में आर्थिक विकास में नए पैमाने गढ़े है, रेत की खपत के मामले में भी कीर्तिमान स्थापित किया है।पिछले तीन साल में ढांचागत निर्माण में इतना अधिक रेत का इस्तेमाल हुआ है जितना पूरी बीसवीं सदी में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ, यूनाइटेड नेशन एनवायरनमेंट प्रोग्राम के मुताबिक हर साल हम 40 अरब टन से अधिक रेत और बजरी का खनन और उपयोग करते हैं, जिसका अधिकांश हिस्सा अवैध तरीके से हासिल किया जाता है।मांग इतनी अधिक है कि दुनिया भर में नदी तल और समुद्र तट खाली होते जा रहे हैं। आज स्थिति यह है कि पानी के बाद दुनिया में दूसरा सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला संसाधन रेत है।

रेत में ही है नदियों की जान

नदियों में पानी के साथ धीरे धीरे बहता रेत, पानी सोख कर उसके तल की गहराई को बनाए रखती थीं। इसी रेत की बदौलत गंगा की विशाल घाटी खेती लायक हिस्सा है जहां खरबूज-तरबूज की मिठास है तो रेतों में दबे कछुओं के अंडे हैं, डॉलफिन और घड़ियाल जैसे लुप्तप्राय जीवो का अस्तित्व है, प्रवासी पक्षियों का डेरा है तो हजारों साल से फलता-फूलता मछली का कारोबार है। नदियों की तली में रेत की मौजूदगी असल में उसके प्रवाह को रोकती है, जिससे पानी को भू-जल के पुनर्भरण के लिए पर्याप्त समय मिलता है, दूसरी तरफ नदी के प्रवाह के साथ बहता बालू जल को शुद्ध रखने की छननी  का काम करता है और नदी के गाद को रोकता है. नदी तटों तक रेत का विस्तार नदी को सांस लेने का अंग होता है, रेत एक तरह से नदियों का फेफड़ा है जो नदियों को स्वस्थ रहने में मदद करता है और नदी के दोनों तरफ रेत के इन्ही फैलाव में नदी जब चाहे तब विस्तार करती रहती है। इस प्रकार नदी के साथ बहता रेत और तट के इतर फैला रेत नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण अंग है।समुद्री तट पर जमीन के तरफ का भूमिगत मीठा पानी और समुद्र का खारा पानी घनत्व के अनुसार तट के साथ साथ एक संतुलन में रहते है जिससे खारे पानी का संक्रमण जमीन  की तरफ नहीं हो पाता, पर बालू के अवैध खनन और भू-जल के दोहन के कारण सारा तटीय क्षेत्र खारे पानी के संक्रमण से उजड़ रहे है।आज जब मैदानी और समुद्र तटीय भाग में भूमिगत जल के लिए त्राहिमाम् मचा हुआ है  भूजल पुनर्भरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बालू को नजरंदाज करना पांव में कुल्हाड़ी मारने के समान है।

पर्यावरण-प्रतिकूल प्रभाव को होगा रोकना

हालांकि, रेत बनाने के लिए चट्टानों को पीसना अपेक्षाकृत सरल प्रक्रिया है, लेकिन इसके अपने पर्यावरणीय प्रभाव भी हैं।मशीनें बहुत अधिक ऊर्जा की खपत करती हैं, इस प्रक्रिया से ध्वनि, धूल और जल प्रदूषण उत्पन्न होता है साथ ही साथ नदी के रेत के मुकाबले आठ गुणा तक महंगा भी है. समग्रता से देखें तो रेत खनन का समाधान पिछले कुछ दशको में हुए नदियों के साथ हुए व्यापक स्तर पर हुए छेड़छाड़ में भी निहित है और कंक्रीट के इतर स्थानीय और परम्परागत निर्माण के विकेन्द्रित प्रणाली विकसित करने में भी। अनियंत्रित रेत खनन के साथ साथ अनगिनत बांध के कारण नदियों में गाद भरता जा रहा है, हाँलाकि गाद रेत का उपयुक्त विकल्प नहीं है, पर इसमें भी कंक्रीट के लायक बालू का खनन हो सकता है। वही, कंक्रीट जो अब निर्माण कार्य का एक मात्र विकल्प है, के बुरे प्रभाव के कारण, से इतर विकल्पों के प्रति जागरूकता बढ़ी है।इन चुनौतियों में महत्वपूर्ण और प्रभावी समाधान नदी से बालू खनन के अवैज्ञानिक तरीकों  पर तत्काल रोक, बालू खनन के लिए प्रभावी स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी तंत्र का विकास, और चट्टानों से बनी रेत यानि ‘एम रेत’ को बढ़ावा देने में निहित है। एम रेत के लिए निर्माण कार्य के अपशिष्ट एक अच्छा और सस्ता विकल्प हो सकता है।
ऐसा नहीं कि नदी या समुद्र तट से रेत खनन का विकल्प नहीं पता, या सूखती और मरती नदियों से हम अनजान हैं, असली समस्या है विकास का पश्चिमी एकाकी मॉडल जिसे भारत सहित सभी विकासशील देशों  ने अपने  स्थानीय पर्यावरण और जरुरत के इतर अपना लिया। इसने प्रकृति से विलगाव और इस विलगाव में शहरों के कंक्रीटीकरण ने हमारी प्रकृति के साथ जुड़ाव को बिल्कुल ही अलग कर दिया।आज रेत का रीतना समय के साथ सभ्यता का बीतना है।विकास और अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने का खेल समानांतर चल रहा जिसमें रेत की भूमिका बनी हुई है, लेकिन सवाल यह है कि अवैध खनन की आड़ में यह सबकी आँखों के सामने से चल रहा जिसपे हाथ डालना बिल्ली के गले में घंटी बांधने के समान है।

क्या कहते है सांसद और नव निर्वाचित विधायक

उक्त संबंध में चुन्नी लाल साहू सांसद लोकसभा महासमुंद ने जांच करवाने की बात कही हैं। वन्ही दूसरी ओर रोहित साहू नव निर्वाचित विधायक राजिम विधान से चर्चा करने पर उन्होंने कहा कि मेरे द्वारा कलेक्टर को अवैध रेत खनन पर कठोर कार्यवाही करने की बात कही गई हैं।उनके द्वारा रेत ही नहीं जिले में किसी भी प्रकार के अवैध कारोबार पर सख्त कार्यवाही करने की बात कही गई हैं। उन्होंने साफ शब्दों में अवैध शराब और संलिप्त शराब कोचियों को लेकर चेतावनी दी और कहा कि अवैध शराब, जुए सट्टे का कारोबार करने वाले बख्शे नहीं जाएंगे। अवैध कार्य करने वाले पर कार्रवाई होगी।


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