संपादकीय : गरीब की थाली केवल एक थाली नहीं है, वह राष्ट्र की आत्मा है यदि वह खाली है, तो हमारा गर्व भी खोखला है।
गरीबों की पीड़ा, महंगाई की मार और लचर व्यवस्था पर एक मार्मिक दृष्टि
लेखक: सुनील कुमार यादव
जब भूख रोटी से बड़ी हो जाए,जब सपने पेट की आग में राख हो जाएँ और जब थाली में सन्नाटा बोलने लगे,
- तब समझिए कि किसी राष्ट्र की आत्मा कराह उठी है।
- आज का भारत जहाँ विकास के नारों की गूँज है,
वहीं दूसरी ओर, गरीब की झोपड़ी में खाली बर्तन सिसकियाँ भर रहे हैं। बढ़ती महंगाई और चरमराती व्यवस्था ने करोड़ों निरीहजनों के माथे से श्रम का पसीना पोंछकर उनके हाथों में असहायता की बेड़ियाँ थमा दी हैं।
- कभी जो दाल-चावल, रोटी-सब्जी एक साधारण भोजन थे,
- आज वे भी गरीब के लिए स्वप्न समान दुर्लभ हो चुके हैं।
हर सुबह बाजार में बदलते दाम, उसकी उम्मीदों को एक बार फिर कुचल देते हैं। स्कूल जाने की उम्र में बच्चे ईंट ढो रहे हैं, अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही रास्ते में दम तोड़ते बीमार शरीर और शिक्षा के नाम पर केवल वादों की धुंध यही है आज की कटु सच्चाई। सरकारी घोषणाओं की बौछार में गरीब का नाम तो दर्ज है, पर उसकी थाली तक राहत की एक भी बूँद नहीं पहुँचती। कागज़ों पर रंगीन योजनाएँ हैं, घोषणाओं में सुनहरे वादे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में भूख और बेबसी का अंधकार पसरा है।
भ्रष्टाचार की मोटी दीवारें और संवेदनहीनता की खाई ने उस दूरी को असंभव बना दिया है, जिसे पाटने के लिए लोकतंत्र ने संकल्प लिया था। महंगाई की बर्बर आँधी ने गरीब की उम्मीदों को उजाड़ दिया है और लचर प्रशासनिक तंत्र ने उसे यह एहसास करा दिया है कि वह इस लड़ाई में अकेला खड़ा है। विकास की रेलगाड़ी तो दौड़ रही है, मगर उसके डिब्बों में गरीबों के लिए कोई सीट नहीं।
किन्तु दोष केवल सत्ता का नहीं है। समाज भी अपनी चुप्पी से उतना ही दोषी है। यदि गरीब की पुकार सत्ता के गलियारों में गुम हो जाती है, तो हमारी संवेदनाओं की भी परख होनी चाहिए। जब तक हम एक-दूसरे की पीड़ा को अपना न समझेंगे, जब तक हम यह स्वीकार न करेंगे कि “उनका दुख” दरअसल “हमारा दुख” भी है, तब तक परिवर्तन एक सपना ही रहेगा। समाज को चाहिए कि वह अपने भीतर से करुणा के निर्झर को प्रवाहित करे।
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हर दिन एक छोटा सा प्रयास…
किसी भूखे को भोजन देना, किसी अनपढ़ बच्चे को पढ़ाना,
किसी बीमार को अस्पताल तक पहुँचाना एक चिंगारी बन सकता है, जो बदलाव की मशाल जला दे।___________________________________________
हमें चाहिए कि हम अपनी चुप्पी को तोड़ें, आवाज़ उठाएँ, साथ खड़े हों, ताकि वह दिन आए जब किसी बच्चे को भूखे पेट सोना न पड़े, जब किसी माँ की आँखों में राहत की मुस्कान लौट आए और जब गरीब की झोपड़ी में भी उम्मीद का दीपक जल सके।
गरीब की थाली केवल एक थाली नहीं है, वह राष्ट्र की आत्मा है। यदि वह खाली है, तो हमारा गर्व भी खोखला है।
समय आ गया है कि हम संवेदनाओं की इस टूटी हुई दीवार को फिर से जोड़ें और महंगाई, उपेक्षा व असमानता के खिलाफ एक सामूहिक संघर्ष का शंखनाद करें।
क्योंकि अगर कोई समाज अपने सबसे कमजोर को मुस्कुराते हुए नहीं देख सकता, तो वह खुद भी कभी सच्चे अर्थों में समृद्ध नहीं बन सकता।
“जब कोई भूखा सोता है, तो धरती की आत्मा एक आँसू गिराती है। आइए, हम वह आखिरी आँसू भी सुखा दें।”
सुनील कुमार यादव,
पेशे से पत्रकार और विचारों से जनपक्षधर लेखक।
गरीबों, वंचितों और पीड़ितों के जीवन-संघर्ष को अपने लेखन के माध्यम से स्वर देने में संलग्न।
समाज की हाशिए पर खड़ी आवाज़ों को मुख्यधारा तक पहुँचाने को अपना ध्येय मानते हैं।
विश्वास रखते हैं कि जब अंतिम पंक्ति का व्यक्ति मुस्कुराएगा, तभी विकास का अर्थ सार्थक होगा।
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