छत्तीसगढ़ में यहां है बिना शिवलिंग वाला मंदिर, महाशिवरात्रि पर उमड़ती भक्तों का जनसैलाब, जानें मान्यता

बिलासपुर/मल्हार (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ का मल्हार में एक प्राचीन शिव मंदिर है. यह मंदिर छठी-सातवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था. श्रावण माह और महाशिवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. भक्तजन यहां भगवान शिव का अभिषेक कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं।
छत्तीसगढ़ का मल्हार अपने ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के लिए प्रसिद्ध है. यहां स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर न केवल स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है. बल्कि इसके रहस्यमय इतिहास ने इसे और भी दिलचस्प बना दिया है. भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) के अनुसार, यह मंदिर छठी-सातवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था. अपनी अनूठी संरचना, अलंकृत मूर्तियों और रहस्य से घिरी गाथाओं के कारण यह मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है. इसके गर्भगृह में जलहरी स्थापित है, जो इस बात को प्रमाणित करता है कि यह भगवान शिव को समर्पित था. मंदिर की द्वारशाखा पर गंगा और यमुना की सुंदर प्रतिमाएँ उकेरी गई हैं. वहीं, अंदर की ओर शिव के गणों को विभिन्न मुद्राओं में दर्शाया गया है. मंदिर के निर्माण में विशाल पत्थरों को तराशकर इस्तेमाल किया गया था, जो उस काल की उत्कृष्ट स्थापत्य कला को दर्शाता है।


रहस्यमयी शिवलिंग का गायब होना

1979 से 1982 के बीच भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा इस स्थल की खुदाई करवाई गई थी. खुदाई के दौरान स्थानीय लोगों ने पंचरत्न से निर्मित एक चमकदार शिवलिंग जैसी आकृति देखने का दावा किया था. किंतु शाम ढलने के कारण खुदाई रोक दी गई. अगले दिन जब खुदाई दोबारा शुरू हुई. वहाँ जलहरी के अलावा कुछ नहीं मिला. यह रहस्य आज भी बना हुआ है कि वह चमकता हुआ शिवलिंग कहां गायब हो गया. इस घटना के बाद यह मंदिर “बिना शिवलिंग वाला मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

सोमवंशी शासकों की स्थापत्यकला का उत्कृष्ट नमूना

मल्हार का यह प्राचीन शिव मंदिर सोमवंशी शासकों की स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण उदाहरण है. यह मंदिर लंबे समय तक उपेक्षित रहा और समय के साथ एक विशाल टीले में परिवर्तित हो गया. इस स्थान को स्थानीय लोग \”देउर\” के नाम से जानते थे. खुदाई के दौरान यहां कई दुर्लभ कलाकृतियां, अलंकृत स्तंभ खंड और अन्य पुरावशेष प्राप्त हुए. जिससे इस मंदिर के शिव मंदिर होने की पुष्टि हुई।

मंदिर परिसर में दुर्लभ मूर्तियाँ

मंदिर के दक्षिण भाग में गरुड़ पर आरूढ़ भगवान विष्णु, लक्ष्मीनारायण की मूर्तियाँ स्थापित हैं. वहीं, पश्चिम भाग में रति और प्रीति के साथ कामदेव की सुंदर प्रतिमा है. इसके अलावा, शिव विवाह और उमा-महेश्वर के अलंकरण अत्यंत कलात्मक रूप में अंकित किए गए हैं. इतिहासविदों का मानना है कि यह मंदिर किसी कारणवश अपूर्ण रह गया था, लेकिन इसके अवशेष इसकी भव्यता को दर्शाते हैं।

आधुनिक संरक्षण और भव्य उद्यान

भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर परिसर को एक सुंदर उद्यान के रूप में विकसित किया है. रंग-बिरंगे फूलों, हरियाली और आकर्षक लैंडस्केपिंग के कारण यह स्थल दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है. बरसात के मौसम में यहां की हरियाली और प्राचीन मंदिर के भव्य दृश्य का संगम पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है।

श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र

श्रावण माह और महाशिवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. भक्तजन यहां भगवान शिव का अभिषेक कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं. मान्यता है कि इस मंदिर में जल चढ़ाने से सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं.मल्हार का यह रहस्यमयी शिव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, कला और संस्कृति का एक दुर्लभ संगम है. इसकी स्थापत्य कला, दुर्लभ मूर्तियां और रहस्यमयी कथाएं इसे और भी रोचक बनाती हैं. अगर आप इतिहास और आध्यात्मिकता में रुचि रखते हैं, तो यह स्थान निश्चित रूप से एक बार देखने लायक है।


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