जिनका बहा सड़क पर खून,टूटा पैर हुए घायल वो पुलिस कर्मी भी हैं किसान का ही पुत्र तो कोई हैं किसान का पौत्र….

किसान राष्ट्र की प्रगति की “धुरी” और राष्ट्र का पालक होता हैं

गरियाबंद(गंगा प्रकाश):-लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है और जो लोग खुद को अभिव्यक्त करने के लिए हिंसक तरीके अपनाते हैं उन्हें किसी भी तरह से माफ नहीं किया जा सकता है और न ही किया जाना चाहिए।ऐसी ही हिंसक घटना जिला गरियाबंद से सामने आई हैं जंहा धान ख़रीदी केन्द्र की मांग को लेकर धुरूवागुड़ी के पास चक्काजाम किया गया इस दौरान पुलिस पर लोगों ने जमकर पथराव कर दिया जिसमे मैनपुर थानेदार समेत 3 जवान घायल हो गए ये वही पुलिस कर्मी हैं जिनके पिता और दादा एवम परदादा सभी किसान ही थे और हैं।जिन्होंने अपनी जमीनों पर जी तोड़ मेहनत कर अपने पुत्रों और पौत्र को पढा लिखाकर योग्य और लायक इंसान बनाकर पुलिस विभाग में समाज की सेवा करने भेजा हैं।बता दे कि कंडेकेला सहकारी समिति के अधीन आने वाले 7 गांव के सैकड़ों लोग दिन सोमवार को नेशनल हाइवे 130 C पर चक्काजाम कर प्रदर्शन कर रहे थे प्रदर्शन में कुछ महिला किसान भी शामिल थी मौके पर राजस्व और पुलिस का अमला भी मौजूद था।

ज्ञात हो कि पहले आदिम जाति सहकारी समिति कांडेकेला में संचालित थी, जिसे समिति ने सहमति से भेजीपदर गांव में संचालित करने को कहा था इसकी सहमति उस इलाके ग्रामीणों ने जगह नहीं होने के कारण दी थी।जमीनी हकीकत यह थी कि ग्रामीणों शासकीय भूमि को अबैध तरीके से कब्जा जमाकर बैठ गए थे और जमीन नही होने का बहाना बनाकर भेजीपदर गांव में संचालित करने को कहा था।अब फिर उसी समिति को वापस एक गांव की सुविधा के मद्देनजर कांडेकेला लाने की मांग की जा रही थी।जबकि हैरानी की बात ये है कि धान खरीदी केंद्र को समिति के लोग ही जगह की कमी बताकर भेजीपदर में खुलवाए थे।अब वही लोग फिर से हंगामा कर दोबारा कांडेकेला में खोलने की मांग पर अड़े रहें।सूत्र बताते हैं कि यहां पहले ही तय हो चुका था कि प्रशासन की कोई बात नही मानना हैं और पुलिस को लाठी चार्ज करने को मजबूर करना हैं किंतु पुलिस प्रशासन ने पूरे धैर्य और संयाम का परिचय देते हुए किसी पर लाठीचार्ज नही की इसी पूर्व नियोजित कार्यक्रम के चलते ग्रामीणों द्वारा कांडेकेला में तत्काल आज के आज ही धान खरीदी केंद्र खोला जाए और कलेक्टर यहां पहुंचकर घोषणा करे की जिद पर अड़े रहे हालांकि ग्रामीण अपनी मांग को लेकर  एक सप्ताह पहले ही प्रशासन को अवगत करा दिया था, जिसके बाद सोमवार सुबह से ही प्रदर्शन करने बैठ गए थे। जो कि करीब एक हजार लोग मौके पर मौजूद थे।सूत्रों की माने तो इस धरना प्रदर्शन को लेकर कुछ बड़े चेहरे नेतृत्व कर रहे थे जो पार्टी में पदाधिकारी भी हैं।इस बीच प्रदर्शनकारियों के बीच कलेक्टर नहीं पहुंचे और सड़क जाम होने की वजह से पुलिस ने ग्रामीणों को वहां से हटाने की कोशिश की,तो ग्रामीणों ने पुलिस प्रशासन पथराव करना शुरू कर दिया।बताया जा रहा है  उग्र भीड़ ने  10 से ज्यादा वाहनों के शीशे तोड़े  हैं।मैनपुर पुलिस की गाड़ी को बीच सड़क पर ही जमकर तोड़फोड़ की गई।उग्र भीड़ ने सरकारी पुलिस वाहन को सड़क पर ही पलटाकर उल्टा कर दिया गया था, जो कि पुलिस द्वारा  सड़क के किनारे साइड पर खड़ी की गई थी।प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर उग्र भीड़ ने जोरदार पथराव कर दिया। जिसमे मैनपुर थानेदार समेत 3 पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए हैं।इस प्रकार उग्र भीड़ ने शासन को क्षति पहुँचाई है उससे लोकतंत्र शर्मसार हुआ है।उससे समूचे छत्तीसगढ़ समेत देश में हमारी छवि धूमिल हुई है, मस्तक पर हमेशा-हमेशा के लिए कलंक का टीका लगा है। और उससे भी अधिक विस्मयकारी यह है कि अभी भी कुछ नेता, तथाकथित बुद्धिजीवी इस हिंसक आंदोलन को जन-आंदोलन की संज्ञा देकर महिमामंडित करने की कुचेष्टा कर रहे हैं।इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि लोकतंत्र में जन-भावनाओं एवं जन-आंदोलनों की अपनी महत्ता एवं भूमिका होती है। पर जन-आंदोलनों की कुछ तो कसौटियाँ होती होंगीं? उसकी कुछ तो मूल पहचान-प्रवृत्तियाँ होंगीं?उसकी कुछ तो मर्यादाएँ होंगीं? स्वतंत्रता-पूर्व से लेकर बाद के अनेक सार्थक-सकारात्मक बदलावों में जन-आंदोलनों की सचमुच महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। चाहे वह स्वतंत्रता से पूर्व का असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो या विदेशी वस्त्रों एवं वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन रहा हो या स्वातंत्रत्योत्तर-काल का भूदान, संपूर्ण क्रांति, श्रीरामजन्मभूमि या अन्ना-आंदोलन। इन सबमें जनसाधारण की स्वतःस्फूर्त सहभागिता रही। तभी वे जन-आंदोलन का स्वरूप ग्रहण कर सके। इन सभी जन-आंदोलनों में यह सामान्य प्रवृत्ति देखने को मिली कि इनका नेतृत्व अपने ध्येय एवं नीति-नीयत-प्रकृति-परिणाम को लेकर भ्रमित या दिशाहीन बिलकुल नहीं रहा। बल्कि स्वतंत्रता-आंदोलनों में तो गाँधी जैसा दृढ़ एवं आत्मानुशासित नेतृत्व था, जो आंदोलनकारियों के हिंसक हो उठने पर अच्छे-भले सफल आंदोलन को भी स्थगित करने का नैतिक साहस व संयम रखता था। चौरी-चौरा में आंदोलनकारियों के हिंसक हो उठने के बाद उन्हें रोक पाना गाँधी जैसे नैतिक एवं साहसी नेतृत्व के लिए ही संभव था। सांस्कृतिक संगठनों को यदि छोड़ दें तो कदाचित राजनीतिक नेतृत्व से ऐसे उच्च मापदंडों की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती।

यह वह दौर था जब आंदोलन के भी सिद्धान्त या आदर्श हुआ करते थे। विदेशी सत्ता से लड़ते हुए भी उन आंदोलनों में स्वानुशासन, नैतिक नियमों एवं मर्यादित आचरण का पालन किया जाता था। सरकारी नीतियों-क़ानूनों का प्रतिकार या असहमति प्रकट करते हुए भी व्यक्तियों-संस्थाओं-प्रतीकों की गरिमा को ठेस न पहुँचाने का यत्नपूर्वक प्रयास किया जाता था। लोकतांत्रिक मूल्यों एवं संयम-संवाद के प्रति आम भारतीयों की आस्था ही रही कि आज़ादी के बाद भी जागरूक एवं प्रबुद्ध नेतृत्व द्वारा कमोवेश इन नैतिक मानदंडों का ध्यान रखा जाता रहा। और जिस नेतृत्व ने इन मानदंडों का उल्लंघन किया जनमानस ने उन्हें बहुत गंभीरता से कभी नहीं लिया। उनका प्रभाव और प्रसार अत्यंत सीमित या यों कहें कि नगण्य-सा रहा। भारत ने सदैव संवाद और सहमति की भाषा को ही अपना माना। धमकी, दबाव, हिंसा, आक्रामकता और मर्यादाविहीन भाषा से भारतीय जन-मन की स्वाभाविक दूरी रही।अपनी माँगों को लेकर अहिंसक एवं शांतिपूर्ण प्रदर्शन या आंदोलन आंदोलनकारियों का लोकतांत्रिक अधिकार है। और लोकतंत्र में इसके लिए सदैव स्थान रहता है। यह सरकार और जनता के बीच उत्पन्न गतिरोध एवं संवादहीनता को दूर करने में प्रकारांतर से सहायक भी है। पर बीते कुछ वर्षों से यह देखने को मिल रहा है कि चाहे वह जे.एन.यू-जामिया-एएमयू में चलाया गया विद्यार्थियों का आंदोलन हो, चाहे नागरिकता संशोधन विधेयक के नाम पर शाहीनबाग में मुसलमानों का; चाहे दलितों-पिछड़ों के नाम चलाया गया आंदोलन हो या वर्तमान में कृषि-बिल के विरोध के नाम पर,ये सभी आंदोलन अपनी मूल प्रकृति में ही हिंसक और अराजक हैं। अपनी माँगों को लेकर देश की राजधानी एवं क़ानून-व्यवस्था को अपहृत कर लेना या बंधक बना लेना, हिंसक एवं अराजक प्रदर्शनों द्वारा चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार पर परोक्ष-प्रत्यक्ष दबाव बनाना, सरकारी एवं सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाना, आने-जाने के मुख्य मार्गों को बाधित एवं अवरुद्ध करना, निजी एवं सरकारी वाहनों में तोड़-फोड़ करना, घरों-दुकानों-बाज़ारों में लूट-खसोट, आगजनी करना, राष्ट्रीय प्रतीकों एवं राष्ट्रध्वज का अपमान करना, मार-पीट, ख़ून-खराबे आदि को अंजाम देना- इनके लिए आम बात है।

ऐसी हिंसक,अराजक एवं स्वेच्छाचारी प्रवृत्तियाँ किसी भी सभ्य समाज या लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए मान्य एवं स्वीकार्य नहीं होतीं, न हो सकतीं हैं। इन सबसे जान-माल की भारी क्षति और रोज़मर्रा की ज़िंदगी तो बाधित होती ही होती है। आम नागरिकों के परिश्रम और कर से अर्जित करोड़ों-करोड़ों रुपए भी व्यर्थ नष्ट होते हैं, पुलिस-प्रशासन की ऊर्जा अन्य अत्यावश्यक कार्यों से हटकर प्रदर्शनकारियों को रोकने-थामने पर व्यय होती है, विकास की गाड़ी पटरी से उतरती है, पूरी दुनिया में देश की छवि धूमिल होती है, विदेशी निवेश प्रभावित होते हैं, पर्यटन और व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ता है और अनुकूल एवं उपयुक्त अवसर की ताक में घात लगाकर बैठे देश के दुश्मनों को खुलकर खेलने और कुटिल चालें चलने का मौक़ा मिल जाता है।

उल्लेखनीय है कि गाँधी जी स्वयं सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा, अनशन-उपवास जैसे प्रयोगों को कमज़ोरों-कायरों-दिशाहीनों के लिए सर्वथा वर्जित एवं निषिद्ध मानते थे। कदाचित वे इसके संभावित दुरुपयोग का अनुमान लगा चुके थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रायः तमाम उपद्रवी एवं अराजक तत्त्व भी स्वतंत्रता-आंदोलन में आजमाए गए इन प्रयोगों की आड़ में अपने हिंसक एवं अराजक व्यवहार को उचित एवं सही ठहराने की दलीलें देते हैं। व्यवस्था-विरोधी या आंदोलनरत समूहों-संगठनों को यह याद रखना होगा कि उनकी लड़ाई अब किसी परकीय या विदेशी सत्ता से नहीं है। अपितु वे लोकतांत्रिक पद्धत्ति से चुनी हुई अपनी ही सरकार तक अपनी बातें-माँगें पहुँचाना चाहते हैं। विधायिका और कार्यपालिका का तो काम ही सुधार की दिशा में क़ानून बनाना है। भारत में कोई स्विस-संविधान की तरह जनमत का प्रावधान तो है नहीं। यहाँ चुने हुए विधायक-सांसद ही जनता के प्रतिनिधि माने जाते हैं। वे ही सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करते हैं। सरकार तक अपनी भावनाओं को पहुँचाने के तमाम पारंपरिक माध्यम भी जनता के पास मौजूद हैं ही। वैसे भी लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है। हर चुनाव में सत्तारूढ़ दल के समर्थन या विरोध में उसे अपने मताधिकार के निर्णायक प्रयोग का अवसर मिलता है। आंदोलनरत स्वरों-समूहों को यह भी ध्यान रखना होगा कि जिन करोड़ों लोगों के समर्थन से कोई दल सत्तारूढ़ होता है, आख़िर उनके मत का भी कुछ-न-कुछ महत्त्व तो होता ही है! और होना भी चाहिए। क्या हम कल्पना में भी ऐसे समाज या तंत्र की कामना कर सकते हैं, जिसमें हल्ला-हंगामा करने वाले हुड़दंगियों-उपद्रवियों एवं अराजक तत्त्वों की तो सुनवाई हो, पर शांत-संयत-प्रबुद्ध-विधायी-अनुशासित नागरिक-समाज के मतों की उपेक्षा कर दी जाय?संवेेेदनशील एवं सरोकारधर्मी सरकारों का अर्थ यह तो नहीं कि उसमें केवल प्रतिरोधी स्वर ही सुने जाएँ और समर्थक या बहुमत स्वरों की घनघोर उपेक्षा की जाय? दुर्भाग्य से अपने देश में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अधिकांश सरकारों ने यही किया और अब तमाम आंदोलनों के नाम पर यही हो रहा है। यह सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वह उन नागरिकों को समुचित प्रश्रय एवं प्रोत्साहन दे जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए ईमानदार करदाता एवं अनुशासित नागरिक के रूप में अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के आंदोलन या विरोध का नेतृत्व करने वाले नेताओं या समूहों की भी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने भीतर के अराजक एवं उपद्रवी तत्त्वों की पहचान कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएँ। संसदीय प्रक्रियाओं को खुलेआम चुनौती देने, संस्थाओं को धूमिल, ध्वस्त एवं अपहृत करने तथा क़ानून-व्यवस्था को बंधक बनाने की निरंतर बढ़ती प्रवृत्ति देश एवं लोकतंत्र के लिए घातक है। इन पर अविलंब अंकुश लगाना समय और सुव्यवस्था की माँग है। कदाचित एक भी सच्चा भारतवंशी नहीं चाहेगा कि दुनिया उसके महान एवं प्राणप्रिय भारतवर्ष की पहचान एक अराजक एवं स्वेच्छाचारी राष्ट्र-समाज के रूप में करे।

जय जवान-जय किसान: जब पाक को हराया,अमेरिका ने गेहूं रोका तो आया था यह नारा

बताते चलें कि 1962 के भारत-चीन युद्ध से देश आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था। जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तब देश में खाने का संकट था। फिर आया साल 1965, जब मानसून कमजोर रहा। देश मे अकाल की नौबत आ गई। इसी दौरान 5 अगस्त 1965 को 30 हजार पाकिस्तानी सैनिक एलओसी पार करके कश्मीर में घुस आए थे भारतीय सेना ने जोरदार जवाब दिया। 6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना ने लाहौर तक कब्जा कर लिया था पाकिस्तान के 90 टैंक ध्वस्त कर दिए थे।यह वो दौर था जब हम अमेरिका की पीएल-480 स्कीम के तहत हासिल लाल गेहूं खाने को बाध्य थे। इसी बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्रीजी को धमकी दी गई थी, अगर युद्ध नहीं रुका तो गेहूं का निर्यात बंद कर दिया जाएगा। शास्त्रीजी ने कहा- बंद कर दीजिए गेहूं देना। इतना ही नहीं, उन्होंने अमेरिका से गेहूं लेने से भी साफ इनकार कर दिया था।अक्टूबर 1965 में दशहरे के दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में शास्त्रीजी ने पहली बार-जय जवान जय किसान का नारा दिया। शास्त्रीजी ने लोगों से सप्ताह में एक दिन व्रत रखने को कहा, यही नहीं उन्होंने खुद भी व्रत रखना शुरू कर दिया था।और आप सभी जानते हैं बताने को नया कुछ भी नही हैं कि हमारे जवान देश की सीमा पर समूचे देश की रक्षा करते हैं तो वंही दूसरी और हमारे पुलिस के जवान  देश आन्तरिक सुरक्षा करती हैं।सरहद और हद में दोनों जवान के कारण ही हम निर्भरता से अपने परिजनों के साथ अपना जीवन यापन करते हैं।किंतु धुरवागुड़ी की उक्त घटना ने जय जवान जय किसान के नारे को कलंकित करके रख दिया हैं।

किसान राष्ट्र का पालक होता हैं

भारत एक कृषि प्रधान देश है।हमारी सम्पन्नता हमारे कृषि उत्पादन पर निर्भर करती है।इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये भारतीय कृषक की एक बड़ी भूमिका है। वास्तव में भारत कृषकों की भूमि है।हमारी 75% जनता गांवों में रहती है।भारतीय किसान का सर्वत्र सम्मान होता है । वह ही सम्पूर्ण भारतवासियों के लिए अन्न एवं सब्जियाँ उत्पन्न करता है।पूरा वर्ष भारतीय कृषक खेत जोतने बीज बोने एव फसल उगाने में व्यस्त रहता है।वास्तव में उसका जीवन अत्यन्त व्यस्त होता है।त्याग और तपस्या का दूसरा नाम है किसान।वह जीवन भर मिट्‌टी से सोना उत्पन्न करने की तपस्या करता रहता है।तपती धूप, कड़ाके की ठंड तथा मूसलाधार बारिश भी उसकी इस साधना को तोड़ नहीं पाते।हमारे देश की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी गांवों में निवास करती है।जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि है।एक कहावत है कि भारत की आत्मा किसान है जो गांवों में निवास करते हैं।किसान हमें खाद्यान्न देने के अलावा भारतीय संस्कृति और सभ्यता को भी सहेज कर रखे हुए हैं।यही कारण है कि शहरों की अपेक्षा गांवों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता अधिक देखने को मिलती है।किसान की कृषि ही शक्ति है और यही उसकी भक्ति है।वर्तमान संदर्भ में हमारे देश में किसान आधुनिक विष्णु है।वह देशभर को अन्न, फल, साग, सब्जी आदि दे रहा है लेकिन बदले में उसे उसका पारिश्रमिक तक नहीं मिल पा रहा है। प्राचीन काल से लेकर अब तक किसान का जीवन अभावों में ही गुजरा है।किसान मेहनती होने के साथ-साथ सादा जीवन व्यतीत करने वाला होता है।

समय अभाव के कारण उसकी आवश्यकतायें भी बहुत सीमित होती हैं।उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता पानी है।यदि समय पर वर्षा नहीं होती है तो किसान उदास हो जाता है।इनकी दिनचर्या रोजाना एक सी ही रहती है।किसान ब्रह्ममुहूर्त में सजग प्रहरी की भांति जग उठता है।वह घर में नहीं सोकर वहां सोता है जहां उसका पशुधन होता है।

उठते ही पशुधन की सेवा, इसके पश्चात अपनी कर्मभूमि खेत की ओर उसके पैर खुद-ब-खुद उठ जाते हैं।उसका स्नान, भोजन तथा विश्राम आदि जो कुछ भी होता है वह एकान्त वनस्थली में होता है।वह दिनभर कठोर परिश्रम करता है।स्नान भोजन आदि अक्सर वह खेतों पर ही करता है।सांझ ढलते समय वह कंधे पर हल रख बैलों को हांकता हुआ घर लौटता है।कर्मभूमि में काम करने के दौरान किसान चिलचिलाती धूप के दौरान तनिक भी विचलित नहीं होता।इसी तरह मूसलाधार बारिश या फिर कड़ाके की ठंड की परवाह किये बगैर किसान अपने कृषि कार्य में जुटा रहता है । किसान के जीवन में विश्राम के लिए कोई जगह नहीं है।वह निरंतर अपने कार्य में लगा रहता है।कैसी भी बाधा उसे अपने कर्तव्यों से डिगा नहीं सकती।अभाव का जीवन व्यतीत करने के बावजूद वह संतोषी प्रवृत्ति का होता है।इतना सब कुछ करने के बाद भी वह अपने जीवन की आवश्यकतायें पूरी नहीं कर पाता। अभाव में उत्पन्न होने वाला किसान अभाव में जीता है और अभाव में इस संसार से विदा ले लेता है।अशिक्षा, अंधविश्वास तथा समाज में व्याप्त कुरीतियां उसके साथी हैं।सरकारी कर्मचारी, बड़े जमीदार, बिचौलिया तथा व्यापारी उसके दुश्मन हैं, जो जीवन भर उसका शोषण करते रहते हैं।आज से पैंतीस वर्ष पहले के किसान और आज के किसान में बहुत अंतर आया है।स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात किसान के चेहरे पर कुछ खुशी देखने को मिली है।

अब कभी-कभी उसके मलिन-मुख पर भी ताजगी दिखाई देने लगती है । जमीदारों के शोषण से तो उसे मुक्ति मिल ही चुकी है परन्तु वह आज भी पूर्ण रूप से सुखी नहीं है।आज भी 20 या 25 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जिनके पास दो समय का भोजन नहीं है।शरीर ढकने के लिए कपड़े नहीं हैं । टूटे-फूटे मकान और टूटी हुई झोपड़ियाँ आज भी उनके महल बने हुए हैं ।

हालांकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से किसान के जीवन में कुछ खुशियां लौटी हैं।सरकार ने ही किसानों की ओर ध्यान देना शुरू किया है।उनके अभावों को कम करने के प्रयास में कई योजनाएं सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं । किसानों को समय-समय पर गांवों में ही कार्यशाला आयोजित कर कृषि विशेषज्ञों द्वारा कृषि क्षेत्र में हुए नये अनुसंधानों की जानकारी दी जा रही है।इसके अलावा उन्हें रियायती दर पर उच्च स्तर के बीज, आधुनिक कृषि यंत्र, खाद आदि उपलब्ध कराये जा रहे हैं।उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने व व्यवसायिक खेती करने के लिए सरकार की ओर से बहुत कम ब्याज दर पर ऋण मुहैया कराया जा रहा है।खेतों में सिंचाई के लिए नहरों व नलकूपों का निर्माण कराया जा रहा है।उन्हें शिक्षित करने के लिए गांवों में रात्रिकालीन स्कूल खोले जा रहे हैं।इन सब कारणों के चलते किसान के जीवन स्तर में काफी सुधार आया है। उसकी आर्थिक स्थिति भी काफी हद तक सुदृढ़ हुई है।

किसान राष्ट्र की प्रगति की “धुरी”

किसान ही किसी भी देश की प्रगति के ‘धुरी’ हुआ करते हैं। जीवन की रक्षा के लिए सुंदर कपड़ों और आलिशान महलों की अपेक्षा उदर की पूर्ति आवश्यक होता है, जो कीमती धातुओं या फिर रुपयों को चबा कर पूर्ति नहीं हो सकता है, इसके लिए अन्न पदार्थों की आवश्यकता होती है, जो हमें किसानों के खून-पसीनों के एवज में ही प्राप्त होते हैं। किसान न केवल देश को अपने खाद्यानों से समृद्ध करते हैं, बल्कि देश की हर प्रगति के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारक होते हैं।हमारे जीवन में किसानों का एक अलग ही महत्व है, हमारी थाली में परोसे गए भोजन सामग्री उसी अन्नदाता किसान की मेहनत का ही फल है, जो वर्ष भर मिट्टी में अपने खून-पसीनों को बहाकर अन्न उगाने के कठोर परिश्रम का कार्य करते हैं। बैलों के साथ अपने कन्धों पर हल को धारण किये हुए अधनंगे किसान त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति तो होते ही हैं, उनमें ही सृजनकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु और विषपानकर्ता महेश की अद्भुत त्रिदेवत्व शक्ति निहित हैं। उनमें आजीवन मिट्‌टी से सुनहली फसलों को उत्पन्न करने के लिए महर्षि दधीचि की कठोर हड्डियों का तेज निहित है। उनकी तपस्या अटल है, जिसे तपती धूप, कड़ाके की सर्दी तथा मूसलाधार बारिश भी तोड़ नहीं पाते हैं। भारत की वास्तविक आत्मा किसान है जो दिल्ली जैसे विकसित शहरों में नहीं, बल्कि गाँवों में टूटी-फूटी झोपड़ियों में निवास करते हैं । डॉo राम कुमार वर्मा ने भारतीय किसानों के सही चित्र अंकित करते हुए लिखा हैं कि-

अधखुले अंग जिनमें केवल है कसे हुए कुछ अस्थि-खण्ड,

जिनमें दधीचि की हड्डी है, यह वज्र इन्द्र का है प्रचण्ड  !

जो है गतिशील सभी ऋतु में गर्मी वर्षा हो या कि ठण्ड,

झोपड़ी झुकाकर तुम अपनी ऊँचे करते हो राज-द्वार !

हे ग्राम देवता ! नमस्कार !

गौरतलब हो कि किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसम्बर, 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ ज़िले के हापुड़ के नूरपुर नामक ग्राम में हुआ था। वह स्वयं किसान परिवार से सम्बन्धित थे और वह ग्रामीण समस्याओं तथा खेती सम्बन्धित समस्यायों को गहराई से समझते थे। उन्होंने किसान सेवा जैसे अपने नैतिक मूल्यों को अपने पिता मीर सिंह से विरासत के रूप में प्राप्त कर किसानों, पिछड़ों और ग़रीबों की सेवा हेतु राजनीति की। उन्होंने सर्वदा खेती और गाँव को महत्व दिया। उनकी नीति किसानों व ग़रीबों को ऊपर उठाने की थी। उनका मानना था कि बगैर किसानों को खुशहाल किए देश व प्रदेश का विकास असम्भव है। भारत का संपूर्ण विकास तभी होगा जब किसान, मज़दूर, ग़रीब आदि सभी खुशहाल होंगे। किसानों की खुशहाली उन्नत खेती से ही हो सकती है। उनके उपज के लिए उचित उपाय हो और उन्हें उपज का उचित दाम मिल सके, इसके लिए भी वह गंभीर थे। आज़ादी के बाद चौधरी चरण सिंह पूर्णत: किसानों के हक के लिए राजनीतिक लड़ाई लड़ने लगे। उनकी मेहनत के कारण ही ‘‘जमींदारी उन्मूलन विधेयक” साल 1952 में पारित हो सका। इस एक विधेयक ने सदियों से खेतों में ख़ून-पसीना बहाने वाले किसानों को खुशहाल जीने का मौका प्रदान दिया। दृढ़ इच्छा शक्ति के धनी चौधरी चरण सिंह ने प्रदेश के 27000 पटवारियों के त्यागपत्र को स्वीकार कर ‘लेखपाल‘ पद का सृजन कर नई भर्ती करके किसानों को पटवारी आतंक से मुक्ति तो दिलाई ही।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में और केन्द्र में वित्तमंत्री के रूप में चौधरी चरण सिंह ने मौका मिलते ही किसानों के हितार्थ भूमि सुधारों सम्बन्धित बहुत काम किया। किसानों के लिए अलग-अलग कई हितकारी कार्य किए, जो किसानों को जमीदारों की शोषण नीति से लड़ने में मदद करती थी। क्योंकि पहले जमीदार किसानों को उनके उपज के बदले कम से कम पैसा अदा करते थे और स्वयं उसे महँगे दामों में बेचकर बेहिसाब लाभ कमाते थे। उन्होंने अपने हर बजट में गाँवों और किसानों को ही केंद्र में रखा और सर्वदा किसानों के साथ कृतज्ञता से पेश आने के लिए अपने अधिकारियों को हिदायतें दीं। भारत के पाँचवें पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को ‘किसानों का मसीहा’ भी कहा जाता है। अतः चौधरी चरण सिंह की जयंती 23 दिसंबर को ही ‘राष्ट्रीय किसान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। अतः आज भी “राष्ट्रीय किसान दिवस” के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह को किसानों के अभूतपूर्व विकास के लिए याद किया जाता है। 

देश में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने भी किसानों को ही देश का ‘सरताज’ माना था। लेकिन देश की आज़ादी के बाद से ऐसे नेता कम ही देखने को मिले, जिनमें किसानों के प्रति सच्चा प्रेम और उनसे सम्बन्धित कृषि कार्य के लिए विकास की सही चाहत हो। हमारे देश के किसान भाई ही आधुनिक पालनकर्ता विष्णु है, जो निरंतर कर्मठता की भाव-भूमि पर खड़े होकर अन्न, फल, साग, सब्जी आदि देते हैं, लेकिन उसके बदले में उन्हें उनका सही पारिश्रमिक तक प्राप्त नहीं हो पाता है । 

प्राचीन काल से लेकर अब तक किसान का जीवन प्रेमचन्द के ‘होरी’ और ‘हल्कू’ के समान ही सदैव अभावों में ही गुजर-वसर कर टूट-बिखर रहे हैं ।

किसानों की अवनति के पीछे उनके मन में व्याप्त जातिप्रथा, अशिक्षा, परम्परागत कृषि विधि के प्रति आसक्ति आदि कई बड़े कारण रहे हैं, जिन्हें दूर कर किसानों में बराबरी व संपन्नता को लाया जा सकता है, जिससे राष्ट्र की आर्थिक और मानवीय शारीरिक समृद्धि हो सकती है। किसानों का देश की प्रगति में उतना ही महत्व है, जितना देश की बाह्य रक्षा के लिए कोई सैनिक का। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का विचार था कि देश की सुरक्षा, सुख-समृद्धि और आत्मनिर्भरता केवल सैनिकों और शस्त्रों पर ही आधारित नहीं, बल्कि किसानों और श्रमिकों पर भी आधारित है। अतः उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा सारे देश को दिया। कवि महावीर प्रसाद ‘मधुप’ के शब्दों में हम भी यही कहेंगे –

ओ भारत के कर्मठ किसान! तुम भूमि-पुत्र कहलाते हो,

श्रम की पूजा में ही अपने जीवन की भेंट चढ़ाते हो।

सैनिक लड़ता समरांगण में, तुम उसे सशक्त बनाते हो,

पोषण कर सबके प्राणों का, अपना कर्त्तव्य निभाते हो॥

तुम ध्यान यही रखते हरदम महफ़ूज वतन की रहे शान।

जय-जय जवान, जय-जय किसान॥

आज भी किसान भाई बहुत ही मेहनत और लगन के साथ कठोर मिट्टी से अनाज को उगाते हैं, खेतों में समय समय पर खाद डालना, पानी सीखना, खरपतवार निकालना, कीड़ा मकोड़ा से बचाना आदि समस्याओं का सामना करते हैं। पर उन्हें अपनी उपज का सही मूल्य प्राप्त नहीं हो पता है। बड़े-बड़े सेठ-साहूकार, दलाल, दूकानदार आदि उनके उपज को कम रुपए में खरीद लेते हैं। फलतः आज भी किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई बहुत सुधार नहीं हुए हैं । कई बार बाढ़ और सुखा पड़ने के कारण किसानों की फसल खराब हो जाती है। ऐसे दुखद स्थिति को देख कर कई बार किसान सहन नहीं कर पाता है और आत्महत्या की ओर बढ़ जाते हैं । ऐसे आवश्यक है सरकार और समृद्ध जनों को किसानों के पक्ष में आगे बढ़ने की, जो उनके दुःख को कम कर सकें। भारत सरकार द्वारा भी किसानों के हित के लिए तथा उनको प्रोत्साहन देने के लिए अलग अलग योजनाओं को लागू किया गया है।


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