जिले के रेंगाकठेरा में अवैध रेत खनन : प्रशासन की लापरवाही और खनिज विभाग की संलिप्तता पर गंभीर सवाल

 

बालोद (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम रेंगाकठेरा में अवैध रेत खनन का मामला सामने आया है, जहां शासन की लाख कोशिशों के बावजूद रेत माफिया का कारोबार धड़ल्ले से जारी है। यहां दो बड़ी-बड़ी एक्सकेवेटर (चैन माउंटेन) मशीनों के माध्यम से नदी का सीना छलनी किया जा रहा है, और यह सब खुलेआम हो रहा है।

ग्रामवासियों और मीडिया के सूत्रों के अनुसार, यह अवैध खनन बिना किसी डर और भय के चल रहा है। रेंगाकठेरा में रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे प्रशासन की आंखों में धूल झोंककर अपने कारोबार को जारी रखे हुए हैं। यह स्थिति प्रशासन की लापरवाही और खनिज विभाग की संलिप्तता को उजागर करती है।

इस मामले में बालोद जिले के खनिज विभाग के अधिकारी श्रीमती मीनाक्षी साहू व खासकर खनिज निरीक्षक शशांक सोनी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। क्या विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से यह अवैध खनन हो रहा है या फिर उनकी जानबूझकर लापरवाही से रेत माफिया का यह कारोबार फल-फूल रहा है? यह सवाल अब जिले के नागरिकों के मन में उठ रहे हैं। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिला खनिज अधिकारी श्रीमती मीनाक्षी साहू कभी भी फोन नहीं उठाती। ऐसा वे जानबूझकर करती है या कोई और कारण है ये तो वो ही बता पाएगी।

इस मामले में जिला प्रशासन और खनिज विभाग को तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए। रेत माफिया के खिलाफ कठोर कदम उठाकर इस अवैध खनन को रोकना चाहिए, ताकि जिले की नदियों और पर्यावरण को बचाया जा सके। समाज के जागरूक नागरिकों और मीडिया को इस मुद्दे को उठाकर प्रशासन और खनिज विभाग पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि इस अवैध कारोबार पर रोक लगाई जा सके।

आपको बता दें कि बिना प्रशासनिक तथा खनिज विभाग की अनुमति के नदियों से रेत का अवैध उत्खनन, विशेषकर भारी मशीनों जैसे जेसीबी और चैन माउंटेन (एक्सकेवेटर) मशीनों के माध्यम से किया जाना, न केवल कानून का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि यह पर्यावरण, जलीय जीव-जंतुओं और पारिस्थितिक संतुलन के लिए भी अत्यंत घातक सिद्ध होता है।

अवैध रेत उत्खनन एवं मशीनों का प्रयोग एक गंभीर पर्यावरणीय और कानूनी अपराध है। खनिज नियमों का उल्लंघन के तहत भारतीय खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 तथा छत्तीसगढ़ खनिज नियमावली के अंतर्गत रेत जैसे गौण खनिज के उत्खनन के लिए पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। बिना अनुमति उत्खनन गैरकानूनी माना जाता है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत इस प्रकार की गतिविधियां यदि पर्यावरणीय अनुमति के बिना होती हैं, तो ये अपराध की श्रेणी में आती हैं। जल अधिनियम, 1974 एवं जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत भी इस तरह के कार्यों को दंडनीय माना गया है।

 

मछलियों और जलचर जीवों का निवास हो रहा खत्म। रेत का अत्यधिक दोहन जल जीवों के प्रजनन और जीवन क्षेत्र को नष्ट कर देता है, जिससे उनका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। जल स्रोतों का सूखना भी एक बड़ा कारण है। नदी की गहराई और बहाव के प्राकृतिक स्वरूप में बदलाव से भूजल स्तर गिरता है और आस-पास के जल स्रोत सूखने लगते हैं।

 

ऐसी लापरवाही और षडयंत्र से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होता है, जिससे बाढ़ और सूखा जैसी स्थितियों का खतरा बढ़ता है। कई क्षेत्रों में भूमि कटाव शुरू हो जाता है, जिससे आसपास के कृषि योग्य भूमि को नुकसान होता है। वन्यजीव और पक्षी प्रजातियां जो नदी किनारे निवास करती हैं, वे भी इस असंतुलन के कारण विस्थापित हो जाती हैं।

 

भारी मशीनों का प्रयोग क्यों घातक है? जेसीबी और चैन माउंटेन मशीनें बड़ी मात्रा में रेत निकालती हैं, जो पारिस्थितिकी के लिए अचानक झटका होता है। इनका कंपन नदी के तल में गहराई तक असर करता है जिससे जीवों की मौत और तल की गुणवत्ता खराब होती है। मशीनों से उठने वाला शोर और प्रदूषण जलीय और तटीय जीवन को प्रभावित करता है।

 

अवैध उत्खनन की सूचना तत्काल खनिज विभाग, राजस्व विभाग और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को दें। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत करें कि भारी मशीनों के प्रयोग से कानून का उल्लंघन हो रहा है। एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) में जनहित याचिका (पीआईएल) के माध्यम से शिकायत की जा सकती है। स्थानीय स्तर पर ग्राम सभा एवं पंचायतों को सूचित कर विरोध दर्ज कराया जा सकता है।

 


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