चतुराई छोड़कर भजन करने पर मिलती है भगवत कृपा – साध्वी राधिका किशोरी जी

   गोलू कैवर्त 

बलौदाबाजार(गंगा प्रकाश )। अनुविभाग मुख्यालय बिलाईगढ़ से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व दिशा में स्थित ग्राम झुमका में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया है। यह आयोजन स्वर्गीय फुद राम साहू के पुण्यस्मृति एवं विश्वकल्याण हेतु  चंद्रानी- तुलसी साहू ( प्रांताध्यक्ष पंचायत सचिव संघ छत्तीसगढ़) श्रीमती अनिता – कामता साहू,  गंगा— समारू साहू एवं उनके परिवार द्वारा आयोजित है। साध्वी राधिका किशोरी  (श्रीधाम अयोध्या) संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा अपनी सुमधुर वाणी में सुना रही हैं। कथा के चतुर्थ दिवस कथा का शुभारंभ करती हुई साध्वी ने बताई कि यह मानव देह भगवत्कृपा से हम लोगों को मिला है। इस जीवन का लक्ष्य ईश्वर द्वारा पहले से निर्धारित है ।मानव देह का खास लक्ष्य भगवान या भगवत्प्रेम को प्राप्त करना है। ठाकुरजी केवल प्रेम के ही भूखे हैं ।भगवान प्रेम से प्रगट हो जाते हैं, यद्यपि भगवान सर्वत्र समान रूप से विद्यमान है किंतु  प्रेम से प्रगट होते हैं। भगवान को प्रेमी अत्यंत प्रिय है। ठाकुरजी किसी विशेष गुण से नहीं रिझते, किंतु प्रेम से भगवान रीझ जाते हैं और भक्तों को दर्शन भी देते हैं। प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी के शब्दों में— हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मै जाना।। रामहि केवल प्रेम पियारा ।जानि लेहु जो जाननिहारा ।। प्रेमाभक्ती रूपी जल के बिना अंदर के मल कभी नहीं समाप्त होते  एवं मन के निर्मल हुए बिना प्रभु मिलते भी नहीं है, चाहे व्यक्ति कितना भी जप तप योग वैराग्य आदि साधन कर ले। गोस्वामीजी ने लिखे हैं कि——-प्रेमभक्ति जल बिनु रघुराई। अभ्यंतर मल कबहुं न जाई।। निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।। मिलहि न रघुपति बिनु अनुरागा। किए कोटि जप योग विरागा। हमारे देश के प्रसिद्ध संत श्रीकबीरदास जी ने कहे हैं कि व्यक्ति चाहे सारे वेदशास्त्र को पढ़ ले यदि जीवन में भगवत प्रेम नहीं है तो वह पंडित नहीहै। पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।  यह पंडित शब्द पंडा से बना है।पंडित उसे कहते हैं जिसकी बुद्धि शास्त्रो ज्जवला है। भगवत प्रेम से मनुष्य का मन एवं बुद्धि निर्मल हो जाता है एवं व्यक्ति की बुद्धि मन के निर्मल होने पर भगवान की प्राप्ति हो जाती है। 

            साध्वी राधिका किशोरीजी ने जड़भरत एवं राजा रहुगण की कथा, गजेंद्र मोक्ष एवं समुद्रमंथन की कथा को विस्तार से कहकर श्रोता समाज को मंत्रमुग्ध कर दी ।कथा सुनाती हुई उन्होंने बताई कि भगवान को कपट, चतुराई, दिखावा पसंद नहीं है। उनको सरलता, सहजता, निर्मलता अत्यधिक प्रिय है। मन वचन कर्म से चतुराई को छोड़कर भजन करने से भगवान कृपा करते हैं। भगवत्कृपा से व्यक्ति के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। मनुष्य धन्य हो जाता है। उसका मानव देह प्राप्त करना सफल हो जाता है। मन क्रम वचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई।। कथा के बीच-बीच में साध्वी किशोरीजी  भजन गाती हैं तो कथा पंडाल में आनंद उत्साह उमड पड़ता है। ताली बजाकर नृत्य करना प्रारंभ हो जाता है। भजन के चलते तक पंडाल में गजब का नृत्य देखने को मिलता है।

          कथा आयोजक तुलसी साहू, कामता साहू ने आगामी 3 दिन की कथाओं में अधिक से अधिक लोगों को आने के लिए निवेदन किए हैं। आयोजकों द्वारा भव्य एवं आकर्षक कथामंच एवं पंडाल का निर्माण कराया गया है। इस कथा की चर्चा दूर-दूर तक हो रही है।

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