गुरु इष्ट के अपमान होने की आशंका हो उस स्थान पर नही जाना चाहिए– पंडित प्रदीप चौबे।

वामन अवतार प्रसंग से भाव विभोर हुए उपस्थित श्रोतागण।

राजेश सोनी

तखतपुर (गंगा प्रकाश)। नगर में जायसवाल परिवार द्वारा पुराना थाना प्रांगण में पितृ मोक्षार्थ संगीतमय श्रीमद भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। श्रीमदभागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर पंडित प्रदीप चौबे ने राम जन्म कथा सती प्रसंग ध्रुव चरित्र देवहूति प्रसंग वासुदेव महिमा यज्ञ दक्षिणा प्रसंग एवम अमृत मंथन के समय मोहिनी अवतार वामन अवतार के बारे में विस्तार से बताया।

सती प्रसंग का वर्णन करते हुए कथाचार्य ने बताया कि किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां आप जा रहे है वहां आपका अपने इष्ट या अपने गुरु का अपमान न हो। कथाचार्य ने कहा कि यदि अपने गुरू इष्ट के अपमान होने की आशंका हो तो उस स्थान पर जाना नहीं चाहिए। चाहे वह स्थान अपने जन्म दाता पिता का ही घर क्यों न हो। प्रसंगवश भागवत कथा के दौरान सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए भगवान शिव की बात को नहीं मानने पर सती के पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाहा होना पड़ा था।

भागवत कथा में उत्तानपाद के वंश में ध्रुव चरित्र की कथा को सुनाते हुए पंडित प्रदीप चौबे ने समझाया कि ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य संयम की नितांत आवश्यकता रहती है। भक्त ध्रुव द्वारा तपस्या कर श्रीहरि को प्रसन्न करने की कथा को सुनाते हुए बताया कि भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए क्योंकि बचपन कच्चे मिट्टी की तरह होता है उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है। ध्रुव की साधना उनके सत्कर्म तथा ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा के परिणाम स्वरूप ही उन्हें वैकुंठ लोक प्राप्त हुआ। 

कथा के दौरान कथाचार्य ने बताया कि संसार में जब-जब पाप बढ़ता है, भगवान धरती पर किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं। राम जन्म की कथा सुनाई तो श्रोता भाव विभोर हो गए। उन्होंने कहा कि जब अयोध्या में भगवान राम का जन्म होने वाला था। तब समस्त अयोध्या नगरी में शुभ संकेत होने लगे। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने पृथ्वी लोक पर आकर धर्म की स्थापना की। आज का व्यक्ति ईश्वर की सत्ता को मानने से भले ही इंकार कर दे लेकिन एक न एक दिन उसे ईश्वर की महत्ता को स्वीकार करना ही पड़ता है। संसार में जितने भी असुर उत्पन्न हुए सभी ने ईश्वर के अस्तित्व को नकार दिया और स्वंय भगवान बनने का ढोंग करने लगे लेकिन जब ईश्वर ने अपनी सत्ता की एक झलक दिखाई तो सभी का अस्तित्व धरा से ही समाप्त हो गया। अधर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो लेकिन धर्म के मार्ग पर चलने वाले के आगे अधिक समय तक नहीं टिक सकता।

कथावाचक पंडित प्रदीप चौबे ने भगवान यज्ञ और दक्षिणा के प्रसंग बताते हुए कहा कि भगवान यज्ञ का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था। स्वायम्भुव मनु की पत्नी शतरूपा के गर्भ से आकूति का जन्म हुआ। वे रूचि प्रजापति की पत्नी हुई। आकूति और प्रजापति रूचि के जुड़वाँ संतानें हुईं। पुत्र यज्ञ जो भगवान विष्णु के यज्ञ नाम से अवतरित हुए। और कन्या हुईं दक्षिणा। मनु जी ने विवाह से पहले ही यह वचन लिया था कि प्रथम पुत्र उन्हें गोद दे दिया जाएगा क्योंकि वे जानते थे कि पुत्र नारायण का अवतार होंगे। इस वचन के अनुसार मनु ने यज्ञ को अपने पुत्र के रूप में गोद ले लिया। यज्ञ विष्णु रूप एवं दक्षिणा लक्ष्मी रूपा थी। इन दोनों का आपस में विवाह हुआ। इन्हीं के कारण से सृष्टि में सर्वप्रथम यज्ञों की प्रक्रिया आरम्भ हुई। इन यज्ञों के कारण देवताओं की शक्ति बढ़ने लगी। यज्ञ और दक्षिणा एक दूसरे के पूरक है। बिना दक्षिणा के यज्ञ फलित नही होता।

कथाचार्य ने वामन अवतार प्रसंग पर विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि किस प्रकार राजा बलि ने अपना सर्वस्व ईश्वर को दान कर दिया। गुरु ने ईश्वर से साक्षात्कार करवाया। भगवान वामन देव ने जब दो पग में ही तीन लोक माप लिया तब तीसरे पग को राजा बलि के मस्तक पर धारण कर लिया। कथा सुन उपस्थित श्रोतागण भावविभोर हो गए। कथा स्थल जय जय श्री राधे के जयघोष से गूंज उठा।

श्रीमद् भागवत महापुराण के चतुर्थ दिवस प्रवचन सुनने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ा। भागवत पुराण पर दिए जा रहे प्रवचनों को सुनने के प्रति जनता में अपूर्व उत्साह देखने को मिल रहा है। इस अवसर पर सत्येंद्र जायसवाल किशोर जायसवाल सौरभ जायसवाल गिरधर राजपूत सहित अन्य भक्तगण उपस्थित रहे।

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