मौका परस्तो की पोस्टर बाजी से कार्यकर्ता मायूश

प्रकाश कुमार यादव

देवभोग/गरियाबंद(गंगा प्रकाश)।। एक तरफ भाजपा अब चुनावी मूड में आ गई हैं और गुटबाजी खत्म करने की मुहिम भी जारी है। छत्तीसगढ़,हिमाचल प्रदेश,राजस्थान, मध्यप्रदेश में अंतर्कलह जारी है लेकिन छत्तीसगढ़ तो अब सरेआम पोस्टरों में दिखाई दे रहा है।एक तरफ भाजपा में गुटबाजी हावी हो रही है वहीं,गुटबाजी कांग्रेस के लिए चुनाव में लाभदायक साबित होगी।भाजपा में फैली गुटबाजी को लेकर आम कार्यकर्ता परेशान हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे पार्टी लगातार कमजोर हो रही है।पिछले तीन वर्षों से प्रदेश में भाजपा की राजनीति में गुटबाजी चरम पर है। यहां पार्टी के कई ग्रुप बन गए हैं। पार्टी में इस धड़ेबाजी को लेकर आम कार्यकर्ता परेशान है। कार्यकर्ताओं पर ग्रुपों का संचालन करने वाले नेताओं का ठप्पा लगाया जा रहा है। बड़े नेताओं द्वारा की जा रही गुटबाजी व हठधर्मिता के कारण जहां पार्टी ने  2018 के विधान सभा चुनाव में सत्ता गवाई थी।हालांकि भाजपा के सीर्ष नेता हमेशा से पार्टी के अंदर व्याप्त गुटबाजी को नकारते आए हैं और हमेशा अपनी आयोजित मीटिंग में गुटबाजी पर नाराजगी जताते आए हैं।भाजपा में फैली गुटबाजी को लेकर आम कार्यकर्ता परेशान हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे पार्टी लगातार कमजोर हो रही है।पिछले तीन वर्षों से प्रदेश में भाजपा की राजनीति में गुटबाजी चरम पर है। यहां पार्टी के कई ग्रुप बन गए हैं। पार्टी में इस धड़ेबाजी को लेकर आम कार्यकर्ता परेशान है। कार्यकर्ताओं पर ग्रुपों का संचालन करने वाले नेताओं का ठप्पा लगाया जा रहा है। बड़े नेताओं द्वारा की जा रही गुटबाजी व हठधर्मिता के कारण जहां पार्टी ने  2018 के विधान सभा चुनाव में सत्ता गवाई थी।हालांकि भाजपा के सीर्ष नेता हमेशा से पार्टी के अंदर व्याप्त गुटबाजी को नकारते आए हैं और हमेशा अपनी आयोजित मीटिंग में गुटबाजी पर नाराजगी जताते आए हैं

दोहरे चरित्र से शशंकित है कार्यकर्ता

भाजपा के हर मापदंड पर बिन्द्रानवागढ़ के कार्यकर्ता खरे उतरते है।पिछली बार आई कांग्रेस के लहर में भी भाजपा का फूल बिन्द्रानवागढ़ में खिला रहा।यंहा के कार्यकर्ताओं की निष्ठा कि चर्चा दिल्ली तक होती है।पर कुछ मौका परस्त लोग जो निष्ठा का मूखोटा लगाए बैठे हैं उनके वजह से यंहा गुटबाजी को बढ़ावा मिल रहा है।ये लोग साधन संपन्न होने के साथ ही निष्ठा का व्यापार नफा नुकसान के आधार पर करते हैं, जनाधार भले न हो पर पैसो से परिणाम बदलने की क्षमता होती है।पोस्टर लगाकार गुटबाजी को हवा देने वाले ऐसे नेताओ के कारण ही कार्येकरता भी दिग्भर्मित है।एक परिवार में अगर कई सदस्य सन्गठन में सक्रिय है,तो हर सदस्य हर धड़ का हिस्सा होता है।गुटों में सन्गठन बंटा रहे पर इनके काम नही रुकते।जनता भी इन्हें भली भांति जानती है,पर इनके झांसे में बड़े नेताओं के चलते इनका कद बढ़ा होता है,यही वजह है कि कार्यकर्ता भी इन्हें मजबूरी में दुआ सलाम कर जाते है।

गुटबाजी से बेहाल भाजपा?

विधानसभा चुनाव 2018 के तीन साल से अधिक बीत जाने के बाद भी भाजपा ने अभी तक छत्तीसगढ़ में पुनरुद्धार के संकेत नहीं दिखाए हैं। 2018 में कांग्रेस के सत्ता में आने से पहले 15 साल तक राज्य पर शासन करने के बावजूद,भाजपा मशीनरी छत्तीसगढ़ में बेहोशी की हालत में नजर आ रही हैं?सत्ता की चाशनी के बिना छत्तीसगढ़ में भाजपा के नेता अलग-अलग राह पर चल पड़े हैं और एक-दूसरे के लिए गड्‍ढा खोदते दिख रहे हैं। राज्य में पार्टी के भीतर अभी डॉ. रमन सिंह और उनका विरोधी खेमा साफ तौर पर आमने-सामने दिखाई दे रहा है। रमन सिंह अपनी पसंद के किसी नेता को नया प्रदेश अध्यक्ष बनवाना चाहते थे तो विरोधी खेमा इसके उलट चाहत रखता था। मुख्यमंत्री रहने के कारण डेढ़ दशक तक संगठन का मुखिया रमन सिंह की पसंद से ही बनता रहा है। रमन सिंह अभी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के साथ राज्य के कद्दावर नेता हैं, जिनके चेहरे पर भाजपा ने लगातार  तीन चुनाव जीते थे लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में बुरी हार का दाग भी उन्हीं पर लगा हैं।लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते 11 में से 9 सीटें जीतने वाली भाजपा इसके बाद न तो उपचुनाव जीत सकी और न ही नगरीय निकाय और पंचायतों में कांग्रेस को मात दे सकी। दस निगमों में कांग्रेस के महापौर बन गए। 27 में से सात जिला पंचायत अध्यक्ष ही भाजपा के खाते में आए हैं।भाजपा हाइकमान ने 2019 के लोकसभा चुनाव में दस मौजूदा सांसदों का टिकट काटकर नए लोगों को उतारा था।जिनमें से नौ सांसद बन गए। लेकिन संगठन में पुराने नेताओं को नजरअंदाज करना हाइकमान के लिए आसान नहीं होगा। छत्तीसगढ़ भाजपा अध्यक्ष के लिए रामविचार नेताम, विष्णुदेव साय, संतोष पांडेय और विजय बघेल के नाम चल रहे थे। कहा जा रहा था कि रमन सिंह का खेमा किसी अनुभवी और पुराने नेता को संगठन की कमान देने के पक्ष में था।वहीं, रमन विरोधी माने जाने वाले नेता बृजमोहन अग्रवाल, प्रेमप्रकाश पांडेय और दूसरे लोग नए और आक्रामक नेता को अध्यक्ष के रूप में चाहते थे। संतोष पांडेय और विजय बघेल लोकसभा के मौजूदा सांसद हैं, जबकि रामविचार नेताम राज्यसभा सदस्य हैं। विष्णुदेव साय को पिछली बार चुनाव नहीं लड़ाया गया था। वे 2006 और 2014 में दो बार अध्यक्ष रह चुके हैं। विजय बघेल मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रिश्तेदार हैं। उनके खिलाफ चुनाव लड़ने के साथ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी है। रमन विरोधी विजय के पक्ष में लाबिंग कर रहे थे, संतोष पांडेय संघ के पुराने कार्यकर्ता और रमन सिंह के गृह जिले से हैं। हाइकमान ने रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह का टिकट काटकर संतोष पांडेय को लोकसभा लड़ाया था।रामविचार नेताम अभी पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उन्होंने जिला पंचायत चुनाव में अपने बूते पर बलरामपुर जिले में बहुमत दिलाकर बेटी निशा नेताम को अध्यक्ष बनवा दिया। ओबीसी वर्ग से धरमलाल कौशिक नेता  पूर्व प्रतिपक्ष थे और वे प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। कौशिक को रमन सिंह की पसंद से भाजपा विधायक दल का नेता बनाया गया था। लेकिन इसको लेकर पार्टी में मतभेद चलता रहा। बड़ी उलझन यह थी कि किसी आदिवासी नेता को संगठन की कमान सौंपा जाए या ओबीसी अथवा सामान्य वर्ग के नेता को चुना जाए।कहते हैं, इतिहास खुद को दोहराता है। ऐसा ही कुछ छत्तीसगढ़ भाजपा में हो रहा था। 2002 में भाजपा के एक दर्जन विधायक कांग्रेस में गए थे। भाजपा ने तब राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशी खड़ाकर कांग्रेस को वाकओवर दे दिया था। अबकी बार बिलासपुर में पार्टी ने महापौर के लिए प्रत्याशी ही नहीं उतारा। कोरबा निगम में बहुमत होते हुए भी भाजपा का महापौर नहीं बन सका। कुछ जगहों पर भाजपा के पार्षदों ने क्रॉस वोटिंग की। एक बात तो साफ है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सत्ता गंवाने के बाद बुरे दौर से गुजर रही है।अब सारा दारोमदार नए प्रदेश अध्यक्ष अरूण साव पर रहेगा।वे गुटबाजी खत्म कर पाते हैं या नही।

संगठन सुस्त और गुटबाजी चरम पर, इसलिए छत्तीसगढ़ में अब रमन सिंह पर नहीं है भाजपा हाईकमान को भरोसा?

छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी नए चेहरे के साथ चुनाव लड़े या फिर चुनाव जीत के बाद नया चेहरा देखने को मिले। 2023 के विधानसभा चुनाव में इस बार मुख्यमंत्री का चेहरा पहले से तय नहीं होगा।जैसा कि सभी को ज्ञात है कि छत्तीसगढ़ में डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव होना है। भाजपा ने तैयारियां शुरू कर दी हैं,लेकिन सीएम फेस के तौर पर रमन सिंह का चेहरा इस बार नजर नहीं आने वाला है। बताया जा रहा है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में इस बार यहां पीएम नरेंद्र मोदी ही सबसे बड़ा चेहरा होंगे। असल में खैरागढ़ उपचुनाव में कांग्रेस से मिली हार के बाद भाजपा को अंदरखाने डर सताने लगा है। इसलिए हाईकमान ने विधानसभा चुनाव के पहले पार्टी की दशा और दिशा सुधारने का टास्क प्रदेश के नेताओं को दिया है। इसके तहत संभावना है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा नए चेहरे के साथ चुनाव लड़े। इस बात की भी संभावना है कि यहां पर सीएम का चेहरा चुनाव के बाद ही घोषित हो।दरअसल, भाजपा हाईकमान ने 2023 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह, नेता पूर्व प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय और महामंत्री (संगठन) पवन साय को दिल्ली बुलाया था। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मिशन-2023 में जीत पर मंत्रणा की। साथ ही संगठनात्मक, सरकार पर आक्रामक (आंदोलनात्मक) और भाजपा के पक्ष में माहौल का निर्माण कैसे हो इस पर फोकस किया था नेताओं के दिल्ली जाने के बाद प्रदेश का सियासी पारा भी चढ़ा हुआ था कि बड़ा परिवर्तन होगा। छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन में विरोध के सुर जो भी हो, लेकिन यह तय है कि केंद्रीय नेतृत्व को अब भी भरोसा इन्हीं नेताओं पर है। यह अलग बात है कि पार्टी की लगातार हार ने विरोधियों को बोलने और एकजुट करने का मौका जरूर दे दिया हैं।सूत्र बताते हैं कि भाजपा की प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी लगातार छत्तीसगढ़ का दौरा कर गई हैं। उन्होंने रायपुर से लेकर बस्तर तक की रिपोर्ट संगठन को सौंपी है, जिसमें संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत पर बल दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक, बस्तर, सरगुजा व दुर्ग संभाग के दौरे के बाद यह पाया गया कि ज्यादातर जिलों में कामकाज संतोषजनक नहीं है। संगठन की गतिविधियां ठप पड़ी हुई हैं। इस पर राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने चिंता जताई थी। इन सबके चलते पार्टी हाईकमान बैठक बुलाने को मजबूर हो गया था। चुनाव पहले संगठन में भी परिवर्तन होने की उम्मीद थी और हुआ भी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्नु देव साय की जगह सब छत्तीसगढ़ भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव हैं तो नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की जगह श्री चंदेल हैं। सूत्र बताते हैं कि गुटबाजी की वजह से संगठन में एकता नहीं थी। कई गुटों में नेता बंटे हुए हैं। कोई भी बडे़ आयोजनों में नेताओं का नहीं आना भी सुर्खियों में रहता है। पिछले चुनाव में आदिवासी सीएम की मांग उठी थी। आदिवासी नेताओं ने इसके लिए आवाज भी उठाई थी। रायपुर व दुर्ग संभाग में भाजपा के दिग्गज नेताओं का गुट भी सक्रिय है। राजधानी रायपुर से लेकर दुर्ग, बस्तर, बिलासपुर व सरगुजा तक कई गुटों में भाजपा नेता बंटे हुए हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी व सीएम भूपेश बघेल भी समय-समय पर इस पर तंज कसते रहे हैं। सीएम भूपेश बघेल तो कई बार यहां तक कह चुके हैं कि भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को प्रदेश संगठन पर भरोसा नहीं है। राष्ट्रीय नेतृत्व यहां के भाजपा नेताओं से किनारा करने लगे हैं। प्रदेश प्रभारी भी स्थानीय नेताओं को तवज्जों नहीं देती।

भाजपा की गुटबाजी पहुंची थी प्रधानमंत्री दफ्तर,छत्तीसगढ़ के पूर्व गृहमंत्री कंवर और विधायक आए थे आमने-सामने

छत्तीसगढ़ में भाजपा के दो विधायकों के बीच की कलह प्रधानमंत्री कार्यालय तक जा पहुंची थी ज्ञात हो कि अकलतरा विधायक सौरभ सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कोरबा जिले में डीएमएफ फंड के पैसों के गलत इस्तेमाल होने की शिकायत की थी,तो वहीं रामपुर विधायक और पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर सौरभ सिंह के आरोपों को झूठा करार दिया था।दोनो ही भाजपा के विधायकों का पीएमओ से किया गया पत्राचार सोशल मीडिया में जमकर वायरल भी हुआ  इस वजह से कांग्रेस को भी भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी पर चुटकी लेने का अवसर मिल गया था।अकलतरा विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक सौरभ सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी से जिला खनिज न्यास यानि डीएमएफ फंड में भ्रष्टाचार होने के मामले की शिकायत करते हुए लिखा था कि कोरबा जिले में डीएमएफ फंड के उपयोग में धांधली हुई है।बीजेपी एमएलए सौरभ ने पीएम को भेजे पत्र में लिखा था कि कोरबा जिले को डीएमएफ मद में मिलने वाली 600 करोड़ रुपये की राशि में घालमेल किया गया है। डीएमएफ की शासी परिषद की मीटिंग भी जिले में नियमित तौर पर नहीं हो रही है।इधर इस मामले में रमन कार्यकाल में गृहमंत्री रहे भाजपा के वरिष्ठ विधायक ननकीराम कंवर ने भी पत्र के काउंटर में पत्र लिखकर पीएम को बताया था कि सौरभ सिंह के आरोपों में जरा भी दम नही है। कंवर ने सौरभ सिंह के पत्र में लगाये गए आरोपों को व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए दुर्भावना से प्रेरित बताया था। ननकीराम कंवर ने अपने पत्र में लिखा था कि छत्तीसगढ़ का कोरबा खनिज संसाधनों से भरपूर है। केंद्र सरकार के निर्णय के बाद मिलने वाली राशि से आदिवासी बाहुल्य कोरबा समेत पड़ोस के इलाकों में विकास का कार्य किया जा रहा है। कंवर ने लिखा था कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में लगातार विकास के कार्य हुए हैं,क्योंकि सौरभ सिंह जांजगीर जिले के है ,इसलिए उन्हें सही जानकारी नहीं है।सौरभ सिंह ने  26 फरवरी 2022 को पीएमओ के साथ पत्राचार किया था, जवाब में पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने 27 फरवरी 2022को पीएम को पत्र भेज कर साथी विधायक शिकायत का खंडन किया था।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने इंटरव्यू में अरुण साव बोले- भाजपा में गुटबाजी की बातें कांग्रेस द्वारा फैलाई हुई इसलिए यह हमारी पार्टी के लिए चुनौती नहीं

भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव के भास्कर के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार इसलिए नहीं बनी कि पूर्ववर्ती रमन सरकार से लोगों में नाराजगी थी बल्कि कांग्रेस के झूठे और लुभावने वादों से जनता आकर्षित हो गई थी।साव ने भास्कर से बातचीत में कहा था कि भूपेश सरकार ने हर वर्ग को ठगा है,इसलिए 2023 के चुनाव में जनता उन्हें सत्ता से उतार देगी। उन्होंने कहा कि भाजपा में गुटबाजी नहीं है। यह कांग्रेस द्वारा फैलाई हुई बातें हैं।

सवाल:अध्यक्ष बनने के साथ आपने भाजपा के लिए क्या लक्ष्य तय किया है?

जबाब:हमारा एक लक्ष्य ही है- 2023 में भाजपा की सरकार बनाना। इसी को फाेकस में रखकर कम काम करेंगे।

सवाल:इसके लिए क्या रोड मैप बनाया है ?

जबाब:कांग्रेस सरकार द्वारा लोगों से किया गया धोखा,घोषणा पत्र के अधूरे वादों तथा केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं को लेकर जनता के बीच जाएंगे।

सवाल:क्या चुनाव जीतने यह पर्याप्त होगा?

जबाब:हम लोगों को उनका हक दिलाने सदन से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ेंगे।

सवाल:भाजपा के लिए क्या चुनौतियां हैं?

जबाब:भाजपा ने चुनौतियों का ही सामना करके ही यहां तक मंजिल तय की है।

सवाल:छत्तीसगढ़ भाजपा गुटों में बंटी हुई है, यह क्या बड़ी चुनौती नहीं है?

जबाब:गुटबाजी जैसी कोई बात नहीं है। यह कांग्रेस द्वारा फैलाई हुई कोरी बातें हैं।

सवाल:बड़े नेताओं के बीच कलह काफी ज्यादा है। इस खाई को कैसे पाटेंगे?

जबाब:भाजपा मैदान में काम करने वाली पार्टी है। जो जिम्मेदारी मिलेगी,वह निभाएंगे। पार्टी की यही ताकत है।

सवाल:सरकार से नाराजगी का असर यह था कि भाजपा 14 सीट पर सिमट गई?

जबाब:छत्तीसगढ़ में भाजपा का मजबूत जनाधार है। विधानसभा के बाद लोकसभा चुनाव में भाजपा 11 में से 9 सीटें जीती। विस में कांग्रेस के झूठे और लुभावने घोषणा पत्र की वजह से भाजपा को हार मिली।

सवाल:राज्य में कोई चेहरा सामने नहीं कर पा रही है? क्या यह भाजपा की कमजोरी नहीं है?

जबाब:हर बार चुनाव लड़ने के लिए अलग रणनीति बनती है। इस बार भाजपा ने तय किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा जाएगा।

सवाल:आप पुराने चेहरों में निष्क्रिय लोगों को अपनी टीम से बाहर करेंगे?

जबाब:इसके लिए विचार विमर्श कर नाम तय करेंंगे। इस पर कोई बात नहीं हुई है।

सवाल:सीएम भूपेश की स्थानीयवाद की राजनीति का मुकाबला भाजपा कैसे करेगी?

जबाब:जनता भूपेश सरकार से मुक्ति चाहती है, क्योंकि उन्होंने सभी को ठगा है। भाजपा मोदी सरकार की नीतियों के साथ चुनाव लड़ेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में विश्वास जीता है।


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