बड़ा सवाल पर्दे के पीछे किसके संरक्षण में चल रहा हैं नशा का कारोबार?


गरियाबंद(गंगा प्रकाश)। देश भर में नशे के शिकंजे में आने वाले युवाओं की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जो एक बड़ी चिंता का विषय है। इसको कहीं न कहीं राजनीति का भी साथ मिल रहा है। युवा तेजी से इससे घिरते जा रहे हें।युवाओं में नशे का चलन तेजी से बढ़ रहा है।
युवाओं द्वारा किया जा रहा नशीले पदार्थों का सेवन देश की बड़ी समस्‍या बनता जा रहा है।
विज्ञान की नजर से देखें तो नशे की लत एक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति का स्वयं पर नियंत्रण नहीं रहता। इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि ऐसे हालात में वह क्या कर गुजरे। फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत के बाद महीनों में हुई जांच-पड़ताल और कहीं भले नहीं पहुंची हो, लेकिन जिस एक निष्कर्ष की तरफ वह तेजी से झुकी है, वह बॉलीवुड में नशे के बढ़ते साम्राज्य का साफ संकेत देती है। हालांकि इसका एक विरोधाभास यह है कि जब फिल्मों की विषय-वस्तु के बारे में हम यह दावा करते हैं कि वह असल में समाज से प्रेरित होती है और सामाजिक वास्तविकताओं को ही दर्शाती है। ऐसे में, जबकि आज पूरी फिल्म इंडस्ट्री को नशे में लिप्त बताया जा रहा है, तब कोई उस समाज की ओर क्यों नहीं झांक रहा, जहां नशे की समस्या शायद सबसे गंभीर दौर में है।जहां तक आम समाज में युवाओं के नशे की गिरफ्त में आने का सवाल है, तो आम तौर पर इसके लिए देश के एक समृद्ध राज्य पंजाब को कठघरे में खड़ा किया जाता है। संभव है कि इसके पीछे वहां पिछले दशकों में नशे के कारोबारियों को चोरी-छिपे मिले राजनीतिक संरक्षण और उड़ता पंजाब जैसे फिल्मी कनेक्शन की भी एक बड़ी भूमिका हो। लेकिन पंजाब से बाहर निकलकर देखें तो पता चलता है कि देश के कुछ दूसरे राज्य भी नशे की भयानक चपेट में हैं। इस नशे का संदर्भ शराब आदि प्रचलित साजोसामान से नहीं, बल्कि गांजा, हेरोइन, अफीम, चरस और रसायनों की जटिल प्रक्रियाओं से बने कई तीखे मिश्रणों से है, जिनका प्रचलन युवाओं में तेजी से बढ़ा है। खास तौर से शहरी-महानगरीय संस्कृति के विस्तार के साथ नशे के सेवन ने युवाओं में जो एक सामाजिक स्वीकृति हासिल की है, वह अमीरों से लेकर मध्यवर्गीय और गरीब तबकों में भी जोर पकड़ चुकी है।ऐसा ही मामला छत्तीसगढ़ राज्य अंतर्गत गरियाबंद जिला मुख्यालय से सामने आया है जहां गरियाबंद जिले की कर्तव्य निष्ठ पुलिस निरंतर अपराध और नशा के कारोबारियों पर अंकुश लगाने कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही हैं।जहां अपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोगो को समय समय जेल की सलाखों के पीछे धकेल रही हैं।बताना लाजमी होगा कि
गरियाबंद कोतवाली पुलिस ने पहली बार नशे की टेबलेट बेचते एक आरोपी को पकड़ने में सफलता मिली है।पुलिस ने शनिवार को पारागाव रोड में टेबलेट के लिए ग्राहक देख रहे आरोपी सद्दाम खान उम्र 35 साल को 300 नग एनाजोलम व एप्राजोलम नामक टेबलेट के साथ गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।थाना प्रभारी कृष्णा जांगड़े ने कार्यवाही की पुष्टि करते हुए बताया की डाक बंगला पारा निवासी आरोपी आदतन बदमाश है,मुखबिर की सूचना मिलते ही उच्च अधिकारियों के निर्देश में स्पेशल टीम व आबकारी विभाग के साथ मिलकर कार्यवाही की गई है।आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस की धारा 22(ख) के तहत कार्यवाही की गई है।किंतु बड़ा सवाल ऐ हैं कि आखिर इतनी मात्रा में सद्दाम खान को किस मेडिकल स्टोर से प्राप्त हुई हैं और नशा का कारोबार में सद्दाम के पीछे किन लोगों का हाथ हैं?

बगैर बदबू के चढ़ता है नशा इसलिए छात्र करते हैं उपयोग

नशीली दवाओं का कारोबार पहले राजिम तक सिमीत था,अब जिला मूख्यालय के अलावा छुरा और मैनपुर में भी पांव पसार गया है।नशीली दवा की एक टेबलेट 20 से 24 घंटे तक अपना असर दिखता है।इसकी एक पत्ते की एमआरपी 34 से 40 रूपए तक है,जिसे ब्लैक में 100 रुपए में खरीदी कर अधिकतम 300 रुपए प्रति पत्ते तक आसानी से बेचा जा सकता है । नशे के अन्य समाग्री से इसकी कीमत काफी सस्ता है, साथ ही यह बदबू नही देता, ऐसे में इसे समान्य नशेड़ी के अलावा स्कूली कॉलेज छात्र भी करना शुरू कर दिए हैं।सूत्र बताते हैं जिले में रोजाना 100 से भी ज्यादा पत्ते की खपत है।

मेडिकल लाइसेंस के बिना थोक में नही होता उपलब्ध

नियम के मुताबिक इस दवा का सेवन डॉक्टर के पर्ची के बगैर नही बेचना है, पर्ची संलग्न कर बिल के साथ ही दवा विक्रय का प्रावधान है।राजधानी में मौजूद होल सेल कारोबारियों से लाने के लिए मेडिकल लाइसेंस नंबर दर्ज कराना होता है।विक्रय के कड़े नियम के बावजूद प्रतिबंधित सशर्त बेची जाने वाली दवा खुलेआम आपराधिक किस्म के लोगो के द्वारा बेचा जाना कही न कही ड्रग डिपार्ट के कार्य शैली पर भी सवाल उठाता है। मेडीकल स्टोर की नियमित परीक्षण,स्टॉक वेरिफिकेशन जैसे नियमो का कितना पालन हो रहा है.?आसानी से भारी मात्रा में यह दवा अपराधिक तत्वों के पास कैसे उपलब्ध हो रहा है यह भी जांच का विषय है।

सालों से नहीं हुई कार्रवाई

इन दवाइयों के दुरूपयोग की जानकारी ड्रग विभाग सहित डाक्टरों को भी है, लेकिन र्मेडिकल स्टोर्स में बिना पर्ची की दी जा रही इन दवाइयों पर ड्रग विभाग ने सालों से कार्रवाई तो रूटिंन चेकिंग भी नहीं की है। जिसके चलते मुनाफे की लालच में दवा दुकान संचालक बडे पैमाने पर स्टॉक कर इन दवाइयों को असुरक्षित ढंग से बेच रहे हैं। विभाग के सुस्त रवैये के चलते इन मेडिकल स्टोर्स पर सालों से कोई कार्रवाई सामने नहीं आयी है।

इन दवाइयों पर है प्रतिबंध

छग शासन ने नशीली दवाईयों की हो रहे दुरूपयोग के चलते पेंटिडीन, नाइट्रोवेट, पैनार्गन, कोडिंग फास्फेट, तार्जएक्टिव जैसी दवाईयों पर बैन लगा दिया है। इनका उपयोग केवल अस्पतालों में या डाक्टरों के सुझाव पर द्वारा किया जा रहा है।

कार्यक्रम कराकर औपचारिकता

हर साल नशा निवारण दिवस के अवसर पर जिला सहित ब्लाक स्तर पर जनजागरूकता को लेकर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित की जाती है। जिसके बाद इन पर साल भर ध्यान नहीं दिया जाता। कार्यक्रम के माध्यम से संबंधित विभागों द्वारा नशा निवारण के लिए केवल औपचारिताएं ही पूरी की जाती है।

खतरनाक साबित हो सकता हैं नशे के लिए दवा का उपयोग

दवाइयों का उपयोग नशे के रूप में बहुत ही खतरनाक है। कुछ दवाइयों में एल्कोहल होता है, जिसके उपयोग से नशे की लत बढ जाती है। ऐसे लोगों में कार्यक्षमता, कार्यशैली व मानसिक रूप से विकृति आने लगती है। ड्रग विभाग को चाहिए कि इन दवाइयों की बिक्री का हिसाब रखा जाए। वहीं बिना डाक्टर के पर्ची की इन दवाइयों का बिक्री न की जाए।

भारत में कितनी गंभीर हैं नशा की समस्या?

आप अक्सर ही ऐसी कहानियाँ सुनते होंगे कि फला आदमी के नशे की लत ने उसके पूरे परिवार को तहस-नहस कर दिया। आपने मुकेश हराने का वो विज्ञापन भी जरूर देखा होगा जिसमें वो तंबाकू सेवन के खतरनाक परिणामों के बारे में चर्चा करते हैं। इसके साथ ही आप अक्सर ऐसी खबरें पढ़ते होंगे जिसका मजमून ये रहता है कि कच्ची शराब ने ली लोगों की जान?नशे की ये लत कितनी खतरनाक है, इसका अंदाजा आप संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (यूएनओडीसी) की विश्व औषधि रिपोर्ट 2022 से लगा सकते हैं। इसके अनुसार दुनिया भर में लगभग 284 मिलियन लोग नशीली दवाओं का उपयोग करते हैं। इसके अनुसार, भारत ने 2019 में विश्व भर में 7% अफीम तथा 2% हेरोइन को ज़ब्त किया है।भारत दो प्रमुख ड्रग उत्पादक क्षेत्रों- गोल्डन क्रिसेंट (ईरान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान) और गोल्डन ट्रायंगल (थाईलैंड-लाओस-म्याँमार) के बीच स्थित है, जो इसे अवैध मादक पदार्थों की तस्करी के लिये संवेदनशील बनाता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े अफ़ीम बाज़ारों में से एक है। हमारे यहाँ शराब, देशी शराब, अफ़ीम, हशीश और मारिजुआना स्वतंत्र रूप से उपलब्ध और उपयोग किए जाते थे। हमारे राजा और उनके दरबारी वरिष्ठ जन नशा करने के लिए इन पदार्थों का उपयोग हुक्के में करते थे। लेकिन उन दिनों लोग इनका प्रयोग कम मात्रा में करते थे और नशीली दवाओं का प्रयोग कोई गंभीर समस्या नहीं थी।
किंतु आज भारत बुरी तरह से नशे की समस्या से जूझ रहा है। यह बेहद जटिल और बहुआयामी मुद्दा है जो देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक ताने बाने को क्षति पहुँचा रहा है। नशीली दवाओं की लत लगातार बढ़ने से निजी जीवन में अवसाद, पारिवारिक कलह, पेशेवर अकुशलता और सामाजिक सह-अस्तित्व की आपसी समझ मे समस्याएं सामने आ रही हैं। हमारे युवा नशे की लत के ज्यादा शिकार हैं। चूँकि युवावस्था में कैरियर को लेकर एक किस्म का दबाव और तनाव रहता है। ऐसे में युवा इन समस्याओं से निपटने के लिए नशीली दवाओं का सहारा लेता है और अंततः समस्याओं के कुचक्र में फंस जाता है। इसके साथ ही युवा एक गलत पूर्वधारणा का भी शिकार होते हैं। उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर धुएँ के छल्ले उड़ाना और महँगी पार्टीज में शराब के सेवन करना उच्च सामाजिक स्थिति का प्रतीक भी जान पड़ता है। विद्यार्थियों के रहने की जगहों के आसपास आप अक्सर नशे के व्यापार को देखते-सुनते भी होंगे।
यदि भारत सरकार के नशे की स्थिति पर हालिया आंकड़ो को देखें तो ये बेहद चौंकाने वाले है। यहाँ की 10 फीसदी से अधिक आबादी अवसाद, न्यूरोसिस और मनोविकृति सहित मानसिक विकारों से पीड़ित है। इसके साथ ही प्रत्येक 1000 में से 15 व्यक्ति नशीली दवाओं का सेवन करते हैं और प्रत्येक 1000 में से 25 लोग क्रोनिक अर्थात स्थायी शराब सेवन के शिकार हैं। भारत में मनोरोग और नशा मुक्ति बिस्तर की उपलब्धता आवश्यक संख्या का केवल 20% है। इस प्रकार, देश भर में 80% मनोरोगी और नशा की समस्या से पीड़ित रोगियों को अस्पताल की सुविधा भी मयस्सर नहीं होती।आपने अक्सर एक शब्द सुना होगा कि फलां इंसान नशे का लती है?

तो आखिर नशे की लत क्या है?

इसका सीधा सा मतलब यह है कि जब नशीली दवाओं का दुरूपयोग किसी व्यक्ति के सामान्य और पेशेवर जीवन को बुरी तरह से प्रभावित करता है तो उसे नशे का लती कहा जाता है। यह न सिर्फ नशेड़ी व्यक्ति के व्यक्तित्व में परिवर्तन लाता है बल्कि उसके आसपास रहने वाले व्यक्तियों के व्यवहार में भी चिड़चिड़ापन ला देता है। सामान्य शब्दों में कहे तो एक नशेड़ी व्यक्ति अपने आसपास के समाज पर एक ‘लहर प्रभाव’ उत्पन्न करता है जिसके कारण शनै:-शनै: सामाजिक ताना बाना बिगड़ता जाता है।

नशे की लत इतनी ज्यादा खतरनाक है कि कई बार लोग इसके अति सेवन से और न मिलने पर आत्महत्या तक कर डालते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार नशे की लत के कारण वर्ष 2021 में 10 हजार से अधिक लोगों ने अपने जीवन की लीला को समाप्त कर लिया। एनसीआरबी की रिपोर्ट में महाराष्ट्र पिछले कुछ सालों में लगातार इस मामले में सबसे ऊपर रहा है। इस राज्य में साल 2021 में 2,818 मामले दर्ज किए गए हैं। वहीं मध्य प्रदेश इस मामले में दूसरे स्थान पर है, जहां कुल 1,634 लोगों की मौत इस कारण हुई। कर्नाटक में जहां 2015 में 100 से कम मामले थे, वहां अधिक वृद्धि देखी गई है। अन्य तीन राज्यों में भी लगातार वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नशा “अंतिम कारण” के रूप में काम कर सकता है, जबकि मानसिक स्थितियों, पारिवारिक समस्याओं और आर्थिक परेशानियों जैसे मुद्दे पीड़ितों को यह कदम उठाने की ओर धकेल सकते हैं।

नशे के कारण होने वाली मौतों की गंभीरता को समझते हुए केंद्र सरकार ने 1995 में ऐसी मौतों के आंकड़े को अलग करना शुरू किया था, जब नशे के कारण 745 आत्महत्याएं हुई थी। 2016 के बाद से नशे से प्रेरित आत्महत्याओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्रत्येक वर्ष कम से कम 1,000 और मामले जुड़ते जा रहे हैं।

यदि नशे की समस्या से निपटने के लिए किये जाने वाले सरकारी प्रयासों की बात की जाए तो सरकार इस दिशा में काफी कुछ कर रही है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग नशीली दवाओं की मांग में कमी को सुनिश्चित करने हेतु नोडल विभाग है। अगस्त 2020 में नशे की समस्या से निपटने हेतु इसी मंत्रालय के द्वारा भारत के सबसे संवेदनशील 272 जिलों में नशा मुक्त भारत अभियान की शुरूआत भी की गई। इसके साथ ही भारत सरकार नशे के आदी लोगों के लिए नशा मुक्ति केंद्र और पुनर्वास सुविधाएं भी मुहैया करा रही है। इसके साथ ही गृह मंत्रालय देश में मादक पदार्थों के उन्मूलन हेतु एक रणनीतिक प्रयास कर रहा है। विगत तीन वर्षों में सरकार ने देश के कई राज्यों में 89000 फुटबॉल मैदान के आकार के भाँग और अफीम उत्पादक क्षेत्रों को नष्ट कर दिया है। सरकार का लक्ष्य 2047 तक भारत को “मादक पदार्थ मुक्त” बनाना है।

इसके साथ ही सरकार ने कुछ विधायी उपाय भी किये है। सरकार ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 जैसे विभिन्न कानून बनाए हैं। अन्य कानून नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस एक्ट, 1985 और अवैध व्यापार की रोकथाम में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस एक्ट, 1988 आदि हैं। यह कानून दवाओं के निर्माण, वितरण, कब्ज़े और खपत को विनियमित और प्रतिबंधित करते हैं। नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंस एक्ट, 1985 अधिनियम में नशीली दवाओं के अपराधों के लिये कड़े दंड का प्रावधान है। संस्थागत उपायों के अंतर्गत सरकार ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI), सीमा शुल्क विभाग आदि जैसे संस्थान बनाए हैं। ये संस्थान ड्रग कानूनों को लागू करते हैं तथा राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय करते हैं।

यदि निवारक उपायों की बात की जाए तो सरकार ने नशीली दवाओं की मांग में कमी लाने हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना, नशा मुक्त भारत अभियान आदि जैसी विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों की शुरुआत की है। नशीली दवाओं की मांग में कमी लाने हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना का उद्देश्य जागरूकता सृजन, क्षमता निर्माण, नशा मुक्ति और पुनर्वास के माध्यम से नशीली दवाओं की मांग को कम करना है। नशा मुक्त भारत अभियान का उद्देश्य स्कूली बच्चों में नशीली दवाओं के हानिकारक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। इसके साथ ही सरकार ने निदान और एनसीओआरडी (NCORD) नामक पोर्टल की शुरूआत की है। यह एक डेटाबेस है जिसमें NDPS अधिनियम के तहत गिरफ्तार किये गए सभी संदिग्धों और दोषियों की तस्वीरें, उंगलियों के निशान, अदालती आदेश, जानकारी एवं विवरण शामिल हैं, जिसे राज्य तथा केंद्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा एक्सेस किया जा सकता है।

हालांकि नशे की समस्या से निपटने हुए भारत के समक्ष पर्याप्त चुनौतियाँ भी हैं। सबसे पहले तो इस दिशा में पर्याप्त बुनियादी ढाँचे का अभाव है। नशीले पदार्थों की तस्करी और दुरुपयोग से प्रभावी ढंग से निपटने के लिये प्रशिक्षित कर्मियों, विशेष उपकरणों और उचित बुनियादी ढाँचे की कमी है।इसके अलावा भारत में नए साइकोएक्टिव पदार्थों का उपयोग बढ़ रहा है और ये दवाएँ अकसर मौजूदा ड्रग नियंत्रण कानूनों के अंतर्गत नहीं आती हैं। इस कारण से कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिये उन्हें प्रभावी ढंग से विनियमित करना जटिल हो जाता है। इसके अलावा डार्क नेट इजिंग ड्रग ट्रैफिकिंग की भी समस्या सामने आ रही है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के मुताबिक, अवैध ड्रग्स में ‘डार्क नेट’ और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल बढ़ रहा है तथा वर्ष 2020, 2021 और 2022 में एजेंसी ने ऐसे 59 मामलों की जाँच की है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में नशीली दवाओं के दुरुपयोग एवं लत से खतरों के बारे में जागरूकता और शिक्षा की कमी भी देखी जाती है।

नशीली दवाओं की समस्याओं से निपटने हेतु सरकार को मौजूदा कानूनों के प्रवर्तन को सख्त बनाना होगा। इसके साथ ही निवारक उपायों के प्रभावी उपयोग को भी सुनिश्चित करना होगा। इसके साथ ही अफीम की खेती एम अवैध रूप से संलग्न किसानों के लिए वैकल्पिक फसल योजना की भी शुरूआत करनी होगी। इस संदर्भ में झारखंड राज्य द्वारा अवैध अफीम उत्पादकों हेतु शुरू की गई वैकल्पिक आजीविका योजना बेहद उल्लेखनीय है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समन्वय को भी मजबूत करने की दिशा के ठोस कदम उठाने होंगे। सूचना और सर्वोत्तम तरीकों के आदान-प्रदान हेतु संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय तथा इंटरपोल जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ साझेदारी को मज़बूत करना होगा। नवीन प्रौद्योगिकी जैसे बिग डेटा और एनालिटिक्स द्वारा ड्रग ट्रैफिकिंग नेटवर्क की पहचान तथा ट्रैक करने, ड्रग मूवमेंट की निगरानी करने तथा ड्रग के दुरुपयोग व तस्करी से संबंधित गतिविधियों की पहचान करने पर ज़ोर देना होगा। इसके साथ ही एक ऐसी ऑनलाइन रिपोर्टिंग प्रणाली विकसित करनी होगी जहाँ नागरिक नशीली दवाओं के दुरुपयोग तथा तस्करी की गतिविधियों की वास्तविक समय में रिपोर्ट कर सकें।

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