कैसे बचेंगे अंतरात्मा की अदालत से?

नई दिल्ली (गंगा प्रकाश):- पति, पत्नी और वो… इन दिनों भारत में दो ऐसे केस चर्चा में हैं जहां पत्नियों ने किसी और के लिए अपने पतियों को छोड़ दिया है. इनमें से एक है एसडीएम ज्योति मौर्य और आलोक कुमार केस. दूसरा है सीमा हैदर और सचिन केस. ज्योति और सीमा केस कहीं न कहीं एक दूसरे से मिलते जुलते हैं. क्योंकि दोनों ही केस में उन्होंने अपने पतियों को छोड़ किसी तीसरे से रिश्ता बनाया है।

जो हुक्म देता है वो इल्तिज़ा भी करता है,ये आसमान कहीं पर झुका भी करता है 

हसीन लोगों से मिलने में ऐतराज न कर ,ये जुर्म वो है जो शादीशुदा भी करता है…

मशहूर शायर मुनव्वर राना का ये शेर इन दिनों भारत और पाकिस्तान से जुड़ी दो कहानियों पर मौजूं है. भारत में एसडीएम ज्योति मौर्य और पाकिस्तान से आई सीमा हैदर की कहानी सुर्खियों में है. दोनों शादीशुदा हैं और दोनों ने अपने पतियों को छोड़ दिया है. इसकी वजह है पति-पत्नी के बीच तीसरे किरदार की एंट्री.

जहां ज्योति के पति आलोक का आरोप है कि उन्होंने उन्हें पढ़ाने लिखाने में मदद की. फिर जब ज्योति एसडीएम बन गईं तो उन्होंने आलोक को छोड़ दिया. फिर महोबा में तैनात होमगार्ड कमांडेंट मनीष दुबे के साथ रिलेशन में आ गईं।वहीं, दूसरे केस यानि पाकिस्तानी सीमा हैदर की अगर बात करें तो वह सरहद लांघकर अपने हिंदुस्तानी प्रेमी सचिन के पास भारत चली आईं. उनके पति गुलाम हैदर का आरोप है कि सीमा को बहला फुसला कर ले जाया गया है. हैदर ने कहा कि वो बीवी-बच्चों के लिए ही पैसा कमाने के लिए सऊदी अरब गया था. लेकिन उसकी पत्नी ने उसे धोखा दे दिया और सचिन के पास चली गई.अगर दोनों केस की बात करें तो ज्योति की दो बेटियां हैं. वहीं, सीमा के भी चार बच्चे हैं. आरोप है कि शादीशुदा होने के बावजूद दोनों ने एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखा. ज्योति ने तो मामले में कहा कि वो इसका जवाब सिर्फ कोर्ट में ही देंगी. तो वहीं, सीमा की अगर बात करें तो वो खुलकर कह रही हैं कि वो सचिन के साथ ही रहना चाहती हैं और पाकिस्तान वापस नहीं जाना चाहतीं.इन दोनों केस में एक और बात कॉमन है. दोनों ने ही अपने पतियों पर प्रताड़ना का आरोप भी लगाया है. जहां ज्योति का कहना है कि बेशक आलोक ने पढ़ाई में उनकी मदद की. लेकिन वो शादी झूठ बोलकर करवाई गई थी. यानि उन्होंने कहा कि उनसे आलोक के परिवार ने झूठ कहा था कि वो ग्राम पंचायत में अफसर है. वहीं, सीमा हैदर केस में सीमा का कहना है कि उसके घर वालों ने जबरदस्ती गुलाम हैदर से उनकी शादी करवाई.

ज्योति का कहना है कि आलोक और ससुराल वाले उन्हें दहेज के लिए प्रताड़ित करते थे. उधर सीमा का कहना है कि गुलाम उनके साथ मारपीट करता था. कायदे से देखा जाए तो दोनों ही महिलाओं का कहना है कि वे अपने पतियों के साथ खुश नहीं थीं.

पहले जानते हैं ज्योति मौर्य मामले में पति आलोक का क्या कहना है

आलोक मौर्य ने कहा कि पति-पत्नी के बीच में झगड़े होते हैं, लेकिन एक तीसरे शख्स के कारण मेरा परिवार टूट गया और आज सब खत्म हो गया. आलोक कहते हैं कि साल 2010 में हमारी शादी हुई थी. शादी से पहले ज्योति और मैं रिलेशन में थे. सब कुछ ठीक चल रहा था. हमारी शादी आपसी रजामंदी से परिवार के साथ हुई थी और शादी के बाद ज्योति पढ़ना चाहती थी. इसलिए मैंने मदद की. साल 2015 में एग्जाम पास करके वह अधिकारी बनी थी.हर तरीके से मैंने कम तनख्वाह होने के बावजूद भी ज्योति की पढ़ाई के लिए सहयोग किया. प्रयागराज में रहते हुए ज्योति को अधिकारी बनाने में मेरे परिवार ने मदद की, लेकिन बाद में ज्योति ने किसी का मान नहीं रखा.

साल 2020 में हुई मनीष दुबे की एंट्री

आलोक कहते हैं कि साल 2020 में मनीष दुबे की हमारी जिंदगी में एंट्री हुई. ज्योति और मनीष के बीच बातचीत होती रही. मैंने उसका विरोध किया, लेकिन ज्योति नहीं मानी. साल 2021 के बाद हालत और खराब हो गए.

आलोक का कहना है कि ज्योति के मोबाइल में दोनों (मनीष और ज्योति) की चेटिंग पढ़ी, जिसमें शादी करने की बात, एक-दूसरे को पसंद करना और कई निजी बातें थीं. ज्योति के मनीष के साथ अनैतिक संबंध हैं. मैंने इसके खिलाफ विभाग में शिकायत की और व्हाट्सएप चैट, ऑडियो, मुझे जेल भेजने की धमकी और दहेज उत्पीड़न का केस लगाने जैसी तमाम बातों के साथ सभी साक्ष्य अधिकारियों के सामने रखे.

बच्चों से मिलना चाहता हूं

आलोक का कहना है कि मेरा और ज्योति का रिश्ता टूट चुका है. दो महीने हो गए हैं मैं अपने बच्चों से नहीं मिला हूं, मैं उनसे मिलना चाहता हूं लेकिन ज्योति मुझे उनसे दूर कर रही है. मुझे न्यायालय पर भरोसा है और मुझे इंसाफ जरूर मिलेगा, जो भी जांच में फैसला होगा मुझे उस पर भरोसा है.

मैं ज्योति से समझौते के लिए तैयार

आलोक मौर्य का कहना है कि अगर किसी ने गलती की है तो उसको उसकी सजा मिले, लेकिन परिवार भी जुड़ जाएगा तो बच्चों की जिंदगी संवर जाएगी, बच्चों के लिए मैं समझौता करने को तैयार हूं बच्चों की आगे की जिंदगी खराब ना हो.तो ये था ज्योति मौर्य मामला. यह मामला कोर्ट तक जा पहुंचा है. अब इसमें क्या फैसला आता है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.

अब बात करते हैं सीमा हैदर मामले में पति गुलाम हैदर का क्या कहना है

गुलाम का कहना है कि वह अपनी बीवी और बच्चों को वापस पाना चाहता है. उन्होंने इसलिए वीडियो जारी कर पीएम नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई है कि उसकी पत्नी सीमा और बच्चों को वापस पाकिस्तान भेजा जाए. गुलाम बार-बार बस यही कह रहे हैं कि उनकी शादी एक लव मैरिज थी. कोई जोर जबरदस्ती से नहीं हुई थी. एक रॉन्ग कॉल के जरिए दोनों के बीच दोस्ती हुई. फिर प्यार. लेकिन सीमा के घर वाले शादी के खिलाफ थे.इसलिए वो खुद भागकर उनके पास आई. फिर दोनों ने लव मैरिज की. गुलाम ने बताया कि जब उनके चार बच्चे हो गए तो उनकी खातिर वो पैसा कमाने के लिए सऊदी अरब चला गया. वहां से वो सीमा को पैसे भेजता था. उन्हीं पैसों से सीमा ने एक घर भी खरीदा. लेकिन PUBG के जरिए सीमा की दोस्ती सचिन से हो गई और इसकी उन्हें भनक तक नहीं लग पाई. सीमा अपना घर और गहने बेचकर भारत चली आई. तब भी उन्हें कुछ पता नहीं चल पाया. फिर इंडियन मीडिया के जरिए उन्हें इस बात का पता चला कि सीमा भारत चली गई हैं।

सीमा ने गुलाम पर लगाए मारपीट के आरोप

जबकि, सीमा का कहना है कि गुलाम से वह चार साल से अलग रह रही है. शादी के बाद से ही वह उसके साथ मारपीट करता था. कई बार उसने उसके चेहरे पर मिर्च पाउडर तक फेंका है. वह उसके साथ बिल्कुल भी नहीं रहना चाहती. बहरहाल, देखना ये होगा कि आगे इस मामले में क्या होता है? क्या भारत सरकार उसे वापस पाकिस्तान भेजेगी या यहीं भारत में रहने की इजाजत देगी. क्योंकि 4 जुलाई को सीमा और सचिन को गिरफ्तार कर लिया गया था. जिसके बाद से वे जमानत पर रिहा हैं. लेकिन कानूनी कार्वाई अभी जारी है.

सीमा और सचिन बार-बार पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ से गुहार लगा रहे हैं कि सीमा को वापस पाकिस्तान न भेजा जाए. सीमा का कहना है कि अगर वो पाकिस्तान वापस गई तो उसे वहां तड़पा-तड़पा कर मार डाला जाएगा.

कैसे हुई थी सीमा-सचिन की लव स्टोरी की शुरुआत

साल 2020 में ऑनलाइन PUBG गेम खेलते खेलते उसे सचिन से प्यार हुआ और फिर प्यार को पाने के लिए वह बच्चों के साथ भारत चली आई. भारत आने से पहले वह एक बार सचिन से नेपाल में मिली भी थी. वहां उन्होंने 7 दिन एक साथ बिताए.

सीमा ने बताया कि जब हम पहली बार नेपाल में मिले तो एक दूसरे को देखकर बहुत ज्यादा खुश हुए. हमें यकीन ही नहीं हो रहा था कि हम असल में एक दूसरे के सामने हैं. हमें इतनी खुशी हुई कि एक दूसरे अलग होने का मन ही नहीं कर रहा था. मन कर रहा था कि बस हमेशा के लिए यहीं ठहर जाएं. लेकिन तब हम सिर्फ मिलने के लिए आए थे. हमने 7 दिन साथ में बिताए. 17 मार्च को हम दोनों को अपने-अपने देश लौटना था.

10-10 घंटे के वीडियो बनाए, खूब रोए

वापस लौटने की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही थी हमें उतना ही बुरा लग रहा था. उस समय हमें नहीं पता था कि हम दोबारा मिल भी पाएंगे या नहीं. 15 और 16 मार्च को तो हम दोनों पूरा दिन बस रोते ही रहे. हम एक दूसरे से दूर नहीं जाना चाहते थे. लेकिन मजबूरी थी. इसलिए एक दूसरे को समझाया. हमने दो दिन कैमरा कमरे में ही रिकॉर्डिंग पर लगा दिया. 10-10 घंटे के वीडियो बनाए. वो इसलिए कि अगर हम दोबारा नहीं भी मिल सके तो इन्हीं वीडियो को देखकर एक दूसरे को याद कर लेंगे.

सीमा ने बताया, ”जब वतन वापसी हुई तो वहां मैं रोज इन वीडियो को देखती और सचिन को याद करती रहती.” सीमा ने बताया कि उसके पास 8 लाख रुपये ही थे. जिसमें से तीन लाख रुपये नेपाल ट्रिप में खत्म हो गए. फिर जब उसने तय किया कि उसे अब बच्चों के साथ भारत आना है तो उस समय 12 लाख रुपये की टिकट बुक हो रही थी.

लाला ने किया पैसे देने से इनकार

इतना पैसा उसके पास नहीं था. उसने अपनी समस्या सचिन को बताई. सचिन ने अपने लाला (जहां सचिन काम करता है) से बात की और उनके रुपये उधार मांगे. तो लाला ने यह कहकर मना कर दिया कि सचिन तू ऐसे ही किसी की बातों में मत आ. हो सकता है कि वो महिला फ्रॉड हो. सचिन ने फिर यह बात सीमा को बताई. तब सीमा ने कहा कि तुम फिक्र मत करो, अगर हमारे नसीब में मिलना लिखा होगा तो हम जरूर मिलेंगे।सीमा ने बताया कि फिर बाद में फ्लाइट के टिकट सस्ते हो गए और उसने सबसे सस्ती वाली सीट बुक करवाई. ताकि वो बच्चों के साथ भारत आ सके. फिर वह शारजाह से नेपाल पहुंची. नेपाल से फिर 15 हजार रुपये की टिकट करके प्राइवेट गाड़ी से वह भारत पहुंची. सीमा ने बताया कि जैसे ही उसने भारत में एंट्री की तो वह खुशी से झूम उठी. कानों में हेडफोन लगाए और गाने सुनने लगी.फिर यूपी में यमुना-एक्सप्रेस वे पर सचिन ने उसे रिसीव किया और दोनों ग्रेटर नोएडा के रबूपुरा इलाके में पहुंचे. जहां सचिन ने दोस्त की मदद से किराए का मकान लिया और वहीं सीमा और उसके बच्चों के साथ वह रहने लगा. लेकिन पुलिस ने दोनों को 4 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया. फिलहाल वे जमानत पर रिहा हैं।

कैसे बचेंगे अंतरात्मा की अदालत से ?

वह सर्वोच्च अदालत है, आप उसके फैसले पर सवाल नहीं उठा सकते, आप उस पर बहस कर सकते हैं, चिंतन कर सकते हैं, चिंता व्यक्त कर सकते हैं, परेशान हो सकते हैं पर सवाल नहीं उठा सकते। मुझे याद है अपने विद्यार्थी जीवन की एक पंक्ति कि जब कार्यपालिका, विधायिका असफल हो जाए तो सामाजिक न्याय के लिए आप न्यायपालिका के द्वार खटखटा सकते हैं। एक अंतिम उम्मीद, अंतिम आसरा, अंतिम टिमटिमाती आशा की लौ… जहां न्याय की देवी आंखों पर पट्टी बांध कर बिना किसी का पक्ष लिए नीर-क्षीर विवेक से अपना फैसला सुनाएगी, एक और पंक्ति मुझे याद आती है कि भले ही 10 गुनाहगार छुट जाए पर कोई मासूम को सजा न हो….  

धारा 497 के मद्देनजर आइए कुछ बातें साझा करें। बात उस रिश्ते से शुरु करें जो दिल से शुरू होकर दिल तक पंहुचता है। दो आत्माएं एक साथ सांस लेती हैं, सालों किसी एक की ‘हां’ का इंतजार किया जाता है, कभी मिल जाने के बाद एक दूजे की सांसों में धड़कते हुए जीवन गुजार दिया जाता है और कभी ना मिल पाने की कसक के साथ एक अधूरा जीवन जी लिया जाता है। यह प्रेम की पवित्रता सिर्फ भारत में ही हो ऐसा नहीं है हर जगह है क्योंकि प्रेम की कोई देश-काल की सीमा नहीं होती, भाषा, बोली, धर्म, प्रांत, संप्रदाय नहीं होता वह बस प्रेम होता है। 

आइए अब इससे आगे चलें… जहां दो के साथ एक तीसरा कोण निर्मित होता है। पति, पत्नी और वह…यह ‘वह’ शब्द इस त्रिकोण में फंसे तीनों के लिए अलग-अलग अनुभूति देता है। 

जिसका संबंध है वह इसे छुपाना चाहता है क्योंकि वह अपनी पत्नी को भी खोना नहीं चाहता क्योंकि वह उसके बच्चों की मां है। घर की इज्जत (?) है। यहां एक किस्म की चालाकी छुपी है। घर पर जो बिना पैसे की सुविधा मिल रही है। तमाम जिम्मेदारियों से लेकर बच्चों के पालन-पोषण और रिश्तेदारी व सामाजिकता निभाने की वह उस घर में बसी प्राणी के साथ ही संभव है… लेकिन ‘वह’ दूसरा रिश्ता भी जरूरी है क्योंकि वह अच्छा लगता है। उसके साथ ऐसी कोई बाध्यता नहीं है, कोई झंझट नहीं है, बस कुछ पलों का सुकून है। वहां पैसों को लेकर चिकचिक नहीं है। अधिकारों का हंगामा नहीं है। पर उसे छुपाना जरूरी था क्योंकि वह सामाजिक मर्यादा के खिलाफ था, कहीं न कहीं हल्का सा ही सही पर कानून का भी भय व्याप्त था। जो अब नहीं होगा। 

‘वह’ जिससे संबंध है वह मासूम भी हो सकती है, शातिर भी हो सकती है और मजबूर भी …उसे एक कानून के डंडे से नहीं हांका जा सकता। लेकिन चाहे मजबूरियां कुछ भी हो यह संबंध उसके लिए अवसाद का ही सबब होता है क्योंकि इस तरह का रिश्ता सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और स्थायित्व नहीं देता बल्कि तीखी नजरों के तीर देता है। यहां कसमसाहट है कि दिल है कि इस रिश्ते से बाहर नहीं आने देता और दिमाग है कि सवाल करता है…पर यहां भी उसे उसका ‘वह’ शब्द गाली लगता है और सामाजिक स्वीकार्यता के लिए संघर्ष यहां भी जन्म लेता है। 

तीसरा वह व्यक्ति जो ‘पत्नी’ नामधारी है जिसके साथ छल, धोखा, फरेब और लंपटता की जा रही है। हो सकता है वह बेचारी हो, हो सकता है वह क्रूर हो, हो सकता है वह मासूम हो, हो सकता है अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाली हो…पर कानून की नजर में उसका अपना कोई वजूद तब तक नहीं …जब तक कि वह बाध्य होकर आत्महत्या न कर लें… उसका कोई हक नहीं बनता…

उसके लिए ‘वह’ यानी उसके जीवन का सुख-चैन छीन लेने वाली। वह यानी उसके पति की प्रेमिका, वह यानी उसके बच्चों की दुश्मन… अब उसे इस ‘वह’ को या तो जीवन भर बर्दाश्त करना है या अपने रिश्ते से बाहर आ जाना है या अपमान, उपेक्षा और हीनता बोध के चलते आत्महत्या का रास्ता चुन लेना है क्योंकि कानून उसका सहारा नहीं बनेगा अब…   

यह फैसला एक महिला के हित में है तो दूसरी महिला के लिए घातक है… 

यही बात उस पुरुष के लिए भी लागू होती है जिसकी पत्नी उसके साथ छल कर रही है। 

छल, फरेब, धोखा जैसे शब्द आज भी उतनी ही नकारात्मक ध्वनि देते हैं जितनी कल देते थे। आप धोखा चाहे पत्नी से करें या किसी अन्य रिश्ते से वह धोखा ही कहलाएगा… अवैध शब्द चाहे अब आपके साथ न लगा हो पर अनैतिक तो है। माना कि विवाहेतर संबंध अपराध नहीं पर 80 प्रतिशत मामलों में अपराध की वजह तो होते हैं। 

सीधी सी बात तो यह है कि जहां ऐसे रिश्ते पनप रहे हैं वहां कानून का डर पहले ही नहीं था और अब तो बिलकुल भी नहीं। विवाहेतर संबंध सदियों से रहे हैं, देवताओं के काल से लेकर राजा-महाराजाओं के जमाने तक और मुगल काल से लेकर वर्तमान दौर के उद्योग‍पति, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग, कलाकार, संगीतकार तक के रहे हैं, चलते आए हैं…

लेकिन एक ऐसा वर्ग समाज में हमेशा रहा है जो वैवाहिक शुचिता, नैतिकता, समर्पण और ईमानदारी को लेकर प्रतिबद्ध है, धर्मपरायण है, यहां उनका अपना कानून है, दिल का कानून, भारतीय मूल्यों की यहां प्रतिष्ठा है और पूरी आत्मा से उस कानून का पालन भी किया जा रहा है। हमारी संस्कृति की जड़ों में अगर पकड़ बनी हुई है तो वह इसी सामान्य मध्यम वर्ग की वजह से बनी हुई है। 

फैसले का सबसे अधिक नकारात्मक असर समाज के उस वर्ग पर होगा जो समाज में अपनी छवि को लेकर सतर्क है पर ऐसे संबंधों के लिए उनका जी ललचाता जरूर है। ऐसे लोग इधर-उधर जाने के गलियारे तलाशते रहते हैं। ऐसे लंपट और धूर्त लोगों के लिए यह फैसला हौसला बढ़ाने वाला है। फिर वही बात कि इन पर कहीं न कहीं कानून का एक जो हल्का सा ही सही पर भय व्याप्त था वह अब न होने से स्थितियां बिगड़ेंगी। 

इन संबंधों को सामाजिक अस्वीकार्यता की वजह से खुलकर सामने लाने में एक शर्म बची थी जो अब नहीं रहेगी। कहीं इस तरह के फैसले संस्कृति को विकृति के मुहाने पर ले जाने वाले आत्मघाती कदम सिद्ध न हो…   

बड़ी बात यह है कि विवाहेतर संबंध को आप किसी एक तुला पर तौल ही नहीं सकते। इस तरह के संबंध कई तरह के होते हैं कई स्तर पर कई पेचीदगियां लिए होते हैं। मानवीय स्वभाव को आप स्त्री-पुरुष के दायरे में नहीं बांट सकते। धोखा फिर भी धोखा है चाहे वह स्त्री करे या पुरुष, फरेब, फिर भी फरेब है चाहे वह पति करे या पत्नी…

ना जाने कितने हजारों जोड़े हर दिन बनते-बिगड़ते हैं उन सब पर क्या यह बात लागू की जा सकती है? संभव ही नहीं है…इसमें स्त्री क्या और पुरुष क्या… रिश्तों की बहुत बारीक तहें हैं आप हर किसी को एक लाठी से नहीं हांक सकते। 

हमारे देश में विवाह जैसा बंधन, बंधन न होकर एक सहज स्वीकार्यता है एक दूसरे के प्रति… भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल संबंधों की परिणति ही ‘क्राइम पेट्रोल’  का कंटेंट बनती है।  

धोखा हर लिहाज से धोखा है। आप अगर संबंधों में ईमानदार नहीं हैं तो फिर कहीं नहीं है। आपको किसी एक से रिश्ता नहीं रखना है तो आप उस संबंध से बाहर आ जाएं और फिर किसी और के साथ रिश्ता कायम करें। लेकिन शादी को बनाए रखते हुए अगर आप कोई संबंध रखते हैं तो वह सामाजिक दृष्टि से अनुचित ही कहा जाएगा कानून चाहे कुछ भी कहे… 

जी हां, कानून कुछ भी कहे, इन सबसे ऊपर एक अदालत होती है वह है अंतरात्मा की अदालत.. आप चाहे कितने ही चालाक, चतुर, लंपट और होशियार हो अगर अपने साथी के साथ किसी भी स्तर पर बेईमानी करते हैं तो आपका अपना मन आपको निरंतर दंडित करता है। और अगर आप इस तरह के संबंधों में उलझे हैं और यह फैसला आपके होंठों पर क्रूर-कुटील मुस्कान का सबब बनता है तो ध्यान रखिए कहीं यह मुस्कान आपके साथी के लबों पर भी तो नहीं सज रही?

क्यों‍कि एक बात महिलाओं की यौन स्वायत्तता की भी कही जा रही है…पर उस पर बात अलग से….फिलहाल आप अंतरात्मा की अदालत से पूछिए कि चाहे कितनी ही मजबूरियां हो लेकिन किसी भी रिश्ते में ‘धोखा’ होना ही क्यों चाहिए? रिश्तों में परस्पर आत्मीयता, समर्पण, प्रतिबद्धता, एकनिष्ठता जैसे शब्द क्या किसी दूसरे ग्रह के हो जाएंगे….


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