अरविन्द तिवारी 

जांजगीर चांपा (गंगा प्रकाश)- सुदामा चरित्र हमें जीवन में आई कठिनाईयों का सामना करने की सीख देता है। सुदामा ने भगवान के पास होते हुये अपने लिये कुछ भी नहीं मांगा। अर्थात नि:स्वार्थ समर्पण ही असली मित्रता है। मित्रता करो तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है , जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताये ही सहायता कर दे। परंतु आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है , तब तक मित्रता रहती है। जब स्वार्थ पूरा हो जाता है , मित्रता खत्म हो जाती है। अपने मित्र का विपरीत परिस्थितियों में साथ निभाना ही मित्रता का सच्चा धर्म है।

                         उक्त बातें मां शंवरीन दाई की पावन धरा अमोरा  महंत) में चल रहे संगीतमय श्रीमद्भागवत के षष्ठम दिवस कथावाचक पं० विश्राम प्रसाद पाण्डेय ने भक्तों को सुदामा चरित्र कथा का रसपान कराते हुये कही। इस प्रसंग में आचार्यश्री ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा के मिलन , सुदामा की दीनहीन दशा , कृष्ण द्वारा अपने बालसखा (बचपन का दोस्त) की बिना एक शब्द बोले सहायता करना आदि प्रसंगों का बड़े ही सुंदर ढंग वर्णन किया। उन्होंने सुदामा चरित्र की कथा पर प्रकाश डालते हुये कहा कि सुदामा संसार में सबसे अनोखे भक्त रहे हैं। वे जीवन में जितने गरीब नजर आये , उतने ही वे मन से धनवान थे। उन्होंने अपने सुख व दुखों को भगवान की इच्छा पर सौंप दिया था। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा दोनों बालसखा है। दोनों बचपन में एक साथ खेले-कूदे , गुरुकुल में भी साथ पढे। लेकिन बड़े होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा बने। लेकिन सुदामा बड़ी गरीबी में अपना जीवन बिता रहे थे। सुदामा की पत्नी जानती थी कि द्वारिकाधीश श्री कृष्ण सुदामा के बहुत अच्छे मित्र हैं। इसीलिये सुदामा की पत्नी ने अपनी गरीबी से छुटकारा पाने के लिये सुदामा को भगवान श्रीकृष्ण के पास सहायता मांगने भेजा । हालाँकि सुदामा श्री कृष्ण से मदद लेना नहीं चाहते थे। सुदामा मीलों पैदल चलकर द्वारिका नगरी पहुंचते हैं। उनकी दयनीय स्थिति देखकर द्वारपाल उन्हें महल के दरवाजे पर ही रोक देता है। लेकिन सुदामा के यह बताने पर कि उनका नाम सुदामा है और वो कृष्णा से मिलना चाहते हैं। तब द्वारपाल महल के अंदर जाकर कृष्ण को सुदामा के बारे में बताता हैं। श्रीकृष्ण दौड़े -दौड़े चले आते हैं और अपने परम मित्र को महल के अंदर ले जाकर उनका खूब आदर सत्कार करते हैं। श्रीकृष्ण सुदामा के पैरों में चुभे हुये कांटों को निकालने वक्त इतने भावुक हो जाते हैं कि वो सुदामा के पैरों को अपने आंसुओं से धो देते हैं। आदर सत्कार करने के बाद कृष्ण सुदामा से उसके बगल में छुपायी हुई पोटली के बारे में पूछते हैं। और मुस्कुराते हुये सुदामा से कहते हैं कि बचपन में भी जब गुरु माता ने उन्हें चने खाने को दिये थे तो वो सारे चने अकेले ही खा गये थे। और आज भी भाभी (सुदामा की पत्नी ) ने उनके लिये जो उपहार भेजा हैं , वे भी उन्हें नहीं दे रहे हैं।खूब आदर सत्कार करने के बाद सुदामा को द्वारिका से विदा कर देते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि सुदामा से भगवान ने मित्रता का धर्म निभाया और दुनियां के सामने यह संदेश दिया कि जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन नहीं हो सकता। राजा हो या रंक मित्रता में सभी समान हैं और इसमें कोई भेदभाव नहीं होता। मनुष्य को जीवन में श्रीकृष्ण की तरह मित्रता निभानी चाहिये। इधर जब सुदामा अपने गांव पहुंचता हैं तो उन्हें झोपड़ी की जगह आलीशान व भव्य महल दिखाई देता है और महल के द्वार पर सारी सुख सुविधायें नजर आती है। सच्चाई का एहसास होने वो दयासागर , करणानिधान भगवान श्रीकृष्ण के प्रति नतमस्तक होकर उनकी महिमा गाने लगते हैं। इसके पहले आचार्यश्री ने असुर नरकासुर वध लीला और भगवान श्रीकृष्ण के 16108 विवाह की कथा का रसपान कराते हुये कहा कि असुर नरकासुर के चलते भगवान श्रीकृष्ण को हजारों नारियों संग विवाह करना पड़ा था। सनातन धार्मिक शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की आठ पत्नियां क्रमश: रुक्मणि , जाम्बवन्ती , सत्यभामा , कालिन्दी , मित्रबिन्दा , सत्या , भद्रा और लक्ष्मणा थी। इसके अलावा उन्होंने 16000 से भी अधिक कन्याओं संग केवल विवाह किया था , ये सभी द्वारिका में भगवान की भक्ति कर जीवन यापन करती थीं। इसके लिये आज भी धार्मिक प्रसंगों में भगवान श्रीकृष्ण की 16108 पत्नियों की कथा सुनाई जाती है। आचार्यश्री ने संक्षिप्त में कथा महात्म्य का वर्णन करते हुये कहा कि श्रीमद्भागवत कथा को अमर कथा माना गया है , यह कथा हमें मुक्ति का मार्ग दिखलाती हैं। जो जीव श्रद्धा और विश्वास के साथ मात्र एक बार इस कथा को श्रवण कर लेता है उनका जीवन सुखमय हो जाता है और वह सदैव के लिये मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है और उसे सांसारिक बंधनों के चक्कर मे आना नही पड़ता। इस कलिकाल में मोक्ष दिलाने वाला श्रीमद्भागवत महापुराण कथा से कोई अन्य श्रेष्ठ मार्ग नही है। वहीं इस कथा के आयोजक लालाराम साहू ने बताया कि प्रतिदिन गांव सहित आसपास के लोग झांकियों के साथ कथा श्रवण का लाभ ले रहे हैं। कथा के अंतिम दिवस आज शुक्रवार को आचार्यश्री द्वारा दत्तात्रेय चरित्र , परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई जायेगी। और आज ही चढ़ोत्री के साथ कथा को विश्राम दी जायेगी।


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