अरुण साव पर छत्तीसगढ़ में राजनीति, कांग्रेस ने बताया आदिवासी समाज का अपमान

रायपुर(गंगा प्रकाश)।छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश भाजपा को नया प्रदेश अध्यक्ष मिल गया है। छत्तीसगढ़ भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष बिलासपुर सांसद अरुण साव होंगे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने साव को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की घोषणा की। संघ पृष्ठभूमि से आने वाले साव शांत और सौम्य नेता के रूप में पहचान रखते हैं। वह पिछले लोकसभा चुनाव में पहली बार बिलासपुर सीट से जीते हैं। विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा संगठन ने बड़ा फेरबदल किया है। ओबीसी वर्ग से आने वाले अरुण को प्रदेश अध्यक्ष की कमान देकर भाजपा ओबीसी वोटरों को साधने की कोशिश में है।साव को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपने के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि वह ओबीसी वर्ग से आते हैं। साथ ही भाजपा प्रदेश के पांचों संभाग में सबसे ज्यादा मजबूत स्थिति में बिलासपुर संभाग में है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष की कमान बिलासपुर के ओबीसी नेता को सौंपी गई है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय आदिवासी वर्ग से आते हैं और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में आदिवासी विधायक मोहन मरकाम जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने क्षेत्रीय संगठन मंत्री के रूप में अजय जामवाल की नियुक्ति की। जामवाल ने तीन दिन में प्रदेश पदाधिकारियों, कोर ग्रुप और विधायक दल की बैठक के बाद एक रिपोर्ट केंद्रीय संगठन को सौंपी थी। इस रिपोर्ट के बाद विष्णुदेव साय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला लिया गया। दिल्ली में भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने अजय जामवाल प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन और विष्णुदेव साय के साथ बैठक भी की थी।

विष्णुदेव साय को हटाने पर कांग्रेस ने साधा निशाना

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से विष्णुदेव साय को हटाने पर कांग्रेस ने निशाना साधा है। कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस के दिन भाजपा अध्यक्ष आदिवासी नेता विष्णुदेव साय को पद से हटाया जाना भाजपा की आदिवासी विरोधी सोच को दर्शाता है।

अरुण साव पर छत्तीसगढ़ में राजनीति, कांग्रेस ने बताया आदिवासी समाज का अपमान

बिहार में नितीश कुमार की राजनीति की चर्चा है।इस बीच छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 को देखते हुए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने प्रदेश में बड़ा फेरबदल किया है।पार्टी ने अरुण साव को सीजी बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। इसे लेकर अब कांग्रेस और बीजेपी नेताओं की ओर से प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। देश में अभी बिहार की राजनीति और नितीश कुमार  की चर्चा तेज है इस बीच बीजेपी ने छत्तीसगढ़ में बड़ा बदलाव किया है. विधानसभा चुनाव 2023 से पहले छत्तीसगढ़ भाजपा अध्यक्ष के पद पर अरुण साव को बैठा दिया गया है।भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्‌डा ने आदेश जारी कर दिया है। इसे लेकर अब कांग्रेस और बीजेपी की ओर से प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। संगठन में अचानक आया आदेश अब कई चर्चाओं को जन्म दे रहा है।

कांग्रेस ने साधा निशाना

आदिवासी खेमे से आने वाले विष्णु देव साय हटाकर अरुण साव को अध्यक्ष बनाने पर खाद्य मंत्री अमरजीत भगत ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी में आदिवासियों के लिए कभी प्रेम रहा ही नहीं है,केवल छलावा ही किया गया है।विष्णु देव साय को प्रदेश अध्यक्ष से हटाए जाने पर खाद्य मंत्री ने दुख व्यक्त किया है और कहा कि आदिवासी समाज को अपमान करने का काम किया गया है।

नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने दी बधाई

सांसद अरुण साव को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने पर नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा कि हम उनके नेतृत्व में मिलकर 2023 में अच्छे से काम करेंगे, विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी चेहरा को हटाकर ओबीसी चेहरा को कमान देने के कांग्रेस के बयान पर उन्होंने कहा कि आदिवासी के बहुत से लोग हमारे यहां पदाधिकारी, परिवर्तन का क्रम चलता रहता है।इस पर बहुत कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।पूर्व मुख्यमंत्री ने दी बधाई

अरुण साव को छत्तीसगढ़ भाजपा अध्यक्ष बनाए जाने पर पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर अरुण साव की नियुक्ति की है।हमें विश्वास है कि उनके नेतृत्व में आगामी चुनाव में सफलता मिलेगी, रमन सिंह ने अरुण साव को बधाई देते हुए कहा कि अगले चुनाव को लेकर युवा नेतृत्व पर भरोसा जताया गया है, विष्णुदेव साय 3 बार प्रदेश अध्यक्ष रहें. उनके अनुभवों का लाभ भी पार्टी लेती रहेगी,आने वाला समय एक चुनौती है।

यहां जानें अरुण साव को

अरुण साव का जन्म 25 नवंबर 1968 को मुंगेली के लोहड़िया गांव में हुआ था,उन्होंने मुंगेली और बिलासपुर से उच्च शिक्षा प्राप्त की. 1990 से 95 तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की मुंगेली तहसील इकाई के अध्यक्ष, जिला संयोजक से प्रांतीय सह मंत्री और राष्ट्रीय कार्य समिति सदस्य बने,भाजपा की राजनीति में पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल के साथ युवा मोर्चा से शुरुआत की,1996 से 2005 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा में विभिन्न पदों पर रहे,1998 में दशरंगपुर से जनपद पंचायत के सदस्य के पद के लिए भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा,1996 से मुंगेली, 2001 में उच्च न्यायालय बिलासपुर में वकालत किया।2004 में छत्तीसगढ़ शासन के पैनल लॉयर, 2005 से 2007 तक उप शासकीय अधिवक्ता, 2008 से 2013 तक शासकीय अधिवक्ता और 2013 से 2018 तक उप महाधिवक्ता छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पद पर कार्यरत रहे।अब सांसद हैं और पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष का जिम्मा भी सौंपा है।

भाजपा लगा चुकी हैं मास्टर स्ट्रोक,खेला बड़ा आदिवासी कार्ड,श्रीमती मुर्मू जी को बनाया राष्ट्रपति।

 अभी हाल ही हुए रास्ट्रपति चुनाव में भाजपा ने बड़ा आदिवासी कार्ड खेलते हुए झारखण्ड की राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था।एनडीए की ओर  राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी को लेकर कई लोगो के नाम सामने आ रहे थे लेकिन राजनीतिक नफा नुकसान को देखते हुए इस बार एनडीए की ओर से आदिवासी समुदाय की झारखण्ड की राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदार घोषित कर दिया था।इसके लिए मुख्तार अब्बास नकवी,वैकेया नायडू,जैसे कई दिग्गजों के नाम सामने आ रहे थे ।आपको बता दें कि कांग्रेस की ओर से यशवंत सिन्हा राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किये गए है।और भारी मतों से श्रीमती मुर्मू जी चुनाव जीतकर देश की पहली आदिवासी महिला के रूप में राष्ट्रपति पद पर अशीन हुई हैं।

विष्णुदेव साय को अध्यक्ष पद से हटाने के पीछे क्या है भाजपा की रणनीति ? साय यहाँ से लड़ेंगे चुनाव? या फिर ….पढिये पूरी खबर ,जानिए क्या चल रहा है भाजपा के अंदरखाने में?

 2023 में कांग्रेस के हाथ से सत्ता का बागडोर छीन लेने के मकसद से भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष तो बदल दिया लेकिन भाजपा के इस फैसले से भाजपा को भारी फजीहत हो सकती है। बीजेपी प्रदेश नेतृत्व में बदलाव की खबर अभी थोड़ी देर पहले से आई है और अभी से ही भाजपा के इस फैसले को आदिवासी विरोधी फैसला बताने में कोई कसर नहीं छोड़ा जा रहा है।

दरअसल आज भाजपा का 2 -2 बार प्रदेश अध्यक्ष का कमान सम्हाल चुके भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री विष्णु देव् साय की आज प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी गयी।इनके जगह बिलासपुर सांसद अरुण साव को भाजपा ने प्रदेश का कमान सौंपा है।पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन तो आम बात है लेकिन किसी खाश दिन में खाश समुदाय से नेतृत्व छीन लेना कांग्रेस तो कांग्रेस भाजपा के भी कुछ बड़े नेताओं को रास नहीं आ रहा है।

आज पूरी दुनिया विश्व आदिवासी दिवस मना रही है और विश्व आदिवासी दिवस के दिन आदिवासी अध्यक्ष से प्रदेश की कमान वापस लेने के पी पीछे पार्टी की रणनीति या मंशा जो भी हो लेकिन राष्ट्रपति चुनाव मे भाजपा के आदिवासी कार्ड से बुरी तरह मात खा चुकी कांग्रेस को भाजपा के खिलाफ मुंह खोलने का मौका जरूर मिल गया ।कांग्रेस के लोग इस खबर के आते ही सोशल मीडिया में सक्रिय हो गए और भाजपा के इस फैसले को आदिवासी विरोधी फैसला बताने में लग गए।प्रदेश से जो भी प्रतिक्रिया आ रही हो लेकिन विष्णुदेव साय के गृह क्षेत्र जशपुर में भाजपा के इस फैसले को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गयी है  ।जशपुर में भाजपा आईटी सेल के बीते कई आदिवासी मसलों पर हमलों से चोट खाये कांग्रेसियों ने फेसबुक पर यहाँ तक लिख दिया कि भाजपा ने आदिवासी दिस्स के मौके पर भाजपा के आदिवासी नेता से नेतृत्व का कमान छीनकर यह साबित कर दिया कि भाजपा की चाल ,चरित्र ,चेहरा और चिंतन की बात व्यवहारिक तौर पर कितना प्रसांगिक है।हांलाकि इस बदलाव को भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कुछ नेता सकारात्मक नजरिये से देख रहे हैं  ।इनका मानना है कि पार्टी इन्हें केंद्र में भेजने की तैयारी कर रही है ।इन्हें पार्टी  केंद्रीय नेतृत्व में कोई बड़ी जिम्मेदारी से सकती है ।सूत्र बताते है कि विष्णुदेव साय 3 दिनों से दिल्ली में हैं और काफी गहन मंथन के बाद विष्णुदेव साय से प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी लेकर यह जिम्मेदारी सांसद अरुण साव को दी गयी है।यह भी कहा जा रहा है कि इस बार विष्णुदेव साय को विधानसभा चुनाव लड़ाया जा सकता है और भाजपा इन्हें आदिवासी मूख्यमंत्री के रूप में पेश कर सकत्ती है।काफी पहले से पार्टी के भीतर यह चर्चा चल रही है कि विष्णुदेव साय 2023 में भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित सीट कुनकुरी से चुनाव लड़ने के इच्छुक है और अंदर ही अंदर कुनकुरी से इनके चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू हो गई है। बहरहाल आगे क्या होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल  सवाल यह है कि आदिवादी नेतृत्व छीनकर गैरआदिवासी को नेतृत्व सौंपने के मुद्दे पर भाजपा अपने आदिवासी खेमे के नेता को कैसे समझाएगी ?यह बताना जरूरी है कि भाजपा के आदिवासी खेमे के बड़े नेता नन्दकुमार साय ने विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर आदिवासी नेता को अध्यक्ष पद से हटाने का सीधा विरोध कर दिया है।उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व के इस निर्णय को दुर्भग्यपूर्ण बताया है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कितना प्रभावी है जातिगत समीकरण?

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हमेशा से जातीय समीकरण का बोलबाला रहा है।छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से ओबीसी और आदिवासी वोटों के आधार पर चुनाव में जीत हार का पैमाना तय होता है।छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 में स्थिति कैसी होगी इसे समझने के लिए पढ़िए ये रिपोर्ट…..जैसा कि नवंबर 2023 में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव संभावित है। इस चुनाव की तैयारी में अभी से प्रदेश की राजनीतिक पार्टियां जुट गई हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों की तरह ही छत्तीसगढ़ के भी चुनावों में, ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवारों का चयन, जातीय समीकरण के आधार पर ही होता है।सच यह भी है कि प्रदेश में कुछ ऐसी सीटें भी हैं।जहां जातिगत समीकरण काम न आकर चेहरा काम आता है।इसी वजह से राजनीतिक दल, इन सीटों से क्षेत्र के प्रभावी चेहरों को चुनावी मैदान में उतारती हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य का गठन 1 नवम्बर 2000 को हुआ। राज्य बनने के बाद से, छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा के चुनाव परिणाम के आंकड़ों को देखें, तो प्रदेश में जाति विशेष का झुकाव, किसी एक पार्टी के लिए स्थिर नजर नहीं आता, छत्तीसगढ़ में लगभग 32 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति की है, करीब 32 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति वर्ग की और करीब 47 प्रतिशत जनसंख्या अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों की है। अन्य पिछड़ा वर्ग में करीब 95 से अधिक जातियां शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में जातीय समीकरण

 छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा की सीटें हैं।इनमें से 39 सीटें आरक्षित है। इन सीटों में से 29 सीटें अनुसूचित जनजाति और 10 सीटें अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है।आरक्षित सीटों के बाद बची 51 सीटें सामान्य हैं।लेकिन इन सीटों में से भी करीब एक दर्जन विधानसभा की सीटों पर अनुसूचित जाति वर्ग का खासा प्रभाव है।प्रदेश के मैदानी इलाकों के ज्यादातर विधानसभा की सीटों पर अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की भी भारी संख्या है।छत्तीसगढ़ में अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी करीब 47 प्रतिशत है।मैदानी इलाकों से करीब एक चौथाई विधायक इसी वर्ग से विधानसभा में चुनकर आते हैं।

जातिगत समीकरणों का प्रभाव

 छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद हुए 4 विधानसभा चुनाव में से पहले तीन चुनाव में अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति वर्ग की सीटों में बीजेपी को ज्यादा जीत मिली, 2003 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों में से करीब 75 प्रतिशत सीटें बीजेपी ने ही जीती 2008 के विधानसभा चुनाव में भी 67 प्रतिशत और 2013 के चुनाव में 36 प्रतिशत सीटें बीजेपी ने ही हासिल की थी।इन तीनों चुनाव में लगभग 60% अनुसूचित जनजाति की सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में अनुसूचित जाति सीटों से कांग्रेस लगभग पूरी तरह साफ हो गई और उसे दस में से महज एक सीट ही मिल पाई।9 सीटों पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया।प्रदेश की अनारक्षित 51 विधानसभा सीटों में कांग्रेस ने बीजेपी से ज्यादा सीटें हासिल की, 2008 में हुए विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के बाद अनारक्षित सीटों पर ओबीसी वर्ग का दबदबा बढ़ गया और इसका लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला,2003 में अन्य पिछड़ा वर्ग से महज 19 विधायक चुने गए थे 2008 में यह संख्या बढ़कर 24 हो गई.इनमें से 13 विधायक बीजेपी से चुनकर विधानसभा पहुंचे, 2013 के चुनाव में कांग्रेस ने अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं में सेंधमारी की और विधायकों की संख्या बराबर कर ली।

कई सीटों पर चेहरे ही होते हैं प्रभावी

प्रदेश में करीब 47% ओबीसी वर्ग के लोग हैं।इस वर्ग में 95 से अधिक जातियां हैं।इनमें सबसे ज्यादा संख्या 12 प्रतिशत साहू जाति की है, जिन्हें क्षेत्रवार बीजेपी और कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता है।रायपुर संभाग में साहू वोटर का ज्यादा झुकाव बीजेपी की ओर है तो वहीं बिलासपुर संभाग के कुछ हिस्सों में इन्हें कांग्रेस समर्थक माना जाता है।प्रदेश की दोनों ही प्रमुख राजनीतिक पार्टियां, इस वर्ग को राजनीति में भरपूर स्थान देती हैं।अन्य पिछड़ा वर्ग में 9% यादव जाति की और 5% कुर्मी, निषाद और मरार जाति की संख्या है।प्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टियां, जातिगत समीकरण को देखते हुए इन जातियों को भी अपनी पार्टी के संगठन या सत्ता में स्थान देती हैं।राजनीतिक प्रेक्षक राम अवतार तिवारी का मानना है कि प्रदेश की कई सीटों पर जातिगत समीकरण काम ना कर, चेहरा काम आता है।इन सीटों पर प्रभावी चेहरों को ही जनता पसंद करती है।

सारे समीकरण हुए फेल

2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 68 सीटों पर भारी जीत हासिल की और प्रदेश की सत्ता पर कब्जा किया,2003 के बाद से लगातार सत्ता में काबिज रही भारतीय जनता पार्टी 15 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी,चौकाने वाले इस चुनावी नतीजों ने विश्लेषकों के सभी गुणा भाग पर पानी फेर दिया, 2018 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी और जनता कांग्रेस जोगी ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। जिसमें बहुजन समाज पार्टी को 2 सीटें और जनता कांग्रेस जोगी को 5 सीटें मिली थी।दंतेवाड़ा, चित्रकूट और मरवाही में हुए उपचुनाव के बाद खैरागढ़ में हुए चुनाव में भी कांग्रेस ने ही जीत हासिल की और पार्टी के विधायकों की संख्या 71 पहुंच गई।उपचुनावों के नतीजों के बाद वर्तमान छत्तीजगढ़ की विधानसभा में बीजेपी की सीट 14 , जनता कांग्रेस की 3 और बहुजन समाज पार्टी की 2 सीटें ही रह गईं।

छत्तीसगढ़ में बीजेपी का प्रयोग हुआ था सफल

2018 के विधानसभा चुनाव में मिली भारी हार के कुछ ही महीने के बाद, भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में नया प्रयोग किया,बीजेपी ने प्रदेश में, पुराने चेहरों की जगह नए और युवा चेहरों को अपना उम्मीदवार बनाया।बीजेपी का यह प्रयोग सफल भी रहा। प्रदेश की 11 लोकसभा की सीटों में से 9 सीटें जीतने में बीजेपी कामयाब रही, 2018 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर राजनीति जानकारों का मानना हैं कि भले ही राजनीतिक पार्टियां, चुनाव की रणनीति जातिगत समीकरण के आधार पर बनाती हों, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह समीकरण उत्तरप्रदेश औऱ बिहार की तरह प्रभावी नहीं रहता।

आदिवासी ही नहीं, अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग का भी है अहम रोल

छत्तीसगढ़ की पहचान आदिवासी बहुल प्रदेश के रूप में है. मगर प्रदेश की जातीय संरचना में, कई अलग-अलग वर्गों का भी अच्छा खासा प्रभाव है। छत्तीसगढ़ में करीब 12 प्रतिशत की आबादी अनुसूचित जाति की है, तो वही एक बड़ी आबादी करीब 47 फ़ीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग की है. ये तीनों ही वर्ग, प्रदेश की राजनीति की दशा और दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाते हैं।यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की कोई भी राजनीतिक पार्टियां, इन तीनों वर्गों की अनदेखी नहीं कर सकतीं. वर्तमान में, प्रदेश की दो प्रमुख राजनीतिक दल, कांग्रेस और बीजेपी के संगठन की कमान आदिवासी वर्ग के नेताओं के पास है, तो वहीं सरकार की कमान अन्य पिछड़ा वर्ग के भूपेश बघेल के पास है। बीजेपी ने इसी ओबीसी वर्ग के नेता धरमलाल कौशिक को विधानसभा का नेता प्रतिपक्ष बनाया है।प्रदेश में प्रभावी अनुसूचित जाति वर्ग के नेताओं को भी प्रदेश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने, कई महत्वपूर्ण और जिम्मेदार स्थानों पर जगह दी है।

छत्तीसगढ़ की लगभग 41 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अनुसूचित

वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी 32 फीसदी आंकी गयी थी। जो 2018 में बढ़ कर 35 फीसदी से ज्यादा हो गयी है।वर्ष 2001 में राज्य गठन के दौरान से आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग और उन्हें समुचित नेतृत्व को देने को लेकर सरकार और आदिवासियों के बीच रस्साकशी चली आ रही थी।कांग्रेस ने बतौर आदिवासी अजित जोगी को मुख्यमंत्री बनाया था।लेकिन वर्ष 2003 में बीजेपी ने रमन सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाकर आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग अनसुनी कर दी थी।इसके बाद से यह मांग कभी सामाजिक मंचों और आदिवासियों के राजनीतिक आंदोलनों में उठती रही।

छत्तीसगढ़ की लगभग 41 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां अनुसूचित जाति (अजा) एवं अनुसूचित जनजाति (अजजा) की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है, फिर भी नेतृत्व कमजोर है। यदि सक्षम नेतृत्व होता तो राज्य बने 23 वर्ष हो गए, समाज का यह तबका मजबूत होता, न कि राजनीति को धनार्जन का जरिया मानने वाले। जब मध्यप्रदेश को विभाजित कर छत्तीसगढ़ बना तो छत्तीसगढ़ियों ने अस्मिता की एक लड़ाई जीत ली। किंतु गरीबी और अमीरी की लड़ाई में अमीर जीतते नजर आ रहे हैं। राज्य बनने के बाद अमीर और भी अमीर होते जा रहे हैं किंतु गरीबों के हिस्से जो कुछ आ रहा है वह अत्यल्प है। गरीबी से सर्वाधिक प्रभावित राज्य के अनुसूचित जाति, जनजाति के लोग हैं। राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मौसम में यह तबका सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इस तबके के वोटर ही नहीं, नेता भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं तथा उनकी धरपकड़, उछलकूद, खरीद-फरोख्त की खबरों से पूरा तबका तथा नेतृत्व अपनों के बीच अविश्वसनीय बनता चला जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने अजीत जोगी को आदिवासी समझ प्रदेश का प्रथम मुख्यमंत्री बनाया। जब उन्हें मुख्यमंत्री चुना गया, उससे पूर्व उनके समर्थन में हाथ उठाने में परहेज करने वाले विधायक देखते ही देखते तीन वर्षों में कट्टर समर्थक बनते देखे गए किंतु प्रदेश की जनता ने उन्हें उनके पहले चुनावी इम्तेहान में हरा दिया। अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों से भी संतोषजनक संख्या में कांग्रेस के प्रत्याशी नहीं जीत पाए। अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री बनते ही पहला दलबदल सारंगढ़ अजा सीट के विधायक डाॅ. छबीलाल रात्रे का कराया जो बसपा से कांग्रेस में आ गए। फिर उन्होंने भाजपा विधायक रामदयाल उइके से मरवाही अनुसूचित जनजाति की सीट खाली करवा ली। इतना ही नहीं, एक वर्ष के भीतर भाजपा के 12 विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर लिया था जिनमें से आठ आरक्षित सीटों से निर्वाचित थे। शायद विपरीत परिणाम का यह भी एक कारण था। सत्ता परिवर्तन हुआ। भाजपा के डाॅ. रमन सिंह मुख्यमंत्री बने। शुरू में कमजोर लगने वाले डाॅ. रमन सिंह मुख्यमंत्री बनने के बाद निरंतर मजबूत होते गए किंतु उनकी इस मजबूती के साथ उनकी पार्टी भाजपा आदिवासी क्षेत्रों में कमजोर होती गई। अजा बहुल क्षेत्रों में भाजपा को बढ़त मिली लेकिन अजजा बहुल क्षेत्रों में पिछड़ते चली गई। उनके नेतृत्व में प्रदेश का कैसे विकास हुआ, यह देखना हो तो शहरों को देखकर समझा जा सकता है, पगडंडियों से जुड़े गांवों को देखकर नहीं। राजकोष, बजट में कई गुना वृद्धि होने के बावजूद अनुसूचित जाति, जनजाति को अपने पैरों पर खड़ा करने का काम अधूरा रह गया। आज भी ट्रांस महानदी के किनारे बसे हजारों अनुसूचित जाति के लोग रोजी-रोटी की तलाश में पलायन करते हैं। बस्तर के आदिवासी कभी पलायन नहीं करते थे लेकिन अब उनका भी पलायन हैदराबाद, चेन्नई बंंगलूरु जैसे शहरों की ओर होने लगा है। यह इस बात का संकेत है कि प्रदेश का विकास एकांगी है। जो विकसित हैं, वे और अधिक विकसित हो रहे हैं। शेष जहां थे, वहीं हैं। इन हालात के लिए केवल सत्ता को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उपर्युक्त वर्ग के जनप्रतिनिधि भी कम दोषी नहीं हैं। जिस प्रदेश में 50 प्रतिशत आबादी अजा, अजजा की हो और जनप्रतिनिधियों का अनुपात 46 (सवर्ण), 44 (अजा, अजजा) हो और उनकी आवाज न सुनी जाए, यह हो नहीं सकता।


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