रायपुर (गंगा प्रकाश)– विश्व का प्रथम लिखित संविधान संयुक्त राज्य अमेरिका का है तथा संसार का सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत का है। भारतीय संविधान सभा का अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा को निर्वाचित किया गया था , उसके बाद डॉ० राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष बनाया गया था। सविधान सभा की प्रारूप समिति के  अध्यक्ष डॉ० भीमराव अंबेडकर थे और 26 जनवरी 1950 को इसे पूर्ण रूप से पूरे देश में लागू किया गया था ।

                उक्त बातें डाॅ० आभा पाल ने आज पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन शाला द्वारा आजादी का अमृत महोत्सव  के अन्तर्गत आयोजित भारतीय संविधान कल , आज और कल विषय पर व्याख्यान एवं परिचर्चा में मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुये कही। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान भारत का सर्वोच्च विधान है जो संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। यह दिन 26 नवम्बर को भारत के संविधान दिवस के रूप में घोषित किया गया हैं। उन्होंने आगे कहा कि भारतीय संविधान सभा में कुल 284 सदस्य थे , जिनमें से 15 महिलायें थीं।

संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है – धनंजय राठौर 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुये मुख्य वक्ता के रूप में संयुक्त संचालक राज्य सूचना आयोग  धनंजय राठौर ने कहा कि वर्ष 2015 में भारतीय संविधान निर्मात्री समिति के अध्यक्ष डाॅ०बी०आर०अंबेडकर के 125 वीं जयंती पर 26 नवम्बर को  संविधान दिवस घोषित किया गया , तब से इस दिन को संविधान दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि  संविधान एक ऐसा लिखित दस्तावेज होता है जिनके द्वारा किसी देश में शासन व्यवस्था चलाई जाती है। इसमें नियम कायदे कानून सरकार की शक्तियां अधिकार आदि के बारे में विस्तार से लिखा होता है। किसी देश या संस्था द्वारा निर्धारित किये गये वह नियम जिसके माध्यम से संस्था का सुचारु ढंग से संचालन हो सके उसे देश या संस्था का संविधान कहा जाता हैं। उन्होंने आगे कहा कि किसी भी देश का संविधान वह मौलिक कानून है जो सरकार के विभिन्न अंगों की रूपरेखा , कार्य निर्धारण तथा नागरिकों के हितों का संरक्षण भी करता हैं। वर्तमान में भारत का संविधान 465 अनुच्छेद जो 25 भागों और 12 अनुसूचियों में लिखित है। जिस समय संविधान लागू हुआ था , उस समय 395 अनुच्छेद , 8 अनुसूचि और 22 भाग थे। संविधान में समय – समय पर कई संशोधन किये जाते हैं। संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है , इसका उल्लंघन करनें वाले को गैर संवैधानिक माना जाता है। इसलिये व्यक्तियों के अधिकार तदर्थ वैधानिक संरक्षण या सामान्य कानून के तहत न्यायिक सुरक्षा पर निर्भर रहते हैं।  उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान कठोरता व लचीलेपन के सम्मिश्रण का अनूठा उदाहरण है। यह अमेरिका , स्विट्जरलैंड और फ्रांसज्ञ, जापान जैसे देश की तरह ना तो बहुत कठोर हैं ना ही ब्रिटेन व इजरायल की तरह बहुत लचीला है। भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान हैं , जो 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। उन्होंने कहा  संविधान के भाग III को ‘भारत का मैग्नाकार्टा ’ की संज्ञा दी गई हैं । ‘मैग्नाकार्टा’ अधिकारों का वह प्रपत्र है , जिसे इंग्लैंड के किंग जॉन द्वारा 1215 में सामंतों के दबाव में जारी किया गया था। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों से संबंधित पहला लिखित प्रपत्र था। उन्होंने कहा कि मौलिक अधिकार उन अधिकारों को कहा जाता हैं जो व्यक्ति के जीवन के लिये मौलिक होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं और जिनमें राज्य द्वारा हस्तक्षेप नही किया जा सकता। ये ऐसे अधिकार हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिये आवश्यक हैं और जिनके बिना मनुष्य अपना पूर्ण विकास नही कर सकता। उन्होंने बताया कि भारतीय संविधान नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान करता है जिसमें समता का अधिकार , स्वतंत्रता का अधिकार ,  शोषण के विरुद्ध अधिकार , धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार ,  संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार और संवैधानिक उपचारों का अधिकार शामिल है। उन्होंने यह भी बताया कि मूलतः संविधान में संपत्ति का अधिकार भी शामिल था , हालांकि इसे 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया था। इसे संविधान के भाग XII में अनुच्छेद 300 (A) के तहत कानूनी अधिकार बना दिया गया है। इस व्याख्यान एवं परिचर्चा में प्रोफेसर प्रियंवदा मिश्रा ने अध्यक्षीय भाषण दिया। इस अवसर पर पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन शाला के प्राध्यापक सर्व डाॅ० डी एन खूँटे , डाॅ० बंशो नुरूटी , डाॅ० सीमा पाल , डाॅ० उदय अढाऊ सहित पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के इतिहास अध्ययन शाला के रिसर्च करने वाले और अध्ययन विद्यार्थी बडी संख्या में उपस्थित थे। उक्ताशय की जानकारी शशिभूषण सोनी ने दी।


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