रिपोर्ट:मनोज सिंह ठाकुर
रायपुर (गंगा प्रकाश )।
प्रधानमंत्री के सर फोड़ने वाले बयान पर नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की मुश्किलें बढ़ सकती है। चुनाव आयोग ने इसेे लेकर कार्रवाई के निर्देश दिये हैं। चुनाव आयोग की तरफ से मुख्य निर्वाचन पदाधिकारियों को मिले निर्देश के बाद ये जानकारी जिला निर्वाचन पदाधिकारी को भी भेज दी गयी है। माना जा रहा है कि आज या कल तक नेता प्रतिपक्ष के खिलाफ जिला प्रशासन की तरफ से शिकायत दर्ज करायी जा सकती है।सूत्रों से जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक चुनाव आयोग ने विधि अनुरूप कार्रवाई के निर्देश दिये हैं। ऐसे में अब राजनांदगांव जिला प्रशासन की तरफ से इस मामले में आगे की कार्रवाई की जायेगी। हालांकि वो कार्रवाई कितनी कड़ी होगी, इसे लेकर अभी तक स्थिति साफ नहीं है। आपको बता दें कि भूपेश बघेल के नामांकन सभा के दौरान चरणदास महंत ने विवादित बयान दिया था। राजनांदगांव में मंगलवार को जनसभा में महंत ने कहा कि एक संरक्षक चाहिए, अच्छा लाठी धर कर मारने वाला। नरेंद्र मोदी के खिलाफ अगर कोई लाठी धर कर खड़ा हो सकता है तो तुम्हारे सांसद (भूपेश बघेल) हैं। बाकी लोग सीधे-साधे हैं।उन्होंने कहा कि, हमें लाठी धरने वाला आदमी चाहिए।उन्होंने यह सारी बातें पीएम मोदी को लेकर कही।  इस दौरान प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी मंच पर मौजूद थे। अब इस बयान को लेकर प्रदेश में जमकर सियासत हो रही है।कांग्रेस छोड़ रहे नेताओं पर चरण दास महंत का गुस्सा फूटा। राजनांदगांव में उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को जूते से मारना चाहिए, जिन्होंने कठिन समय में कांग्रेस को छोड़ा। उनको कभी पार्टी में वापस नहीं लेना है. हमने ही ऐसे नेताओं को सिर में चढ़ा के रखा था।भाजपा ने इस मामले में तीखा हमला बोला था। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी का वो परिवार हैं, इसलिए पहली लाठी उन्हें मारनी चाहिये। वहीं उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने तो चरणदास महंत के बंगले तक भाजपा नेताओं के साथ कूच किया था और कहा था कि महंत उन्हें लाठी मारें। मामले में चुनाव आयोग में भी शिकायत दर्ज करायी गयी थी। भाजपा का कहना है कि चरण दास महंत द्वारा आम सभा के दौरान देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध “लाठी पकड़ने” तथा “सिर फोड़ने” जैसे वाक्यांशों के प्रयोग स्पष्तः उनके द्वारा कांग्रेस कार्यकर्ताओं एवं आम जनता को प्रधानमंत्री जी एवं विपक्षियों के विरुद्ध सामूहिक हिंसा हेतु दुष्प्रेरित करने के उद्देश्य से दिए गए हैं I श्री महंत के द्वारा आम-सभा के दौरान देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध “लाठी पकड़ने” तथा “सिर फोड़ने” जैसे वाक्यांशों के प्रयोग कर कांग्रेस कार्यकर्ताओं एवं आम जनता को प्रधानमंत्री के विरुद्ध सामूहिक हिंसा हेतु दुष्प्रेरित करना स्पष्तः राजद्रोह जैसे गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है I

लापता सांसद ज्योत्सना महंत बतौर कांग्रेस प्रत्याशी 5 सालों बाद हुई प्रकट.. कुसमुंडा, गेवरा, दीपका क्षेत्र में हुआ था पुतला दहन

लोकसभा चुनाव की रणनीति को तैयार करने के लिए कद्दावर नेताओं के द्वारा सक्रिय होने की खबर अब देखने को मिल रही है। कोरबा लोकसभा क्षेत्र में जिन्होंने 5 सालों में कुछ नहीं किया वे अब जनता के आगे झोली फैलाकर वोट मांगने के लिए नजर आएंगी।
इन 5 सालों में कोरबा वासियों तथा आम लोगों और कोयला खदान से संबंधित प्रभावित क्षेत्रों तथा रोजगार,पर्यावरण, शिक्षा, जल अन्य से संबंधित जटिल समस्याओं को अनदेखा करते हुए प्रभावित क्षेत्रों में भ्रमण नही करते हुए लगातार सांसद ज्योत्सना महंत ने कोरबा में अपने कुछ खास और करीबी लोगों के लिए ही काम किया है। पांच साल तक जनता जिनका चेहरा देखने के लिए तरसती रही, अब वह खुद वोट मांगने के लिए नजर आएँगी |

आम लोगों का कहना है कि

पिछले 5 सालों में ज्योत्सना महंत ने जनता के लिए किया ही क्या है। वे अधिकांश समय दिल्ली और रायपुर में ही बिताई है कोरबा के लिए वह एक प्रवासी ही रह गई थी। ज्योत्सना महंत कोरबा प्रवास पर आती भी थी तो कुछ अपने करीबी लोगो के यहाँ ठहर कर यहाँ से रवाना हो जाती थी। उन्हें जनता के दुःख दर्द और उनके परेशानियों से कोई मतलब नही था। जनता अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए उन्हें तलाशती रहती थी। आलम यह था की चुनाव जीतने के बाद उनका अधिकांश समय दिल्ली और रायपुर में बीता कोरबा के लिए वह एक प्रवासी ही रह गई थी। ऐसी स्थिति में जनता क्यों वोट उन्हें देगी। आज जनता सवाल पुछ रही है की आखिर क्या काम उन्होंने कोरबा लोकसभा क्षेत्र में किया है जिसपे वह वोट मांग रही है। जिस सांसद को अपने क्षेत्राधिकार के जनता से कोई मतलब और लेना-देना नहीं तो जनता ऐसे सांसद का सपोर्ट और ऐसे सांसद प्रत्याशी को आखिर क्यों वोट देना चाहेगी..?

कुसमुंडा, गेवरा, दीपका कोयला खदान क्षेत्र के स्थाई निवासियों और ग्रामीणों में भारी आक्रोश

स्थाई निवासियों और ग्रामीणों का कहना है कि संसद ज्योत्सना महंत पिछले 5 सालों में हम बेरोजगार ग्रामीण तथा स्थाई निवासियों के क्षेत्र में एक बार भी भ्रमण नहीं किया गया है। एसईसीएल कुसमुंडा, गेवरा, दीपका कोयला खदान खुली हुई है। एसईसीएल के द्वारा हमारे जमीनों को छलपूर्वक अधिग्रहण कर लिया गया बदले में हमें रोजगार, बसाहट, मुआवजा एवं अन्य सुविधाओं से वंचित भी किया गया। पिछले 40 वर्षों से हमारे जमीनों को अधिग्रहण कर हमें घर से बेघर कर दिया गया। आज ऐसी स्थिति बनी है कि हमें न हीं रोजगार मिला और ना ही बसाहट, मुआवजा। इसी प्रकार कोयला खदान खुलने से पर्यावरण पूरी तरह के से प्रदूषित हो चुकी है। हम दूषित वातावरण में जीवन यापन कर रहे हैं। शासन, प्रशासन और एसईसीएल इस मामले पर ध्यान आकर्षित नहीं करते हुए एक प्रकार से स्थाई निवासियों और भू विस्थापित ग्रामीणों के साथ शोषण कर रहे हैं। पिछले 5 सालों में कोरबा सांसद ज्योत्सना महंत के द्वारा प्रभावित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की कोई काम नहीं की गई है और ना ही एक बार भी इन क्षेत्रों में भ्रमण नहीं किया गया। हम लोगों ने बार-बार आवेदन देनी चाही परंतु हमारे आवेदन का भी अनादर किया गया साथ ही अधिकांश समय दिल्ली और रायपुर में गुजारी। अब लोकसभा चुनाव नजदीक है तथा कांग्रेस ने फिर से ज्योत्सना महंत को प्रत्याशी के रूप में चुना है। जिससे कि सांसद ज्योत्सना महंत के द्वारा फिर से चुनावी राजनीति को लेकर मैदान में उतर रही है। अगर हमने इस बार फिर से उन्हें जीताने की चेष्टा की तो हमारा पतन निश्चित है। इसी बात को लेकर पर्यावरण प्रदूषित क्षेत्र के प्रभावित लोगों के द्वारा नारेबाजी करते हुए सांसद ज्योत्सना महंत की पुतला दहन की गई। और साथ ही यह संकल्प लेते हुए कहा कि हमें ऐसे सांसद की जरूरत नहीं जो जनता की बातों को दरकिनार करते हुए अनदेखा करें।

जिला कोरबा में दिग्गज नेताओं का है निवास स्थल

जिला कोरबा ऊर्जाधानी नगरी के नाम से छत्तीसगढ़ राज्य ही नहीं समूचे भारत में प्रसिद्ध है। इस जिले में कांग्रेस और भाजपा के दिग्गज नेताओं का निवास स्थल है। यहां की पर्यावरण और सड़के हानिकारक मिट्टी, राखड़,धूल, डस्ट की गुब्बारों से बारों मास ढकी हुई रहती है। समूचे जिले में पर्यावरण प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुकी है। इस जिले में अनेकों प्रकार के पावर प्लांट एवं कोयला खदान संचालित है। यहां दिग्गज नेताओं का निवास स्थल व निवासी होने के बावजूद पर्यावरण प्रदूषण को लेकर पर्यावरण विभाग के ऊपर कोई  कार्रवाई नहीं की जाती रही है। पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम के लिए उठाए गए कदम भी सिर्फ दिखावे और राजनीति के लिए होती है।

चरणदास महंत की लाठी पीएम मोदी को ,मगर जख्मी हुए भूपेश बघेल? समझिए छत्तीसगढ़ के रंग बदलते सियासत को

छत्तीसगढ़ के सबसे वरिष्ठ नेता डॉ0 चरणदास महंत। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में दूसरे नंबर के ओहदेदार मंत्री रहे। चार बार सांसद। केंद्र में मंत्री। दो बार छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष। छत्तीसगढ़ विधानसभा का अध्यक्ष। और अब नेता प्रतिपक्ष। राजनीति में यह मौका सबको नहीं मिलता। महंत सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। इसका मलाल उन्हें रहेगा। मगर उसके अलावे कुछ बचा भी नहीं। पुराने लोगों ने मध्यप्रदेश के समय उनका जलजला देखा है। उतने बड़े राज्य के गृह मंत्री, फिर जनसंपर्क और वाणिज्यिक मंत्री भी। उस समय गृह मंत्री का रुतबा भी कुछ और होता था। महंत ने सियासत में ये मुकाम ऐसे ही हासिल नहीं किया। हालांकि, राजनीति में इंट्री के समय उनके पिता के नाम का फायदा मिला। मगर बाद में खुद अपनी जमीन बनाई। वे काफी मिलनसार, लो प्रोफाइल वाले और सोच-समझकर बात करने वाले नेता माने जाते हैं। करीब तीन दशक की सियासत में कभी भी वे विवादों में नहीं आए। यहां तक कि कांग्रेस की सरकार के समय उन्हें हांसिये पर रखने का प्रयास किया गया तब भी चुप ही रहे।

मगर लोकसभा चुनाव 2024 के संग्राम के दौरान उन्होंने इस हफ्ते दो ऐसी बातें कह दी कि कांग्रेस पार्टी ही नहीं, छत्तीसगढ़ की सियासत में उसके गूंज खतम नहीं हो रही है। पहली बात…कोरबा लोकसभा सीट से उनकी पत्नी ज्योत्सना महंत कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। कोरबा में प्रचार के दौरान महंत ने कहा कि कांग्रेस पार्टी अभी तक चुनावी माहौल बनाने में कामयाब नहीं हो पाई है। और दूसरा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लाठी मारकर सिर फोड़ देना चाहिए। हालांकि, दूसरे वाले बयान से उन्होंने यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि छत्तीसगढ़ी नहीं समझने वाले लोग जानबूझकर बात को बतंगड़ बना रहे हैं…प्रधानमंत्री के प्रति उनका पूरा आदर है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री के बगल में मुस्कुराते हुए बैठे अपनी एक फोटो भी जारी कर दी।

अपने ही पोस्ट में गोल?

दरअसल, 11 लोकसभा सीटों में से दो-एक जगह को छोड़ दें, तो कांग्रेस पार्टी की स्थिति काफी खराब है। कई प्रत्याशी तो अकेले प्रचार पर निकल रहे। उनके साथ कोई कांग्रेसी नहीं जा रहा। ऐसा प्रतीत हो रहा कि प्रत्याशियों ने पहले से ही मान लिया है कि नतीजा क्या आएगा? लेकिन, महंतजी जैसे हाइट का कोई नेता ऐसी बातें कहेगा तो उसकी अनुगूंंज होगी ही। कांग्रेस की सियासत में इस पर चुटकी ली जा रही कि पार्टी की स्थिति खराब होने का मतलब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर अप्रत्यक्ष हमला है। क्योंकि चार महीने पहले तक सूबे के मुख्यमंत्री भूपेश ही थे। तो कांग्रेस पार्टी की स्थिति का जिम्मेदार महंतजी आखिर किसे मानेंगे। उधर, प्रधानमंत्री को लाठी मारने की बात को भी कांग्रेस के लोग भूपेश के खिलाफ बता रहे हैं। सियासी पंडितों का भी कहना है कि राजनांदगांव में अभी तक पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का वर्तमान सांसद संतोष पाण्डेय से सीधा मुकाबला था। जाहिर है, संतोष के सामने भूपेश का नाम बड़ा था ही।

लाठी मारने के बयान के बाद महंत नेशनल लेवल पर चर्चा में आए ही, अब मोदी का नाम सामने आ जाने पर राजनांदगांव में भूपेश के सामने संतोष पाण्डेय से ज्यादा मोदी की चर्चा होगी। और मोदी के सामने फिर भूपेश बघेल कहां टिक पाएंगे। कांग्रेस में जो चल रहा, उसे पार्टी का अंदरुनी मामला बताया जा रहा। कांग्रेस के लोगों का कहना है कि ये तो होना ही था…सरकार में रहते हुए सीएम भूपेश और स्पीकर महंत के रिश्ते हमेशा तल्ख रहे। तो फिर अब सरकार के नही रहने पर रिश्ते सहज कैसे हो सकते हैं। मगर इससे बीजेपी का काम आसान होता जा रहा है। कांग्रेस के लोग ही अब स्वीकारने लगे हैं छत्तीसगढ़ में चुनाव में पार्टी का बंटाधार होना निश्चित है…बीजेपी छत्तीसगढ़ में रिकार्ड जीत दर्ज करने जा रही है।

परिवारवाद, भ्रष्टाचार और अहंकार के कारण पतन की ओर बढ़ती कांग्रेस?

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपने सिकुड़ते दायरे के बावजूद कांग्रेस पार्टी जानबूझकर अपने पतन की असली वजह नहीं तलाश रही है। वह बहुत करती है तो आत्‍मचिंतन लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं होता है। इसका कारण है आलाकमान संस्‍कृति। कांग्रेस में जिस आलाकमान संस्‍कृति को इंदिरा गांधी ने जन्‍म दिया उसने पार्टी में परिवारवाद के बीज बो दिए जिससे कांग्रेस आज तक बाहर नहीं निकल पाई है। क्षेत्रीय दिग्‍गज भी इस परिवार के आगे नतमस्‍तक रहते हैं। दूसरे शब्‍दों में परिवारवाद ने योग्‍यता और आंतरिक लोकतंत्र का अपहरण कर रखा है। भ्रष्‍टाचार के बड़े-बड़े मामलों में जिस तरह कांग्रेसी नेताओं के नाम आए उससे भी कांग्रेस की प्रतिष्‍ठा गिरी।

देखा जाए तो कांग्रेस की यह स्‍थिति एक दिन में नहीं आई है। कभी देश के हर गांव-क़स्बा-तहसील से नुमाइंदगी दर्ज़ कराने वाली पार्टी पिछले तीन दशकों से लगातार अपना जनाधार खोती जा रही है। इसका अपवाद 2004 और 2009 के आम चुनाव रहे। इन दो वर्षों को छोड़ दिया जाए तो उसका मत प्रतिशत लगातार गिर रहा है। यदि प्रमुख राज्‍यों के मत प्रतिशत में आए बदलाव को देखा जाए तो स्‍थिति और स्‍पष्‍ट हो जाएगी। कांग्रेस की स्‍थिति में गिरावट के समानांतर ही भाजपा तथा क्षेत्रीय दलों के प्रदर्शन में सुधार हो रहा है। चूंकि, कांग्रेस क्षेत्रीय अस्‍मिताओं को सम्‍मान नहीं दे पाई इसलिए स्‍थानीय दिग्‍गजों ने अपनी अलग राह चुन ली। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्‍व ने कमोबेश यही व्‍यवहार मतदाताओं के साथ किया। गरीबी, बेकारी, असमानता दूर करने के स्‍थायी उपायों के बजाए कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति करने लगी जिससे आम जनता का कांग्रेस से मोहभंग होता चला गया।

कांग्रेस के मतों के क्षेत्रीय दलों के खाते में जाने की शुरूआत हिंदी क्षेत्र में मंडल की राजनीति करने वाले दलों और मायावती के साथ हुई। उसके बाद उड़ीसा में उसका स्‍थान नवीन पटनायक की बीजू जनता दल ने, पश्‍चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने, सीमांध्र और तेलंगाना में जगनमोहन रेड्डी और के चंद्रशेखर राव और दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने ले लिया। बाकी अनेक राज्यों में भाजपा कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर ही चुकी है। कांग्रेस के वोटों के बिखरने को दिल्‍ली के उदाहरण से अच्‍छी तरह समझा जा सकता है। आप ने दिल्‍ली में 70 में जो 67 सीटें जीतीं उनमें कांग्रेस के वोट ही सर्वाधिक थे। कांग्रेस का मत प्रतिशत वर्ष 2008 में 40.3 फीसदी था जो कि 2015 में घटकर 9.7 फीसदी रह गया।

दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस ने जब भी अपना मत प्रतिशत किसी के हाथ गंवाया वह उसे दुबारा हासिल नहीं कर पाई। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपने सिकुड़ते दायरे के बावजूद कांग्रेस पार्टी जानबूझकर अपने पतन की असली वजह नहीं तलाश रही है। वह बहुत करती है तो आत्‍मचिंतन लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं होता है। इसका कारण है आलाकमान संस्‍कृति। कांग्रेस में जिस आलाकमान संस्‍कृति को इंदिरा गांधी ने जन्‍म दिया उसने पार्टी में परिवारवाद के बीज बो दिए जिससे कांग्रेस आज तक बाहर नहीं निकल पाई है। क्षेत्रीय दिग्‍गज भी इस परिवार के आगे नतमस्‍तक रहते हैं। दूसरे शब्‍दों में परिवारवाद ने योग्‍यता और आंतरिक लोकतंत्र का अपहरण कर रखा है। भ्रष्‍टाचार के बड़े-बड़े मामलों में जिस तरह कांग्रेसी नेताओं के नाम आए उससे भी कांग्रेस की प्रतिष्‍ठा गिरी।

परिवारवाद और भ्रष्‍टाचार के अलावा वैचारिक पंगुता भी कांग्रेस को पतन की ओर धकेल रही है। उदाहरण के लिए उत्‍तर प्रदेश में पार्टी तकरीबन साल भर से “27 साल यूपी बेहाल” नामक अभियान चला रही थी। लेकिन चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस ने उसी समाजवादी पार्टी से चुनावी गठबंधन कर लिया जिसे वह उत्‍तर प्रदेश की बदहाली के लिए जिम्‍मेदार मानती रही है। कायदे से देखा जाए तो कांग्रेस को हिंदी पट्टी में जाति आधारित राजनीति की प्रभावी काट ढूंढ़कर मतदाताओं के सामने एक सशक्‍त विकल्‍प प्रस्‍तुत करना था, लेकिन उसने भारतीय जनता पार्टी को सत्‍ता में आने से रोकने के नाम पर जातिवादी राजनीति के आगे समर्पण कर दिया। यह उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता की कमजोरी को दर्शाता है। यही सब कारण मिलकर कांग्रेस का सूर्यास्‍त कर रहे हैं।

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