रायपुर  (गंगा प्रकाश) । छत्तीसगढ़ सरकार ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित परसा खदान के लिए 841.538 हेक्टेयर और PEKB फेज-2 के लिए 1,136.328 हेक्टेयर वन भूमि में खनन की अनुमति दी है।
छत्तीसगढ़ सहित देश-दुनिया के तमाम शहरों में हुए विरोध प्रदर्शन के बावजूद हसदेव के जंगलों में आरी चलना शुरू हो गई है। जिला प्रशासन के साथ ही वन विभाग और पुलिस की टीम ने गुरुवार से ही पेड़ों की कटाई शुरू करा दी। रफ्तार इतनी तेज है कि महज 6 घंटे में ही 2000 पेड़ धराशायी कर दिए गए। पहले फेज में 45 हेक्टेयर में जंगल काटा जाना प्रस्तावित है। इसमें करीब 8000 पेड़ हैं। इसके लिए खदान का विरोध कर रहे ग्रामीणों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

आंदोलनकारियों को उठा ले गई पुलिस

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर स्थित हसदेव अरण्य के परसा ईस्ट केते बासन (PEKB) कोल माइंस के सेकेंड फेज के लिए पेड़ों को कटाई की जा रही है। पहले चरण में बासेन से बंबारू तक पेड़ काटे जाने हैं। बताया जा रहा है कि 93 हेक्टेयर में जंगल काटा जाएगा। इससे पहले खदान का विरोध कर रहे आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। ग्रामीणों के मुताबिक, तड़के करीब 3-4 बजे से ही पुलिस टीम आंदोलनकारियों को उनके घरों से उठा कर ले गई। सभी को अलग-अलग जगह रखा गया है।

पेड़ काटने में 600 लोग, 5000 जवान लगाए गए

पेड़ काटने को लेकर जिला प्रशासन ने देर रात ही पुलिस और वन विभाग के साथ रणनीति बना ली थी। इसी के तहत ग्रामीणों को गिरफ्तार कर पेड़ों की कटाई शुरू कराई गई। इन ग्रामीणों की गिरफ्तारी परसा कोल ब्लॉक के आसपास बसे गांवों से की गई है। पेड़ काटने के लिए 20 से अधिक टीमें लगाई गई हैं। इसमें 600लोग शामिल हैं। वहीं विरोध को रोकने के लिए गांवों में हजारों की संख्या में जवान तैनात किए गए हैं।

समृद्ध जैव विविधता वाला जंगल हो जाएगा नष्ट

छत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिले के बीच स्थित हसदेव समृद्ध जंगल है। करीब एक लाख 70 हजार हेक्टेयर में फैला यह जंगल अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की साल 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक इस क्षेत्र में 10 हजार से अधिक आदिवासी हैं। हाथी तेंदुआ, भालू, लकड़बग्घा जैसे जीव, 82 तरह के पक्षी, दुर्लभ प्रजाति की तितलियां और 167 प्रकार की वनस्पतियां पाई गई है।

राजस्थान की रोशनी के लिए कट रहे पेड़

दरअसल, हसदेव अरण्य से पेड़ों को काटने का पूरा मामला राजस्थान की बिजली से जुड़ा हुआ है। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान 2012 में आवंटित हुई थी। 2019 में इसके दूसरे फेज का प्रस्ताव आया था। इसमें परियोजना के लिए 348 हेक्टेयर राजस्व भूमि, 1138 हेक्टेयर वन भूमि के अधिग्रहण सहित करीब 4 हजार की आबादी वाले पूरे घाटबर्रा गांव को विस्थापित करने का प्रस्ताव है। इसको लेकर मार्च में राजस्थान के निवर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने छत्तीसगढ के निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से रायपुर में मुलाकात भी की थी। इसके बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने अप्रैल में मंजूरी दे दी थी जबकि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय जुलाई 2019 में ही माइंस को मंजूरी दे चुका है।

राज्य से लेकर विदेशों तक में हुआ था विरोध

परसा कोल माइंस के दूसरे चरण की मंजूरी के बाद हसदेव अरण्य में पेड़ों के काटे जाने को लेकर गांव से लेकर शहर और छत्तीसगढ़ से लेकर विदेशों तक में विरोध हुआ था करीब 10 माह पहले अमेरिका के वाशिंगटन डीसी स्थित महात्मा गांधी मेमोरियल, लंदन के प्रसिद्ध इंडिया हाउस, आस्ट्रेलिया में सिडनी ओपेरा हाउस के पास, कनाडा और ब्राजील के भारतीय दूतावासों के पास हाथ में सेव हसदेव, आदिवासी लाइव्स मैटर जैसे स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर लोगों ने प्रदर्शन किया था।
सिंहदेव के विरोध पर निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा था कि एक डंगाल नहीं कटेगी
हसदेव अरण्य में पेड़ों के काटे जाने को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के अंदर ही विरोध था। इसे लेकर टीएस सिंहदेव ने ही विरोध किया था। इसे लेकर वह प्रदर्शनकारी ग्रामीणों से मिलने भी गए थे। सिंहदेव ने कहा था कि उनका व्यक्तिगत मानना है कि घने जंगल का विनाश कर कोयले का खनन नहीं होना चाहिए। इसके बाद निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा था कि अगर टीएस बाबा नहीं चाहते हैं तो वहां से पेड़ क्या, एक डंगाल भी नहीं कटेगी।

हसदेव जंगल में फिर शुरू हुई पेड़ों की कटाई, कोल खदान का विरोध करने वाले हिरासत में

हसदेव के जंगलों में पेड़ों की कटाई फिर से शुरू हो गई है। किसी भी विरोध से बचने के लिए पहले से ही पूरे इलाके में पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई है।छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन होते ही हसदेव अरण्य क्षेत्र में एक बार फिर से पेड़ों की कटाई शुरू कर दी गई है। जिला प्रशासन व वन विभाग की अनुमति के बाद गुरुवार से पीईकेबी 2 परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई की जा रही है। वर्तमान में लगभग 93 हेक्टेयर भूमि में 9000 से ज्यादा पेड़ों के कटाई की योजना बनाई गई है। पिछली बार पेड़ों की कटाई को लेकर उपजे विवाद व विरोध प्रदर्शन को देखते हुए इस बार प्रशासनिक महकमा पहले से ही अलर्ट मोड़ पर है और विरोध करने वाले कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया है।बताते चले कि राजस्थान राज्य विद्युत् वितरण कम्पनी को आबंटित व अडानी कंपनी द्वारा संचालित परसा ईस्ट केते बासेन 2 कोल परियोजना के लिए पेड़ों के कटाई की अनुमति भारत सरकार द्वारा दी जा चुकी है।पेड़ों की कटाई और कोयला उत्पादन की अनुमति मिलने के बाद जिला प्रशासन की मदद से पहले दो बार पेड़ों की कटाई का काम शुरू किया गया था लेकिन दोनों ही बार ग्रामीणों के भारी विरोध के कारण पेड़ों की कटाई बीच में ही रोकनी पड़ गई थी लेकिन अब सत्ता परिवर्तन होने के बाद एक बार फिर से पेड़ों की कटाई का काम शुरू किया गया है।हसदेव अरण्य क्षेत्र में आने वाले हरिहरपुर, साल्ही, घाटबर्रा, फतेहपुर, बासेन, परसा में पुलिस बल को तैनात किया गया और फिर पेड़ों की कटाई शुरू की गई।घाटबर्रा, पेंड्रामार जंगल में सुबह 10 बजे से पेड़ों की कटाई शुरू कर दी गई थी,इस दौरान जंगल के कक्ष क्रमांक 2003, 2004, 2005 और 2006 में चार अलग अलग टीमों द्वारा हरे भरे पेड़ों की कटाई की गई। गोरतलब हो कि हाल ही में भारत सरकार के कोल मंत्रालय द्वारा छत्तीसगढ़ के अधिकारियों की बैठक लेकर पेड़ों की कटाई कराने के साथ ही जल्द से जल्द खदान से कोयला उत्पादन शुरू करने के निर्देश दिए थे।ओपन कास्ट माइंस से कोयला उत्पादन को लेकर सरकार से मिले निर्देश के बाद कलेक्टर कुंदन कुमार ने नेतृत्व में जिला प्रशासन, वन विभाग की टीम उदयपुर क्षेत्र में पहुंची थी।पीईकेबी फेज 1 के खदानों से कोयला उत्पादन का कार्य किया जा रहा था जबकि ओपन कास्ट माइंस पीईकेबी 2 कोल परियोजना के लिए लगभग 21 सौ हेक्टयर जंगल में खनन व पेड़ों के कटाई की स्वीकृति साल 2011 में ही दी जा चुकी है। इस योजना के तहत हर साल लगभग 150 हेक्टेयर जंगल की कटाई कर उसमें से कोयला उत्पादन किया जाना है लेकिन विगत वर्ष दो बार कोयला पेड़ों की कटाई का विरोध किया गया, ऐसे में लगभग 41 हेक्टेयर जंगल में ही पेड़ों की कटाई हो पाई थी. पेड़ों की कटाई पूरी नहीं होने के कारण कोयला उत्पादन चार पांच महीनों से प्रभावित हो गया था इसीलिए वर्तमान में जिला प्रशासन द्वारा शासन के निर्देश पर पिछले बार के स्वीकृत 93 हेक्टेयर जंगल में ही पेड़ों की कटाई शुरू कराई गई है। 93 हेक्टेयर जंगल में 9 हजार से अधिक पेड़ काटे जाने की बात कही जा रही है।इस मामले में सरगुजा कलेक्टर कुंदन कुमार ने बताया “घाटबर्रा कोल परियोजना पिछले चार महीने से रुकी हुई थी। परियोजना को लेकर भारत सरकार के कोल मंत्रालय से सचिव व छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव द्वारा समीक्षा की गई. कोल आयात के कारण भारत सरकार को हानि हो रही थी इसलिए प्रोजेक्ट को जल्दी चालू करने का निर्देश दिया गया था।प्रोजेक्ट को लेकर बाहरी लोगों का विरोध शुरू से रहा है इसलिए पुलिस बल को तैनात किया गया है ताकि किसी प्रकार की कोई घटना ना हो और शांति व कानून व्यवस्था बनी रहे। यह प्रोजेक्ट भारत सरकार द्वारा स्वीकृत है।इसलिए पेड़ों की कटाई और कोयला खनन का कार्य रुक नहीं सकता, यह ओपन कास्ट परियोजना है तो पेड़ों की कटाई करनी पड़ेगी, वर्तमान में 93 हेक्टेयर में 8 से 9 हजार पेड़ की कटाई की जानी है।कोल खदान प्रारंभ होने से क्षेत्र के लोगों को रोजगार उपलब्ध हो सकेंगे।”हसदेव अरण्य क्षेत्र में पेड़ों की कटाई और कोयला उत्पादन को लेकर विरोध का सिलसिला सालों से चला आ रहा है। बीते साल जिला प्रशासन द्वारा दो बार पेड़ों की कटाई का प्रयास किया गया लेकिन विरोध के कारण प्रशासन को पीछे हटना पड़ा था, इस दौरान पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने भी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर कड़ा विरोध किया था जबकि भाजपा ने प्रदेश के उप मुख्यमंत्री के निवास का घेराव कर दिया था।दोनों तरफ से विरोध के कारण प्रशासन ने कटाई का कार्य बंद करा दिया था,यही वजह है कि इस बार विरोध के कारण कटाई को प्रभावित होने से रोकने के लिए प्रशासन पहले से ही अलर्ट था।इस दौरान पुलिस टीम द्वारा रहा आंदोलनकारियों रामलाल, जयनंदन सरपंच घाटबर्रा, ठाकुर राम व अन्य को उनके घर से हिरासत में भी लिया गया है जिसका वीडियो वायरल हो रहा है।

टिकैत ने पूछा कि क्या आदिवासी मुख्यमंत्री का पहला काम यही था?

हसदेव अरण्य में कोयला खदानों के लिए पेड़ कटाई का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। किसान नेता राकेश टिकैत ने एक वीडियो जारी कर इस कार्रवाई का विरोध किया है। विभिन्न संगठनों ने गिरफ्तारी की निंदा करते हुए तत्काल रिहाई और हसदेवो में जंगल की कटाई पर रोक लगाने की मांग की है

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने आज सुबह सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि हसदेव आंदोलन का नेतृत्व करने वाले रामलाल करियाम, जय नंदन पोर्ते, ठाकुर राम और कई अन्य साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। यहां पर अडानी के एमडीओ वाले खदान के आवंटन और जंगल की कटाई का विरोध करने के लिए ग्रामीण एक वर्ष से अधिक समय से आंदोलन कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर डाले गए एक वीडियो पोस्ट में दिखाई दे रहा है कि कुछ पुलिस वाले आंदोलनकारी के घरों में पहुंचे हैं और वह उन्हें अपने साथ चलने के लिए कह रहे हैं। वे यह भी कह रहे हैं कि कुछ देर में वापस लौट जाना, अपना नाम कटवा लेना। महिलाएं कह रही है कि अभी ठीक से सुबह भी नहीं हुई है और आप इनको लेकर जा रहे हैं। इसके बाद एक वाहन में आंदोलनकारी बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं।

किसान नेता राकेश टिकैत में इन गिरफ्तारियों का विरोध करते हुए एक वीडियो पोस्ट डाली है। उन्होंने कहा है कि हरदेव अरण्य के आदिवासी अपना जल, जंगल, जमीन बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। इनको उठाकर जेल में बंद किया जा रहा है। क्या सरकार बनते ही आदिवासी मुख्यमंत्री का सबसे पहले काम यही था? किसान, मज़दूरों को तीन-चार जगह से उठाया गया है। हम सबको हसदेव चलना पड़ेगा।

इधर हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने कहा है कि छत्तीसगढ़ की सत्ता में काबिज होते ही भाजपा सरकार ने अपने चहेते कार्पोरेट अडानी के लिए संसाधनों की लूट और आदिवासियों के दमन की कार्रवाई शुरू कर दी है। इसी कारगुजारी के तहत आज सुबह गांव में भारी पुलिस फोर्स को तैनात करके परसा ईस्ट केते बासेन कोयला खदान के लिए पेड़ों की कटाई शुरू कर दी गई है। इसके पहले संगठन के कई साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन भाजपा सरकार की इस दमनात्मक कार्रवाई की कड़े शब्दो में भर्त्सना करती है और आदिवासियों साथियों की तत्काल रिहाई की मांग करते हुए हसदेव के जंगल विनाश पर रोक लगाने की मांग करती है।

हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ का समृद्ध वन क्षेत्र है, जहां हसदेव नदी और उस पर मिनीमता बांगो बांध का कैचमेंट है, जिससे 4 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित होती है। केंद्र सरकार के ही एक संस्थान ‘भारतीय वन्य जीव संस्थान’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हसदेव अरण्य में कोयला खनन से हसदेव नदी और उस पर बने मिनीमाता बांगो बांध के अस्तित्व पर संकट होगा। प्रदेश में मानव-हाथी संघर्ष इतना बढ़ जाएगा कि फिर कभी उसे कभी सम्हाला नही जा सकता।

छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 26 जुलाई 2022 को अशासकीय संकल्प सर्वानुमति से संकल्प पारित किया था कि हसदेव अरण्य को खनन मुक्त रखा जाए। पूरा क्षेत्र पांचवी अनुसूची में आता है और किसी भी ग्रामसभा ने खनन की अनुमति नहीं दी है। परसा ईस्ट केते बासेन कोयला खदान के दूसरे चरण के लिए खनन वनाधिकार कानून, पेसा अधिनियम और भू-अर्जन कानून – तीनों का उल्लंघन है।

छत्तीसगढ़ बचाओ संघर्ष समिति ने कहा है कि जिन जंगलों का विनाश किया जा रहा है, उसके प्रभावित गांव घाटबर्रा गांव को मिले सामुदायिक वन अधिकार पत्र को गैरकानूनी रूप से तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा ही निरस्त किया गया था, जिसका मामला पुन: बिलासपुर उच्च न्यायालय में लंबित है। नव निर्वाचित भाजपा सरकार को जिस विश्वास के साथ इस प्रदेश और खासकर सरगुजा के आदिवासियों ने सत्ता सौंपी है, सरकार का यह कृत्य उसके साथ सीधा विश्वासघात है। यदि हसदेव के जंगलों की कटाई नहीं रोकी गई, तो पूरे प्रदेश में व्यापक आंदोलन शुरू किया जायेगा।

गिरफ्तारी और जंगल कटाई का विरोध करने वालों में निम्न संगठन शामिल हैं- छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन – अखिल भारतीय आदिवासी महासभा, जिला किसान संघ- राजनादगांव, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्त्ता समिति), जन स्वास्थ्य कर्मचारी यूनियन, छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच, भारत जन आन्दोलन, हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति (कोरबा, सरगुजा), माटी (कांकेर), अखिल भारतीय किसान सभा (छत्तीसगढ़ राज्य समिति), छत्तीसगढ़ किसान सभा, किसान संघर्ष समिति कुरूद, दलित आदिवासी मंच (सोनाखान), गाँव गणराज्य अभियान (बलरामपुर), आदिवासी जन वन अधिकार मंच (कांकेर), सफाई कामगार यूनियन, मेहनतकश आवास अधिकार संघ (रायपुर), मूलवासी बचाओ मंच, जशपुर जिला संघर्ष समिति, राष्ट्रीय आदिवासी विकास परिषद् (छत्तीसगढ़ ईकाई-रायपुर), जशपुर विकास समिति? और रिछारिया कैम्पेन। संगठनों के संयोजक मंडल में मनीष कुंजाम, सुदेश टेकाम, शालिनी गेरा, विजय भाई, रमाकांत बंजारे, नंदकुमार कश्यप और आलोक शुक्ला शामिल हैं।

भारत की विकासात्मक हिंसा और हसदेव के स्वदेशी लोगों का संघर्ष

यह एक सच्चाई है कि दुनिया अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है। इसमें योगदान देने वाला एक प्रमुख कारक प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन है जो स्वदेशी समुदायों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है, जो अपने पर्यावरण के साथ सहजीवी संबंध साझा करते हैं। इस तथ्य के बावजूद कि विश्व बैंक द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, स्वदेशी लोग दुनिया की आबादी का केवल 6% हिस्सा हैं, वे इसकी 80% जैव विविधता की रक्षा करते हैं।हालाँकि भारत आधिकारिक तौर पर “स्वदेशी” शब्द को मान्यता नहीं देता है, फिर भी यह कई स्वदेशी समुदायों का घर है, जिसमें मध्य भारत के स्वदेशी समुदाय भी शामिल हैं जो खुद को आदिवासी के रूप में पहचानते हैं , जिसका अर्थ है मूल निवासी। मध्य भारत के संदर्भ में, आदिवासी शब्द का प्रयोग “आदिवासी” शब्द के साथ किया जाता है और विभिन्न आदिवासी समूह आदिवासी समाज का हिस्सा हैं। यह लेख आदिवासी समुदायों के भूमि और संसाधन अधिकारों के लिए संघर्ष को परिप्रेक्ष्य में रखने का प्रयास करता है, विशेष रूप से मध्य भारतीय राज्य छत्तीसगढ़ के खतरे में पड़े, प्राचीन हसदेव अरण्य (शाब्दिक अनुवाद: वन) में।

“छत्तीसगढ़ के फेफड़े” हसदेव अरण्य का परिचय

हसदेव जंगल सन्निहित जंगल का एक बड़ा हिस्सा है जो कई आदिवासी समुदायों का घर है और इसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है क्योंकि यह हसदेव नदी का जलग्रहण क्षेत्र है और विविध वन्यजीव प्रजातियों (जिनमें से कुछ लुप्तप्राय हैं) का घर है। यह एक महत्वपूर्ण हाथी गलियारा भी बनाता है, जिसके विघटन से मानव-हाथी संघर्ष में तेजी से वृद्धि होगी। इसके पारिस्थितिक महत्व के कारण, कोयला मंत्रालय और पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा 2009-2010 में जंगल को ” खनन के लिए निषिद्ध क्षेत्र ” के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
दुर्भाग्य से, हसदेव वन को हसदेव अरण्य कोयला क्षेत्र के रूप में अधिक जाना जाता है क्योंकि यह क्षेत्र एक बड़े कोयला क्षेत्र के शीर्ष पर स्थित है जो 1878 वर्ग किमी में फैला है, जिसमें से 1502 वर्ग किमी घने वन क्षेत्र के अंतर्गत स्थित है। हसदेव के वन क्षेत्र के भीतर कम से कम 14 कोयला खदानें आवंटित की गई हैं। इसके कारण, पीईकेबी कोयला खदान को सफलतापूर्वक शुरू करने के लिए 2011 में इसके “नो-गो” वर्गीकरण को उलट दिया गया था। इस खदान ने आसपास के गांवों के लिए पानी के प्राथमिक स्रोत को प्रदूषित कर दिया , हाथी गलियारे को बाधित कर दिया, दो गांवों को विस्थापित कर दिया और आदिवासियों के पवित्र स्थानों को नष्ट कर दिया।
इस जंगल के आदिवासी समुदाय कई पीढ़ियों से इस क्षेत्र में बसे हुए हैं और अपने अस्तित्व के लिए इस पर निर्भर हैं। फलों, फूलों और सब्जियों की खरीद के अलावा, जंगल आदिवासियों के मवेशियों के लिए चरागाह और उनकी दवाओं के लिए फार्मेसी के रूप में भी काम करता है। सबसे बढ़कर, जंगल पवित्र है। आदिवासी समुदाय मानते हैं कि उनके देवता जंगल के पेड़ों, नदियों और पहाड़ियों में रहते हैं। उनके लिए, जंगल केवल एक भौतिक स्थान नहीं है जहां समुदाय अस्थायी रूप से रहता है, बल्कि एक जीवित मंदिर है जो उनके अस्तित्व को चिह्नित करता है।पीईकेबी खदान के कारण जंगल और उनकी संस्कृति के विनाश को देखने के बाद, आदिवासी समुदायों ने अपनी भूमि पर किसी भी कोयला खनन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध शुरू किया। एक दशक से अधिक समय से समुदायों ने अपने संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए विरोध प्रदर्शन किया है।

आदिवासी अधिकार और उनके कमजोरियाँ: हसदेव का उदाहरण

भारत में वनों में रहने वाले आदिवासी समुदायों को नियंत्रित करने वाले तीन प्रमुख कानून हैं: 1) भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची, 2) पंचायत प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 जिसे PESA के रूप में भी जाना जाता है और 3) अनुसूचित जनजातियाँ और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 को वन अधिकार अधिनियम या एफआरए के रूप में भी जाना जाता है। ILO कन्वेंशन 169 (देश के लगभग 104 मिलियन स्वदेशी निवासियों के बावजूद, अभी तक भारत द्वारा अनुमोदित नहीं) की तरह , ये भारतीय कानून आदिवासी समुदायों के भूमि और संसाधन अधिकारों के साथ-साथ स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति के अधिकार को मान्यता देते हैं। PESA और FRA दोनों अपनी भूमि पर प्रस्तावित किसी भी विकास कार्य के बारे में निर्णय लेने में ग्राम सभाओं की स्वायत्तता को मान्यता देते हैं। एफआरए के दायरे में आने वाली जमीन नहीं बेची जानी चाहिए।
2013 में, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार (एलएआरआर) अधिनियम पारित किया गया था। धारा 2(2)(बी) में, इस अधिनियम में कहा गया है कि “…अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी कानून (न्यायालय के फैसले के किसी भी आदेश सहित, जो अंतिम हो गया है) के उल्लंघन में कोई भी भूमि अधिग्रहण के माध्यम से हस्तांतरित नहीं की जाएगी।” ऐसे अनुसूचित क्षेत्रों में प्रचलित भूमि हस्तांतरण के लिए।” आदर्श रूप से, इस अधिनियम को पिछले सभी भूमि अधिग्रहण कानूनों को खत्म कर देना चाहिए था, लेकिन एलएआरआर लागू नहीं किया जा रहा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इसके कार्यान्वयन पर दिशानिर्देश जारी नहीं किए हैं।
इस प्रकार, हसदेव जंगल में कोयला खदानों (जैसे परसा और मदनपुर दक्षिण कोयला ब्लॉक) के लिए भूमि अधिग्रहण कोयला धारक क्षेत्र (अधिग्रहण और विकास) ( सीबीए ) अधिनियम, 1957 के दायरे में किया जा रहा है। यह अधिनियम करता है वन में रहने वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता नहीं दी गई है और इसलिए, इस कानून के उपयोग के माध्यम से स्वदेशी समुदायों की सहमति को प्रभावी ढंग से दरकिनार किया जा रहा है।एफआरए के आधार पर, आदिवासी समुदायों के सदस्य और अन्य पारंपरिक वन निवासी अपनी व्यक्तिगत और सामुदायिक भूमि और संसाधनों दोनों के स्वामित्व के प्रमाण के रूप में भूमि स्वामित्व के लिए आवेदन कर सकते हैं। जब तक ऐसे सभी दावों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी निजी या सार्वजनिक परियोजना के लिए भूमि हस्तांतरित नहीं की जा सकती। इस कानून को लागू हुए अब 16 साल हो गए हैं, फिर भी आज तक हसदेव जंगल में आदिवासी ग्रामीणों को उनके मालिकाना अधिकार नहीं मिले हैं, जबकि इसके लिए तीन बार से अधिक आवेदन कर चुके हैं। गांवों को अभी भी अपने सामुदायिक भूमि अधिकार अधिकार प्राप्त नहीं हुए हैं और, एकमात्र गांव के मामले में, जिसने ऐसा किया था, उनके सामुदायिक भूमि अधिकार जिला स्तर के अधिकारियों द्वारा ” रद्द ” कर दिए गए थे। प्रभारी अधिकारियों ने दावा किया कि कोयला खनन कार्यों का विरोध करने के लिए समुदाय अपने अधिकारों का दुरुपयोग करेंगे।हसदेव के आदिवासी समुदायों ने अपने सामुदायिक वन अधिकारों को रद्द करने के खिलाफ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, हालांकि, अभी तक कोई निर्णय नहीं आया है। उन्होंने परसा कोयला ब्लॉक की भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को भी चुनौती दी, लेकिन छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने “इन याचिकाओं में कोई योग्यता नहीं” का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया । मामले की अपील की गई है और वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी सुनवाई की जा रही है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि स्वदेशी समुदायों के भूमि और संसाधन अधिकारों को एफआरए लागू होने से पहले ही समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (1997), (लोकप्रिय रूप से समथा निर्णय के रूप में जाना जाता है) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरकरार रखा गया है। कानून लागू होने के बाद, उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम पर्यावरण और वन मंत्रालय और अन्य (जिसे नियमगिरि मामले के रूप में जाना जाता है) में, सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में अपनी भूमि और संसाधनों पर स्वदेशी समुदायों के अधिकारों को बरकरार रखा और संस्कृति के नुकसान को भी मान्यता दी। इसका सामना समुदायों को तब करना पड़ता है जब उन्हें विकासात्मक परियोजनाओं के कारण विस्थापन का सामना करना पड़ता है।हालाँकि, 2019 में, केंद्र सरकार बनाने के लिए धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के फिर से चुने जाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने स्वदेशी अधिकारों पर स्थापित न्यायशास्त्र पर अपना रुख बदल दिया। वन्यजीव संरक्षण गैर सरकारी संगठनों द्वारा दायर एक याचिका के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने लगभग दस लाख स्वदेशी लोगों को उनके जंगलों से जबरन बेदखल करने का आदेश दिया। आदेश को बाद में निलंबित कर दिया गया था , लेकिन तब से, देश के भीतर स्वदेशी अधिकारों का प्रवर्तन उतार-चढ़ाव की स्थिति में है।

ज़मीन हड़पना और कोयला खोदना: राज्य-कॉर्पोरेट सांठगांठ और इसकी रणनीति

हसदेव में आगे कोयला खनन के खिलाफ अपने वर्षों के विरोध में, समुदायों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। उन्होंने देखा है कि उनके गांवों को “विकास” के खोखले वादों पर विभाजित किया जा रहा है, जो निगमों द्वारा उनकी जमीनों पर खनन करने की मांग कर रहे हैं, अर्थात् राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल), जिसमें अदानी माइनिंग एंटरप्राइजेज “माइन डेवलपर और ऑपरेटर” (एमडीओ) है। . खनन के लिए सहमति नौकरियों, बड़े और बेहतर घरों और बेहतर जीवनशैली की समग्र आकांक्षा के झूठे वादों पर प्राप्त की गई है। आरोप लगाए गए हैं कि निगमों ने उन उम्मीदवारों का समर्थन करने में भी पैसा लगाया है जो ग्राम स्तर के चुनावों में उनके खनन एजेंडे के प्रति पक्षपाती होंगे।

इससे भी अधिक गंभीर दावे यह हैं कि निगमों ने जिला स्तर के अधिकारियों की उपस्थिति में बंद दरवाजे के पीछे अनापत्ति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए सरपंच (ग्राम प्रधान) पर दबाव डालकर एक और कोयला खदान के लिए सहमति प्राप्त की। जब स्थानीय समुदाय ने इस जबरदस्ती के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज करने की कोशिश की, तो पुलिस ने इसे दर्ज करने से इनकार कर दिया।
अक्टूबर 2021 में, हसदेव के विभिन्न गांवों के आदिवासी समुदाय मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ व्यक्तिगत रूप से अपनी चिंताओं को उठाने के लिए 300 किलोमीटर पैदल चलकर राज्य की राजधानी पहुंचे। बाद में उन्होंने आरोपों की तुरंत जांच शुरू करने के लिए जिला स्तर पर सक्षम अधिकारियों को लिखा , लेकिन आज तक इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
फिलहाल हसदेव के समुदाय जंगल में डेरा डाले हुए हैं. लगातार विरोध प्रदर्शनों और उपलब्ध सभी नौकरशाही साधनों को ख़त्म करने के बाद भी, निगम कर्मचारी पहले से ही चालू कोयला खदान का विस्तार करने और दूसरी खदान शुरू करने के लिए नियमित रूप से रात में पेड़ों को काट रहे हैं। 10 जून 2022 को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री द्वारा मौखिक रूप से खनन परियोजनाओं पर रोक लगा दी गई थी। हालाँकि, इससे स्थानीय समुदायों को कोई राहत नहीं मिली है। हसदेव के आदिवासियों को जंगल में रहना पड़ा है क्योंकि निगम कर्मचारी, सरकारी अधिकारियों की सहायता से, लगातार पेड़ों को काटने का प्रयास करते हैं।

स्वदेशी अधिकार संघर्षों के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भूमिका

जब से भारत में धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई है, पर्यावरण की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए कानूनों को कमजोर करने के कई प्रयास किए गए हैं। हाल ही में, सरकार ने एफआरए से सहमति को अनिवार्य करने वाले खंड को हटाने का फैसला किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि हसदेव में प्रतिरोध भारत में कोई अलग मामला नहीं है और आदिवासी समुदायों के लिए आगे की राह बिल्कुल आसान है।
जैसा कि दुनिया भर के अधिकांश स्वदेशी प्रतिरोध आंदोलनों में होता है, हसदेव के लोगों का संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक वे जीवित हैं। अक्सर कार्यकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि यदि समुदायों का लचीलापन नहीं होता, तो हसदेव जंगल वर्षों पहले नष्ट हो गया होता। G7 द्वारा भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को एक विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित करने और उनकी खोखली प्रतिज्ञाओं पर जयकार करने के बजाय, दुनिया भर की सरकारों के लिए अच्छा होगा कि वे भारत के वर्तमान प्रक्षेप पथ पर करीब से नज़र डालें। पर्यावरण और लोगों दोनों की सुरक्षा करने वाले कानूनों को पहले ही वापस लिया जा रहा है, जबकि अधिकारों को रद्द और कमजोर किया जा रहा है।
भारत के सबसे शक्तिशाली निगम और राज्य के हसदेव के लोगों के खिलाफ होने से, कोई सोच सकता है कि उनका संघर्ष खो गया है। वास्तव में, यह संघर्ष हमारे सामूहिक भविष्य के लिए एक स्टैंड-इन है: यह विकासात्मक पूंजीवाद या हमारे ग्रह के अस्तित्व के बीच का निर्णय है जैसा कि हम जानते हैं। हसदेव अरण्य के आदिवासी लोग, अधिकांश स्वदेशी लोगों के रूप में, हम सभी के लिए और उस दुनिया के लिए लड़ते हैं जिसमें हम रहते हैं। भारत सरकार और भारत के मेगा-निगमों को उनके अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुसार जवाबदेह बनाना, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का काम है – और वे बेहतर हैं हम सभी के लिए इस पर खरा उतरें।


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