सड़क दुर्घटना में घायलों की मदद हेतु लोगों में जनजागरूकता के लिए किए जा रहे उपाय

इनकी फोटो बड़े-बड़े होर्डिंग में शहर में विभिन्न प्रमुख जगहों पर लगाया गया

रिपोर्ट:मनोज सिंह ठाकुर
रायपुर(गंगा प्रकाश)।
अगर आप सड़क पर घायल अवस्‍था में पड़े व्यक्ति की मदद करते हैं, तो घबराने की कतई जरूरत नहीं है।सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश हैं कि मदद करने वाले व्यक्ति को पुलिस परेशान नहीं कर सकती,इसके साथ आप मदद करने के एवज में गुड सेमेटेरियन अवार्ड भी हासिल कर सकते हैं।सड़क पर चलते हुए कोई व्यक्ति घायल अवस्था में पड़ा हुआ दिखाई देता है, तो ऐसे में लोग मदद करने में घबराते हैं। दरअसल डर लगता है कि कहीं कोई आरोप न लगा दे, हालांकि समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण कई लोगों की जान चली जाती है।शायद आपको पता नहीं है अगर आप किसी की जान बचाते हैं, तो आपको सरकार इनाम देती है।इसके साथ ही गुड समेटेरियन अवार्ड के रूप में सर्टिफिकेट भी देती है।और हां आपको कोई फंसा भी नहीं सकता, क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश हैं कि मदद करने वाले व्यक्ति को पुलिस परेशान नहीं कर सकती।
नोएडा डीसीपी ट्रैफिक अनिल कुमार यादव बताते हैं कि सड़कों पर अगर कोई दुर्घटना में घायल व्यक्ति दिखता है तो उसकी मदद करें।भारत सरकार ऐसे व्यक्तियों के लिए गुड सेमेटेरियन अवार्ड देती है।जिसके तहत 5000 रुपये और एक प्रशस्ति पत्र देती है. लोग अक्सर घबरा जाते हैं कि किसी की मदद करें या न करें। ऐसे में घायल व्यक्ति की मौत हो जाती है।लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने सख्त आदेश दिया है कि मदद करने वालों को कोई भी पुलिस वाला परेशान नहीं करेगा बल्कि आपको उचित इनाम भी पुलिस प्रशासन द्वारा दिया जाएगा बताना लाजमी होगा कि
रायपुर पुलिस द्वारा सड़क दुर्घटनाओं पर रोकथाम एवं घायलों को त्वरित उपचार में मदद उपलब्ध कराने वाले व्यक्तियों को गुड सेमेरिटंस अर्थात नेक इंसान को हर माह प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जा रहा हैं। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रायपुर संतोष कुमार सिंह द्वारा आज ऐसे सड़क दुर्घटना में घायलों को त्वरित सहायता पहुंचा कर जान बचाने वाले 06 गुड सेमेरिटंस को निवास कार्यालय में सम्मानित किया गया। इस दौरान अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक यातायात रायपुर ओमप्रकाश शर्मा, उप पुलिस अधीक्षक यातायात रायपुर गुरजीत सिंह एवं सड़क सुरक्षा सेल के स्टाफ कमलेश कुमार वर्मा, मुकेश वर्मा एवं राजकुमार साहू आदि उपस्थित रहे।
बता दें कि भारत देश में प्रति वर्ष सड़क दुर्घटना में लगभग डेढ़ लाख लोगों की मृत्यु होती है, जिसका प्रमुख कारण घायलों को त्वरित चिकित्सा   सहायता नही मिलने के कारण होता है। सड़क दुर्घटना के दौरान 30 मिनट का समय गोल्डन आवर कहलाता है। इस दौरान यदि घायल व्यक्ति को किसी भी प्रकार से हास्पिटल तक पहुंचा दिया जाता है या फिर चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध करा दिया जाता है तो घायल की जान बचाई जा सकती है। किन्तु अधिकांश सड़क दुर्घटनों में लोगों द्वारा बार बार पेशी जाना पड़ेगा व पुलिस द्वारा बार बार पूछताछ के लिए आना पडे़गा परेशानी होगी सोचकर मोबाइल फोन से विडियों फोटो बना लिया जाता है, किन्तु घायल की जान बचाने हेतु कोई उपाय नही किया जाता जिससे घायल व्यक्ति त्वरित उपचार के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ देता है। जिसे दृष्टिगत रखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा सभी थाना प्रभारियों को निर्देशित किया है कि थाना क्षेत्र में घटित सड़क दुर्घटना में घायल को त्वरित सहायता पहुंचाने हेतु गुड सेमेरिटंस का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार करने एवं घायल को त्वरित सहायता पहुंचाकर जान बचाने वाले गुड सेमेरिटंस को प्रोत्साहित व पुरस्कृत करने हेतु उपस्थित कराने निर्देशित किया गया है। इसी क्रम में आज रायपुर जिले में घटित विभिन्न सड़क दुर्घटनाओं में घायलों की मदद करने वाले गुड सेमेरिटंस को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह द्वारा मोंमेंटो व प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया साथ ही इनका फोटो पिछले माह की तरह बड़े-बड़े होर्डिंग में शहर में विभिन्न प्रमुख जगहों पर लगाया गया है।
माह अप्रैल में सड़क दुर्घटना में घायलों की मदद करने वाले गुड सेमेरिटंस निम्नलिखित है:-
01.मनोहर वरवानी पिता रमेश वरवानी, उम्र-40 वर्ष निवासी महावीरनगर रायपुर, थाना तेलीबांधा द्वारा दिनांक 13 मार्च 2024 को तेलीबांधा थाना के सामने घटित सड़क दुर्घटना में घायल हुए दुष्यंत अनंत पिता मानसिंह अनंत निवासी चीचा नवा रायपुर को तत्काल 108 एम्बुलेंस बुलाकर जिला हास्पिटल पहुॅचाकर भर्ती कराकर उनकी जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।

02. जसबीर सिंह पिता श्री मलकीत सिंह उम्र-37 वर्ष, निवासी श्याम नगर तेलीबांधा रायपुर थाना तेलीबांधा द्वारा दिनांक 22 मार्च 2024 को उद्योग भवन के सामने चौक, रिंग रोड 01 में घटित सड़क दुर्घटना में घायल अमरनाथ खूंटे पिता गनपत खूंटे उम्र-23 साल को 108 एम्बुलेंस बुलाकर जिला हास्पिटल रायपुर पहुचाकर उनकी जान बचाई।
03. हितेश साहू पिता श्री ईश्वरी साहू, उम्र-28 वर्ष, ग्राम फुंडहर थाना तेलीबांधा के द्वारा दिनांक 20 मार्च 2024 को ग्रेंड नीलम होटल व्हीआईपी रोड के पास हुए सड़क दुर्घटना में घायल टेमरी निवासी को स्वयं के कार से मेकाहारा हास्पिटल पहुॅचाया एवं दिनांक 01 अप्रेल 2024 को मरीन ड्राइव तेलीबांधा तालाब के पास सड़क दुर्घटना में घायल विनायक चंद्राकर पिता लक्ष्मीनारायण चंद्राकर को स्वयं के कार से जिला हास्पिटल पहुॅचाकर जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी ।
04 ढिलेन्द्र कुमार सेन पिता श्री लच्छी राम सेन, उम्र-52 वर्ष, सिलतरा, थाना धरसींवा के द्वारा दिनांक 02 अप्रेल 2024 को ग्राम भूमिया एवं सांकरा के मध्य मोसा. एवं सायकल में हुए सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल मोटर सायकल एवं सायकल चालक को डायल 112 वाहन के माध्यम से सीएचसी धरसींवा पहुॅचाया जिसमें मोसा. चालक की जान बचाया जा सका। 
05.रोमा राय कुर्रे पिता श्री राजकुमार कुर्रे, ग्राम छछानपैरी, थाना मुजगहन के द्वारा दिनांक 25.03.2024 को ग्राम छछानपैरी के पास एक्टिवा एवं मो.सा. में हुए सड़क दुर्घटना में डायल 112 वाहन के माध्यम से घायल को वी.वाय हास्पिटल पहुॅचाकर उनकी जान बचाया।
06.सोना राम बंजारे पिता श्री छोटे लाल बंजारे, शिक्षक कालोनी थाना तिल्दा के द्वारा दिनांक 26.03.2024 को ग्राम लखना के पास स्वयं से अनियंत्रित होकर गिरे मोसा. चालक एवं सवार व्यक्ति को 108 एम्बुलेंस बुलाकर साथ में जाकर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र सिमगा ले जाकर भर्ती कराया।

उपरोक्त सभी छः गुड सेमेरिटन को घायलों की मदद करने के लिए सराहना करते हुए भविष्य में भी इस प्रकार से घायलों की सहायता करने हेतु प्रोत्साहित किया गया।

सड़क हादसों में घायलों की मदद क्यों नहीं करते लोग, आंखें चुराकर क्यों निकल जाते है

सड़क दुर्घटना में घायलों को अस्पताल तक पहुंचाने वालों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार प्रोत्साहन योजना चला रही है। घायल का जीवन का बचाने में सार्थक प्रयास करने वाले को पांच हजार रुपये का पुरस्कार भी दिया जाता है। इसके बावजूद लोग घायलों की मदद के लिए आगे नहीं आते।मोबाइल से वीडियो बनाने वाले तो बहुत मिलेेंगे, खुद को समाजसेवी बताने वाले भी कम नहीं हैं लेकिन, मौके पर सब पीछे हट जाते हैं। इसके चलते हर साल हादसों में घायल बहुत से लोगों की जीवन लीला समाप्त हो जाती है। घायलों को देखकर भी लोगों की मदद के लिए आगे नहीं आने वाले कारणों की पड़ताल करते हुए हमारे  संवाददाता की रिपोर्ट।हादसे के तुरंत बाद इलाज नहीं मिलने से हो जाती है मौत
सड़क हादसों में आए दिन लोग जान गवां रहे हैं। सड़क सुरक्षा को लेकर प्रतिवर्ष अभियान चलाए जा रहे हैं, इसके बाद भी रोड दुर्घटनाओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है। देश की अलग-अलग संस्थाओं के द्वारा किए गए सर्वे में पाया गया है कि 50 फीसद घायलों की मृत्यु इसलिए हो जाती है कि घटना के एक घंटे के अंदर उन्हें समुचित उपचार नहीं मिल पाता।

अस्पतालों की व्यवस्था और पुलिस का रवैया भी मौत का जिम्मेदार

इसके साथ ही कुछ हद तक सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था और पुलिस का रवैया भी इसके लिए जिम्मेदार है। अक्सर घायलों को देखकर डाक्टर तत्काल रेफर का आदेश जारी कर देते हैं। अस्पतालों में इलाज की समुचित व्यवस्था नहीं होने के चलते भी लोगों की जान चली जाती है। मुरादाबाद मंडल में बीते तीन सालों में हुई सड़क दुर्घटनाओं में 3603 लोगों की मृत्यु हुई है।

अस्पताल में नहीं होता गाइडलाइन का पालन

घायलों को अस्पताल पहुंचाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ वर्ष पूर्व केंद्र सरकार को निर्देश जारी किए थे। जिसमें केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय में 13 सूत्रीय गाइड लाइन जारी की थी। लेकिन, इस आदेश का पालन नहीं किया जा रहा था।जबकि आप सड़क हादसा होने पर अब आप पीड़ित की नि:संकोच मदद कर सकते हैं। पुलिस आपको परेशान नहीं करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मददगार राहगीर के लिए बनाई गई केंद्र सरकार की गाइडलाइंस को मंजूरी दे दी। जस्टिस के. एस. राधाकृष्णन कमिटी की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने गाइडलाइंस तैयार की थी।विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश

अनुच्छेद-141 के तहत तमाम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए है। इसे लागू करना बाध्यकारी होगा। अगर कोई अथॉरिटी इसे लागू नहीं करती तो यह अदालत की अवमानना मानी जाएगी। पिछली सुनवाई पर केंद्र सरकार ने जो गाइडलाइंस पेश की थी, उस पर याचिकाकर्ता ने इसे लागू करवाने का आग्रह किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश के हर जिले के पुलिस चीफ की जिम्मेदारी है कि वह पीड़ितों की मदद करने वाले लोगों के हितों की रक्षा के लिए गाइडलाइंस को लागू करवाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के लिए मंजूर की केंद्र की गाइडलाइंस

•कोर्ट के आदेश पर हेल्थ मिनिस्ट्री यह गाइडलाइंस जारी करेगी की कि कोई भी सरकारी अथवा प्राइवेट अस्पताल घायल के इलाज के लिए ऐसे मददगार राहगीर को पेमेंट के लिए नहीं रोकेगा। घायल का फौरन इलाज होगा।

•इलाज में अगर डॉक्टर लापरवाही करेगा तो उसके खिलाफ एमसीआई की धारा के तहत कार्रवाई होगी।

•सभी अस्पताल अपने गेट पर हिंदी और अंग्रेजी में लिखेंगे कि ऐसे मददगार राहगीर को नहीं रोकेंगे या घायल के इलाज के लिए उनसे पैसे नहीं मांगेंगे।

•सभी पब्लिक व प्राइवेट अस्पताल गाइडलाइंस का पालन करेंगे। उल्लंघन पर संबंधित अथॉरिटी कार्रवाई करेगी।

•कोई भी घायल को अस्पताल पहुंचाता है तो उसे वहां से फौरन जाने की इजाजत होगी। कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा।

•अगर वह प्रत्यक्षदर्शी है तो उसे पता बताने के बाद जाने दिया जाएगा।

•ऐसे मददगार राहगीर को उचित इनाम भी दिया जाएगा।

•मददगार किसी भी क्रिमिनल या सिविल केस के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

•घायल के बारे में पुलिस या अस्पताल को बताने वाले को पेश होकर ब्योरा नहीं देना होगा।

•मदद करने वाले का व्यक्तिगत सूचना देना अनिवार्य नहीं बल्कि उसकी मर्जी (ऑप्शनल) पर होगा।

•उस सरकारी कर्मचारी या अधिकारी पर कार्रवाई होगी जो मददगार को अपना नाम व विवरण देने के लिए मजबूर करता है।

क्या है गाइडलाइन

गाइड लाइन के अनुसार थाने से लेकर अस्पताल में ऐसे साइन बोर्ड लगाने के निर्देश दिए गए थे, जिसमें स्पष्ट उल्लेख करना था, कि घायलों को अस्पताल पहुंचाने वालों से पुलिस कोई पूछताछ नहीं करेगी। इसके साथ ही अगर कोई पुलिस अधिकारी पूछताछ के लिए डर बनाता है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई तय की जाएगी। अभी तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया, जिसमें पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की गई हो।

डॉक्टर और पुलिस कर्मी बिना नाम-पता पूछे नहीं जाने देते

सरकारी अस्पताल में भी घायल के पहुंचाने पर लाने वाले का नाम-पता दर्ज किया जाता है। कई बार डाक्टर भी नाम-पता नहीं बताने पर घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले को ही अपने साथ मरीज को ले जाने की बात कहने लगते हैं। वहीं, पुलिस भी नाम-पता दर्ज होने के बाद एक बार पूछताछ जरूर करती है। घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले का नाम-पता साक्ष्य के रूप में दर्ज कर लेती है। ऐसे में पुलिस कार्रवाई के झंझट से बचने के लिए लोग घायलों को अस्पताल पहुंचाने से बचते हैं।

अधिवक्ता जब पहुंचा अस्पताल, तो हुई पूछताछ

सड़क दुर्घटनाओं के मामले में क्लेम से संबंधित मामलों को देखने वाले अधिवक्ता आशुतोष त्यागी ने बताया कि सरकार नियम तो बना देती है, लेकिन उसका अनुपालन सुनिश्चित नहीं करा पा रही है। घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले का नाम-पता लिए बिना डाक्टर भी भर्ती नहीं करते हैं, वहीं पुलिस भी उसी मदद करने वाले से पूछताछ जरूर करती है। अधिवक्ता का कहना कि दो साल पहले कोर्ट रोड पर बाइक सवार घायल हुआ था।उन्होंने उसे अस्पताल पहुंचाया था। इस दौरान नाम-पता अस्पताल के रजिस्टर में दर्ज करा दिया। इसके बाद पुलिस ने उसी नाम-पते के आधार पर उनसे भी पूछताछ की। नियमानुसार यह मदद करने वाले पर निर्भर है कि वह नाम-पता दर्ज कराना चाहता है या नहीं। कोई उस पर दबाव नहीं बना सकता। पुलिस द्वारा नियमों का उल्लंघन किया जाता है, शायद इसी के चलते लोग मदद के लिए आगे नहीं आते हैं।

कानून क्या कहता है?

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, एक अच्छा व्यक्ति वह व्यक्ति होता है जो अच्छे विश्वास के साथ, भुगतान या इनाम की उम्मीद के बिना, और देखभाल या विशेष संबंध के किसी भी कर्तव्य के बिना, स्वेच्छा से तत्काल सहायता या आपातकालीन व्यवस्था के लिए आगे आता है. किसी दुर्घटना या आपातकालीन चिकित्सा स्थिति में किसी घायल व्यक्ति की मदद करता है।2012 में, सेवलाइफ फाउंडेशन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें घायलों की मदद के लिए आगे आने वाले मदद करने वाले लोगों की सुरक्षा करने का अनुरोध किया गया था. मार्च 2016 में, SC ने 2015 में किसी की मदद करने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए सड़क मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों को “कानून का बल” देते हुए एक आदेश पारित किया. अदालत ने दिशानिर्देशों को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कानूनी रूप से जरूरी बना दिया था।दिशानिर्देशों के तहत, घायल व्यक्ति से कोई संबंध नहीं रखने वाला व्यक्ति किसी दुर्घटना, आपातकालीन चिकित्सा स्थिति में आपातकालीन देखभाल के रूप में सहायता प्रदान करने के लिए आगे आ सकता है. कानून ऐसे अच्छे लोगों को सड़क दुर्घटना या चिकित्सा आपातकालीन पीड़ितों के जीवन को बचाने के लिए किए जा रहे कार्यों के बाद किसी भी तरह की परेशानी से बचाता है।
इसके अलावा कोई भी व्यक्ति, प्रत्यक्षदर्शी को छोड़कर, जो पुलिस को किसी दुर्घटना के परिणामस्वरूप मृत्यु या चोट की सूचना देता है, उसे अपना व्यक्तिगत विवरण जैसे पूरा नाम, पता या फ़ोन नंबर बताने की आवश्यकता नहीं है।गुड समारिटन कानून के अनुसार, व्यक्ति को पुलिस द्वारा इन विवरणों को रजिस्टरों और अन्य रिकॉर्डों में दर्ज करने के लिए भी नहीं कहा जाएगा।इसके अलावा, यदि कोई मदद करने वाला व्यक्ति पुलिस गवाह बनने के लिए सहमत होता है, तो उसके साथ अत्यंत सम्मान और देखभाल के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए. कानून के मुताबिक, बयान की रिकॉर्डिंग सादे कपड़ों में एक अधिकारी द्वारा की जाएगी और अगर व्यक्ति को उस पुलिस स्टेशन में जाना होगा जहां मामला दर्ज है, तो उसे यह बात लिखित में देनी होगी।यदि वह व्यक्ति प्रत्यक्षदर्शी होने का दावा करता है, तो उसे शपथ पत्र के रूप में साक्ष्य प्रदान करने की अनुमति है।दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए किसी क्षेत्र के पुलिस उपायुक्त या पुलिस अधीक्षक को जिम्मेदार बनाया गया था।2020 में, सड़क दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वाले अच्छे लोगों की सुरक्षा के लिए एक नई धारा, 134ए, मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 में शामिल की गई थी।
धारा में कहा गया है कि मदद करने वाले व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, पंथ, लिंग या राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा. मोटर वाहन से जुड़े किसी दुर्घटना के शिकार व्यक्ति की किसी भी चोट या मृत्यु के लिए वह किसी भी नागरिक या आपराधिक कार्रवाई के लिए उत्तरदायी नहीं है, अगर “आपातकालीन चिकित्सा या गैर-चिकित्सीय देखभाल या सहायता प्रदान करते समय कार्य करने में लापरवाही या कार्य करने में असफल होता” है।
हालांकि, सेवलाइफ फाउंडेशन द्वारा 2018 में 11 भारतीय शहरों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि, मदद करने वाले लोगों की सुरक्षा के दिशानिर्देशों के बावजूद, केवल 29 प्रतिशत उत्तरदाता (कुल 3,667 लोगों में से) किसी घायल को अस्पताल ले जाने के इच्छुक थे, केवल 28 प्रतिशत लोग एम्बुलेंस बुलाने को तैयार थे और केवल 12 प्रतिशत लोग पुलिस बुलाने को तैयार थे. इसके अलावा, केवल 16 प्रतिशत लोगों के गुड समारिटन कानून के बारे में पता था।
सड़क परिवहन मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, “देश में चार में से तीन लोग पुलिस उत्पीड़न, अस्पतालों में हिरासत और लंबी कानूनी औपचारिकताओं के डर के कारण सड़कों पर घायल दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने से झिझकते हैं। अगर कोई मदद करना भी चाहता है, तो ये कारक उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं।


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