गरियाबंद/फिंगेश्वर (गंगा प्रकाश)। चुनावी जंग में फतह करने की सारी संभावनाओं को बरकरार रखते हुए काफी ऊंची उड़ान के साथ रोहित साहू राजिम विधानसभा के चुनावी मैदान में सामने आए हैं। 2023 विधानसभा चुनाव के सरकारी शंखनाद के पूर्व ही इस बार भाजपा ने राजिम जैसी प्रतिष्ठा एवं संघर्ष की सीट पर चार माह पूर्वा प्रत्याशी का नाम कोई साधारण व्हूव रचना के तहत घोषित किया है। ऐसा नहीं है। भाजपा की चुनावी तीर्थ छोड़ने के कई मायने हैं। भाजपा का पहला एवं निर्णायक लक्ष्य हर हाल में राजिम चुनाव जीतना है। भाजपा ने रोहित साहू का चयन शत प्रतिशत जातिगत समीकरण के तहत किया। रोहित साहू ने 2018 के चुनाव में 23776 वोट लेकर जिला पंचायत चुनाव में संघर्षपूर्ण चुनौती के मध्य भारी अंतर से चुनाव जीतकर तथा अपने दो व्यक्तिगत कार्यक्रम भाजपा प्रवेश एवं अपने जन्मदिन के अवसर पर हजारों की भीड़ दिखाकर यह तो सिद्ध कर दिया था। कि यदि उसे मौका मिले तो वह काफी बड़ी जीत दिलाने की पूरी संभावना रखता है। इस समय महासमुंद क्षेत्रीय में सांसद चुन्नीलाल साहू एवं प्रदेश में भाजपा के दमदार डॉक्टर रमन सिंह सहित छत्तीसगढ़ भाजपा के अन्य खड़े नेताओं ने रोहित साहू की इन उपलब्धियां को देखा और राज्य में विधानसभा के लिए रोहित साहू के नाम पर भाजपा हाई कमान के समक्ष उनके पक्ष रखा तो रोहित को राजिम की उम्मीदवार बनाने की राह आसान हुई। जमीनी कार्यकर्ता एवं विशुद्ध छत्तीसगढ़िया को टिकट देकर भाजपा ने यह संदेश देने में बाजी मारी है। की पार्टी की पूरी 5 साल तक नजर रहती है की कौन सा कार्य कर्ता वास्तव में जनता के बीच जाना पहचाना एवं सक्रिय चेहरा है। 2003 में चंदूलाल साहू जैसे एकदम नए तथा जनता के बीच अनजान के नाम की जीत में भी भाजपा को यह सोचने मजबूर किया है कि जातिवाद की प्रधानता को राजीम विधानसभा क्षेत्र से नकारा नहीं जा सकता। यहां यह भी माना जा रहा है कि लगभग चार माह पूर्व प्रत्याशी का नाम घोषित करने से जहां रोहित को भरपूर समय मिलेगा साथ ही पार्टी के भीतर कोई रोहित साहू का विरोध करें तो समय रहते विरोध करने वाले को मनाया जा सके और भाजपा की जितने तैयार किया जावे। जैसे ही गुरुवार 17 अगस्त की शाम राजिम से रोहित साहू को भाजपा प्रत्याशी बनाने की खबर आई पूरे क्षेत्र में मतदाताओं ने जमकर पटाखे फोड़े और खुशी का इजहार किया। भाजपा एक अनुशासित एवं कैडर पार्टी कहलाती है। यहां पार्टी का निर्णय ही अंत मान्य होता है। राजीम में भाजपा के टिकट के लिए दावेदारों की लंबी लिस्ट है। जिसमें काफी पुराने दमदार एवं अपने आप को रोहित साहू से ज्यादा अधिकार उम्मीदवार के लिए मानते हैं। रोहित साहू के विरोध में उनका कांग्रेस तथा योगी कांग्रेसी संबंध रहना सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। वरिष्ठ जनों का यह विरोध पूरी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता। परंतु पार्टी के बड़े अनुभवी तथा जीत की संभावनाओं का काफी नजदीक से अध्ययन करने वाले हाथ कमान ने सभी अतिथियों को जानते समझते हुए भी रोहित साहू को चुना है। तो उसका सभी सम्मान एवं स्वागत करते हुए अंतः भाजपा की जीत के लिए काम करेंगे। ऐसा माना जा रहा है यहां यह माना जा रहा है कि इस विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्व में किए गए दो प्रयोगों को पुनः दोहराते हुए नए चेहरे रोहित साहू पर दांव लगाया है वे जमीनी कर्मठ एवं सक्रिय कार्यकर्ता है। विधानसभा जैसे बड़ा एवं खर्चीला चुनाव हारने के बाद भी रोहित चुप नहीं रहे। उन्होंने जिला पंचायत चुनाव लड़ा और विपरीत दिखती स्थिति के बाद भी काफी अंतर से चुनाव जीता। रोहित दो बार अपने ग्राम का पंचायत चुनाव जीता है। विकासखंड सरपंच संघ के अध्यक्ष बने और विकासखंड की 72 पंचायतों के सरपंचों के साथ पूरे विकासखंड में अपनी पहचान बनाई राजिम विधानसभा में एक बार कांग्रेस उम्मीदवार के बारे में चर्चा की जा रही है। जातिवाद के चलते अगर यहां कांग्रेसी भी कोई भी पोस्ट कर दें तो आश्चर्य नहीं है राजनीति के एक मैच में कौन हारेगा कौन जीतेगा यह तय होने में काफी समय हैं। लेकिन यह आवश्यक कहा जा सकता है कि भाजपा ने टास जीत लिया है इंतजार अब कांग्रेसी कदम का है।
रोहित साहू के चयन में जातिगत समीकरण के साथ जीत की संभावना को प्रमुख माना भाजपा हाई कमान ने
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