रिपोर्ट:मनोज सिंह ठाकुर
रायपुर (गंगा प्रकाश)।
छत्तीसगढ़ के 22 सौ करोड़ के शराब और 6 सौ करोड़ के कोल खनन परिवहन घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री भूपे बघेल की ‘हमराह’ सौम्या चौरसिया के 4 दिनों तक के लिए ईओडब्लू रिमांड ली गई है। इस अवधि में ईओडब्लू के अधिकारी उससे तमाम घोटालों और भूपे बघेल के साथ अंजाम दिए गए, आर्थिक घोटालों को लेकर पूछताछ करेगी। वर्ष 2018 में डिप्टी कलेक्टर के पद से जंप करते हुए सौम्या चौरसिया सीधे बघेल की उपसचिव बन गई थी। इसके बाद बघेल और सौम्या के अपराधों से पूरा प्रदेश डोलने लगा था। सीएम हाउस में बतौर पटरानी सौम्या के आगमन से जहां प्रदेश को भ्रष्टाचार की महारानी प्राप्त हुई थी, वही पूर्व मुख्यमंत्री का दाम्पत्य जीवन भी चर्चा में रहा था।घर में मचे घमासान और बाप की ढीली चड्डी के चलते पुत्री ने आत्महत्या जैसा घातक कदम भी उठा लिया था। यही नहीं सौम्या के कब्जे में दो जुड़वाँ बच्चों के वैधानिक और जेनेटिक माता – पिता की पहचान का मामला भी लंबित बताया जाता है।भूपे राज्य में आतंक की पर्याय बन चुकी सौम्या से होने वाली पूछताछ काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। माना जा रहा है कि आरोपी सौम्या चौरसिया और पूर्व मुख्यमंत्री भूपे बघेल के बीच चोली दामन का साथ होने के चलते छत्तीसगढ़ शासन की तिजोरी पर जमकर चूना लगा है।
आज अदालत में डिप्टी कलेक्टर सौम्या के साथ आरोपी आईएएस और रायगढ़ की पूर्व कलेक्टर रानू साहू को भी अदालत में पेश किया गया था। ईओडब्लू ने दोनों ही आरोपियों से पूछताछ की मांग को लेकर 15 दिनों की रिमांड मांगी थी। हालांकि कोर्ट ने 4 दिनों की रिमांड प्रदान की। इसके बाद दोनों ही आरोपी अधिकारियों को ईओडब्लू मुख्यालय भेज दिया गया है। यहाँ दोनों ही आरोपी पूछताछ कक्ष में अपनी – अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे है। इस दौरान उनके क़ानूनी सलाहकार और अन्य परिजन भी EOW मुख्यालय में नजर आये।

बताया जाता है कि पूछताछ से पूर्व आरोपी अधिकारियों का मेडिकल टेस्ट भी कराया गया है। बताते है कि कोर्ट में सौम्या और रानू साहू का आमना – सामना भी हुआ, दोनों ने एक दूसरे को घूर कर देखा और अपशब्द भी कहे। हालांकि मौके पर मौजूद महिला पुलिस कर्मियों ने फ़ौरन दोनों को एक दूसरे के सामने से चलता कर दिया। इसके पश्चात दोनों ही आरोपी एक दूसरे के अगल – बगल में खड़े नजर आये।

उधर सौम्या चौरसिया से घोटालों को लेकर व्यापक पूछताछ की संभावना जताई जा रही है। बताते है कि तमाम घोटालों और काली कमाई की बंदरबाट को लेकर पूर्व सुपर सीएम सौम्या और उन्ही के समकक्ष कुर्सी पर आसीन अनिल टुटेजा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सौम्या और कोयला दलाल सूर्यकान्त तिवारी एक ओर से धन बटोर रहे थे, तो दूसरी ओर से तत्कालीन रायगढ़ कलेक्टर रानू साहू भी सूर्यकान्त के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कोयले पर 25 रुपये टन अवैध लेव्ही वसूल रहे थे।

इस गिरोह ने सालाना 10 हज़ार करोड़ से ज्यादा की चपत सरकारी तिजोरी पर लगाई थी। हालांकि ईडी को लगभग 6 सौ करोड़ के ही सबूत हाथ लगे थे। आरोपी सौम्या चौरसिया से अभी तक मात्र 30 करोड़ की संपत्ति ही जप्त हो पाई है। जबकि 5 हज़ार करोड़ से ज्यादा की संपत्ति और उसके सौदे राजधानी रायपुर के इर्द – गिर्द मंडरा रहे है।

जानकारी के मुताबिक कोयला घोटाले मामले में जेल में बंद निलंबित IAS रानू साहू और सौम्या चौरसिया प्रोडक्शन वारंट पर विशेष कोर्ट में पेश किया गया था। दरअसल ईओडब्ल्यू ने प्रोडक्शन वारंट के लिए कोर्ट में एक याचिका पेश की थी। दोनों पक्षों की दलीले सुनने के बाद जज अतुल श्रीवास्तव की कोर्ट ने 4 दिनों की ईओडब्लू रिमांड स्वीकृत की। बताते है कि पूछताछ के दौरान ही कई सबूतों को इकट्ठा करने और विवेचना योग्य दस्तावेजों की जप्ती को लेकर ईडी रिमांड की अवधि बढ़ाने के लिए कोर्ट में पुनः अर्जी पेश कर सकती है। इधर आरोपी रानू साहू ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खट – खटाया है। वही सौम्या चौरसिया की जमानत को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट में सोमवार को सुनवाई के आसार है।

सौम्या चौरसिया कौन हैं जिन्हें निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की उप सचिव और छत्तीसगढ़ की ‘सुपर सीएम’ कहा जाता था?

छत्तीसगढ़ के निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की उप सचिव रही सौम्या चौरसिया की प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी द्वारा कथित अवैध वसूली और ज़मीन व कोयला से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में की गई गिरफ़्तारी के साथ ही राज्य में नौकरशाही और सत्ता की भूमिका को लेकर बहस शुरू हो गई थी,छत्तीसगढ़ की राजनीति और नौकरशाही में पिछले पांच वर्षो में सौम्या चौरसिया, सबसे चर्चित और प्रभावशाली नाम रहा है। निवर्तमान कांग्रेस नीत भूपेश सरकार में मंत्री-विधायक और अफसरों से जुड़े हर छोटे-बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक फ़ैसले को सौम्या चौरसिया से जोड़ा जाता रहा है। यहां तक कि मीडिया घरानो में पत्रकारों की नियुक्ति से लेकर उन्हें नौकरी से निकाले जाने तक के पीछे भी सौम्या चौरसिया की भूमिका के किस्से बताने वालों की कमी नहीं है।जो की एक प्रशासनिक आतंकवाद का जीता जागता उदाहरण रही हैं।15 साल के भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में, भारतीय राजस्व सेवा की नौकरी छोड़ कर मुख्यमंत्री सचिवालय में शामिल हुए अमन सिंह को राज्य का सबसे ताक़तवर व्यक्ति माना जाता था। निवर्तमान भूपेश बघेल की सरकार में सौम्या चौरसिया को ‘लेडी अमन सिंह’ कहा गया हैं।लेकिन साल 2018 से पहले ऐसा नहीं था। यह 2015 के आसपास का मामला है, जब छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के पाटन के किसानों ने वहां की एसडीएम कार्यालय का घेराव किया था।
किसानों के इस प्रदर्शन के पीछे थे कांग्रेस नेता भूपेश बघेल और एसडीएम थीं सौम्या चौरसिया। सौम्या चौरसिया ने उस समय अपना अनुभव साझा करते हुए यह इच्छा जताई थी कि वे जीवन में एक बार दुर्ग ज़िले की कलेक्टर बन कर लौटना चाहती हैं, ताकि कुछ नेताओं को ‘सबक’ सिखाया जा सके।साल 2008 बैच की राज्य प्रशासनिक सेवा की अधिकारी 42 वर्षीय(लगभग) श्रीमती सौम्या चौरसिया कलेक्टर तो नहीं बन पाईं लेकिन 17 दिसंबर 2018 को जब भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, उसके तीसरे ही दिन मुख्यमंत्री सचिवालय में बतौर उप सचिव सौम्या चौरसिया की नियुक्ति का आदेश भी जारी हो गया था।
माना गया कि भूपेश बघेल के विधानसभा क्षेत्र पाटन में एसडीएम और गृह ज़िले दुर्ग में 2011 से 2016 तक विभिन्न पदों पर काम करने के कारण भूपेश बघेल उनसे प्रभावित थे, इसलिए कई शीर्ष अधिकारियों को किनारे करते हुए मुख्यमंत्री सचिवालय में उनकी नियुक्ति की गई थी।राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, “सौम्या चौरसिया ने अपनी नियुक्ति के कुछ ही महीनों के भीतर पूरे मुख्यमंत्री सचिवालय में अपनी ऐसी पकड़ बना ली थी कि उनकी मर्जी के बिना एक चिट्ठी या फ़ाइल तक इधर से उधर नहीं होती थी।वे वरिष्ठ आईएएस और आइपीएस अधिकारियों को निर्देशित करने लगीं थी राज्य के प्रशासनिक और यहां तक कि राजनीतिक फ़ैसलों में भी उनका दख़ल बढ़ता चला गया, वे देखते ही देखते मुख्यमंत्री की सबसे क़रीबी अधिकारी बन गईं थी।उन्हें लेकर आम धारणा भी यही बन गई थी कि वे राज्य की सबसे ताक़तवर अफ़सर हैं।

क्या हैं आरोप

छत्तीसगढ़ के कोरबा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी, तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी सौम्या चौरसिया ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 2008 में राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की।बिलासपुर ज़िले में प्रशिक्षण के बाद 2011 तक उन्हें पेंड्रा और बिलासपुर में एसडीएम के पद पर कामकाज करने का मौका मिला, 2011 में उनका तबादला दुर्ग ज़िले में किया गया, जहां उन्होंने भिलाई और पाटन में एसडीएम का दायित्व संभाला।मार्च 2016 में भिलाई चरौदा नगर निगम की वे पहली आयुक्त बनाई गईं और उसी साल उन्हें रायपुर नगर निगम में अपर आयुक्त के पद पर पदस्थ किया गया, मुख्यमंत्री सचिवालय में पदस्थापना से पहले तक वे इसी पद पर कार्यरत थीं।
छत्तीसगढ़ में विपक्षी दल भाजपा का आरोप था कि सत्ता में कांग्रेस पार्टी की सरकार के आने के कुछ महीनों के भीतर ही कोयला से लेकर आयरन ओर और रेत खदानों से लेकर शराब बिक्री तक में, एक तयशुदा रक़म की वसूली की शुरुआत हुई, जो अरबों में है।
इन्हीं चर्चाओं के बीच फरवरी 2020 में आयकर विभाग ने राज्य में एक साथ कई जगहों पर छापा मारा, जिनमें सौम्या चौरसिया का घर भी शामिल था।
इस कार्रवाई के दौरान अख़बारों ने छापा कि सौम्या चौरसिया के घर से 100 करोड़ से अधिक की नगद रक़म बरामद की गई है।लेकिन आयकर विभाग ने अपना एक बयान जारी करते हुए साफ़ किया था कि राज्य भर में मारे गए इन सभी छापों में 150 करोड़ रुपये की बेनामी लेन-देन के दस्तावेज़ मिले हैं।इसी छापेमारी में मिले दस्तावेज़ों के आधार पर ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, हाईकोर्ट के जज और अन्य अधिकारी, हज़ारों करोड़ के कथित नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले के आरोपियों आईएएस आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा को बचाने के लिए साजिश रच रहे थे।आयकर विभाग के इन दस्तावेज़ों को पढ़ने से सौम्या चौरसिया के प्रभाव का भी अनुमान लगाया जा सकता है।
दिल्ली की एक अदालत में इसी साल मई महीने में आयकर विभाग ने 997 पन्नों का आरोप पत्र पेश किया, इस आरोप पत्र के पृष्ठ क्रमांक 835 में मुख्यमंत्री के एक और करीबी अधिकारी अनिल टूटेजा और सौम्या चौरसिया का कथित वाट्सऐप चैट का स्क्रिन शॉट बताता है कि छत्तीसगढ़ में शीर्षस्थ अधिकारियों की पदस्थापना का फ़ैसला तक, यही दोनों मिल कर ले रहे थे।छापे के इन दस्तावेज़ों के अलावा भी जांच चलती रही और छापों का सिलसिला भी जब प्रवर्तन निदेशालय ने छापामारी की ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरु की तो सौम्या चौरसिया एक बार फिर इस जद में आईं, उनसे कई-कई दिनों तक पूछताछ होती रही।
सौम्या चौरसिया की गिरफ़्तारी के बाद अदालत में ईडी ने अपने आरोप पत्र में कहा था कि राज्य में 500 करोड़ से भी अधिक की अवैध कोयला लेवी की वसूली के पीछे सौम्या चौरसिया हैं। ईडी ने परिजनों के नाम की ज़मीन की ख़रीद-बिक्री में भी करोड़ों रुपये की गड़बड़ी के आरोप लगाए थे।
लेकिन इतना तो तय है कि अभी छत्तीसगढ़ की राजनीति की केंद्र में आ चुकी सौम्या चौरसिया के मुद्दे पर अगले कुछ दिनों तक चौक-चौराहों से लेकर विपक्ष और सत्ता के गलियारे तक, सच, झूठ और अफ़वाहों की शक़्ल में बातें होती रहेंगी।

कौन हैं रानू साहू?

छत्तीसगढ़ में पुर्वर्ती कांग्रेस सरकार की सर्वाधिक महत्वाकांक्षी योजनाएँ कृषि विभाग से जुड़ी रही हैं और गिरफ़्तारी के समय रानू साहू इसी कृषि विभाग की संचालक और छत्तीसगढ़ राज्य मंडी बोर्ड की प्रबंध संचालक थीं।वे निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की विश्वासपात्र अफ़सरों में शुमार रही हैं।रानू साहू छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला के पाण्डुका की रहने वाली हैं।रानू साहू का चयन 2005 में पुलिस उपाधीक्षक के तौर पर हुआ था।2010 में उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की थी और उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला,रानू साहू के पति जयप्रकाश मौर्य भी आईएएस अधिकारी हैं।रानू साहू जून 2021 से जून 2022 तक कोरबा में कलेक्टर थीं,इसके बाद फ़रवरी 2023 तक वे रायगढ़ ज़िले की भी कलेक्टर थीं।दोनों ही ज़िले राज्य में सर्वाधिक कोयला उत्पादन करने वाले ज़िलों में गिने जाते हैं।रानू साहू के पति आईएएस जयप्रकाश मौर्य जून 2021 से भूगर्भ और खनिज विभाग के विशेष सचिव के पद पर कार्यरत थे।पिछले नौ महीनों में रानू साहू के घर और दफ़्तर पर ईडी ने तीन-तीन बार छापामारी की थी और उनसे कई बार पूछताछ की गई।पिछले साल 11 अक्तूबर को जब ईडी ने रानू साहू के रायगढ़ स्थित कलेक्टर निवास पर छापा मारा था तो उनके सरकारी बंगले पर ताला लगा था और उनके अवकाश या दौरे पर होने की कोई अधिकृत सूचना नहीं थी।इसके बाद ईडी ने उनका सरकारी बंगला सील कर दिया था।ईडी को जानकारी मिली थी कि वे इलाज के लिए हैदराबाद में हैं।महीने भर बाद 14 नवंबर को रानू साहू ने अपने रायगढ़ लौटने की सूचना ईडी को दी, जिसके बाद जाँच कार्रवाई शुरू की गई।
माना जा रहा था कि उनकी किसी भी समय गिरफ़्तारी हो सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।पिछले साल कोरबा के पूर्व विधायक और राज्य के पूर्व राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल ने कई अवसरों पर, सार्वजनिक तौर पर रानू साहू पर कथित भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप लगाए।लेकिन मंत्री के आरोपों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और रानू साहू अपने पद पर बनी रहीं।
अब जबकि रानू साहू की गंभीर आरोपों में गिरफ़्तारी हो चुकी है।

25 रुपये से 540 करोड़ की उगाही… छत्तीसगढ़ के कोयला लेवी घोटाले की पूरी कहानी

बताते चलें कि खदान से कोयला उठाना है, उसके लिए डीएम से एनओसी लेनी होगी, लेकिन उसके पहले हमें हर एक टन कोयले पर 25 रुपये चुका दीजिए,इस तरह से ट्रांसपोर्टर्स और कारोबारियों से जबरन वसूली की गई हर दिन दो से तीन करोड़ कमाए ये पैसा राजनेताओं, नौकरशाहों और कारोबारियों में बांटा गया।बस इतनी सी कहानी है छत्तीसगढ़ के कथित कोयला लेवी घोटाले की।इस सिलसिले में  प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने ताबड़तोड़ छापे मारे हैं ये छापे कांग्रेस के कई नेताओं के ठिकानों पर की गई थी ईडी ने जिनके यहां छापेमारी की, उनमें प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल और कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव समेत कई बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं।छत्तीसगढ़ के कोयला लेवी घोटाले का मास्टरमाइंड कारोबारी सूर्यकांत तिवारी है। इस मामले में ईडी ने अब तक सूर्यकांत तिवारी, उसके चाचा लक्ष्मीकांत तिवारी, आईएएस अफसर समीर विश्नोई और कोयला कारोबारी सुनील अग्रवाल समेत 9 लोगों को गिरफ्तार किया है। ऐसे में ये जानना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ का ये पूरा घोटाला क्या है? कैसे 25 रुपये से 540 करोड़ रुपये की उगाही कर ली गई?

क्या है पूरा मामला?

– इसकी कहानी शुरू होती है 15 जुलाई 2020 से,राज्य के भूविज्ञान और खनन विभाग ने खदानों से कोयले के ट्रांसपोर्ट के लिए ई-परमिट की ऑनलाइन प्रक्रिया को संशोधित किया।

– इस नियम से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी एनओसी जारी करना जरूरी हो गया,लेकिन ईडी का दावा है कि इसके लिए कोई एसओपी या प्रक्रिया जारी नहीं की गई।

– एक माइनिंग कंपनी खरीदार के पक्ष में कोल डिलीवरी ऑर्डर (CDO) जारी करती है, जिसे तब कंपनी के पास 500 रुपये प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से बयाना राशि यानी EMD जमा करनी होती है और 45 दिनों के भीतर कोयला उठाना पड़ता है।

– ईडी का दावा है कि नए नोटिफिकेशन ने कथित तौर पर माइनिंग कंपनियों को ट्रांसमिट परमिट के लिए एनओसी लेने के लिए सरकार के पास आवेदन करने को मजबूर कर दिया।

– बगैर एनओसी के परमिट जारी नहीं किया जाता और CDO भी एक्जीक्यूट नहीं होती है।45 दिन के बाद CDO खत्म हो जाएगी और खरीदार की EMD को भी जब्त कर लिया जाएगा।

– ED की जांच में सामने आया कि माइनिंग डिपार्टमेंट की डॉक्यूमेंट प्रोसेस सही नहीं थी. कई जगहों पर सिग्नेचर नहीं थे,नोट शीट नहीं थी,कलेक्टर या डीएमओ की मनमर्जी पर नाममात्र की जांच करवाकर एनओसी जारी कर दी जाती थी।

– ईडी के मुताबिक, 15 जुलाई 2022 के बाद बगैर किसी एसओपी के 30 हजार से ज्यादा एनओसी जारी कर दी गईं। इन और आउट का रजिस्टर भी मेंटेन नहीं किया गया।अफसरों की भूमिका भी साफ नहीं थी,ट्रांसपोर्टर का नाम, कंपनी का नाम भी नहीं था।

– ईडी के मुताबिक, इस पूरे कार्टल को सूर्यकांत तिवारी चलाता था,उसने सीनियर अफसरों की मदद से उगाही का एक नेटवर्क तैयार किया था।

– इसमें हर खरीदार या ट्रांसपोर्ट को डीएम ऑफिस से एनओसी लेने से पहले 25 रुपये प्रति टन के हिसाब से चुकाना पड़ता था।

– इसके लिए उन्होंने कुछ आदमियों को रखा जो इस पैसे को इकट्ठा करते थे,बाद में इन पैसों को किंगपिन, वर्करों, सीनियर आईएएस-आईपीएस अफसरों और राजनेताओं में बांट दिया जाता था।

– ईडी का अनुमान है कि ऐसा करके हर दिन दो से तीन करोड़ रुपये की उगाही की गई, इस मामले में ईडी ने सूर्यकांत तिवारी के चाचा लक्ष्मीकांत तिवारी को गिरफ्तार किया था,लक्ष्मीकांत तिवारी ने कबूल किया है वो हर दिन 1-2 करोड़ रुपये की उगाही करता था।

– ईडी के मुताबिक, इस पूरे खेल में कम से कम 540 करोड़ रुपये की जबरन वसूली की गई।इस मामले में जनवरी 2023 तक ईडी ने आरोपियों की 170 करोड़ की संपत्ति जब्त कर ली थी।

हर चीज का रखा जाता था हिसाब-किताब

– ईडी ने बताया की सूर्यकांत तिवारी ने कोयला ट्रांसपोर्टर्स और कारोबारियों से जबरन पैसे ऐंठने के लिए जमीनी स्तर पर अपनी टीम बना रखी थी।

– उसकी ये टीम निचले स्तर के सरकारी अफसरों और ट्रांसपोर्टर्स और कारोबारियों के बीच को-ऑर्डिनेट किया करती थी।

– चूंकि, उसकी ये टीम पूरे राज्य में फैली थी, इसलिए उन्होंने वॉट्सऐप ग्रुप बना रखे थे,कोल डिलीवरी के ऑर्डर और जबरन वसूली की रकम को एक्सेल शीट में रखा जाता था। इसे सूर्यकांत तिवारी के साथ साझा किया जाता था।

– ईडी का मानना है कि दो साल में 500 करोड़ रुपये से ज्यादा की जबरन वसूली की गई, इसलिए माना जा सकता है कि इसके पीछे उन लोगों का हाथ रहा होगा, जिनके पास राज्य की मशीनरी को कंट्रोल करने की ताकत थी।

क्या हुआ इस पैसे का?

– ईडी के मुताबिक, सूर्यकांत तिवारी के पास से एक डायरी भी मिली है। इस डायरी में उसने लिखा है कि वो कितना पैसा किसे देता था।

– इस डायरी में लिखा है जबरन वसूली से आए 540 करोड़ में से 170 करोड़ रुपयी की बेनामी संपत्ति खरीदी गई।बेनामी संपत्ति यानी किसी दूसरे नाम से संपत्ति खरीदी गई।

– 52 करोड़ रुपये राजनेताओं को दिए गए। 4 करोड़ रुपये छत्तीसगढ़ के विधायकों को दिए गए, 6 करोड़ रुपये पूर्व विधायकों में बांटे गए, इसके अलावा 36 करोड़ रुपये अफसरों में बंटे।

ED ने किन-किनको आरोपी बनाया?

– सूर्यकांत तिवारीः इसे ही पूरे घोटाले का मास्टरमाइंड माना जा रहा है।जबरन वसूली के लिए इसी ने नेटवर्क तैयार किया था।

– सौम्या चौरसियाः छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की डिप्टी सेक्रेटरी, इनकी साढ़े 7 करोड़ से ज्यादा की बेनामी संपत्ति जब्त हो चुकी है।

– लक्ष्मीकांत तिवारीः सूर्यकांत तिवारी के चाचा ने कबूला है कि हर दिन 1-2 करोड़ की उगाही करते थे। सूर्यकांत तिवारी के भाई रजनीकांत तिवारी और मां कैलाश तिवारी भी आरोपी हैं।

– समीर विश्नोईः 2009 बैच के आईएएस अफसर हैं।समीर और उनकी पत्नी के पास 47 लाख कैश और 4 किलो सोने की जवाहरात मिले थे।

– सुनील अग्रवालः इंद्रमाणी ग्रुप के मालिक,कोयला कारोबारी हैं।ईडी के मुताबिक, सूर्यकांत तिवारी के बड़े कारोबारी दोस्त हैं।

इन सबके अलावा माइनिंग अफसर शिव शंकर नाग, संदीप कुमार नायक और राजेश चौधरी भी आरोपी हैं।लक्ष्मीकांत तिवारी के रिश्तेदार मनीष उपाध्याय को भी आरोपी बनाया गया है।


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