प्रकाश कुमार यादव
रायपुर (गंगा प्रकाश)।
आपको बता दें की भारतीय जनता पार्टी एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल है जो भारत को एक सुदृढ़,समृद्ध एवं शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए कृतसंकल्प है। भारत को एक समर्थ राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ भाजपा का गठन 6 अप्रैल, 1980 को नई दिल्ली के कोटला मैदान में आयोजित एक कार्यकर्ता अधिवेशन में किया गया था जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी निर्वाचित हुए थे, अपनी स्थापना के साथ ही भाजपा ने अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं लोकहित के विषयों पर मुखर रहते हुए भारतीय लोकतंत्र में अपनी सशक्त भागीदारी दर्ज की तथा भारतीय राजनीति को एक नए आयाम दिए। कांग्रेस की एकाधिकार वाली एक-दलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के रूप में जानी जाने वाली भारतीय राजनीति को भारतीय जनता पार्टी ने दो ध्रुवीय बनाकर एक गठबंधन-युग के सूत्रपात में अग्रणी भूमिका निभाई है। देश में विकास आधारित राजनीति की नींव भी भाजपा ने विभिन्न राज्यों में सत्ता में आने के बाद तथा पूरे देश में भाजपा नीत राजग शासन के दौरान रखी। आज लगभग चार दशक बाद प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किसी एक पार्टी को देश की जनता ने पूर्ण बहुमत दिया है तथा भारी बहुमत से भाजपा नीत राजग सरकार केन्द्र में विद्यमान है।हालांकि भारतीय जनता पार्टी का गठन 6 अप्रैल, 1980 को हुआ, परन्तु इसका इतिहास भारतीय जनसंघ से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति तथा देश विभाजन के साथ ही देश में एक नई राजनीतिक परिस्थिति उत्पन्न हुई। मोहन दास करमचंद गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर देश में एक नया राजनीतिक षड्यंत्र रचा जाने लगा। सरदार पटेल के देहावसान के पश्चात् कांग्रेस में नेहरू का अधिनायकवाद प्रबल होने लगा। गांधी और पटेल दोनों के ही नहीं रहने के कारण कांग्रेस ‘नेहरूवाद’ की चपेट में आ गई तथा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा पर लापरवाही, राष्ट्रीय मसलों जैसे कश्मीर आदि पर घुटनाटेक नीति,अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारतीय हितों की अनदेखी आदि अनेक विषय देश में राष्ट्रवादी नागरिकों को उद्विग्न करने लगे। ‘नेहरूवाद’ तथा पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर भारत के चुप रहने से क्षुब्ध होकर डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ स्वयंसेवकों ने भी प्रतिबंध के दंश को झेलते हुए महसूस किया कि संघ के राजनीतिक क्षेत्र से सिद्धांततः दूरी बनाये रखने के कारण वे अलग-थलग तो पड़े ही, साथ ही संघ को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता देश में महसूस की जाने लगी। फलतः भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर, 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में हुई।
भारतीय जनसंघ ने डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी के नेतृत्व में कश्मीर एवं राष्ट्रीय अखंडता के मुद्दे पर आंदोलन छेड़ा तथा कश्मीर को किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार देने का विरोध किया। नेहरू के अधिनायकवादी रवैये के फलस्वरूप डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां उनकी रहस्यपूर्ण स्थिति में मृत्यु हो गई। एक नई पार्टी को सशक्त बनाने का कार्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गया। भारत-चीन युद्ध में भी भारतीय जनसंघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेहरू की नीतियों का डटकर विरोध किया। 1967 में पहली बार भारतीय जनसंघ एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में भारतीय राजनीति पर लम्बे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, जिससे कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय हुई।

भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय

सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निरंकुश होती जा रही कांग्रेस सरकार के विरूद्ध देश में जन-असंतोष उभरने लगा। गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन के साथ बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हो गया। कांग्रेस ने इन आंदोलनों के दमन का रास्ता अपनाया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया तथा देशभर में कांग्रेस शासन के विरूद्ध जन-असंतोष मुखर हो उठा। 1971 में देश पर भारत-पाक युद्ध तथा बांग्लादेश में विद्रोह के परिप्रेक्ष्य में बाह्य आपातकाल लगाया गया था जो युद्ध समाप्ति के बाद भी लागू था। उसे हटाने की भी मांग तीव्र होने लगी। जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने जनता की आवाज को दमनचक्र से कुचलने का प्रयास किया। परिणामत: 25 जून, 1975 को देश पर दूसरी बार आपातकाल भारतीय संविधान की धारा 352 के अंतर्गत ‘आंतरिक आपातकाल’ के रूप में थोप दिया गया। देश के सभी बड़े नेता या तो नजरबंद कर दिये गए अथवा जेलों में डाल दिए गये। समाचार पत्रों पर ‘सेंसर’ लगा दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक राष्ट्रवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हजारों कार्यकर्ताओं को ‘मीसा’ के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। देश में लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगा। जनसंघर्ष को तेज किया जाने लगा और भूमिगत गतिविधियां भी तेज हो गयीं। तेज होते जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी, 1977 को लोकसभा भंग कर दी तथा नये जनादेश प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर एक नये राष्ट्रीय दल ‘जनता पार्टी’ का गठन किया गया। विपक्षी दल एक मंच से चुनाव लड़े तथा चुनाव में कम समय होने के कारण ‘जनता पार्टी’ का गठन पूरी तरह से राजनीतिक दल के रूप में नहीं हो पाया। आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई तथा ‘जनता पार्टी’ एवं अन्य विपक्षी पार्टियां भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। पूर्व घोषणा के अनुसार 1 मई, 1977 को भारतीय जनसंघ ने करीब 5000 प्रतिनिधियों के एक अधिवेशन में अपना विलय जनता पार्टी में कर दिया।

भाजपा का गठन

जनता पार्टी का प्रयोग अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। दो-ढाई वर्षों में ही अंतर्विरोध सतह पर आने लगा। कांग्रेस ने भी जनता पार्टी को तोड़ने में राजनीतिक दांव-पेंच खेलने से परहेज नहीं किया। भारतीय जनसंघ से जनता पार्टी में आये सदस्यों को अलग-थलग करने के लिए ‘दोहरी-सदस्यता’ का मामला उठाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध रखने पर आपत्तियां उठायी जानी लगीं। यह कहा गया कि जनता पार्टी के सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं बन सकते। 4 अप्रैल, 1980 को जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति ने अपने सदस्यों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य होने पर प्रतिबंध लगा दिया। पूर्व के भारतीय जनसंघ से संबद्ध सदस्यों ने इसका विरोध किया और जनता पार्टी से अलग होकर 6 अप्रैल, 1980 को एक नये संगठन ‘भारतीय जनता पार्टी’ की घोषणा की। इस प्रकार भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई।भारतीय जनता पार्टी एक सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु निरंतर सक्रिय है। पार्टी की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की है जो आधुनिक दृष्टिकोण से युक्त एक प्रगतिशील एवं प्रबुद्ध समाज का प्रतिनिधित्व करता हो तथा प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति तथा उसके मूल्यों से प्रेरणा लेते हुए महान ‘विश्वशक्ति’ एवं ‘विश्व गुरू’ के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हो। इसके साथ ही विश्व शांति तथा न्याययुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए विश्व के राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखे।
भाजपा भारतीय संविधान में निहित मूल्यों तथा सिद्धांतों के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित राज्य को अपना आधार मानती है। पार्टी का लक्ष्य एक ऐसे लोकतान्त्रिक राज्य की स्थापना करना है जिसमें जाति, सम्प्रदाय अथवा लिंगभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय, समान अवसर तथा धार्मिक विश्वास एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो।भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म-मानवदर्शन’ को अपने वैचारिक दर्शन के रूप में अपनाया है। साथ ही पार्टी का अंत्योदय, सुशासन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास एवं सुरक्षा पर भी विशेष जोर है। पार्टी ने पांच प्रमुख सिद्धांतों के प्रति भी अपनी निष्ठा व्यक्त की, जिन्हें ‘पंचनिष्ठा’ कहते हैं। ये पांच सिद्धांत (पंच निष्ठा) हैं-राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय अखंडता, लोकतंत्र, सकारात्मक पंथ-निरपेक्षता (सर्वधर्मसमभाव), गांधीवादी समाजवाद (सामाजिक-आर्थिक विषयों पर गाँधीवादी दृष्टिकोण द्वारा शोषण मुक्त समरस समाज की स्थापना) तथा मूल्य आधारित राजनीति।
श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अपनी स्थापना के साथ ही भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गई। बोफोर्स एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पुनः गैर-कांग्रेसी दल एक मंच पर आये तथा 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। वी.पी. सिंह के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया। इसी बीच देश में राम मंदिर के लिए आंदोलन शुरू हुआ। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए रथयात्रा शुरू की। राम मंदिर आन्दोलन को मिले भारी जनसमर्थन एवं भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर आडवाणी जी की रथयात्रा को बीच में ही रोक दिया गया। फलतः भाजपा ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। और वी.पी. सिंह सरकार गिर गई तथा कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बने। आने वाले आम चुनावों में भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ता गया। इसी बीच नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस तथा कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकारों का शासन देशपर रहा, जिस दौरान भ्रष्टाचार, अराजकता एवं कुशासन के कईं ‘कीर्तिमान’ स्थापित हुए।1996 के आम चुनावों में भाजपा को लोकसभा में 161 सीटें प्राप्त हुईं। भाजपा ने लोकसभा में 1989 में 85, 1991 में 120 तथा 1996 में 161 सीटें प्राप्त कीं। भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा सरकार ने 1996 में शपथ ली, परन्तु पर्याप्त समर्थन के अभाव में यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई। इसके बाद 1998 के आम चुनावों में भाजपा ने 182 सीटों पर जीत दर्ज की और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने शपथ ली। परन्तु जयललिता के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के कारण सरकार लोकसभा में विश्वासमत के दौरान एक वोट से गिर गई, जिसके पीछे वह अनैतिक आचरण था, जिसमें उड़ीसा के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिररिधर गोमांग ने पद पर रहते हुए भी लोक सभा की सदस्यता नहीं छोड़ी तथा विश्वासमत के दौरान सरकार के विरूद्ध मतदान किया। कांग्रेस के इस अवैध और अनैतिक आचरण के कारण ही देश को पुनः आम चुनावों का सामना करना पड़ा। 1999 में भाजपा 182 सीटों पर पुनः विजय मिली तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 306 सीटें प्राप्त हुईं। एक बार पुनः श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा-नीत राजग की सरकार बनी।भाजपा-नीत राजग सरकार ने श्री अटल बिहारी के नेतृत्व में विकास के अनेक नये प्रतिमान स्थापित किये। पोखरण परमाणु विस्फोट, अग्नि मिसाइल का सफ़ल प्रक्षेपण, कारगिल विजय जैसी सफलताओं से भारत का कद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ऊंचा हुआ। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य में नयी पहल एवं प्रयोग, कृषि, विज्ञान एवं उद्योग के क्षेत्रों में तीव्र विकास के साथ-साथ महंगाई न बढ़ने देने जैसी अनेकों उपलब्धियां इस सरकार के खाते में दर्ज हैं।भारत-पाक संबंधों को सुधारने, देश की आंतरिक समस्याओं जैसे नक्सलवाद, आतंकवाद, जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तर पूर्व के राज्यों में अलगाववाद पर कईं प्रभावी कदम उठाए गये। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सुदृढ़ कर सुशासन एवं सुरक्षा को केन्द्र में रखकर देश को समृद्ध एवं समर्थ बनाने की दिशा में अनेक निर्णायक कदम उठाये गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राजग शासन ने देश में विकास की एक नई राजनीति का सूत्रपात किया।
आज वर्तमान समय में भाजपा देश में एक प्रमुख राष्ट्रवादी शक्ति के रूप में उभर चुकी है एवं देश के सुशासन, विकास, एकता एवं अखंडता के लिए कृतसंकल्प है।
10 साल पार्टी ने विपक्ष की सक्रिय और शानदार भूमिका निभाई। 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी, जो आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ की उद्घोषणा के साथ गौरव सम्पन्न भारत का पुनर्निर्माण कर रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा लगभग 11 करोड़ सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गयी है।26 मई, 2014 को श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की। मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने कम समय में ही अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने विश्व में भारत की गरिमा को पुन:स्थापित किया, राजनीति पर लोगों के विश्वास को फिर से स्थापित किया। अनेक अभिनव योजनाओं के माध्यम से नए युग की शुरुआत की। अन्त्योदय, सुशासन, विकास एवं समृद्धि के रास्ते पर देश बढ़ चला है। आर्थिक और सामाजिक सुधार सुरक्षित जीवन जीने का मार्ग उपलब्ध करा रहे हैं। किसानों के लिये ऋण से लेकर खाद तक की नयी नीतियां जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, आदि ने कृषि के तीव्र विकास की अलख जगायी है। ये नया युग है सुशासन का। चाहे आदर्श ग्राम योजना हो, स्वच्छता अभियान या फिर योग के सहारे भारत को स्वथ्य बनाने का अभियान, इन सभी कदमों से देश को एक नयी ऊर्जा मिली है। भाजपा की मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’, अमृत मिशन, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं से भारत को आधुनिक और सशक्त बनाने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है। जनधन योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी अनेक योजनाएं देश में एक नयी क्रांति का सूत्रपात कर रही हैं। भाजपा सरकार ने देशवासियों को विश्व की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना का उपहार दिया है।

भारतीय राजनीति में भाजपा का योगदान

राष्ट्रीय अखण्डता, कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय, कबाइली वेश में पाकिस्तानी आक्रमण के प्रतिकार, परमिट व्यवस्था एवं धारा 370 की समाप्ति व पृथकतावाद से निरन्तर संघर्ष करने वाली एकमात्र पार्टी भारतीय जनसंघ या भाजपा है, अन्यथा कश्मीर का बचना कठिन था।गोवा मुक्ति आंदोलन, सत्याग्रह एवं बलिदान। बहुत दबाव के बाद ही सरकार ने सैनिक कार्यवाही की।बेरुबाड़ी एवं कच्छ समझौते हमारी राष्ट्रीय अखण्डता के लिए चुनौती थे। भाजपा ने इस चुनौती का सामना किया।आज भी देश में राष्ट्रीय अखण्डता के मुद्दे उठाना पृथकतावाद से जूझना एवं इस निमित्त समाज को निरन्तर जाग्रत रखने का काम भाजपा ही कर रही है।देश को परमाणु शक्ति सम्पन्न कर भारत पर हमलों की हिमाकत करने वालों को अटलजी की सरकार ने सीधा संदेश दिया था।किंतु अब सत्ता की चाह में भाजपा में कोई नियम नहीं रहा हैं। अब जैसा भी हो जो भी हो भाजपा को हर हाल में सत्ता चाहिए।जिसके लिए चाहें उसे अपने ही नियम क्यों ना तोड़ना पड़े?

सत्ता की चाह में अपने ही नियम और कायदे तोड़ी भाजपा?

पंद्रह सालों तक सत्ता में रहने के बाद पांच साल विपक्ष में रही भाजपा छत्तीसगढ़ में अपनी वापसी के लिए बेचैन है। जीत की चाह इस कदर है कि इसके लिए भाजपा ने अपने ही बनाए कायदों से किनारा कर लिया है। भाजपा की दोनों सूची में अब तक कुल 85 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान हो चुका है। अब तक घोषित उम्मीदवारों की सूची देखकर ये साफ पता चलता है कि भाजपा ने टिकट देने के लिए अपने ही बनाये हुए किसी भी अघोषित नियम का पालन नहीं किया है। इस सूची में परिवारवाद, भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे, कांग्रेस और जोगी कांग्रेस से आने वाले नेताओं को भी टिकट दी गई है। यही नहीं अपनी ही पार्टी से बगावत कर पिछले चुनाव में अपने ही उम्मीदवारों को हराने वाले, 80 साल के उम्र के करीब पहुंचने वाले नेताओं को भी टिकट देकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि उसका लक्ष्य सिर्फ जीत है। तमाम सर्वे की बात कही गई। ये भी कहा गया कि टिकट बंटवारे में सिर्फ आलाकमान की चलेगी और किसी की नहीं। लेकिन दोनों सूची देखकर साफ पता चलता है कि भाजपा हाईकमान के बाद टिकट बंटवारे में पूरी तरह पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की चली है। रमन सिंह के अलावा अन्य नेताओं को भी न पूरी तवज्जो दी गई है और न नजरअंदाज किया गया है।

उम्र का पैमाना नजरअंदाज

भाजपा द्वारा बार-बार ये कहा जा रहा था कि 75 साल की उम्र के बाद किसी को टिकट नहीं मिलेगी। लेकिन कद्दावर नेता ननकीराम कंवर पर 77 की उम्र में फिर से पार्टी ने दांव खेला है। ननकीराम कंवर को फिर से रामपुर से मैदान में उतारा है। उनकी जीत सुनिश्चित मान रही भाजपा ने उम्र के अपने अलिखित कायदे को नजरअंदाज कर दिया है।

परिवारवाद के लिए मूंदी आंखें

परिवारवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करने वाली भाजपा ने जूदेव परिवार से आने वाले प्रबल प्रताप सिंह जूदेव को कोटा से और संयोगिता सिंह जूदेव को चंद्रपुर से मौका दिया गया है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के भांजे विक्रम सिंह को खैरागढ से टिकट दिया गया है।

जीत के लिए हारे हुए पर बाजी तो उतारे पैरासूट?

इसी तरह भाजपा के तमाम नेता ये कहते रहे कि चेहरे नए होंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, पार्टी ने इस बार 42 पुराने प्रत्याशियों को फिर से टिकट दिया है। इसमें से 15 ऐसे प्रत्याशी हैं, जो 2018 में हार चुके हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में पाटन से हारे मोतीलाल साहू को इस बार रायपुर ग्रामीण से टिकट दी गई है। खरसिया में हार का सामना करने वाले ओपी चौधरी को इस बार रायगढ़ से मैदान में उतारा गया है। इसी तरह कटघोरा में चुनाव हारने वाले लखनलाल देवांगन को इस बार कोरबा से टिकट दी गई है। नवागढ़ से दयालदास बघेल, बीजापुर से महेश गागड़ा, अंतागढ़ से विक्रम उसेंडी, रायपुर पश्चिम से राजेश मूणत, बिलासपुर से अमर अग्रवाल, बैकुंठपुर से भैयालाल राजवाड़े, मनेंद्रगढ़ से श्यामलाल जायसवाल, भिलाईनगर से प्रेमप्रकाश पांडेय, नारायणपुर से केदार कश्यप और कोंडागंव से लता उसेंडी को टिकट दी गई है। ये वही उम्मीदवार हैं, जो इन्हीं सीटों पर 2018 में हार का मुंह देख चुके हैं। हालांकि 2018 में भी भाजपा ने 52 पुराने प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा था, जिनमें 16 हारे हुए प्रत्याशी मैदान में थे। इससे पहले 2013 में जिन पुराने प्रत्याशियों को पार्टी ने टिकट दिया था, उसमें से 21 जीतकर आए थे।

पार्टी में आते ही मिल गई टिकट

भाजपा ने कुछ दिनों पहले भाजपा का दामन थामने वाले छत्तीसगढ के हीरो पद्मश्री अनुज शर्मा को भाजपा ने घरसीवा से चुनावी मैदान में उतारा है। यहां से ब्राह्मण को साधने की कोशिश की गई है। हालांकि अनुज शर्मा काफी समय से बीजेपी के साथ नजर आ रहे थे। इसी तरह लोरमी से पहले कांग्रेस और फिर जोगी कांग्रेस से विधायक रहे। फिर जोगी कांग्रेस में विधायक दल के नेता रहे धर्मजीत सिंह ने ऐन चुनाव के पहले हाथ में कमल ले लिया। अब पार्टी ने तखतपुर से उन पर दांव लगाया है। अफसरी छोड़कर भाजपा का झंडा उठाने वाले नीलकंठ टेकाम को भी पार्टी ने टिकट से नवाजा है। वहीं राजिम विधान सभा से हर चुनाव अलग पार्टी के कार्यकर्ता रहे रोहित साहू जो कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस से जोगी कांग्रेस से ही भाजपा में आए हैं और उन्हें टिकट मिल गई है। रायपुर ग्रामीण से मोतीलाल साहू भी कांग्रेस से बीजेपी में आए हैं जिन्होंने ने वर्ष 2009 में महासमुंद लोकसभा सीट से कांग्रेस से भाजपा के चंदूलाल साहू के विरुद्ध चुनाव लडा था जिसमे भाजपा के चंदूलाल साहू की जीत हुई थी।और पाटन से मुख्यमंत्री के खिलाफ उतारे गए बीजेपी के उम्मीदवार विजय बघेल भी कभी कांग्रेस में थे।

पांच सीटों पर सबकी नजर

भाजपा ने 90 में से 85 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए हैं। लेकिन 5 सीटों पर उसका पेंच फंस गया है। पार्टी ने पांच सीटों अंबिकापुर, बेलतरा, बेमेतरा, कसडोल और पंडरिया के प्रत्याशी घोषित नहीं किए है। कयास लगाए जा रहे हैं कि टिकट किसे मिलेगी? फार्मूला क्य़ा होगा? लेकिन अब तक की दोनों सूची देखकर साफ है कि बीजेपी का लक्ष्य जीत है, चाहे उसके लिए उसके अपने नियम-कायदे की बलि क्यों न चढ़ानी पड़े? जाहिर है पार्टी की तीसरी सूची में भी सिर्फ जीत का समीकरण काम करेगा।

2 संभागों में रहेगी कांटे की टक्कर; जो जीता वही ‘सिकंदर’,भाजपा-कांग्रेस ने झौंकी ताकत

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव को लेकर आज सोमवार को चुनावी बिगुल बज चुका है। ऐसे में प्रदेश के दो महत्वपूर्ण संभागों यानी सरगुजा और बस्तर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर रहेगी। इस बार के चुनाव में जहां कांग्रेस के सामने सरकार बचाने की चुनौती रहेगी।छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव को लेकर आज सोमवार को चुनावी बिगुल बज चुका है। दो चरणों में चुनाव कराए जाएंगे। 7 नवंबर को पहला चरण और 17 नवंबर को दूसरे चरण में चुनाव कराए जाएंगे। वहीं 3 दिसंबर को मतगणना होगी। ऐसे में प्रदेश के दो महत्वपूर्ण संभागों यानी सरगुजा और बस्तर में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर रहेगी। इस बार के चुनाव में जहां कांग्रेस के सामने सरकार बचाने की चुनौती रहेगी। वहीं बीजेपी एक बार फिर राज्य की सत्ता में आने की पूरजोर कोशिश करेगी। भाजपा ने छत्तीसगढ़ के लिए 21 उम्मीदवारों का एलान 17 अगस्त को कर चुकी है। फिलहाल इन 21 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है।
छत्तीसगढ़ में बसपा ने 8 अगस्त को 9 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी की थी। इसके बाद बीजेपी ने 17 अगस्त को 21 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी की थी। छत्तीसगढ़ आम आदमी पार्टी ने अपने प्रत्याशियों की पहली सूची 8 सितंबर और दूसरी 2 अक्टूबर को जारी की थी। पहली सूची में जहां 10 प्रत्याशियों को टिकट दिया था। वहीं दूसरी सूची में 12 प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा है। इस तरह से आप ने अब तक कुल 22 प्रत्याशियों को चुनावी रण में उतार चुकी है। वहीं राज्य में सत्ता पर आसीन कांग्रेस ने अभी तक अपने प्रत्याशियों की लिस्ट जारी नहीं की है। ऐसे में कयास लगाया जा रहा है कि कांग्रेस जल्द ही अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर सकती है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ के सियासी समीकरण की बात करें तो इस वक्त 90 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 71, भाजपा के 15, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के 4 और बसपा 1 एक विधायक हैं।

सरगुजा संभाग का राजनीतिक समीकरण; कांग्रेस का मजबूत किला है सरगुजा?3 चुनाव में बीजेपी का नहीं खुला खाता

6 जिलों वालें सरगुजा संभाग में कुल 14 विधानसभा सीटें हैं। संभाग के 6 जिलों में सरगुजा, कोरिया, रामानुजगंज- बलरामपुर, सूरजपुर, जशपुर, मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर शामिल हैं। इन जिलों की अधिकांश आबादी आदिवासी है। इन्हीं आदिवासी वोटर्स को कांग्रेस और बीजेपी दोनों साधने की कोशिश में लगी हैं। दोनों ही आदिवासी हितैषी होने का दावा करते हुए वोट मांग रही हैं।
बात वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव की करें, सरगुजा संभाग की 14 की 14 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। यहीं से काग्रेस छत्तीसगढ़ की सत्ता की चाबी खुलती है। कांग्रेस को सुरगजुा के बाद बस्तर से बड़ी जीत मिली थी। और 15 साल का कांग्रेस का वनवास खत्म हुआ था।  2018 में सरगुजा में बीजेपी का सुपड़ा ही साफ हो गया था। टीएस सिंहदेव की वजह से निर्णायक जीत मिली थी क्योंकि वहीं घोषण पत्र तैयार किए थे। संभाग की जनता उन्हें सीएम मानकर चल रही थी क्योंकि साल 2018 में प्रदेश में सीएम का कोई चेहार घोषित नहीं था। संभाग में बाबा का वर्चस्व हार जीत तय करता है। छत्तीसगढ़ विधानसभा की 90 सीटों में सरगुजा संभाग की 14 सीटें काफी अहम है। यहां की 14 में से 9 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। साल 2013 के विधानसभा चुनावों में 7 सीटों पर बीजेपी का कब्जा था और 7 सीटों पर कांग्रेस आसीन थी। यानी 2018 के चुनाव में बीजेपी को यहां काफी नुकसान उठाना पड़ा।

सरगुजा संभाग आदिवासी बहुल्य जिला है, यहां के 6 जिलों में 14 विधानसभा सीट हैं, इन 14 सीटों में 9 सीट आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं और महज 5 सीट सामान्य वर्ग के लिए हैं। इन सभी 14 सीट में पिछले चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की थी, जिनमें से तीन विधायक को भूपेश कैबिनेट में जगह मिली थी। जिसमें दो आरक्षित वर्ग की सीट से विधायक बने थे और एक सामान्य सीट से कैबिनेट मंत्री बने थे। फिलहाल आरक्षित वर्ग से अमरजीत भगत ही कैबिनेट मंत्री हैं। कुछ दिन पहले डॉ प्रेमसाय सिंह को पार्टी हाईकमान के आदेश पर इस्तीफा दे दिए थे। सरगुजा संभाग की 14 सीटें छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी खोलती हैं। जिसकों  यहां से बढ़त मिली समझो उसकी सरकार यहां बनना तय माना जाता है।

2018 में भाजपा को 7 सीटों पर मिली हार

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 में भाजपा को जिन 7 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। उनमें  5 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी। ये सीटें भरतपुर सोनहत, जशपुर, कुनकुरी, पत्थलगांव, प्रतापपुर हैं। 2 सामान्य सीटें मनेंद्रगढ़ और बैकुंठपुर में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था।

सरगुजा संभाग में 6 जिले

सरगुजा
कोरिया
रामानुजगंज-बलरामपुर
सूरजपुर
जशपुर
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर

सरगुजा संभाग में 14 विधानसभा सीटें
अंबिकापुर
लुंड्रा
प्रतापपुर
सीतापुर
सामरी
रामानुजगंज
प्रेम नगर
भटगांव
बैकुंठपुर
भरतपुर-सोनहत
मनेंद्रगढ़
जशपुर
कुनकुरी
पत्थलगांव

सरगुजा संभाग में बीजेपी-कांग्रेस को अब तक मिली सीटें

वर्ष       भाजपा      कांग्रेस
2003      10       04

2008     09       05

2013      07      07

2018      0       14

विधानसभा सीटों का गणित

छत्तीसगढ़ में विधानसभा सीटों की बात करें तो छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटें हैं, इसमें से 39 सीटें आरक्षित है, 29 अनुसूचित जनजाति (एसटी) और 10 अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित हैं। 51 सीट सामान्य है। प्रदेश की कुल आबादी में 32 फीसदी आदिवासी वर्ग यानी की अनुसूचित जनजाति से है। 13 फीसदी आबादी एससी यानी की अनुसूचित जाति वर्ग से आती है और सबसे बड़ा जनाधार जो की 47 फीसदी है वह ओबीसी वर्ग से है।

बस्तर संभाग का राजनीतिक समीकरण

अब बात बस्तर संभाग के सियासी गणित की करें तो आदिवासी बहुल बस्तर संभाग में कुल 7 जिले हैं। 7 जिलों के संभाग में यहां छत्तीसगढ़ की 12 विधानसभा और 1 लोकसभा सीट है। बस्तर संभाग की 12 विधानसभा सीटों में 11 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) और एक सीट सामान्य है। इनमें बस्तर, कांकेर, चित्रकोट, दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंटा, केशकाल, कोंडागांव, नारायणपुर, अंतागढ़, भानुप्रतापपुर की सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। वहीं जगदलपुर विधानसभा सीट सामान्य है। 12 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को यहीं से करारी हार का सामना करना पड़ा था और सत्ता गंवानी पड़ी थी। राजनीतिक दृष्टिकोण से बस्तर संभाग काफी अहम माना जाता है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी बस्तर से खुलती है। इसलिए माना जाता है कि अगर छत्तीसगढ़ में सरकार बनानी है, तो बस्तर किला पर फतह हासिल करना बहुत जरूरी है। प्रदेश में कुल 90 विधानसभा सीट हैं, जिनमें से 29 सीटें आदिवासियों के लिए सुरक्षित हैं और 29 में से 12 सीटें बस्तर संभाग से आती हैं। 15 साल तक सत्ता पर काबिज रही बीजेपी को साल 2018 में यही से करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था, इसलिए बीजेपी में सत्ता पाने की बैचेनी है। बस्तर में बीजेपी प्रदेश प्रभारी ओपी माथुर समेत पार्टी के कई दिग्गज नेता दौरा कर चुके हैं और कर रहे हैं। बस्तर में पीएम मोदी, प्रियंका गांधी और सीएम अरविंद केजरीवाल और पंजाब के सीएम भगवंत मान बस्तर का चुनावी दौरा कर चुके हैं।

भाजपा के झांसे में नहीं आएंगे छत्तीसगढ़ के किसान?

बताते चले की कांग्रेस की भूपेश सरकार में छत्तीसगढ़ के किसानों को 2800 से 3600 रु. प्रति क्विंटल धान की क़ीमत मिलेगा। इसी को रोकने भाजपा के छत्तीसगढ़ के नेता केंद्र सरकार के माध्यम से राज्य की धान खरीदी बंद करवाना चाहते हैं। केंद्र ने राज्य से चावल लेने के कोटे में कटौती करती हैं, 86 लाख टन को घटा कर 61 लाख कर दिया। बारदाना में भी कटौती कर दिया, राज्य के भाजपा नेता इस पर राज्य की बजाय केंद्र का पक्ष ले रहे हैं। राज्य के खिलाफ झूठ बोल रहे हैं। छत्तीसगढ़ का किसान भारतीय जनता पार्टी के झूठ, भ्रम और छलावे में नहीं आने वाला है, भूपेश सरकार में छत्तीसगढ़ के किसानों को धान की कीमत वायदे से ज्यादा मिल रहा है, आगे और ज्यादा की उम्मीद भी किसानों को भूपेश सरकार से ही राजीव गांधी किसान न्याय योजना की इनपुट सब्सिडी की राशि को मिलाकर पिछले खरीफ सीजन में धान का प्रतिफल छत्तीसगढ़ के किसानों को 2640 और 2660 रूपए प्रति क्विंटल मिला है जो देशभर में सर्वाधिक है। कोदो 3000 रूपए प्रति क्विंटल, कुटकी 3100 और रागी की खरीदी 3578 रूपए प्रति क्विंटल की दर पर केवल छत्तीसगढ़ में ही हुई है। छत्तीसगढ़ का किसान यह मान चुका है कि कांग्रेस सरकार में आने वाले समय में धान की कीमत यह 2800 रु. से, 3600 रू. प्रति क्विंटल तक मिलेगा। भाजपा के 2183 पर भी छत्तीसढ़ के किसानों को भरोसा नहीं है, किसान यह समझ चुके हैं कि धान और किसान भारतीय जनता पार्टी के लिए केवल चुनावी लिहाज से ही जरूरी है।
15 साल रमन राज में छत्तीसगढ़ के किसानों को लगातार ठगा गया, बोनस के नाम पर वादाखिलाफ़ी की गई। चुनावी साल को छोड़कर कभी बोनस नहीं दिया गया। पीसीसी चीफ ने कहा कि छत्तीसगढ़ के किसान यह समझ चुके हैं कि कैसे चुनाव करीब आते ही भाजपाई किसान हितैषी होने का ढोंग करने लगते हैं। रमन राज के कुशासन और वादाखिलाफी के साथ ही मोदी सरकार के झूठे वादे और जुमले भी किसानों को याद है। 2014 में वादा किया था भाजपा ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार सी-2 फार्मूले पर 50 प्रतिशत लाभ के साथ एमएसपी देने का, 9 साल हो गए क्या हुआ उस वादे का? 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने का वादा मोदी सरकार ने किया था लेकिन किए उल्टा, कृषि की लागत 3 गुना बढ़ा दी। पोटाश की कीमत 800 से बढ़कर 1700, कीटनाशक के दाम 4 गुना तक बढ़े हैं। ट्रैक्टर और कृषि यंत्रों में 12 से 18 प्रतिशत जीएसटी वसूली जा रही है, कृषि उपकरणों के स्पेयर पार्ट्स में तो 28 परसेंट तक बेरहमी से जीएसटी की वसूली जा रही है। उन्होंने कहा कि यूपीए के दौरान केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने 2004-05 से 2013-14 के बीच धान की एमएसपी में कुल 134 प्रतिशत की वृद्धि किया था, लेकिन मोदी सरकार ने 2003-04 से लेकर खरीफ सीजन 2023-24 के लिए घोषित समर्थन मूल्य अर्थात 10वीं बार में धान के समर्थन मूल्य में कुल वृद्धि मात्र 66.64 प्रतिशत बढाया है, इसका अर्थ साफ है कि मनमोहन सरकार की तुलना में मोदी सरकार में धान की एमएसपी वृद्धि दर आधे से भी कम है। भूपेश सरकार ने तो भाजपाइयों के तमाम अड़ंगेबाजी के बावजूद, बिना किसी भेदभाव के छत्तीसगढ़ के किसानों को अपने संसाधनों से इनपुट सब्सिडी दे रही है और आगे भी देगी। छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार द्वारा भूमिहीन कृषि श्रमिकों के लिए चलाई जाने वाली न्याय योजना का दूसरा उदाहरण देश में नहीं है। छत्तीसगढ़ के अन्नदाता के आशीर्वाद से पुनः भूपेश पर भरोसे की सरकार बनेगी और छत्तीसगढ़ के किसानों को उनकी उम्मीदों से ज्यादा लाभ होगा।

प्रदेश में बिक रही नकली खाद

कांग्रेस और बीजेपी दोनों सरकारों ने छत्तीसगढ़ के किसानों का हक मारा है। उनके अधिकारों को छीना है। शोषण किया है। उन्हें लूटा है। यही वजह है कि आज लगभग 23 साल बाद भी छत्तीसगढ़ के किसान परेशान और त्रस्त हैं। इसका जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस सरकार और बीजेपी है। रमन सिंह ने किसानों को बोनस देने का वादा किया था, लेकिन अंतिम दो सालों का बोनस नहीं दिया। कांग्रेस ने घोषणा पत्र में वादा किया था कि सरकार बनने पर बोनस दिया जाएगा, लेकिन साढ़े चार बाद भी खुद को छत्तीसगढ़िया बताने वाली भूपेश सरकार ने किसानों को बोनस नहीं दिया। ये बातें आम आदमी पार्टी प्रदेश अध्यक्ष कोमल हुपेंडी ने मंगलवार को पार्टी कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहीं।
हुपेंडी ने कहा कि कांग्रेस ने जनघोषणा पत्र में किसानों से वादा किया था कि सिंचाई का रकबा बढ़ाएंगे। आम आदमी पार्टी पूछती है कि प्रदेश के किस कोने में सिंचाई का रकबा बढ़ा गया है। आज आलम यह है कि किसानों के खेतों तक पानी नहीं पहुंच रहा है। किसानों की हितैषी बताने वाली सरकार को पता होना चाहिए कि नवा रायपुर में अपनी मांगों को लेकर लंबे समय तक किसानों ने आंदोलन किया। किसानों का दमन किया गया। एक किसान की मौत हो गई, बावजूद इसके सरकार के तरफ कोई बयान नहीं आया। उन्होंने कहा कि आज किसान परेशान है। फर्टिलाइजर का दाम बढ़ गया। प्रदेश में आज नकली खाद बेचा जा रहा है। आखिरकार किसके संरक्षण में पूरे प्रदेश में नकली खाद बेची जा रही है। वर्मी कंपोस्ट में रेत और मिट्टी मिलाई जा रही है। किसानों के ऊपर दबाव बनाकर जबरन दिया जा रहा है।

किसानों को दोनों पार्टियों ने धोखा किया

प्रदेश के किसानों के साथ दोनों राजनैतिक पार्टियों ने बारी-बारी से धोखा किया। धान खरीदी को राजनैतिक मुद्दा बना दिया गया है। कांग्रेस ने 2018 में छल-कपट और झूठ बोलकर सरकार बनाई। अब फिर विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही अब बीजेपी-कांग्रेस को किसान और धान की याद आ रही है। चुनावी साल होने के नाते दोनों राजनीतिक दल किसानों को लुभाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाह रहे हैं।भूपेश सरकार के गायब राशन की वसूली के लिए सख्ती के सारे दावे खोखले साबित हो रहे हैं। 23 लाख रुपए वसूलने के बाद भी 12 हजार क्विंटल चावल की वसूली नहीं हो पाई। सरकार सिर्फ राशन की वसूली के लिए सख्ती के दावे कर रही है लेकिन यह दावे हकीकत में खोखले हैं।

सिर्फ 64 क्विंटल चावल ही वसूले

रायपुर जिले के 142 राशन दुकानों से गायब हुए 18000 क्विंटल चावल में से सिर्फ 64 क्विंटल चावल ही वसूल सके हैं। इतना ही नहीं 269 क्विंटल शक्कर में से सिर्फ 105 कुंटल की वसूली हुई है। वहीं 303 क्विंटल नमक में से सिर्फ 94 क्विंटल की वसूली हुई है। उन्होंने कहा, करीब 86 क्विंटल का कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला। इस पर राशन दुकान संचालकों को राजस्व विभाग की तरफ से आरआरसी जारी की गई है। आरआरसी जारी तो गई की गई, लेकिन उसके बाद कोई सख्ती नहीं हुई। उन्होंने कहा कि तक गड़बड़ी करने वालों पर आखिरकार कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

WhatsApp Facebook 0 Twitter 0 0Shares
Share.

About Us

Chif Editor – Prakash Kumar yadav

Founder – Gangaprakash

Contact us

📍 Address:
Ward No. 12, Jhulelal Para, Chhura, District Gariyaband (C.G.) – 493996

📞 Mobile: +91-95891 54969
📧 Email: gangaprakashnews@gmail.com
🌐 Website: www.gangaprakash.com

🆔 RNI No.: CHHHIN/2022/83766
🆔 UDYAM No.: CG-25-0001205

Disclaimer

गंगा प्रकाश छत्तीसगढ के गरियाबंद जिले छुरा(न.प.) से दैनिक समाचार पत्रिका/वेब पोर्टल है। गंगा प्रकाश का उद्देश्य सच्ची खबरों को पाठकों तक पहुंचाने का है। जिसके लिए अनुभवी संवाददाताओं की टीम हमारे साथ जुड़कर कार्य कर रही है। समाचार पत्र/वेब पोर्टल में प्रकाशित समाचार, लेख, विज्ञापन संवाददाताओं द्वारा लिखी कलम व संकलन कर्ता के है। इसके लिए प्रकाशक, मुद्रक, स्वामी, संपादक की कोई जवाबदारी नहीं है। न्यायिक क्षेत्र गरियाबंद जिला है।

Ganga Prakash Copyright © 2025. Designed by Nimble Technology

You cannot copy content of this page

WhatsApp us

Exit mobile version