रायपुर(गंगा प्रकाश)।मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कुहासे से धुंध हट चुका है, जैसा कि पहले से अनुमान लगाया जा रहा था कि किसी अप्रत्याशित चेहरा सामने आएगा जिसे मुख्यमंत्री घोषित किया जाएगा। मुख्यमंत्री के कुर्सी दौड़ में लगभग दर्जन भर नाम शामिल था, बहुतों ने तो चाटुकारिता की हदें पार करते हुए अपने अपने हिसाब से मुख्यमंत्री भी चुन लिए थे।राज्य बनते ही आदिवासी समुदाय से मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग उठती रही मगर यह समुदाय विगत दो दशक से छला गया। जबकि सरकार बनाने में प्रमुख भूमिका इसी समुदाय के प्रतिनिधि बस्तर और सरगुजा से आते हैं जिनका एक तिहाई बहुमत रहता है।फिर भी हमेशा से बस्तर और सरगुजा को आला कमान ने ठेंगा दिखाया है। अब यह मिथक टूट चुका है, प्रदेश में मुख्यमंत्री के नाम को लेकर सरगुजा संभाग के तहत कुनकुरी (जशपुर) से मान. विष्णुदेव साय के नाम पर मुहर लग चुका है।
छत्तीसगढ़ राज्योदय के समय से ही प्रदेश को सौगात में मिली नक्सल समस्या को लेकर बस्तर झुलसते आया है। न्याय की आस में बस्तर में लगभग तीन दर्जन से अधिक जगहों पर आंदोलन जारी है। ऐसे में प्रदेश के नए मुख्यमंत्री जो आदिवासी समाज से चुनकर आ रहे हैं क्या बस्तर को लेकर वे इतने संजीदा होंगे या दीगर आदिवासी नेताओं की तरह सिर्फ एक चेहरा-मोहरा ?इस सम्बन्ध में बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला जी लिखते है… “आदिवासी आरक्षण के तहत किसी भी राजनीतिक पार्टी की ओर से जीता हुआ प्रत्याशी आदिवासी समाज को उसके हक और अधिकार नहीं दिला सकता, वे केवल राजनीतिक मोहरे होते हैं, उनकी नकेल कॉर्पोरेट परस्त सरकार के हाथों में होती है जो उन्हें अपने मन मुताबिक नचाते रहता है।सरकार चाहे किसी की भी रहे भाजपा की या कांग्रेस की या कम्युनिस्टों की आदिवासियों को अपने हक की लड़ाई सदियों से संघर्ष के रास्ते ही मिला है और यह संघर्ष लगातार जारी रहेगा। पुरानी सरकार गई, नई सरकार आई ?बस्तर में 35 जगह पर आंदोलन लगातार जारी है कई आंदोलन को 3 साल से ज्यादा हो गए है।दिन भर नारेबाजी, प्रदर्शन, लंबी-लंबी रैलियां और रात में क्रांतिकारी जन गीतों के साथ मनोरंजन और उत्साहवर्धन। अनुशासित ढंग से लंबी लड़ाइयों का रहस्य जानना है तो आपको बस्तर के इन आंदोलन स्थल में आना तो पड़ेगा ही जहां अपने-अपने खर्चे से अपना अपना खाना बना कर लोग अपने सामाजिक और सामूहिक दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं। बेचा घाट आंदोलन के दो वर्ष पूर्ण होने पर आदिवासी क्रांतिकारिर्यों को बधाई। ऊर्जा बनी रहे लड़ाई अभी लंबी लड़नी है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी संस्कृति बनाम धार्मिक रूपांतरण है

पूर्व की सत्तारूढ़ कांग्रेस सांप्रदायिक आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए पूर्व की भूपेश बघेल सरकार द्वारा किए गए कार्यों का राग अलापती रही है,जबकि भाजपा लाल गढ़ में धर्मांतरण को अपना प्रमुख चुनाव बनाते रही है। बस्तर में कांग्रेस का अभियान आदिवासियों से जुड़ने के लिए पिछले पांच वर्षों में पूर्व की भूपेश बघेल सरकार द्वारा किए गए ‘देवगुड़ी’ (आदिवासी गांव के मंदिर) और ‘घोटुल’ (आदिवासियों के सामाजिक-सांस्कृतिक केंद्र) के विकास पर केंद्रित है। वह बेल्ट, जो पिछले चार दशकों से वामपंथी उग्रवाद से जूझते आ रहा है।कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहते है कि आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए बस्तर में ‘देवगुड़ी’ और ‘घोटुल’ के विकास की कल्पना पहली बार भूपेश बघेल सरकार ने की थी।पिछले पांच वर्षों में पूरे बस्तर में 2454 ‘देवगुड़ी’ और ‘घोटुल’ विकसित किए गए हैं।पूर्व कि कांग्रेस सरकार ने बस्तर की प्रत्येक पंचायत को अपने गांवों में ‘देवगुड़ियों’ के जीर्णोद्धार के लिए पांच लाख रुपये का अनुदान भी आवंटित किया है।इसके अलावा हमारी सरकार ने विभिन्न आदिवासी त्योहारों के आयोजन के लिए बस्तर की प्रत्येक पंचायत को 10,000 रुपये का अनुदान भी प्रदान किया है।बस्तर संभाग के अंतर्गत आने वाले सातों जिलों में से प्रत्येक को अपने-अपने क्षेत्रों में ‘देवगुड़ी’ और ‘घोटुल’ के नवीनीकरण के लिए राज्य सरकार द्वारा 19 करोड़ रुपये का फंड आवंटित किया गया है।श्री शुक्ला कहते हैं कि भूपेश बघेल सरकार ने बस्तर के दूरदराज के हिस्सों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने के लिए एक अभिनव योजना, ‘हाट बाजार (ग्राम बाजार) क्लिनिक’ भी शुरू की है।
भाजपा ने राज्य के आदिवासी इलाकों खासकर बस्तर में कथित धर्मांतरण को क्षेत्र के विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनाया है।वंही भाजपा मानती है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों विशेषकर बस्तर में बड़े पैमाने पर अवैध धर्म परिवर्तन हो रहा है, जिससे गांवों का सामाजिक माहौल खराब हो रहा है। स्थिति ऐसी हो गई है कि गांवों में आदिवासी अब अपने रिश्तेदारों के शवों के निपटान को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कई गांवों में आदिवासियों को विशेष समुदाय के सदस्यों से मृतक का अंतिम संस्कार आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार करने या गांव छोड़ने के लिए कहते देखा गया।संयोग से, बस्तर संभाग के पूर्व आयुक्त ने बस्तर में धर्म परिवर्तन की बढ़ती घटनाओं की रिपोर्ट पर जिला कलेक्टरों को सचेत किया था और उनसे इसे रोकने के लिए उपाय करने को कहा था।हाल के दिनों में बस्तर के विभिन्न हिस्सों में धर्मांतरण को लेकर कई हिंसक घटनाएं सामने आईं हैं।

आदिवासियों की ‘घर वापसी’ में जुटा संघ

चौदहवीं शताब्दी में बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव जब पुरी की तीर्थयात्रा से लौटे तो उनके साथ गए आदिवासी पवित्र घोषित कर दिए गए और उन्हें हिंदू समाज में शामिल कर लिया गया।
जब बस्तर के भाजपा सांसद दिनेश कश्यप कुनगुडा गांव में 33 आदिवासी परिवारों के पैर धोकर उनकी ‘घर वापसी’ कर रहे थे, तो पुरुषोत्तम देव की याद अनायास आ गई।छत्तीसगढ में आदिवासियों के कथित जबरन धर्म परिवर्तन और ‘घर वापसी’ को लेकर सडक से लेकर संसद तक बहस लगातार जारी है। इस बहस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इससे जुडे अन्य हिंदू संगठन कहां हैं?दो शक्तियाँ आमने-सामने हैं जिनके बीच लंबे समय से आदिवासी खडे हैं, एक ओर चर्च के पादरी उन्हें प्रभु यीशु की शरण में आने के लिए कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव की पंचायत, आमसभा करके इलाके में हिंदू धर्म के अलावा किसी भी अन्य धर्म के प्रचार को प्रतिबंधित करने का फैसला सुना रही है।कोंडागांव में ढलती हुई सांझ में बुजुर्ग मंसाराम सोरी याद करते हैं साठ का दशक, जब बस्तर के अंतिम राजा प्रवीर चंद भंजदेव की हत्या हुई थी।प्रवीर की लोकप्रियता ऐसी थी कि आदिवासी घरों में उन्हें देवता की तरह पूजा जाता था।मंसाराम कहते हैं- “राजा की हत्या के चार-पांच साल बाद बाबा बिहारीदास आया। कहता था कि वह प्रवीर का अवतार है। हमारे जैसे लोगों ने मान लिया।
इसके बाद जो कुछ हुआ, वह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। बाबा बिहारीदास ऊर्फ कंठीवाले बाबा ने आदिवासियों को तुलसी की कंठीमाला पहनानी शुरू कर दी। मांसाहार और शराब से आदिवासियों को दूर रहने की सलाह दी। गांव के गांव बाबा बिहारीदास के अनुयायी बनने लगे।आज के भारत जन आंदोलन के नेता ब्रह्मदेव शर्मा तब बस्तर के कलेक्टर थे।बाबा बिहारीदास के इस ‘सांस्कृतिक हस्तक्षेप’ से नाराज ब्रह्मदेव शर्मा ने बिहारीदास को जिला बदर कर दिया लेकिन बिहारीदास ऊंची राजनीतिक पहुंच के बल पर बस्तर लौटे और ब्रह्मदेव शर्मा का बस्तर से तबादला हो गया।
बस्तर में बाबा बिहारीदास की तूती बोलने लगी। सात-सात रुपए में आदिवासियों को जनेऊ देकर उन्हें हिंदू यहां तक कि ब्राह्मण बनाने की शुरुआत भी हुई।
1972 के चुनाव में बिहारीदास ने बस्तर की सात सीटों पर कांग्रेस का प्रचार किया और सभी सीटें कांग्रेस को मिलीं। ये और बात है कि 1981 में एक आदिवासी युवती से बलात्कार के आरोप में बिहारीदास उलझे और फिर उनका आधार कमजोर पडता चला गया।

संघ का जिम्मा

बिहारीदास के बाद आदिवासियों के उत्थान और उन्हें हिंदू समाज में शामिल करने का जिम्मा संघ परिवार ने संभाला।गायत्री परिवार, सदाफल आश्रम और ऐसे ही कई संगठन इलाके में सक्रिय हो गए। आज की तारीख में आरएसएस और उससे जुडे हुए कम से कम 27 संगठन बस्तर में सक्रिय हैं।पिछले 50 साल से आदिवासी समाज और संस्कृति का अध्ययन कर रहे निरंजन महावर कहते हैं कि प्रत्येक आदिवासी समाज का अपना धर्म है और वे जीववादी हैं लेकिन उनका हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। बस्तर में संघ और उससे जुडे संगठनों ने उन्हें हिंदू बनाने की लगातार कोशिश की और वे उसमें एक तरह से सफल भी हुए।

संघ की पाठशाला

लेकिन छत्तीसगढ में आरएसएस के कई किस्म के प्रकल्पों में से एक निर्माण प्रकल्प चलाने वाले ब्रजेंद्र शुक्ला का मानना है कि आरएसएस ने मूल रुप से आदिवासियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिये काम किया है। इनमें धर्म कहीं मुद्दा ही नहीं है।
ब्रजेंद्र निर्माण प्रकल्प में लगभग 400 बच्चों की प्रतियोगी परीक्षा की पाठशाला चला रहे हैं। लेकिन क्या यह आदिवासियों के लिये संघ की पाठशाला तो नहीं है?
रजेंद्र कहते हैं कि आदिवासी हिंदू हैं और हमें ऐसा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। यह तो दूसरे धर्म के लोग हैं, जो उन्हें भडका रहे हैं। ऐसे में बस्तर जैसे इलाकों में हमारे लिए जरूरी है कि हम उन्हें अपने घर में वापस लाएँ।
इस ‘घर लाने’ की पूरी प्रक्रिया का असर कोंटा से लेकर केशकाल तक देखा जा सकता है। आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, गायत्री परिवार जैसे हिंदू संगठनों के स्कूलों में पढने वाले बच्चे सुबह से लेकर शाम तक आधा दर्जन बार हिंदू देवी-देवताओं की प्रार्थना करते हैं। उनके नाम अब संस्कृतनिष्ठ होने लगे हैं। गणेश पूजा से लेकर रक्षाबंधन तक का त्यौहार अब गांव-गांव में धूम-धाम से मनाया जाता है।
पत्रकारों का मानना है कि इलाके के आदिवासियों में किसी भी कट्टर हिंदू से भी कहीं अधिक धूम हिंदू त्यौहारों की बनी रहती है। त्यौहार मनाने और दिखाने का चलन बढा है। हिंदू त्यौहारों पर फोटो खिंचवाने के लिये दंतेवाडा शहर आने वाले आदिवासियों की संख्या हर साल बढती जा रही है।
लेकिन सिरिसगुडा ग्राम पंचायत की सरपंच जमुना बघेल इससे सहमत नहीं हैं।हालाँकि जमुना के बजाय सवालों के जवाब उनके पति दलपत बघेल देते हैं, “विश्व हिंदू परिषद या आरएसएस वाले न हों तो ईसाई लोग सारे आदिवासियों को ईसाई बना देंगे। वे लोग तेजी से भोले-भाले आदिवासियों को लोभ-लालच दे कर फंसा रहे हैं और उन्हें ईसाई बना रहे हैं।इससे बचने के लिए सिरिसगुडा पंचायत ने फैसला किया कि गांव में हिंदू धर्म के अलावा दूसरे धर्मों का प्रचार, प्रार्थना सभा एवं धर्म उपदेश देना प्रतिबंधित रहेगा। इस फैसले पर अब छत्तीसगढ हाई कोर्ट में बहस हो रही है।ईसाई धर्म प्रचार करने वाले इवेंजेलिकल फैलोशिप ऑफ इंडिया के मध्यभारत के सचिव अखिलेश एडगर कहते हैं, हमारी जानकारी के अनुसार बस्तर में 52 ग्राम पंचायतों ने इस तरह का फैसला लिया। ईसाई धर्म को मानने वाले आदिवासियों को सस्ता राशन देना बंद किया गया और उनके साथ मारपीट की गई। इन सब बातों की रिपोर्ट भी थाने में दर्ज है।

जरूरत क्यों

लेकिन जब ईसाई धर्मावलंबी बस्तर में शिक्षा और स्वास्थ्य का काम कर रहे हैं तो भला आदिवासियों को ईसाई धर्म में शामिल करने की जरूरत क्यों पडी ?सिरिसगुडा ग्राम पंचायत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने वाले छत्तीसगढ क्रिश्चियन फोरम के महासचिव अरुण पन्ना लाल भोलेपन से कहते हैं, “अगर वो ईसाई धर्म में आते हैं तो भी हम आदिवासियों को उनके अपने धर्म से कभी भी अलग होने के लिये नहीं कहते। हम आरएसएस की तरह नहीं हैं, जो आदिवासियों का धर्म बदल रहे हैं।हालाँकि आरएसएस के एक वरिष्ठ अधिकारी आदिवासियों के धर्म बदलने को सिरे से नकारते हैं। उनका दावा है कि वे तो उन्हें केवल अपने घर वापस ला रहे हैं। उनका घर यानी हिंदू धर्म।

सियासत और आदिवासी

तमाम तरह की सियासत और सरकार की दमनकारी नीतियों के बावजूद हसदेव अरण्य की ग्रामसभाएं बिना निराश और हताश हुए उम्मीद कर रही हैं कि देर से ही, उन्हें न केवल भारत वरन् दुनिया से समर्थन मिलेगा और अंतत: जीत भी संविधान और उसमें लिखी इबारतों की होगी। मध्य भारत का फेफड़ा कहलाए जाने वाले और यहां के सबसे सघन वन हसदेव अरण्य में कोयला खनन को लेकर प्रस्तावित हैरिटेज- दशकों पुराने – वृक्षों की कटाई की मंजूरी दिये जाने के खिलाफ विभिन्न समुदायों व संगठनों के लोग जुटे रहें। यहां राजनीति भी है और नेतागिरी भी। यहां आदिवासी स्वशासन को लेकर कुछ बरस पूर्व की गई पत्थलगढ़ी से फलस्वरुप जन्मा सर्व आदिवासी समाज भी है और राजनीति से उपजा आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ भी। यहां पांचवी अनुसूची और पेसा कानून की बाते भी हैं और आदिवासी बहुल इलाकों में ग्राम पंचायतों में गैर आदिवासी उपसरपंच धेल भी। यहां कैब्रिज में हसदेव अरण्य को लेकर राहुल गांधी की बातों की चर्चा भी है और नेता प्रतिपक्ष रहते हुए भूपेश बघेल द्वारा अब अचानक पलटी मारने की बातें भी।

पहले हसदेव अरण्य के बारे में

हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ के सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा जिले में फैला बहुमूल्य जैव विविधता वाला वन क्षेत्र है। भारतीय वन्य जीव संस्थान ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि हसदेव अरण्य क्षेत्र में नई खदानों को अनुमति दी गई तो उसके भयानक परिणाम होंगे। दो सौ सत्तर पेज की रिपोर्ट में कहा गया कि देश के एक प्रतिशत हाथी छत्तीसगढ़ में हैं। वहीं हाथियों और इंसानों के संघर्ष में 15 प्रतिशत जनहानि केवल छत्तीसगढ़ में होती है। किसी एक स्थान पर कोयला खदान चालू की जाती है तो हाथी वहां से हटने को मजबूर हो जाते हैं। वे दूसरे स्थान पर पहुंचने लगते हैं, जिससे नए स्थान पर हाथी-मानव द्वंद बढ़ता है। ऐसे में हाथियों के अखंड आवास, हसदेव अरण्य कोल फील्ड क्षेत्र में नया खदान खोलने से दूसरे क्षेत्रों में मानव-हाथी द्वंद्व इतना बढ़ेगा कि राज्य को संभालना मुश्किल हो जाएगा। भारतीय वन्य जीव संस्थान ने रिपोर्ट मे कहा है कि इस क्षेत्र में दुर्लभ, संकटग्रस्त और विलुप्तप्राय वन्यप्राणी थे और हैं भी। इस क्षेत्र में पूरे वर्ष भर हाथी रहते हैं। यहां तक कि कोरबा वन मंडल में, हसदेव अरण्य कोल फील्ड क्षेत्र के पास बाघ भी देखा गया है। यह क्षेत्र अचानकमार टाइगर रिजर्व, भोरमदेव वन्यजीव अभ्यारण्य और कान्हा टाइगर रिजर्व से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हसदेव अरण्य कोलफील्ड और उसके आसपास के क्षेत्र में मुख्य रूप से आदिवासी रहते हैं। वे वनों पर बहुत ज्यादा आश्रित हैं। गैर काष्ठ वनोपजों से उनकी मासिक आय का 46 प्रतिशत हिस्सा आता है। इसमें जलाऊ लकड़ी, पशुओं का चारा, औषधीय पौधे और पानी शामिल नहीं है। अगर इनको भी शामिल कर लिया जाए तो कम से कम 60 से 70 प्रतिशत आय वनों से होती है।

एक दशक से आंदोलनरत हैं आदिवासी

गौरतलब है कि यहां के आदिवासियों के लिए हसदेव अरण्य को बचाने की लड़ाई आज की नहीं है। आदिवासी पिछले एक दशक से इस जंगल के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। पिछले साल केंद्र सरकार की मुहर के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने हसदेव अरण्य के परसा कोयला खदान को अप्रैल में मंजूरी दे दी थी। सरगुजा और सूरजपुर जिले के 1252.447 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले परसा कोयला खदान का 841.538 हेक्टेयर जंगल का इलाका है, जबकि 410.909 हेक्टेयर क्षेत्र जंगल क्षेत्र से बाहर का इलाका है। हसदेव अरण्य क्षेत्र के गांवों के सैकड़ों लोगों ने 2 अक्टूबर, 2021 लेकर 4 अक्टूबर, 2021 तक जनसभा और राजधानी रायपुर तक की पदयात्रा की घोषणा की थी। तब आदिवासी मदनपुर गांव की उसी चौपाल में इकट्ठा हुए थे, जहां 2015 में राहुल गांधी ने खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे आदिवासियों से बात की थी। वहां से सभी लोग पैदल ही रायपुर की पदयात्रा पर चले। जंगलों, पहाड़ों, गांवों, शहरों को पार करते हुए वे सभी 13 अक्टूबर, 2021 को रायपुर पहुंचे थे। यहां उन्हें तत्कालिन मुख्यमंत्री भुपेश बघेल से मिलने की इजाजत नहीं मिली थी। आदिवासी रात को रायपुर में ही रुके। सुबह बूढ़ा तालाब के किनारे धरना दिया और शाम को राज्यपाल और तत्कालिन मुख्यमंत्री से मिले थे। आंदोलनकारियों के मुताबिक पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मदनपुर को उजड़ने नहीं देने की बात करते हुए इस प्रस्तावित परियोजना से किसी भी गांव का विस्थापन न होने देने की बात कही थी।

सियासतदानों की सियासत

इतना ही नहीं, इसी दौरान आदिवासी राजभवन भी पहुंचे, जहां लॉन में राज्यपाल अनसुईया उईके ने सभी की बात सुनी। इस दौरान ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि ग्राम सभाओं ने बकायदा प्रस्ताव पारित कर इन परियोजनाओं का विरोध किया है। इसके बाद भी फर्जी ग्राम सभाओं की सहमति बताकर परियोजनाओं को स्वीकृति दिलाई गई है। अब उनकी जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। आदिवासियों की बात सुनने के बाद तब तत्कालिन राज्यपाल अनसूया ऊइके ने कहा था कि आदिवासियों के साथ जो हुआ, उसे अब मैं नहीं होने दूंगी। आपकी मांग पर मुख्यमंत्री के साथ चर्चा करूंगी। दिल्ली में कोयला मंत्री और प्रधानमंत्री मोदी से बात करूंगी।इस दौरान हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपकर जंगल बचाने की मांग भी की थी। उनका कहना था कि वहां पेसा कानून लागू कर ग्राम सभाओं को निर्णय का अधिकार मिलना चाहिए। उस जंगल को लेमरु हाथी रिजर्व में शामिल कर संरक्षित किया जाना चाहिए।
तब तत्कालिन राज्यपाल अनुसूईया उइके ने कहा था कि जो आवेदन मिला है उसका अध्ययन करुंगी। राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में आदिवासियों ने मांग की थी कि बिना ग्रामसभा की सहमति के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोल बेयरिंग एरियाज एक्ट के तहत किए गए भूमि अधिग्रहण को तत्काल निरस्त की जाय। पांचवी अनुसूची क्षेत्र में किसी भी कानून से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के पूर्व ग्रामसभा से अनिवार्य सहमति के प्रावधान लागू किए जाएं। साथ ही, परसा कोल ब्लाक के लिए फर्जी ग्रामसभा प्रस्ताव बनाकर हासिल की गई वन स्वीकृति को तत्काल निरस्त किया जाय और ऐसा करने वाले अधिकारी और कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो। इसके अलावा घाटबर्रा गांव के निरस्त सामुदायिक वन अधिकार को बहाल करते हुए सभी गांवों में सामुदायिक वन अधिकार और व्यक्तिगत वन अधिकारों को मान्यता दी जाय।
उल्लेखनीय है कि हसदेव अरण्य भौगोलिक रुप से उस क्षेत्र में अवस्थित है जो संविधान की पांचवीं अनुसूची में शामिल है। यह अनुसूची ग्रामसभाओं और वहां सदियों से बसे आदिवासी समुदायों को उनकी परंपरा, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं को संवैधानिकता प्रदान करती है। बीते एक दशक से सरगुजा और कोरबा जिले की ग्रामसभाएं संगठित होकर इस सघन, समृद्ध, जैव विविधतता से परिपूर्ण जंगल और वन्य जीवों के नैसर्गिक पर्यावास को बचाने के लिए न केवल अपने सांवैधानिक शक्तियों का ही उपयोग कर रहीं हैं, बल्कि अपने जंगल को किसी भी कीमत पर खनन के लिए न देने के लिए सतत संघर्ष कर रही हैं। हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति 24 ग्रामसभाओं का देश में एक ऐसा बिरला उदाहरण है, जो अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग करते हुए अपने नैसर्गिक संसाधन बचाने के लिए गुजारिश करता चला आ रहा है।
यह समिति वर्ष 2015 से ही – जब सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला खदानों के आवंटन में हुए कथित घोटाले के मद्देनजर देश के 214 कोयला खदानों के आवंटन को रद्द कर नए आवंटन करने के निर्देश दिये थे- केंद्र सरकार को यह लिखित में देती रही हैं कि हसदेव अरण्य के दायरे में आने वाली कोयला खदानों को नीलामी प्रक्रिया से बाहर रखा जाए। इसके पीछे समिति का आधार यह रहा है कि खनन शुरू करने से पहले ग्रामसभाओं की सहमति जरूरी है। और हसदेव की इन ग्रामसभाओं ने यह तय कर लिया है कि वे कोयला खदानों के लिए अपने इस विरासती जंगल को नष्ट करने की सहमति नहीं देंगीं। इस लिहाज से यह एक संवैधानिक टकराव की स्थिति ही है। इसके अतिरिक्त 2006 में लागू हुए वनाधिकार (मान्यता) कानून में भी गैर-वानिकी उपयोग के लिए वनों के इस्तेमाल के लिए ग्रामसभा से इस आशय का प्रस्ताव लेना अनिवार्य हो गया है कि “उसके दायरे में आने वाले वन क्षेत्र में वनाधिकार मान्यता कानून के तहत दिये गए सभी 13 प्रकार के अधिकार प्रदान किए जा चुके हैं”। इन अधिकारों में व्यक्तिगत वन अधिकार (जिस वन भूमि पर लोग 13 दिसंबर, 2005) से पहले खेती करते रहे हैं या निवास बनाया है, सामुदायिक निस्तार अधिकार, सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार, लघु वनोपाज संग्रहण के अधिकार, अगर उस ग्रामसभा में आदिम जनजाति समुदाय का निवास है, तो उनके पर्यावास के अधिकार आदि शामिल हैं।
मगर, पूर्व की कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार इन ग्रामसभाओं को मिली संवैधानिक शक्तियों को लगातार नजरअंदाज कर रही थी। राज्य सरकार द्वारा पेसा कानून के ऊपर कोल एरिया बेयरिंग एरियाज एक्ट, 1957 (कोयला-धारक क्षेत्र कानून-1957) को तरजीह देते हुए यह नजीर पेश करने की गैर-कानूनी कोशिश की है कि यह कानून पेसा कानून, 1996 से प्रभावित नहीं होता और कोयला धारक क्षेत्रों में जमीन अधिग्रहण से पूर्व पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की ग्राम सभाओं की सहमति या परामर्श की जरूरत नहीं है। इस संबंध में एक मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में चल रहा है। वन अधिकार कानून, 2006 की बात करें तो यहां भी ग्राम सभाओं के प्रस्तावों को तो जरूरी माना गया है, लेकिन ग्रामसभाओं के एक दशक से चल रहे विरोध को देखते हुए खनन के पक्ष में और वनाधिकार कानून के समग्र क्रियान्वयन के संबंध में फर्जी प्रस्ताव बनवा कर यहां खनन के लिए तमाम स्वीकृतियां दे दी गईं हैं।

आदिवासी लगाते रहे हैं फर्जी ग्रामसभा प्रस्ताव के आरोप

उल्लेखनीय है कि जब से प्रभावित गांवों के फर्जी प्रस्तावों की खबर ग्रामसभाओं को मिली है, वे तभी से ये कह रही हैं कि उन्होंने ऐसे कोई प्रस्ताव पारित ही नहीं किए हैं। ये प्रस्ताव जिन तारीखों में दिखलाए गए हैं, उन तारीखों में कोई ग्रामसभा आयोजित ही नहीं हुई है। फर्जी ग्रामसभाओं के आधार पर राज्य सरकार द्वारा खनन परियोजना को दी गईं तमाम स्वीकृतियां खारिज मानी जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुइया उइके ने इन फर्जी ग्रामसभाओं के जांच के आदेश भी दिये थे। लेकिन राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने राज्यपाल के आदेश को भी कोई तवज्जो नहीं दी।

मगर हसदेव अरण्य की ग्रामसभाएं बिना निराश और हताश हुए उम्मीद कर रही हैं कि देर से ही, उन्हें न केवल भारत वरन् दुनिया से समर्थन मिलेगा और अंतत: जीत भी संविधान और उसमें लिखी इबारतों की होगी।

खतरें में है हसदेव जंगल के कटने से आदिवासियों का आस्तित्व खतरे में

हम विगत दो वर्षों (कोरोना काल) में यह जान चुके हैं कि ऑक्सीजन मानव जीवन के साथ-साथ अन्य जीवों के लिए कितना आवश्यक है। ऑक्सीजन तब सम्भव है, जब हमारे आस पास हरा भरा पेड़ पौधा हो, जंगल हो। ‘जंगल’ आदिवासियों का कला, संस्कृति, भाषा, वेशभूषा, को समेटे हुए जीवकोपार्जन एवं प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर, जनजातियों का प्राकृतिक धरोहर है। विकास के नाम पर हो रही आदिवासी रहवास क्षेत्रों का भूमि अधिग्रहण कर जंगलों की कटाई एवं आदिवासियों का विस्थापन मूल जनजातियों की कला, संस्कृति, भाषा और वेशभूषा पर गहरा प्रभाव डालता है।
हसदेव अरण्य कोरबा, सरगुजा, सूरजपुर जिला के बीच में मौजूद एक घना जंगल है। जिसके आसपास मुख्यतः गोंड, उरांव, लोहार, पंण्डो, धनुहार, मझवार, बिंझवार आदि जनजातियों का निवास है। यह क्षेत्र संविधान के पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है। ‘हसदेव अरण्य’, लगभग 1,70,000 हजार हेक्टेयर में फैला, घना एवं सन्निहित, मध्यभारत का एक मात्र सबसे बड़ा जंगल है। जो जैव विविधता और खनिज संपदा से भरपूर है, इसमें विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणी जिसमें हाथी, भालू, चिता कई प्रकार तितलियां, दुर्लभ वनस्पतियां आदि मौजूद हैं।
परसा खदान जंगल (फेस टू) की रखवाली करते आदिवासी
‘कोल बेयरिंग एक्ट’ के तहत खदानों का आवंटन, जंगलों की कटाई एवं स्थानीय लोगों की विस्थापन इस क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। सवाल इसलिए क्योंकि यह क्षेत्र पांचवी अनुसूची में शामिल है जहां पेशा कानून लागू होता है। और संविधान से चलने वाला भारत देश में आदिवासियों को प्राप्त अधिकार को नजर अंदाज करके पूंजीपतियों के हित में ‘कोल बेरिंग एक्ट’ को प्राथमिकता देना, जो जंगल, वन प्राणी और आदिवासियों की कला, संस्कृति एवं उनके अस्तित्व को ही समाप्त कर रहा है। जंगलों को उजड़ता देख हसदेव अरण्य क्षेत्र में आदिवासियों का विरोध एवं विरोध का समर्थन शीर्ष पर है। 4 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक, फतेहपुर-सरगुजा से रायपुर के लिए, आदिवासियों का तीन सौ किलोमीटर की शांति पूर्ण पैदल यात्रा की गई। इस यात्रा में लगभग 300 लोगों ने भाग लिया था।परसा कोल ब्लॉक को बढ़ाने के लिए, दूसरे फेस की खनन हेतु पेड़ों की कटाई की जानी है। जिसमें धरना प्रदर्शनकारियों के अनुसार “लगभग दो लाख से अधिक पेड़ कटेंगे। जिसके लिए परसा कोल ब्लॉक में लगभग चार सौ पुलिस फोर्स, तीस – पैंतीस मशीन, और दो ढाई सौ मजदूर लाकर, पेड़ों की कटाई के लिए तैयारी की जा चुकी है। यह तैयारी तब की जा रही है जब आदिवासियों की तीज त्यौहार का समय है, कोल ब्लॉक की यह संदेहात्मक गतिविधि, से ग्रामीण सचेत हो गए और कोल ब्लॉक की गतिविधि पर नजर रखने के लिए अब आदिवासी महिला पुरुष रात दिन डेरा डाल कर जंगल की रखवाली कर रहे हैं।”

आदिवासी कृषि, पशुपालन आदि करने एवं लघुवनोपज सहेजने में निपुण हैं।

उमेश्वर सिंह आर्मो जी ने आदिवासियों का ‘उत्थान से पतन की ओर’ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि, “हमारी जो पेशा है लघु वनोपज है, कृषि है और पशुपालन है। पशुपालन के लिए आप कोई प्रावधान किये हैं? सरकार की जो पुनर्वासनीति है वहां कहीं हमारे पशुओं के लिए जगह नहीं है। हमारे जो लघु वनोंपज है जिसमें हम लाखों रुपए की आमदनी जंगल से लेते हैं। तो उस सारे चीजों से वंचित करके सिर्फ पैसा को पकड़ा देता है तो कहीं न कहीं उसका गलत उपयोग हो जाता है।परसा खदान के लिए विस्थापित केते गांव की जीता जागता उदाहरण बताते हुए कहते हैं, “जैसे हम जहां बैठे है उसके बगल में केते गांव था, वो केते गांव उजड़ गई, और आज उसकी स्थिति भनायक एवं खतरनाक है। लोग कहां हैं यह नहीं पता, परसा की कई ऐसे उदाहरण है, जिनको करोड़ो में लोगों मुआवजा मिला था, आज फिर वही व्यक्ति जंगल जाता है जंगल से लकड़ी काटता है और लकड़ी बेचता है तो उसका डेली का जीवन यापन हो रहा है। तो ऐसे स्थिति आठ से दस साल में हो गई है। उसका करोड़ो रुपए कहां चला गया यह एक उदाहरण है। इसलिए जो जहां कहीं भी आदिवासियों का विस्थापन किया जाता है विस्थापन के नाम पर वो पतन की ओर ही जाता है। इसका बड़ा कारण है कि जो सरकारी योजनाएं हैं, उसमें बहुत सारी खामियां हैं उसको कभी भी ठीक नहीं किया गया।

आदिवासियों की संस्कृति जंगल से जुड़ी है। शहरों की नजरिए से यह एक मनोरंजन मात्र है।

आर्मों जी कहते हैं। “आदिवासियों का जो भौगोलिक क्षेत्र होता है, उस भौगोलिक क्षेत्र में एक भाषा, एक परंपरा, एक रितिरिवाज सारे चीज वातावरण में निर्मित होता है। और उस चीज को उस जगह से हटा दिया जाए तो वह टूटता है, जैसे हमारा करमा त्योहार, करमा त्योहार व्यक्तिगत नहीं है, करमा त्योहार हमारा सामूहिक रूप से होते हैं। जितने भी हमारे आदिवासियों का त्योहार है उनमें सामूहिकता है। अब उसको वहां से हटा के तीतर बितर कर देगें तो जरूर वो टूटेगा, उससे बिखरेगा, आप नहीं संजो सकते, मैं हसदेव क्षेत्र में रहता हूं, मुझे यहां से विस्थापित कर दिया जाता है, मैं बिलासपुर चला जाता हूं क्या वो बिलासपुर में करमा नृत्य होता है?, सामूहिक होती है, नहीं होती है। उसको एक सिर्फ मनोरंजन के रूप में माना जाता है। हम जब पेड़ को रोक रहें हैं की पेड़ नहीं काटेंगे उस पेड़ में भी “करमी” की पेड़ है, उसकी पूजा करते हैं, वो हमारे आत्मा से जुड़ा हुआ है। तो अगर उसे आप अलग कर दोगे तो कैसे वो बचेगा, संभव ही नहीं है बचना।”

“जंगल कटाई” आदिवासियों की अस्तित्व, वन्यजीवों की आशियाना, तथा किसानों की लगभग चार लाख हेक्टेयर सिंचित भूमि को भी प्रभावित कर रहा है।

‘वे बताते हैं’ “पांचवी अनुसूची का जो एरिया है, वहां लघुवनोंपाज और खेती से निर्भर होते है। जब विस्थापित होंगे तो हमारा खेती चला जायेगा, हमारा लघुवनोंपज जो जंगल से मिलता है वो चला जायेगा। यहां जंगली जो जीव निवास करते हैं उनका भी आशियाना खतम हो जायेगा। जो हसदेव नदी है उसका केचमेंट एरिया है, पूरे जो हसदेव का इलाका है, यहां से ही छोटे नदी जाकर हसदेव से मिलते हैं। उस नदी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। हसदेव नदी जो जांजगीर, चंपा, बिलासपुर का जो क्षेत्र है वहां चार लाख हेक्टेयर कृषि जमीन को सिंचित करती है, तो वो किसान भी उस संकट से गुजरेंगे, और हमारा छत्तीसगढ़ जो है बर्बादी की ओर चली जायेगी। तो इसलिए हसदेव को बचाना जरूरी है।श्री हरिप्रसाद गोंड़(उम्र 80 वर्ष) जी ने कहा की “हमर जगह जमीन भागाथे, हमन कहां जाई, हमर नान लाईका हे ओमन भटक हीं..गली गली। तेखार बार हमन जंगल ला बचाथन।”

बासेन ग्राम के निवासी हरिप्रसाद पोर्ते (उम्र 19 वर्ष) बताते हैं, “वो बोलते हैं कि विकास हो रहा है, पर हकीकत कुछ और ही है। सबसे पहले कंप्यूटर यहां लाया गया था, एक महीना कंप्यूटर चला जिसमें मैं भी स्टूडेंट था। और पांच सिलाई मशीन लाया गया था यहां बासेन में। तो उसको सिखाया जा रहा था महिला लोग सीखे नहीं और एक महीना बाद ले गए मशीन सब को। जंगल न जाना पड़े इसलिए मशरूम उत्पादन का उद्योग किया गया था बासेन में, “घर-घर मशरूम उगा कर खा सकते हो जंगल जाना नहीं पड़ेगा, ऐसा कहा गया , वो भी कुछ नहीं है अभी। पिछले वर्ष हम लोग बोले अडानी से कि रोड बनवा दो रोड भी नहीं बनवाया। और बोले कि यहां लाईट खराब हो गया है लाईट बनवा दो कोई नहीं बनवाया। हम लोग कई बार सूचना भी दिए हमको काम दिलाइए लेकिन किसी को काम में नहीं लिया। जो हम लोग लिस्ट बनाए थे गांव में उनमें से कोई भी काम में नहीं लगे। और हैंडपंप खराब होता था उसको भी नहीं बनवाया। खदान आगे बढ़ने लगा उसको विरोध करने लगे, तो अडानी वाला जाके पोस्टर लगाया है, रिक्सा सेवा, एंबुलेंस सेवा, हैंडपंप खराब हो तो कॉल करें ऐसे कुछ पोस्टर लगा कर पूरे बस्ती में लगा दिया है। पर सब धोखा है।

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