हसदेव में पेड़ों की कटाई शुरू, सामाजिक कार्यकर्ताओं का हिरासत में लेने का आरोप


रायपुर/कोरबा (गंगा प्रकाश)। 21 दिसंबर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित जैव विविधता संपन्न हसदेव अरण्य क्षेत्र में वन विभाग ने बृहस्पतिवार को परसा पूर्व कांते बासन (पीईकेबी) कोयला खदान परियोजना के दूसरे चरण के लिए कड़ी सुरक्षा के बीच पेड़ों की कटाई शुरू की।सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि हसदेव क्षेत्र में कोयला खनन का विरोध कर रहे लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। विपक्षी कांग्रेस ने भी राज्य विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया और भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) सरकार पर अडाणी का पक्ष लेने का आरोप लगाया।स्थानीय प्रशासन ने दावा किया है कि उसके पास पेड़ काटने के लिए सभी आवश्यक अनुमति थी। वहीं पुलिस ने दावा किया है कि उन्होंने कुछ स्थानीय लोगों के घरों का दौरा किया और उन्हें कानून-व्यवस्था के लिए किसी प्रकार की समस्या पैदा न करने की सलाह दी।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने विधानसभा परिसर में संवाददाताओं से कहा कि उन्हें लोगों द्वारा (वनों की कटाई के खिलाफ) विरोध के बारे में जानकारी मिली है लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

वन विभाग ने हसदेव जंगल के पेड़ो की अंधाधुंध कटाई

वन विभाग ने बृहस्पतिवार सुबह सरगुजा जिले के उदयपुर विकासखंड में पीईकेबी चरण दो के लिए पेड़ों की कटाई शुरू की। जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने बताया कि कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए वहां पुलिस कर्मियों को तैनात किया गया है। उन्होंने कहा कि इसके लिए आवश्यक मंजूरी पहले ही दी जा चुकी है।
राज्य में कांग्रेस की सरकार ने पिछले साल राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को आवंटित पीईकेकेबी चरण- दो खदान (सरगुजा) के लिए 1,136.328 हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग की अनुमति दी थी।

क्या हसदेव जंगल के कटने से आदिवासियों का आस्तित्व खतरे में है?

हम विगत वर्षों (कोरोना काल) में यह जान चुके हैं कि ऑक्सीजन मानव जीवन के साथ-साथ अन्य जीवों के लिए कितना आवश्यक है। ऑक्सीजन तब सम्भव है, जब हमारे आस पास हरा भरा पेड़ पौधा हो, जंगल हो। ‘जंगल’ आदिवासियों का कला, संस्कृति, भाषा, वेशभूषा, को समेटे हुए जीवकोपार्जन एवं प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर, जनजातियों का प्राकृतिक धरोहर है। विकास के नाम पर हो रही आदिवासी रहवास क्षेत्रों का भूमि अधिग्रहण कर जंगलों की कटाई एवं आदिवासियों का विस्थापन मूल जनजातियों की कला, संस्कृति, भाषा और वेशभूषा पर गहरा प्रभाव डालता है।हसदेव अरण्य कोरबा, सरगुजा, सूरजपुर जिला के बीच में मौजूद एक घना जंगल है। जिसके आसपास मुख्यतः गोंड, उरांव, लोहार, पंण्डो, धनुहार, मझवार, बिंझवार आदि जनजातियों का निवास है। यह क्षेत्र संविधान के पांचवी अनुसूची के अंतर्गत आता है। ‘हसदेव अरण्य’, लगभग 1,70,000 हजार हेक्टेयर में फैला, घना एवं सन्निहित, मध्यभारत का एक मात्र सबसे बड़ा जंगल है। जो जैव विविधता और खनिज संपदा से भरपूर है, इसमें विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणी जिसमें हाथी, भालू, चिता कई प्रकार तितलियां, दुर्लभ वनस्पतियां आदि मौजूद हैं।
‘कोल बेयरिंग एक्ट’ के तहत खदानों का आवंटन, जंगलों की कटाई एवं स्थानीय लोगों की विस्थापन इस क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। सवाल इसलिए क्योंकि यह क्षेत्र पांचवी अनुसूची में शामिल है जहां पेशा कानून लागू होता है। और संविधान से चलने वाला भारत देश में आदिवासियों को प्राप्त अधिकार को नजर अंदाज करके पूंजीपतियों के हित में ‘कोल बेरिंग एक्ट’ को प्राथमिकता देना, जो जंगल, वन प्राणी और आदिवासियों की कला, संस्कृति एवं उनके अस्तित्व को ही समाप्त कर रहा है। जंगलों को उजड़ता देख हसदेव अरण्य क्षेत्र में आदिवासियों का विरोध एवं विरोध का समर्थन शीर्ष पर है। 4 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक, फतेहपुर-सरगुजा से रायपुर के लिए, आदिवासियों का तीन सौ किलोमीटर की शांति पूर्ण पैदल यात्रा की गई। इस यात्रा में लगभग 300 लोगों ने भाग लिया था।परसा कोल ब्लॉक को बढ़ाने के लिए, दूसरे फेस की खनन हेतु पेड़ों की कटाई की जानी है। जिसमें धरना प्रदर्शनकारियों के अनुसार “लगभग दो लाख से अधिक पेड़ कटेंगे। जिसके लिए परसा कोल ब्लॉक में लगभग चार सौ पुलिस फोर्स, तीस – पैंतीस मशीन, और दो ढाई सौ मजदूर लाकर, पेड़ों की कटाई के लिए तैयारी की जा चुकी है। यह तैयारी तब की जा रही है जब आदिवासियों की तीज त्यौहार का समय है, कोल ब्लॉक की यह संदेहात्मक गतिविधि, से ग्रामीण सचेत हो गए और कोल ब्लॉक की गतिविधि पर नजर रखने के लिए अब आदिवासी महिला पुरुष रात दिन डेरा डाल कर जंगल की रखवाली कर रहे हैं।

निपुण हैं आदिवासी कृषि, पशुपालन आदि करने एवं लघुवनोपज सहेजने में

उमेश्वर सिंह आर्मो जी ने आदिवासियों का ‘उत्थान से पतन की ओर’ के कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि, “हमारी जो पेशा है लघु वनोपज है, कृषि है और पशुपालन है। पशुपालन के लिए आप कोई प्रावधान किये हैं? सरकार की जो पुनर्वासनीति है वहां कहीं हमारे पशुओं के लिए जगह नहीं है। हमारे जो लघु वनोंपज है जिसमें हम लाखों रुपए की आमदनी जंगल से लेते हैं। तो उस सारे चीजों से वंचित करके सिर्फ पैसा को पकड़ा देता है तो कहीं न कहीं उसका गलत उपयोग हो जाता है।”परसा खदान के लिए विस्थापित केते गांव की जीता जागता उदाहरण बताते हुए कहते हैं, “जैसे हम जहां बैठे है उसके बगल में केते गांव था, वो केते गांव उजड़ गई, और आज उसकी स्थिति भनायक एवं खतरनाक है। लोग कहां हैं यह नहीं पता, परसा की कई ऐसे उदाहरण है, जिनको करोड़ो में लोगों मुआवजा मिला था, आज फिर वही व्यक्ति जंगल जाता है जंगल से लकड़ी काटता है और लकड़ी बेचता है तो उसका डेली का जीवन यापन हो रहा है। तो ऐसे स्थिति आठ से दस साल में हो गई है। उसका करोड़ो रुपए कहां चला गया यह एक उदाहरण है। इसलिए जो जहां कहीं भी आदिवासियों का विस्थापन किया जाता है विस्थापन के नाम पर वो पतन की ओर ही जाता है। इसका बड़ा कारण है कि जो सरकारी योजनाएं हैं, उसमें बहुत सारी खामियां हैं उसको कभी भी ठीक नहीं किया गया।

आदिवासियों की संस्कृति जंगल से जुड़ी है। शहरों की नजरिए से यह एक मनोरंजन मात्र है।

आर्मों जी कहते हैं। “आदिवासियों का जो भौगोलिक क्षेत्र होता है, उस भौगोलिक क्षेत्र में एक भाषा, एक परंपरा, एक रितिरिवाज सारे चीज वातावरण में निर्मित होता है। और उस चीज को उस जगह से हटा दिया जाए तो वह टूटता है, जैसे हमारा करमा त्योहार, करमा त्योहार व्यक्तिगत नहीं है, करमा त्योहार हमारा सामूहिक रूप से होते हैं। जितने भी हमारे आदिवासियों का त्योहार है उनमें सामूहिकता है। अब उसको वहां से हटा के तीतर बितर कर देगें तो जरूर वो टूटेगा, उससे बिखरेगा, आप नहीं संजो सकते, मैं हसदेव क्षेत्र में रहता हूं, मुझे यहां से विस्थापित कर दिया जाता है, मैं बिलासपुर चला जाता हूं क्या वो बिलासपुर में करमा नृत्य होता है?, सामूहिक होती है, नहीं होती है। उसको एक सिर्फ मनोरंजन के रूप में माना जाता है। हम जब पेड़ को रोक रहें हैं की पेड़ नहीं काटेंगे उस पेड़ में भी “करमी” की पेड़ है, उसकी पूजा करते हैं, वो हमारे आत्मा से जुड़ा हुआ है। तो अगर उसे आप अलग कर दोगे तो कैसे वो बचेगा, संभव ही नहीं है बचना।””जंगल कटाई” आदिवासियों की अस्तित्व, वन्यजीवों की आशियाना, तथा किसानों की लगभग चार लाख हेक्टेयर सिंचित भूमि को भी प्रभावित कर रहा है।

‘वे बताते हैं’ “पांचवी अनुसूची का जो एरिया है, वहां लघुवनोंपाज और खेती से निर्भर होते है। जब विस्थापित होंगे तो हमारा खेती चला जायेगा, हमारा लघुवनोंपज जो जंगल से मिलता है वो चला जायेगा। यहां जंगली जो जीव निवास करते हैं उनका भी आशियाना खतम हो जायेगा। जो हसदेव नदी है उसका केचमेंट एरिया है, पूरे जो हसदेव का इलाका है, यहां से ही छोटे नदी जाकर हसदेव से मिलते हैं। उस नदी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। हसदेव नदी जो जांजगीर, चंपा, बिलासपुर का जो क्षेत्र है वहां चार लाख हेक्टेयर कृषि जमीन को सिंचित करती है, तो वो किसान भी उस संकट से गुजरेंगे, और हमारा छत्तीसगढ़ जो है बर्बादी की ओर चली जायेगी। तो इसलिए हसदेव को बचाना जरूरी है।”श्री हरिप्रसाद गोंड़(उम्र 80 वर्ष) जी ने कहा की “हमर जगह जमीन भागाथे, हमन कहां जाई, हमर नान लाईका हे ओमन भटक हीं..गली गली। तेखार बार हमन जंगल ला बचाथन।”

बासेन ग्राम के निवासी हरिप्रसाद पोर्ते (उम्र 19 वर्ष) बताते हैं, “वो बोलते हैं कि विकास हो रहा है, पर हकीकत कुछ और ही है। सबसे पहले कंप्यूटर यहां लाया गया था, एक महीना कंप्यूटर चला जिसमें मैं भी स्टूडेंट था। और पांच सिलाई मशीन लाया गया था यहां बासेन में। तो उसको सिखाया जा रहा था महिला लोग सीखे नहीं और एक महीना बाद ले गए मशीन सब को। जंगल न जाना पड़े इसलिए मशरूम उत्पादन का उद्योग किया गया था बासेन में, “घर-घर मशरूम उगा कर खा सकते हो जंगल जाना नहीं पड़ेगा, ऐसा कहा गया , वो भी कुछ नहीं है अभी। पिछले वर्ष हम लोग बोले अडानी से कि रोड बनवा दो रोड भी नहीं बनवाया। और बोले कि यहां लाईट खराब हो गया है लाईट बनवा दो कोई नहीं बनवाया। हम लोग कई बार सूचना भी दिए हमको काम दिलाइए लेकिन किसी को काम में नहीं लिया। जो हम लोग लिस्ट बनाए थे गांव में उनमें से कोई भी काम में नहीं लगे। और हैंडपंप खराब होता था उसको भी नहीं बनवाया। खदान आगे बढ़ने लगा उसको विरोध करने लगे, तो अडानी वाला जाके पोस्टर लगाया है, रिक्सा सेवा, एंबुलेंस सेवा, हैंडपंप खराब हो तो कॉल करें ऐसे कुछ पोस्टर लगा कर पूरे बस्ती में लगा दिया है। पर सब धोखा है।

क्या है हसदेव आंदोलन?

हसदेव आंदोलन छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल में कोयला खनन के खिलाफ कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया एक आंदोलन है।हसदेव नदी मध्य भारत की एक नदी है जो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश राज्यों से होकर बहती है। यह महानदी की एक सहायक नदी है और इसकी कुल लंबाई लगभग 348 किलोमीटर है। हसदेव नदी छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की पहाड़ियों से निकलती है और ओडिशा राज्य में महानदी में विलय से पहले राज्य के कोरबा और बिलासपुर जिलों से होकर बहती है।हसदेव नदी क्षेत्र में सिंचाई, औद्योगिक उपयोग और घरेलू खपत के लिए पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह मछलियों और अन्य जलीय जीवन की विभिन्न प्रजातियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण निवास स्थान है। यह नदी घने जंगलों से घिरी हुई है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जानी जाती है। हालाँकि, हसदेव नदी के आसपास का क्षेत्र खनन गतिविधियों से भारी प्रभावित हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप प्रदूषण हुआ है और नदी के पानी की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र में गिरावट आई है।

खनन के लिए घटनाओं की श्रृंखला

पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार परिषद ने जून 2011 में खनन के लिए वन भूमि का उपयोग न करने की सलाह दी। तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के पर्यावरण मंत्री, जयराम रमेश ने यह कहकर इस विकल्प को पलट दिया कि कोयला खनन घने जंगल से दूर कहीं और होगा।
MoEF ने 2012 में PEKB कोयला खदानों के चरण I में खनन के लिए वन मंजूरी को मंजूरी दे दी, जिसमें 137 मिलियन टन का भंडार और 762 हेक्टेयर की खनन सीमा थी।
छत्तीसगढ़ सरकार ने मार्च 2022 में घोषणा की कि उसने पीईकेबी कोयला ब्लॉक के दूसरे चरण के हिस्से के रूप में 1,136 हेक्टेयर क्षेत्र में कोयला खनन के लिए राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम को अधिकृत किया है।
लिंक में वाणिज्यिक कोयला खनन के बारे में और पढ़ें ।

हसदेव में खनन विरोधी प्रदर्शन
पिछले दस वर्षों से, कई संगठनों और लोगों ने क्षेत्र में खनन के खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाया है। अक्टूबर 2021 में आदिवासी समुदायों के 350 व्यक्तियों ने “अवैध” भूमि अधिग्रहण का आरोप लगाते हुए रायपुर तक 300 किलोमीटर की पैदल यात्रा की।

ऐसा कहा जाता है कि आदिवासी सदस्यों द्वारा खनन कार्यों की “अनुमोदन” दर्शाने के लिए फर्जी ग्राम सभाओं की स्थापना की गई है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) और भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) के अध्ययनों से क्षेत्र में जैव विविधता के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। उन्होंने मानव-हाथी संघर्ष के विषय पर भी चर्चा की, जिसमें बताया गया कि अन्य राज्यों की तुलना में कम हाथी होने के बावजूद, छत्तीसगढ़ निवास स्थान के क्षरण या जंगल की कटाई के कारण संघर्ष के एक बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार है। इन निष्कर्षों ने चेतावनी दी कि अधिक वनों की कटाई से हाथियों का शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन होगा।

चल रहे विरोध प्रदर्शन के साथ सीपीआर का लिंक

आयकर अधिनियम की धारा 12ए के तहत, सीपीआर को वर्ष 2027 तक कर छूट का दर्जा दिया गया था। आईटी विभाग ने 22 दिसंबर, 2022 को भेजे गए 33 पेज के कारण बताओ पत्र के साथ छूट का विरोध किया, जिसमें कहा गया था कि सीपीआर इसमें भाग ले रहा था। गतिविधियाँ जो “उन वस्तुओं और शर्तों के अनुरूप नहीं थीं जिनके तहत इसे पंजीकृत किया गया था”।इसके अलावा, आईटी विभाग की प्रतिबंधित “गतिविधियों” की सूची में हसदेव आंदोलन में सीपीआर की “भागीदारी” भी शामिल है। यह जन अभिव्यक्ति सामाजिक विकास संस्था (जेएएसवीएस) के माध्यम से किया गया था। आईटी विभाग ने पिछले चार वर्षों में यह संकेत देते हुए गणना प्रस्तुत की है कि जेएएसवीएस को सीपीआर से 87% -98% के बीच दान मिला और, उनके अनुसार, यह “उसके अनुमोदित लक्ष्यों के अनुसरण में नहीं था”।सरकार आदिवासी अधिकारों, विकासात्मक आवश्यकताओं को संतुलित करने, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और भारत विरोधी गतिविधि की जाँच करने की शास्त्रीय दुविधा का सामना कर रही है। समय की मांग सतत विकास की है जो जंगलों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके और खनन के लिए आनुपातिक मात्रा में पेड़ लगाकर आदिवासी अधिकारों को सुरक्षित कर सके।

नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने कहा

मिली जानकारी के अनुसार बताया गया कि सदन में हसदेव का मुद्दा उठाया पर सरकार ने नहीं दिया कोई जवाब। हसदेव में पेड़ कटाई और विरोध करने वालों की गिरफ़्तारी पर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर चरणदास महंत ने कहा, तीन आदिवासी साथियों की गिरफ़्तारी हुई। आंदोलन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ला की गिरफ़्तारी हुई है। हमने इस मुद्दे को सदन में उठाया, लेकिन इस पर सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। महंत ने कहा, तीस हजार पेड़ अब तक काटे जा चुके हैं। ढाई लाख और काटे जाएंगे। विधानसभा में संकल्प पारित हुआ था कि आने वाले दिनों में और खदान ना खोला जाए। जो खदाने हैं आने वाले पचास सालों तक के लिए काफी है। हमने इस मुद्दे को सदन में उठाया, लेकिन इस पर सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया।

आदिवासियों को पुलिस ने किया गिरफ्तार..जंगल प्रेमियों ने छेड़ा जंग”

जानकारी के अनुसार गुरूवार की सुबह पुलिस टीम घाट बररा पेन्ड्रा मार पहुंचकर धरना आंदोलन कर रहे आदिवासियों के साथ अमानवीय व्यवहार कर भगाया है। इतना ही नहीं घर घुसकर पुलिस ने आदिवासी परिवारों के लोगों को हिरासत में लिया है। इसके साथ ही जंगल की अधाधुंद कटाई का काम भी शुरू हो गया है। हसदेव बचाओ आंदोलन की अगुवाई कर रहे डॉ. आलोक शुक्ला को हिरासत में लेकर पुलिस ने अज्ञात स्थान पर छोड़ा है। जानकारी मिली कि आलोक शुक्ला को बिलासपुर में छोड़ा गया है। साथ ही आंदोलन से दूर रहने की चेतावनी भी दी गयी है।
घटनाक्रम से नाराज पूर्व विधायक शैलेष पाण्डेय, जंगल मितान के संस्थापक चन्द्रप्रदीप वाजपेयी ने बताया कि प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री है। दुख की बात है कि आदिवासी मुख्यमंत्री की पुलिस ही आदिवासियों की दुश्मन बन चुकी है। हसदेव के जंगल को बचाने के लिए आदिवासी सड़क पर हैं। लेकिन आदिवासी मुख्यमंत्री के राज्य में आदिवासियों को जेल भेजा जा रहा है। पुलिस संरक्षण में हसदेव के जंगलों को काटा जा रहा है। सुबह से दोपहर तक सैकड़ों पेड़ों की सुरक्षा के बीच हत्या हो चुकी है।

शैलेष ने कहा कि आदिवासी समाज की चिंता और हसदेव जंगल की उपयोगिता को समझते हुए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाया था। मेधा पाटेकर और रादेश टिकैत जैसी नामचीन हस्तियों ने भी हसदेव बचाओ अभियान में शिरकत कर आदिवासी समाज की चिंता में अपनी चिंता को शामिल किया था। बावजूद इसके सरकार बनते ही भाजपा ने अडानी को लाभ पहुंचाने जंगलों को काटना शुरू कर दिया गया।

अखिलेश चंद्रप्रकाश बाजपेई ने दुख जाहिर करते हुए कहा कि जंगल बरबाद होने का मतलब वन्य जीव ही नहीं बल्कि मानव जीवन पर भारी संकट का संकेत है। हमने देवकीनन्दन दीक्षित चौक पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ और जंगल को बचाने पोस्टर प्रदर्शनी किया । सरकार से आदिवासियों के खिलाफ हो रहे पुलिस अत्याचार रोकने की गुहार लगाई है। हमारी बातों को गौर नहीं किया गया तो हम उग्र आंदोलन के लिए मजबूर हैं। चाहे जान चली जाए..लेकिन छत्तीसगढ़ की जनता की जिन्दगी को अडानी के हाथों गिरवी नहीं होने देंगे।

मानव जीवन अस्तित्व के लिए पृथ्वी में घने जंगल एवं पेड़ों का महत्व”

पेड़ पृथ्वी पर जीवन के लिए भगवान का सबसे प्रमुख आशीर्वाद हैं। वे ऑक्सीजन, भोजन, आश्रय और वर्षा देते हैं। पेड़ अतिरिक्त रूप से हवा को चैनल करते हैं और इसे स्वच्छ बनाते हैं। वृक्षों की जड़ें गन्दगी को बाँधकर उत्तम रखती हैं। पंख वाले जानवरों और प्राणियों के लिए, एक पेड़ एक घर जैसा दिखता है। यह एक विशिष्ट रूफटॉप ओवरहेड जैसा दिखता है।

पेड़ों के बिना, पक्षियों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। उनके पास घर जाने और अंडे देने के लिए कोई जगह नहीं होगी। जल्द ही, इनमें से हर एक जीव धूल खाएगा। वे गर्मियों में पेड़ों के नीचे आराम करते हैं और इसी तरह बारिश से छिप जाते हैं। जीव और पंख वाले जानवर पेड़ों के उत्पाद खाते है। पेड़ पक्षियों और छोटे जीवों को उनके शिकारियों से बचाते हैं।

पेड़ तब तक हमारी मदद करते हैं जब तक वे खुद जीवित रहते हैं। वे इसी तरह तापमान की निगरानी में मदद करते हैं। ये गर्मियों में हवा को ठंडा करने में मदद करते हैं। हाथी और अन्य जीव पेड़ों की पत्तियों को खाते हैं।

जब वे गुजरते हैं तो वे किसी भी घटना में उपयोगी होते हैं। इनकी लकड़ी का उपयोग फर्नीचर बनाने में किया जाता है। इसे खाना बनाने और गर्म करने के लिए तला जाता है। गिरी हुई पत्तियाँ कमाल की खाद हैं। पेड़ कई सालों तक जीवित रहते हैं और हमारी मदद करते हैं। जितनी संख्या में अनुमति मिल सकती है, उतनी संख्या में हमें पौधे लगाने चाहिए। हमें भी किसी पेड़ को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए और उसे जीवित रहने देना चाहिए।

पेड़ विभिन्न आकृतियों और आकारों में आते हैं। कुछ विशाल होते हैं जबकि कुछ छोटे होते हैं, कुछ मोटे होते हैं और अन्य के तने सख्त होते हैं। दूसरे के तने सुन्दर और नाजुक होते हैं। कुछ मिट्टी के उत्पाद फूल देते हैं। जो भी हो, उनमें से प्रत्येक एक आशीष है—एक आशीष परमेश्वर ने हमें लक्ष्य दिया है कि हम विश्राम कर सकें।

हम चारों ओर ध्यान देने योग्य लेते हैं और ऑक्सीजन लेते हैं। वही ऑक्सीजन जो पेड़ पैदा करते हैं। क्या हम बिना ऑक्सीजन के रह पाएंगे? उपयुक्त प्रतिक्रिया नहीं है। यह उत्तर स्पष्ट करता है कि पृथ्वी पर जीवन के लिए पेड़ कितने महत्वपूर्ण हैं। वे दुनिया के जीवन भावनात्मक रूप से सहायक नेटवर्क हैं।

पेड़ों का भी असाधारण व्यापारिक सम्मान है। कागज बनाने के लिए पेड़ों की लकड़ी के मैश का उपयोग किया जाता है। उनका उपयोग खिड़कियां और प्रवेश द्वार बनाने के लिए किया जाता है। पेड़ बारिश के दौरान पानी रोकते हैं। यह पानी एक भूमिगत जल भंडार को भरता है। वे वैसे ही मिट्टी को बचने से रोकते हैं।

पेड़ स्कूलों में बच्चों को छाया भी देते हैं। ब्रेक के दौरान युवा पेड़ों के नीचे बैठकर खेलते हैं। पेड़ किसी स्थान को अद्भुत बनाते हैं। वे अशांति और संदूषण को कम करते हैं। पेड़ भी धूल को रोककर हवा को साफ रखते हैं।

पेड़ पंख वाले जीवों, गिलहरियों और कीड़ों के लिए घर हैं। पेड़ परिसंचरण तनाव और तनाव को कम करने के लिए जाने जाते हैं। पुराने पेड़ों में खोखले होते हैं जिनमें छोटे जीव और उड़ने वाले जीव रहते हैं। पेड़ कई सालों से हमारी मदद करते आ रहे हैं। कुछ धर्म पेड़ों को भगवान के रूप में मानते हैं। वे पेड़ के नीचे पूजा करते हैं और उसकी देखभाल करते हैं। हम सभी को एक पेड़ के बारे में सोचना चाहिए और दूसरा पौधा लगाना चाहिए। अच्छा होगा कि आप अपने घर में एक पौधा लगाएं। सड़क के किनारे एक और पेड़ लगाने से दूसरे लोगों को मदद मिलेगी।

पेड़ जीवित प्राणियों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और वे पृथ्वी पर हमारे अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण हैं। वे हमें जीवन के दो आवश्यक घटक प्रदान करते हैं जो भोजन और ऑक्सीजन हैं। इनके अलावा, पेड़ भी मनुष्य को कई लाभ प्रदान करते हैं और इस प्रकार उन्हें जीवन का सबसे आवश्यक हिस्सा माना जाता है।

पेड़ और पौधे ही हैं जो CO2 ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं जो हमारे जीवन को आगे बढ़ाते हैं। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन सबसे आवश्यक तत्व है। साथ ही, कार्बन डाइऑक्साइड एक ग्रीनहाउस गैस है जो ग्लोबल वार्मिंग की ओर ले जाती है। अत: प्रकृति का यह चक्र पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसलिए वनीकरण से हवा शुद्ध होगी और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में भी मदद मिलेगी।

वृक्ष एक समृद्ध और समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की ओर भी ले जाता है जिसमें पशु, पक्षी, कीड़े और कई अन्य जीवित प्राणी अपने अस्तित्व और जीवन के लिए पेड़ों पर निर्भर होते हैं। पेड़ खाद्य श्रृंखला के निचले भाग में मौजूद होते हैं क्योंकि वे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं। इस प्रकार, वे बड़े पैमाने पर पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान करते हैं और पर्यावरण को स्वच्छ और स्वस्थ बनाते हैं। इसके अलावा, कई प्रकार की आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक दवाएं पेड़ों से बनाई जाती हैं जिनका उपयोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों को ठीक करने के लिए किया जाता है।

पेड़ पारिस्थितिकी तंत्र में पानी के संतुलन को भी बनाए रखते हैं, पेड़ों की जड़ें इस तरह से बनाई जाती हैं कि यह मिट्टी को मजबूती से पकड़ कर रखता है और बारिश और बाढ़ के दौरान इसे बहने नहीं देता है, इसलिए ये मिट्टी के कटाव और भूस्खलन को रोकने में मदद करते हैं।

पेड़ हवा और भोजन का एक समृद्ध स्रोत हैं और प्रकृति की सौंदर्य सुंदरता में भी योगदान करते हैं। लोग पेड़ों की गोद में आनंद लेते हैं क्योंकि प्रकृति स्वयं एक महान तनाव बस्टर है और लोगों को अच्छा और सक्रिय महसूस कराती है। पेड़ चिलचिलाती गर्मी में छाया भी देते हैं और हमें अपनी शांत और ठंडी हवा से राहत देते हैं।

इसलिए पेड़ मानव जीवन का अहम हिस्सा हैं। वे दवा और लकड़ी उद्योग में इसके विभिन्न उपयोगों के कारण देश के आर्थिक विकास में भी मदद करते हैं। इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हम भगवान के ऐसे सुंदर प्राणियों को संरक्षित करें और इस प्रकार हमें वृक्षारोपण को बढ़ावा देना चाहिए और पेड़ों के लिए हानिकारक गतिविधियों को हतोत्साहित करना चाहिए।

हसदेव जंगल बचाओ पर्यावरण का करो रख- रखाओ, स्वच्छ वातावरण और स्वच्छ जीवन पाओ

हसदेव जंगल छत्तीसगढ़ के जाने-माने पर्यटन स्थल एवं घने जंगलों में से एक है। इस जंगल में अनेको प्रकार के वन्य प्राणीयों  का विचरण एवं बाहुल्य आदिवासी जनप्रजातियों का निवास्थल है। समुचित छत्तीसगढ़ में हरदेव अरण्य जंगल किसी स्वर्ग से काम नहीं। यहां की शुद्ध वायु एवं बड़े झाड़ के पेड़ और भोले भाले आदिवासियों तथा विचरण कर रहे जीव जंतु पर्यटकों का आकर्षण है। परंतु कुछ पीते हुए परसों से इस जंगल पर किसी की टोटका या नजर लग गई है। कांग्रेस हो या भाजपा की सरकार दोनों पार्टियों ने जंगल के पेड़ को काटने को लेकर मुनाफा एवं फायदा पाने की कोशिश की है। इसी लड़ाई में वहां निवासरत आदिवासी प्रजातियों के द्वारा लंबे वर्षों से पेड़ों की कटाई को लेकर जंग जारी है। कांग्रेस पार्टी के हार के बाद भाजपा को सत्ता में महीने भर आते नहीं हुए हैं कि हसदेव अरण्य जंगल के पेड़ों की कटाई फिर से शुरू हो गई है। विडंबना की बात यह है कि आदिवासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद आदिवासियों के ऊपर ही शोषण किया जा रहा है चुनाव जीतने के उपरांत दोहरे चरित्र के शोषण करने वाले भाजपा पार्टी का चेहरा सामने आया है। आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को उजाड़ कर देश के विकास और आम लोगों के हित में बात करने वाले मुख्यमंत्री की क्या यही छत्तीसगढ़ का विकास है..?

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