Brekings: 7 करोड़ का पुल बना मज़ाक, जान जोखिम में डाल रहे 40 गांव के लोग: तीन साल में एक भी पिलर नहीं, अब फिर से चक्काजाम की चेतावनी

गरियाबंद के अमलीपदर में सूखा तेल नदी पर निर्माणाधीन पुल बना ग्रामीणों की पीड़ा का कारण, बारिश में टापू बन जाएगा पूरा इलाका, स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर संकट

गरियाबंद/अमलीपदर (गंगा प्रकाश)।7 करोड़ का पुल बना मज़ाकग रियाबंद जिले के अमलीपदर क्षेत्र के लोगों का सब्र अब टूटने के कगार पर है। साल 2022 में शासन ने यहां की सूखा तेल नदी पर 7 करोड़ रुपए की लागत से एक उच्चस्तरीय पुल निर्माण की स्वीकृति दी थी। इसका उद्देश्य था कि आसपास के 40 गांवों को सालभर सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिल सके। लेकिन हकीकत ये है कि तीन साल बाद भी पुल का एक भी पिलर खड़ा नहीं हो पाया है।

इस बीच प्रशासन खामोश है, ठेकेदार नदारद और ग्रामीण फिर से अपने पुराने संकट की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं। आने वाली बारिश ने चिंता को और गहरा कर दिया है क्योंकि हर साल की तरह इस बार भी सूखा तेल नदी उफान पर आ जाएगी और अमलीपदर से सटे गांव टापू बन जाएंगे।

पढ़ाई और ज़िंदगी दोनों दांव पर

इस इलाके में स्कूल जाने वाले सैकड़ों बच्चे रोज़ जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं। पुल निर्माण की घोषणा ने इन्हें कुछ उम्मीद दी थी, लेकिन अब वो उम्मीद टूट चुकी है। नदी का बहाव तेज़ होने पर बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं। कई बार हादसे हो चुके हैं, मगर न तो सेतु विभाग चेता और न ही जिला प्रशासन।

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स्थानीय निवासी बताते हैं, “हर साल बच्चों को रस्सी पकड़कर नदी पार कराना पड़ता है। बारिश में तो हालात और भी बदतर हो जाते हैं। जिस पुल के लिए 7 करोड़ मंजूर हुए, उस पर तीन साल में मिट्टी भराई तक नहीं हुई।”

सिर्फ कागजों में काम, ज़मीन पर सन्नाटा

पुल निर्माण की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग (PWD) के सेतु शाखा को दी गई थी। शुरुआती कार्यवाही के बाद कुछ मजदूरों को काम पर लगाया गया, लेकिन कुछ महीनों में ही सब रुक गया। ठेकेदार के साइट छोड़कर चले जाने की खबर है, मगर विभागीय अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं।

अमलीपदर के सरपंच बताते हैं, “कई बार अधिकारियों से बात की गई। जनप्रतिनिधियों को आवेदन दिए गए, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। हम चाहते हैं कि अगर पुल बनाना संभव नहीं है तो कम से कम बरसात में नाव या अस्थायी पुल की व्यवस्था तो करें।”

अब उबल रहा गुस्सा, चक्काजाम की चेतावनी

पिछले साल भी ग्रामीणों ने पुल निर्माण की मांग को लेकर चक्काजाम किया था। प्रशासन ने तब आश्वासन दिया था कि अगले बारिश के पहले काम शुरू हो जाएगा, लेकिन वो आश्वासन भी झूठा निकला। अब ग्रामीणों ने दोबारा चक्काजाम करने का ऐलान कर दिया है।

ग्राम धमारिकोट, सिर्री, कोहड़ी, गोढ़ीटोला, बिंद्रानवागांव, बंसेन, कोलियारी, घुटकेल, खड़गांव समेत करीब 40 गांव के लोग इस आंदोलन में शामिल होने जा रहे हैं।

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल

इस क्षेत्र के विधायक, जिला पंचायत सदस्य और अन्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी ग्रामीणों को खल रही है। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन अब कोई भी इन गांवों की सुध लेने नहीं आ रहा।

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स्थानीय ग्रामीण महिला कहती हैं, “हमने उन्हें जिताया, लेकिन वो एक पुल तक नहीं बनवा सके। हमें मजबूरन आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। क्या हमारी जान की कोई कीमत नहीं?”

आखिर जिम्मेदार कौन?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों की परियोजना तीन साल में क्यों अधूरी पड़ी है? जिम्मेदार विभाग ने कोई निगरानी क्यों नहीं की? ठेकेदार को कितना भुगतान किया गया, और वो काम अधूरा छोड़कर कैसे चला गया?

जब प्रशासन, जनप्रतिनिधि और विभागीय अधिकारी सब चुप हैं, तो ग्रामीणों का आक्रोश जायज़ है। अब वक्त आ गया है कि शासन इस मामले में तुरंत संज्ञान ले, नहीं तो यह चिंगारी बड़ा जनांदोलन बन सकती है।

ग्रामीणों की मांगें:

अधूरे पुल निर्माण को तुरंत शुरू किया जाए*ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हो*बारिश के पूर्व वैकल्पिक मार्ग या नाव की सुविधा सुनिश्चित की जाए*जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाया जाए


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