भैरमगढ़ के तुरेम आश्रम में सरकारी नियमों की धज्जियां कैसे उड़ती हैं, इसका जीता-जागता सबूत सामने आया है। यहां चपरासी के पद पर पदस्थ शासकीय कर्मचारी मानसिंह नाग की जगह उसका बेटा आशीष नाग महीनों से ड्यूटी कर रहा है, और पूरे खेल के संरक्षक बने बैठे हैं आश्रम के अधीक्षक दीपक देहारी।
आशीष नाग कोई विभागीय कर्मचारी नहीं, बल्कि भैरमगढ़ महाविद्यालय का नियमित छात्र है। इसके बावजूद वह रोज आश्रम में हाजिरी बजाता है, काम करता है और बच्चों के बीच रहता है।
कैमरे पर कबूलनामा: आशीष ने खुद स्वीकार किया कि पिता की तबीयत खराब है इसलिए वो उनकी जगह आ रहा है। आश्रम के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों ने भी इसकी पुष्टि कर दी है।
सबसे बड़ा सवाल अधीक्षक दीपक देहारी पर :
आश्रम का पूरा प्रशासनिक और अनुशासनात्मक दायित्व अधीक्षक का होता है। तो सवाल सीधा अधीक्षक दीपक देहारी से है –
अधीक्षक की लिखित अनुमति के बिना एक बाहरी लड़का आश्रम में कैसे घुस रहा है? क्या अधीक्षक ने ही यह अवैध व्यवस्था बना रखी है? आश्रम में आदिवासी बच्चे रहते हैं। उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अधीक्षक की है। एक गैर-अधिकृत, गैर-पुलिस वेरिफाइड व्यक्ति को बच्चों के बीच किसके कहने पर रखा गया? अगर कोई अनहोनी होती है तो जिम्मेदार कौन? 3. हाजिरी रजिस्टर में किसके हस्ताक्षर हो रहे हैं? मानसिंह के नाम पर आशीष हस्ताक्षर कर रहा है तो यह फर्जीवाड़ा है, और अगर मानसिंह घर बैठे वेतन ले रहा है तो यह अधीक्षक की मिलीभगत से सरकारी खजाने की लूट है। 4. क्या अधीक्षक दीपक देहारी ने इस अवैध ड्यूटी की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों – मंडल संयोजक और सहायक आयुक्त को दी? अगर नहीं दी तो क्यों छिपाया?
यह साफ है कि अधीक्षक दीपक देहारी की निगरानी पूरी तरह फेल है, या फिर उनकी सह पर ही यह फर्जीवाड़ा चल रहा है।
विभाग सो रहा है: इस पूरे मामले में मंडल संयोजक शिव समरथ से पक्ष जानने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन उठाना जरूरी नहीं समझा।
मांग-: कलेक्टर बीजापुर को तत्काल तुरेम आश्रम का औचक निरीक्षण कर हाजिरी रजिस्टर जब्त करना चाहिए और अधीक्षक दीपक देहारी और कर्मचारी मानसिंह नाग दोनों पर सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत निलंबन की कार्रवाई होनी चाहिए।
