खैरगुड़ा में नई फसल के अन्न के साथ पुरखों की परंपरा का निर्वहन, बुजुर्गों के आशीर्वाद से सजी पारिवारिक मिलन की बेला
बस्तर (गंगा प्रकाश)। चार भाइयों से शुरू हुआ एक परिवार आज कई पीढ़ियों तक विस्तार पा चुका है। समय के साथ परिवार के सदस्य अलग-अलग स्थानों पर रहने लगे और अपनी-अपनी जिम्मेदारियां संभालने लगे, लेकिन रिश्तों की डोर आज भी उतनी ही मजबूत है। यही तस्वीर नवाखानी पर्व पर खैरगुड़ा में देखने को मिली, जब बड़े घर परिवार की कई पीढ़ियां एक साथ जुटीं और नई फसल के अन्न का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजन कर उसे ग्रहण किया।
नवाखानी के अवसर पर परिवार के बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने के साथ बच्चों और युवाओं ने भी पारिवारिक परंपरा में हिस्सा लिया। घर के आंगन में जब बुजुर्गों से लेकर नई पीढ़ी तक के सदस्य एक साथ बैठे तो माहौल आत्मीयता और अपनत्व से भर गया। नई फसल के स्वागत के साथ यह आयोजन परिवार के लिए आपसी प्रेम और एकजुटता का अवसर भी बन गया।
चार भाइयों से बढ़ता गया परिवार, जुड़ती गई पीढ़ियां
बड़े घर परिवार के वरिष्ठ जदुराम और डमरू सिंह ठाकुर ने बताया कि नवाखानी उनके परिवार के लिए केवल नई फसल ग्रहण करने का पर्व नहीं है, बल्कि यह ऐसा अवसर है जो परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे के करीब लाता है। पुरखों से चली आ रही परंपरा के अनुसार परिवार के सदस्य इस अवसर पर एकत्रित होते हैं और बुजुर्गों का आशीर्वाद लेकर नई फसल का अन्न ग्रहण करते हैं।
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उन्होंने कहा कि परिवार के सदस्यों की संख्या और पीढ़ियां बढ़ती गईं। आज कई सदस्य अलग-अलग स्थानों पर रहकर अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन पर्व और पारिवारिक परंपराएं उन्हें फिर एक साथ जोड़ देती हैं।
बुजुर्गों के संस्कार, नई पीढ़ी की जिम्मेदारी
नवाखानी मिलन में परिवार की कई पीढ़ियों की मौजूदगी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। बुजुर्गों ने जहां नई पीढ़ी को पारंपरिक रीति-रिवाजों और पारिवारिक संस्कारों से परिचित कराया, वहीं बच्चों और युवाओं ने भी उत्साह के साथ आयोजन में भाग लिया।
परिवार के सदस्यों का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली और अलग-अलग स्थानों पर रहने के बावजूद ऐसी पारिवारिक परंपराएं रिश्तों को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। नवाखानी का यह आयोजन इसी पारिवारिक एकता और विरासत की तस्वीर पेश करता नजर आया।
इन सदस्यों की रही मौजूदगी
नवाखानी पर्व पर बड़े घर परिवार की वरिष्ठ सुकटी बाई, जदु राम, शिवनाथ, चैतन सिंह, तुलाराम, तयसिंह, डमरू सिंह, अंतुराम, समलुराम, चंद्रों, रघु, विश्वनाथ, नरेंद्र, केशव, लखेश्वर, छबीलाल, मनोज, पेनसिंह, थबिर, डोमेश, खेमेश्वर, राजकुमार और तापेश सहित परिवार के समस्त सदस्य उपस्थित रहे।
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खैरगुड़ा में हुआ यह पारिवारिक मिलन केवल नई फसल के स्वागत तक सीमित नहीं रहा। चार भाइयों से शुरू हुए परिवार की कई पीढ़ियां जब एक साथ बैठीं तो पुरानी परंपराओं और नई पीढ़ी के बीच एक जीवंत सेतु भी दिखाई दिया। बुजुर्गों के आशीर्वाद और नई पीढ़ी की भागीदारी के बीच नवाखानी ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि समय और दूरी चाहे कितनी भी बढ़ जाए, पारिवारिक संस्कार और रिश्तों की डोर पीढ़ियों को एक साथ बांधे रख सकती है।
