जयपुर की अखिल भारतीय संगीत प्रतियोगिता में नौ वर्षीय साक्षी ने हासिल किया द्वितीय स्थान, तालियों से गूंज उठा सभागार
छुरा (गंगा प्रकाश)। मंच पर जैसे ही नौ वर्षीय साक्षी यादव ने सुर साधे, सभागार में मौजूद लोग कुछ पल के लिए जैसे ठहर गए। नन्ही आवाज में निकले सुरों ने ऐसा समां बांधा कि प्रस्तुति खत्म होते ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। किसी को शायद अंदाजा नहीं था कि अपनी आवाज से लोगों के दिलों में उतर रही यह बच्ची दुनिया को अपनी आंखों से देख नहीं सकती। जयपुर में आयोजित अखिल भारतीय संगीत प्रतियोगिता में साक्षी ने अपनी गायकी से न केवल दर्शकों को प्रभावित किया, बल्कि द्वितीय स्थान हासिल कर छत्तीसगढ़ का नाम भी रोशन किया।
लेकिन साक्षी की यह सफलता महज एक संगीत प्रतियोगिता का परिणाम नहीं है। इसके पीछे उसके माता-पिता का वर्षों का संघर्ष, बेटी के भविष्य को लेकर उनका अटूट विश्वास और साक्षी की अपनी जिद छिपी है।
जन्म के समय ही सामने आई थी बड़ी चुनौती
कुमारी साक्षी यादव के जन्म के बाद चिकित्सकों ने माता-पिता कुंती यादव और कन्हैया यादव को बताया था कि उसकी दोनों आंखों में पुतली विकसित नहीं हुई है और वह कभी देख नहीं सकेगी। बेटी के जन्म की खुशी के बीच मिली इस खबर ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।
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माता-पिता ने बेटी की आंखों की रोशनी लौटने की उम्मीद में रायपुर सहित अन्य स्थानों पर उपचार और चिकित्सकीय सलाह ली, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय बेटी को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया।
गांव से 100 किलोमीटर दूर शुरू हुई शिक्षा की राह
जब साक्षी स्कूल जाने की उम्र में पहुंची तो उसके माता-पिता ने बेहतर शिक्षा के लिए उसे नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड, हीरापुर, रायपुर में दाखिला दिलाया। गांव से करीब 100 किलोमीटर दूर बेटी को पढ़ाई के लिए छोड़ना माता-पिता के लिए आसान नहीं था। बेटी को छोड़कर लौटते समय आंखों में आंसू थे, लेकिन इस विश्वास ने उन्हें संभाले रखा कि शिक्षा ही उनकी बेटी के भविष्य का मजबूत आधार बनेगी।
साक्षी के पिता कन्हैया यादव वन विभाग में दैनिक मजदूरी के आधार पर ड्राइवर का कार्य करते हैं, जबकि मां कुंती बाई कृषि मजदूरी करती हैं। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद दोनों ने बेटी की पढ़ाई और प्रतिभा को आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
पढ़ाई के साथ संगीत बना साक्षी की नई पहचान
वर्तमान में साक्षी कक्षा चौथी में अध्ययनरत है। बचपन से ही उसका झुकाव संगीत और गायन की ओर रहा है। उसकी प्रतिभा को पहचानकर विद्यालय की संगीत प्रशिक्षक कौशल्या सिन्हा, जो स्वयं दृष्टिबाधित हैं, उसे गायन का प्रशिक्षण दे रही हैं।
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प्रशिक्षण और लगातार अभ्यास का परिणाम तब सामने आया, जब साक्षी ने राजस्थान के जयपुर में आयोजित अनुराग संगीत संस्थान की 33वीं अखिल भारतीय संगीत प्रतियोगिता में हिस्सा लिया।
प्रतियोगिता में साक्षी ने स्वागत गीत, छत्तीसगढ़ का राजकीय गीत ‘अरपा पैरी के धार’ और ‘तू कितनी अच्छी है, प्यारी मां’ सहित विभिन्न गीत प्रस्तुत किए। उसकी आवाज में आत्मविश्वास और सुरों में पकड़ ने निर्णायक मंडल का ध्यान आकर्षित किया। अंततः साक्षी ने प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त किया।
बेटी की सफलता ने वर्षों का दर्द किया कम
जिस बेटी के जन्म के समय उसकी आंखों की रोशनी को लेकर माता-पिता चिंतित और दुखी थे, आज उसी बेटी की उपलब्धियां उनके लिए गर्व का विषय बन गई हैं।
परिवार का कहना है कि साक्षी ने साबित कर दिया है कि शारीरिक चुनौती किसी व्यक्ति की प्रतिभा को रोक नहीं सकती। यदि परिवार का सहयोग, उचित मार्गदर्शन और अवसर मिले तो बच्चे अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।
आगे जालंधर सहित अन्य शहरों में दिखाएगी हुनर
विद्यालय की प्राचार्य ने साक्षी की प्रतिभा की सराहना करते हुए कहा कि महज नौ वर्ष की उम्र में उसके भीतर संगीत सीखने की अद्भुत क्षमता है। विद्यालय की ओर से उसे देश के विभिन्न राज्यों में आयोजित होने वाली संगीत प्रतियोगिताओं में अवसर दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। आने वाले समय में साक्षी जालंधर सहित अन्य स्थानों पर भी अपनी गायकी का प्रदर्शन करेगी।
साक्षी की कहानी केवल एक प्रतियोगिता जीतने की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की कहानी है, जिसमें माता-पिता ने परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपनी बेटी के सपनों को उड़ान देने का फैसला किया। आंखों से दुनिया न देख पाने वाली इस नन्ही गायिका ने अपने सुरों से यह संदेश दिया है कि प्रतिभा को देखने के लिए आंखों की नहीं, उसे पहचानने के लिए हौसले और अवसर की जरूरत होती है।
