छुरा (गंगा प्रकाश)। सरकारी धन से ग्रामीणों के लिए बनाया गया तालाब आज खुद सवालों के घेरे में है। जिस तालाब का निर्माण मनरेगा योजना के तहत जल संरक्षण और ग्रामीणों की सुविधा के उद्देश्य से कराया गया था, उसी स्थल पर अब कथित तौर पर बड़े पैमाने पर मुरम की खोदाई किए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि शासकीय कोटवारी जमीन पर स्थित तालाब से जेसीबी और हाईवा लगाकर लगातार मुरम निकाली जा रही है। करीब 30 फीट गहरा गड्ढा होने की बात कही जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसकी अनुमति से सरकारी जमीन की इस तरह खोदाई हो रही है और क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है?
मामला छुरा नगर से मडेली-बोइरगांव-राजिम मार्ग के चौड़ीकरण कार्य से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, हरदी निवासी कोटवार नारद राम नेताम की कोटवारी जमीन पर वर्ष 2021 में मनरेगा योजना के तहत करीब 10 लाख रुपये की लागत से तालाब का निर्माण कराया गया था। अब इसी स्थल से सड़क निर्माण के लिए मुरम निकाले जाने का आरोप सामने आया है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पिछले करीब एक सप्ताह से खोदाई और ढुलाई का काम लगातार चल रहा है। इससे तालाब का मूल स्वरूप बदल गया है और स्थल पर गहरा गड्ढा बन गया है।
ग्रामीणों की चिंता केवल सरकारी जमीन से मुरम निकाले जाने तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि यदि बारिश के दौरान इस गड्ढे में पानी भर गया तो छोटे बच्चों और मवेशियों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। बिना सुरक्षा इंतजाम के इस तरह गहरी खोदाई जारी रहने से भविष्य में किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ग्रामीणों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि यहां कोई दुर्घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
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स्थानीय जानकारी के अनुसार, मुरम की खोदाई और परिवहन के लिए करीब पांच हाईवा लगाए गए हैं। आरोप है कि अब तक हजारों हाईवा मुरम सड़क निर्माण में खपाई जा चुकी है। हालांकि, वास्तविक मात्रा का निर्धारण मौके की जांच, परिवहन अभिलेखों और निर्माण एजेंसी के दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही हो सकता है। इसके बावजूद यह मामला कई अहम सवाल खड़े करता है। क्या मुरम निकालने के लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति ली गई है? क्या खोदाई के लिए निर्धारित स्थल और मात्रा का कोई रिकॉर्ड है? यदि यह जमीन शासकीय कोटवारी भूमि है, तो वहां खुदाई की स्वीकृति किसने दी?
करीब 52 करोड़ रुपये की लागत से मेडेली-बोइरगांव-राजिम मार्ग का निर्माण कार्य भी सवालों के घेरे में आ गया है। निर्माण स्थल पर शासकीय इंजीनियर की अनुपस्थिति और ठेकेदार के इंजीनियर के मौके पर नजर नहीं आने की बात सामने आई है। सड़क पर मुरम-मिट्टी डालकर रोलर चलाते हुए काम किए जाने की जानकारी है, लेकिन मौके पर पानी का छिड़काव और तराई होते नहीं दिखने की शिकायत की गई है। ऐसे में सड़क निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता और निर्धारित मानकों के पालन की जांच जरूरी हो गई है।
पुलिया निर्माण को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि निर्माण के महज दो दिन बाद सेंटरिंग हटाकर मिट्टी डालने और रोलर चलाने का काम किया गया। हालांकि, किसी भी निर्माण कार्य में सेंटरिंग हटाने और आगे की प्रक्रिया अपनाने की उपयुक्तता का आकलन संबंधित संरचना की डिजाइन, तकनीकी विनिर्देशों और इंजीनियर की स्वीकृति के आधार पर किया जाना चाहिए। ऐसे में संबंधित विभाग द्वारा स्थल निरीक्षण कर निर्माण की गुणवत्ता और अपनाई गई प्रक्रिया की जांच किए जाने की आवश्यकता है।
इस संबंध में निर्माण कार्य से जुड़े ठेकेदार के इंजीनियर से मोबाइल पर संपर्क किया गया। उन्होंने अपना परिचय बीटेक छात्र रामजी के रूप में देते हुए बताया कि पुलिया की दीवार में तराई करवाई जाएगी। सड़क के अन्य हिस्सों में मिट्टी डालकर रोलर चलाने से निर्माण मजबूत होने की बात भी कही। उन्होंने अन्य स्थानों पर तराई को मायने नहीं रखने वाला बताया। उनके इस कथन के बाद निर्माण कार्य में पानी के छिड़काव, मिट्टी की नमी और निर्धारित तकनीकी मानकों के पालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष आकलन तकनीकी अधिकारियों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
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मामले में खनिज विभाग का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। खनिज अधिकारी गरियाबंद अर्चना ठाकुर ने कहा कि जिले में मुरम की कोई खदान नहीं है। उनके इस बयान के बाद सड़क निर्माण में इस्तेमाल हो रही मुरम के स्रोत, उसके परिवहन और आवश्यक अनुमति को लेकर सवाल और गंभीर हो गए हैं। यदि मुरम कथित तौर पर शासकीय कोटवारी जमीन से निकाली जा रही है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि इसके लिए किस विभाग या सक्षम अधिकारी ने अनुमति जारी की और निकाली गई सामग्री का हिसाब किस रिकॉर्ड में दर्ज है।
वहीं, तहसीलदार रमेश मेहता ने कहा कि यदि कोटवारी जमीन में मुरम खोदाई के नाम पर अथाह गड्ढे किए जा रहे हैं तो मामले की जांच कराई जाएगी। अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर है। क्या राजस्व विभाग मौके का निरीक्षण कर जमीन की स्थिति और खोदाई की वैधता की जांच करेगा? क्या खनिज विभाग मुरम के स्रोत और परिवहन संबंधी दस्तावेजों की पड़ताल करेगा? और क्या सड़क निर्माण एजेंसी से उपयोग की गई मुरम का पूरा हिसाब मांगा जाएगा?
यह मामला केवल मुरम की खोदाई का नहीं, बल्कि सरकारी धन से निर्मित संपत्ति की सुरक्षा, शासकीय भूमि के संरक्षण, सड़क निर्माण की गुणवत्ता और आम लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ा है। वर्ष 2021 में मनरेगा के तहत करीब 10 लाख रुपये खर्च कर बनाए गए तालाब की वर्तमान स्थिति की जांच होना आवश्यक है, ताकि यह पता चल सके कि खोदाई से सरकारी संपत्ति को कितना नुकसान पहुंचा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि करीब 52 करोड़ रुपये की सड़क परियोजना के बीच मुरम का स्रोत और खोदाई की अनुमति स्पष्ट क्यों नहीं है? क्या प्रशासन के निरीक्षण के बाद इस मामले की वास्तविकता सामने आएगी, या सरकारी जमीन पर बने कथित ‘मौत के कुएं’ के गहराते जाने के बावजूद कार्रवाई का इंतजार ही करना पड़ेगा?
