सड़क से पंचायत तक निर्माण कार्यों में गुणवत्ता और पारदर्शिता पर उठते सवाल; आरोपों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की जरूरत
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। विकास कार्यों के लिए सरकार से जारी होने वाली राशि आखिर जमीन पर कितना विकास कराती है और कितनी रकम निर्माण की प्रक्रिया में ही बंट जाती है? यह सवाल केवल किसी एक सड़क, नाली या भवन तक सीमित नहीं है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यों को लेकर समय-समय पर सामने आने वाली अनियमितताओं और कथित कमीशनखोरी के आरोपों ने व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं।
सरकार की ओर से सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल भवन, नाली, आहता, सामुदायिक भवन और अन्य विकास कार्यों के लिए बड़ी मात्रा में राशि स्वीकृत की जाती है। उद्देश्य स्पष्ट है—जनता को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना। लेकिन जब किसी निर्माण कार्य में गुणवत्ता को लेकर शिकायत सामने आती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्वीकृत राशि का उपयोग किस तरह हुआ और निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी रही।
पूरी राशि खर्च, फिर काम में कमी क्यों?
निर्माण कार्यों में गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग, इंजीनियर और तकनीकी अमले की होती है। इसके बावजूद यदि सड़क कुछ समय बाद उखड़ने लगे, पुल-पुलिया में दरारें दिखाई देने लगें या नाली पहली बारिश में जवाब दे दे तो निर्माण की गुणवत्ता और निरीक्षण दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।
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स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी समय-समय पर लगाए जाते रहे हैं कि निर्माण कार्यों में कथित रूप से कई स्तरों पर हिस्सेदारी तय होने के कारण ठेकेदार के पास वास्तविक निर्माण पर खर्च करने के लिए अपेक्षित राशि नहीं बचती। हालांकि किसी भी मामले में केवल आरोपों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय संबंधित दस्तावेजों और तकनीकी जांच के आधार पर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है।
पंचायतों तक पहुंची ‘कमीशन संस्कृति’ की चर्चा
पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य गांवों तक विकास और निर्णय प्रक्रिया को पहुंचाना है। ग्राम पंचायतों को विभिन्न योजनाओं के तहत विकास कार्यों के लिए राशि मिलती है। ऐसे में पंचायत स्तर पर होने वाले कार्यों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
कुछ स्थानों पर यह आरोप सामने आते हैं कि प्रभावशाली लोगों द्वारा पसंदीदा ठेकेदार या अपने करीबी व्यक्तियों को काम दिलाने का दबाव बनाया जाता है। कहीं-कहीं कथित कमीशन तय होने की बातें भी सामने आती हैं। इन आरोपों की सत्यता संबंधित विभागीय जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
‘खास लोगों’ की भूमिका पर भी सवाल
विकास कार्यों में कुछ जनप्रतिनिधियों के करीबी लोगों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगाए जाते हैं कि ऐसे लोग ठेके, निर्माण सामग्री की आपूर्ति अथवा अन्य गतिविधियों में प्रभाव का इस्तेमाल कर लाभ हासिल करते हैं।
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यदि किसी सरकारी कार्य में हितों के टकराव की स्थिति है तो उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कार्य निर्धारित नियमों और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के तहत हुआ है या किसी बाहरी प्रभाव की भूमिका रही है।
असली सवाल—गुणवत्ता की निगरानी कौन करे?
विकास कार्य की गुणवत्ता खराब होने का सबसे बड़ा नुकसान जनता को उठाना पड़ता है। सरकारी रिकॉर्ड में काम पूर्ण हो सकता है और भुगतान भी हो सकता है, लेकिन यदि कुछ समय बाद निर्माण क्षतिग्रस्त हो जाए तो जनता के पैसे से कराया गया विकास टिकाऊ नहीं रह जाता।
जरूरत इस बात की है कि बड़े विकास कार्यों की तकनीकी जांच, स्वीकृत राशि का सार्वजनिक विवरण, गुणवत्ता परीक्षण और कार्य पूर्ण होने के बाद भौतिक सत्यापन को प्रभावी बनाया जाए। किसी भी शिकायत पर निष्पक्ष जांच हो और अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदारी तय की जाए।
सरकारी विकास राशि जनता का पैसा है। इसलिए उसका उपयोग भी पारदर्शिता और निर्धारित मापदंडों के अनुसार होना चाहिए। सवाल किसी एक सड़क या भवन का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जिसके आधार पर जनता विकास की उम्मीद करती है।
