प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की कवायद

वर्तमान व्यवस्था में पुलिस के पास लाठीचार्ज या धारा 144 लागू करने जैसे निर्णयों के लिए जिला मजिस्ट्रेट (Collector) की अनुमति अनिवार्य होती है। पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद, पुलिस अधिकारियों के पास मजिस्ट्रेट शक्तियां आ जाएंगी। इसका मतलब है कि कानून-व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले अब सीधे पुलिस कमिश्नर ले सकेंगे। गृह विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, इसके लिए ड्राफ्ट तैयार करने की प्रक्रिया पर चर्चा शुरू हो चुकी है।

बिलासपुर और दुर्ग जैसे न्यायधानी और औद्योगिक केंद्र वाले जिलों में अपराध के बदलते पैटर्न को देखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है। रायपुर में पहले से ही इसे लागू करने की घोषणा हो चुकी है, जिसके बाद अब अन्य बड़े संभागों की बारी है।

सरकार का रुख और आधिकारिक संकेत

“शहरीकरण के साथ सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ी हैं। कानून-व्यवस्था को और अधिक आधुनिक और जवाबदेह बनाने के लिए पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य आम जनता को त्वरित न्याय और सुरक्षा देना है।”
— सरकारी प्रवक्ता, छत्तीसगढ़ शासन

आम नागरिकों पर क्या होगा असर?

इस प्रणाली के लागू होने से पुलिस की कार्यप्रणाली में तेजी आएगी। आम जनता के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि लाइसेंसिंग (हथियार, होटल, बार), धरना-प्रदर्शन की अनुमति और कानून-व्यवस्था से जुड़े काम अब एक ही छत के नीचे हो सकेंगे।

  • त्वरित निर्णय: दंगों या आपातकालीन स्थिति में पुलिस को कलेक्टर के आदेश का इंतजार नहीं करना होगा।
  • बेहतर ट्रैफिक नियंत्रण: ट्रैफिक पुलिस के पास दंड और नियम लागू करने की अधिक स्वायत्तता होगी।
  • जवाबदेही: पुलिस सीधे शासन के प्रति जवाबदेह होगी, जिससे प्रशासनिक देरी कम होगी।

सरकार अगले कैबिनेट सत्र या बजट सत्र के दौरान इस पर आधिकारिक मुहर लगा सकती है। गृह विभाग वर्तमान में इसके लिए पदों के सृजन और आवश्यक बुनियादी ढांचे का आकलन कर रहा है।


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