• सख्त टिप्पणी: CJI सूर्यकांत बोले- क्या अब सभी मौलिक अधिकार मंदिर के गर्भगृह के अंदर ही तय होंगे?
  • कोर्ट का फैसला: मंदिर प्रशासन और कलेक्टर ही तय करेंगे प्रवेश के नियम, अदालत का काम मैनेजमेंट नहीं।
  • दलीलें: वकील विष्णु शंकर जैन ने ‘समानता के अधिकार’ (Article 14) का दिया था हवाला।

उज्जैन. विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन और गर्भगृह में विशेष प्रवेश की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि धार्मिक रीति-रिवाजों और मंदिर प्रबंधन में अदालती दखल की एक सीमा है।

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गर्भगृह में समानता के अधिकार पर कोर्ट का कड़ा रुख

याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की ओर से पेश हुए एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि कलेक्टर की सिफारिश पर वीआईपी लोगों को गर्भगृह में जल चढ़ाने की अनुमति देना आम भक्तों के साथ भेदभाव है। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन बताया। इस पर CJI ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“अगर हम यह मान लें कि गर्भगृह के भीतर अनुच्छेद 14 लागू होता है, तो कल लोग अनुच्छेद 19 (बोलने की आजादी) का दावा करेंगे और कहेंगे कि हमें वहां मंत्र पढ़ने या कुछ भी बोलने का अधिकार है। क्या सारे मौलिक अधिकार अब गर्भगृह के अंदर ही मांगेंगे?”
— जस्टिस सूर्यकांत, मुख्य न्यायाधीश

‘अदालतें मंदिर प्रशासन नहीं चला सकतीं’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर के भीतर किसे प्रवेश देना है और किसे नहीं, यह तय करना मंदिर प्रबंधन समिति और जिम्मेदार प्राधिकारियों का काम है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि अदालतें हर मंदिर की दर्शन व्यवस्था रेगुलेट करने लगेंगी, तो यह न्यायपालिका के भार को अनावश्यक रूप से बढ़ा देगा। बेंच ने यह भी कहा कि इस तरह की याचिकाएं अक्सर ‘असली श्रद्धालुओं’ द्वारा नहीं लगाई जातीं।

क्या था पूरा विवाद? (Context)

याचिका में मांग की गई थी कि गर्भगृह में प्रवेश के लिए एक ‘यूनिफॉर्म पॉलिसी’ होनी चाहिए। आरोप था कि रसूखदार लोग आसानी से शिवलिंग तक पहुंच जाते हैं, जबकि आम भक्तों को घंटों कतार में लगने के बाद भी दूर से ही दर्शन करने पड़ते हैं। इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी अगस्त 2025 में इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि ‘VIP’ शब्द की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है और यह प्रशासन का विवेक है।


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