छतरपुर की दो कमार बेटियां लिख रहीं संघर्ष की ऐसी कहानी, जो सरकारी दावों पर खड़े कर रही बड़े सवाल
छुरा (गंगा प्रकाश)। जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसे ग्राम छतरपुर में दो ऐसी बेटियां हैं, जिनकी जिंदगी किसी किताब की कहानी से कम नहीं है। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया। घर में न सहारा बचा, न मजबूत आर्थिक आधार। लेकिन इन हालातों के आगे झुकने के बजाय दोनों बहनों ने किताबों को अपना साथी बना लिया और शिक्षा को अपनी ताकत।
विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समाज से आने वाली मोनिका कमार (कक्षा 11वीं) और राधिका कमार (कक्षा 9वीं) आज भी हर दिन स्कूल पहुंच रही हैं। गरीबी है, संघर्ष है, अभाव हैं, लेकिन सपनों की लौ अब भी जल रही है।
विडंबना यह है कि जिन बच्चियों को शासन की योजनाओं का सबसे ज्यादा लाभ मिलना चाहिए था, वे आज भी अपने दम पर संघर्ष कर रही हैं। ग्रामीण बताते हैं कि माता-पिता के निधन के बाद लगभग दस साल बीत गए, लेकिन ग्राम पंचायत सचिव से लेकर जनपद पंचायत के सीईओ तक किसी ने यह जानने की जरूरत नहीं समझी कि आखिर ये बच्चियां कैसे जीवन गुजार रही हैं, पढ़ाई कैसे कर रही हैं और किन परिस्थितियों से गुजर रही हैं।
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सरकारी फाइलों में विकास, जमीन पर संघर्ष
कमार जनजाति के उत्थान के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। बैठकों में योजनाएं बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती हैं, उपलब्धियों के दावे किए जाते हैं। लेकिन छतरपुर की इन दो बेटियों की जिंदगी उन दावों की हकीकत बयां कर रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी योजना का उद्घाटन हो, किसी निर्माण कार्य का भुगतान हो या किसी फाइल पर हस्ताक्षर करने हों तो अधिकारी-कर्मचारी तुरंत सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन जब किसी अनाथ और जरूरतमंद बच्ची के भविष्य की बात आती है तो जिम्मेदारों की संवेदनशीलता कहीं खो जाती है।
किताबों से बदलना चाहती हैं किस्मत
कभी वनोपज और आखेट पर निर्भर रहने वाले कमार समाज की ये बेटियां अब शिक्षा के जरिए अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। उनका सपना है कि पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनें और अपने समाज के बच्चों के लिए प्रेरणा बनें।
इनकी कहानी सिर्फ दो बहनों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस जज्बे की कहानी है जो विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद नहीं छोड़ता। साथ ही यह उस व्यवस्था से भी सवाल पूछती है, जो विशेष पिछड़ी जनजातियों के विकास के बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन कई बार सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने में नाकाम दिखाई देती है।
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सबसे बड़ा सवाल
जब माता-पिता नहीं रहे, तब इन बच्चियों का सहारा कौन बना?
जब संघर्ष बढ़ा, तब किसने उनका हाथ थामा?
और जब सरकार की योजनाएं इनके नाम पर बनीं, तब उनका लाभ आखिर कहां पहुंचा?
छतरपुर की इन दो बेटियों की आंखों में आज भी सपने हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे अपने सपनों को किसी सरकारी मदद के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और हौसले के दम पर पूरा करने की कोशिश कर रही हैं।
