गरियाबंद/छुरा/देवभोग (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती जिला गरियाबंद उड़ीसा राज्य से सटा होने के कारण वर्षों से अंतरराज्यीय अपराधों की चुनौती झेलता आ रहा है। जिले के छुरा और देवभोग ब्लॉक सीधे उड़ीसा सीमा से लगे हुए हैं, जिससे तस्करी के विभिन्न अवैध रास्ते प्राकृतिक रूप से बन गए हैं। हाल के वर्षों में उड़ीसा से छत्तीसगढ़ में होने वाले गैरकानूनी कार्यों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। गरियाबंद पुलिस कप्तान के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बाद मादक पदार्थों, अवैध शराब, वन्यजीव तस्करी और हाल के दिनों में अवैध धान परिवहन पर बड़ी कार्रवाई ने जिले में कानून-व्यवस्था को मजबूत करने का संदेश जरूर दिया है।

पुलिस द्वारा गांजा तस्करी, ओडिसा से लाई जा रही अवैध शराब, पेंगुलिन, तेंदुआ खाल और अन्य वन्यजीव तस्करों के विरुद्ध लगातार अभियान चलाया गया है। हाल ही में अवैध धान तस्करों पर की गई करोड़ों रुपये की जब्ती और वाहनों को सीज किए जाने की कार्रवाई पूरे जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पुलिस प्रशासन सीमा पार अपराधों को लेकर गंभीर है और सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

लेकिन गौ-तस्करी पर कार्रवाई क्यों कमजोर?

हालांकि इन तमाम सख्त कार्रवाइयों के बीच एक गंभीर सवाल लगातार उठ रहा है—क्या गरियाबंद जिला प्रशासन गौ-तस्करी को रोकने में विफल साबित हो रहा है?

स्थानीय ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों और गौ-रक्षा से जुड़े लोगों का आरोप है कि उड़ीसा की ओर से बड़ी संख्या में गौ-तस्कर सीमा पार कर छत्तीसगढ़ के भीतर घुसपैठ कर रहे हैं और निर्दोष गायों को अवैध कत्लखानों तक पहुंचाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि यह नेटवर्क छुरा और देवभोग क्षेत्र में सक्रिय है, जहां से रात के अंधेरे में गौवंश को ट्रक, पिकअप और अन्य वाहनों के माध्यम से उड़ीसा पहुंचाया जाता है।

सबसे चिंताजनक आरोप यह है कि इस पूरे अवैध कारोबार को कुछ स्थानीय तथाकथित सहयोगियों का संरक्षण मिल रहा है, जो मोटी रकम के लालच में इन तस्करों के नेटवर्क का हिस्सा बन गए हैं। यही कारण बताया जा रहा है कि कई बार स्पष्ट सूचना मिलने के बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती।

ग्रामीणों में आक्रोश, गौ-रक्षकों में निराशा

देवभोग और छुरा क्षेत्र के कई गांवों में इस मुद्दे को लेकर जबरदस्त आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि गौ-माता केवल धार्मिक आस्था का विषय ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं। उनके साथ हो रही क्रूरता और अवैध तस्करी समाज को भीतर से झकझोर रही है।

गौ-रक्षा संगठनों का आरोप है कि कई बार प्रशासन को मौखिक और लिखित शिकायतें दी गईं, लेकिन कुछ मामलों को छोड़ दिया जाए तो बड़े तस्कर अब भी खुलेआम सक्रिय हैं। उनका यह भी कहना है कि जिस सख्ती से गांजा, शराब और धान तस्करी पर कार्रवाई होती है, यदि उसी स्तर की तत्परता गौ-तस्करी के मामले में दिखाई जाए, तो इस अपराध पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सकती है।

प्रशासन की भूमिका पर उठते सवाल

इस पूरे मामले ने जिला प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर जब पुलिस अन्य अंतरराज्यीय अपराधों पर सफलतापूर्वक अंकुश लगा सकती है, तो गौ-तस्करी जैसे जघन्य अपराध को रोकने में कमजोरी क्यों?
क्या इसके पीछे संसाधनों की कमी है, सीमावर्ती मार्गों की निगरानी में चूक है, या फिर कहीं न कहीं तंत्र की मिलीभगत भी इस नेटवर्क को हवा दे रही है—यह बड़ा प्रश्न बना हुआ है।

सूत्रों की मानें तो कुछ क्षेत्रों में पुलिस गश्त नियमित नहीं है, वहीं कुछ संवेदनशील रास्तों पर स्थायी चेक पोस्ट की भी सख्त जरूरत बताई जा रही है। यदि इन मार्गों पर निरंतर निगरानी रखी जाए, तो तस्करों की आवाजाही को काफी हद तक रोका जा सकता है।

जनता की मांग—निर्णायक कार्रवाई हो

अब जिले की जनता, सामाजिक संगठनों और गौ-रक्षा समितियों की एक ही मांग है कि गौ-तस्करी को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए, जितना अन्य अपराधों को लिया जा रहा है। सीमा पर संयुक्त छापेमारी, ड्रोन के जरिए निगरानी, रात्रि गश्त बढ़ाने और स्थानीय संदिग्धों पर कड़ी नजर रखने की मांग जोर पकड़ रही है।

इसके साथ ही यह भी अपेक्षा की जा रही है कि यदि किसी भी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है, तो उस पर भी सख्त कार्रवाई हो, ताकि अपराधियों के हौसले पूरी तरह पस्त किए जा सकें।


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