प्रकाश कुमार यादव
गरियाबंद/फिंगेश्वर(गंगा प्रकाश)। पराली जलाने पर प्रशासनिक प्रतिबंध और सरकारी चेतावानियों के बावजूद दूरस्त अंचल के खेतों में किसान द्वारा पराली जलाई जा रही है। इस कार्य से न केवल वायु प्रदूशण का गंभीर खतरा पैदा हो रहा है बल्कि कलेक्टर द्वारा जारी स्पश्ट निर्देशों की भी खुली अवहेलना हो रही है। जानकारी के अनुसार दुरस्त अंचल में कई किसानों ने धान की कटाई के बाद बचे अवशेश को आग के हवाले करना जारी रखा है। ग्रामीण इलाकों से उठते धुएं के गुबार ने स्थानीय पर्यावरण और वायु गुणवत्ता पर प्रतिकुल प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। यह देखते हुए हैरानी होती है कि यह सब कलेक्टर द्वारा पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध के आदेश और संभावित कानूनी कार्यवाही की चेतावनी के बाद हो रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि शाम ढलते ही कई खेतों में आग लगाई जा रही है। हमने धुएं की कालिमा और आग की लपटें देखी, एक ग्रामीण ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, यह हर साल का चलन बन गया है, लेकिन इस बार प्रशासन की सख्ती के बावजूद ऐसा हो रहा है। किसानों से बातचीत में उनका तर्क है कि अगली फसल की तैयारी के लिए उनके पास पराली हटाने का कोई सस्ता और आसान विकल्प नहीं है। वे मशीनीकृत समाधानों की उच्च लागत और समय की कमी का हवाला दे रहे हैं। हालांकि यह तर्क प्रशासनिक अधिकारियों को स्वीकार्य नहीं लग रहा। प्रशासन की ओर से दिए गए एक बयान में कहा गया है कि पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी की जा रही है और ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्यवाही की जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाने और पराली प्रबंधन के वैकल्पिक तरीके उपलब्ध कराने का भी दावा किया गया है। लेकिन, जमीनी स्तर पर इन उपायों का असर दिखाई नहीं दे रहा है। इस स्थिति ने एक बार फिर सवाल खड़े किए है कि क्या केवल निर्देश जारी करने भर से इस गंभीर समस्या का समाधान संभव है ? विशेशज्ञों का मानना है कि किसानों को व्यवहारिक और किफायती विकल्प उपलब्ध कराए बिना, तथा उन्हें दंडात्मक उपायों के बजाय प्रोत्साहन दिए बिना इस चुनौती पर काबू पाना मुश्किल है। जब तक किसानों की व्यवहारिक समस्याओं का हल नहीं निकाला जाता, तब तक प्रतिबंध के बावजूद खेतां में आग लगती रहेगी और हवा में जहर घुलता रहेगा।
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