शासन की लाखों की योजना धूल फांक रही, निजी अस्पतालों की चांदी – जनता का दर्द उभरकर सामने


छुरा (गंगा प्रकाश)। शासन की ओर से स्वास्थ्य सुविधाओं को ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इन योजनाओं की पोल खोल देती है। ताज़ा उदाहरण है छुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र। यहां पहली बार शासन ने सोनोग्राफी मशीन उपलब्ध कराई, ताकि ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों को जांच के लिए दूर शहरों तक न जाना पड़े। लेकिन हकीकत यह है कि मशीन आए 3 से 4 माह हो चुके हैं और अब तक एक भी जांच नहीं हुई है। लाखों रुपए की यह मशीन अस्पताल के कमरे में धूल फांक रही है।

विभागीय अधिकारी कुंभकरणीय नींद में

छुरा अस्पताल में सोनोग्राफी मशीन तो आ गई, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति आज तक नहीं हुई। विभागीय अफसर इस मसले पर बिल्कुल कुंभकरणीय नींद में सोए हुए हैं। शासन की ओर से करोड़ों की राशि खर्च कर मशीन तो भेज दी गई, लेकिन उसे चलाने वाले विशेषज्ञ की व्यवस्था करना भूल गए। नतीजा यह कि ग्रामीणों को सिर्फ सपना दिखाया गया – सुविधा का लाभ अब तक किसी को नहीं मिला।

बीएमओ कीर्तन साहू ने भी साफ स्वीकार किया है कि “रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति न होने के कारण मशीन का संचालन संभव नहीं हो पा रहा है।” यानी जिम्मेदार अधिकारी जानते हुए भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

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 गरीब मरीजों के साथ हो रहा मजाक

यह स्थिति ग्रामीणों के लिए किसी मजाक से कम नहीं। अस्पताल में मशीन बंद है और जांच के लिए उन्हें गरियाबंद या रायपुर जाना पड़ता है।

सोनोग्राफी जांच का खर्च निजी अस्पतालों में लगभग 1200 रुपए।वाहन किराया मिलाकर कुल खर्च 3000 से 4000 रुपए तक।गांव के गरीब परिवारों के लिए यह बोझ असहनीय है।

ग्राम छुरा के कृष्णा यादव बताते हैं – “सरकारी अस्पताल में मशीन होते हुए भी हमें बाहर जाना पड़ता है। चार हजार रुपए का खर्च एक गरीब परिवार के लिए किसी सजा से कम नहीं। अगर यही हाल रहा तो इलाज कराना हमारे बस की बात नहीं।

 निजी अस्पतालों की बल्ले-बल्ले

सरकारी मशीन के बंद रहने से निजी अस्पतालों की चांदी हो गई है। रायपुर और छुरा के क्लीनिक मरीजों से मनमाना पैसा वसूल रहे हैं। ग्रामीण कहते हैं कि यह पूरा खेल जानबूझकर की गई लापरवाही जैसा लगता है। “सरकारी मशीन बंद, मरीज मजबूर और निजी अस्पताल मालामाल।”

 जनता का तंज – योजना या छलावा?

ग्रामीणों का सवाल बिल्कुल सीधा है – जब रेडियोलॉजिस्ट की व्यवस्था ही नहीं थी तो मशीन क्यों भेजी गई? क्या यह सिर्फ दिखावा था या फिर सरकारी पैसों की बर्बादी? लोग अब यह तक कहने लगे हैं कि यह मशीन छुरा के लिए ‘ड्रीमगर्ल’ बन गई है – जिसे जनता सिर्फ दूर से देख सकती है, उसका लाभ नहीं उठा सकती।

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 महिलाओं और प्रसूताओं पर दोहरी मार

सबसे ज्यादा परेशानी प्रसूता महिलाओं को हो रही है। गर्भवती महिलाओं की सोनोग्राफी जांच न हो पाने से परिजन मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। कई परिवारों को कर्ज लेकर जांच करानी पड़ रही है। एक महिला के पति ने बताया – सरकारी मशीन अगर चालू होती तो सौ रुपए में काम हो जाता, लेकिन हमें 4000 रुपए खर्च करने पड़े। यह गरीब आदमी की जेब पर सीधा डाका है।

 लाखों की मशीन धूल फांक रही

करीब चार महीने से यह मशीन अस्पताल में बेकार पड़ी हुई है। न इसकी देखभाल हो रही है और न ही इसका कोई उपयोग। अगर यही हाल रहा तो आने वाले महीनों में यह मशीन खराब हो सकती है और शासन की लाखों की राशि पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी।

 तत्काल समाधान की मांग

समाजसेवी मनोज पटेल, कांग्रेस नेता अशोक दीक्षित,जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने शासन से मांग की है कि छुरा अस्पताल में तुरंत रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति की जाए। यदि विभाग ने अब भी आंखें बंद रखीं तो यह मशीन कबाड़ हो जाएगी और छुरा की जनता निजी अस्पतालों की लूट का शिकार बनती रहेगी।

छुरा अस्पताल की सोनोग्राफी मशीन, जो ग्रामीणों के लिए उम्मीद की किरण थी, अब लापरवाही का प्रतीक बन गई है। विभागीय अधिकारी कुंभकरणीय नींद में सो रहे हैं और जनता महंगे इलाज का बोझ ढो रही है। सवाल अब यह है कि शासन कब जागेगा और छुरा की जनता को उनका हक दिलाएगा?


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