संपादकीय
प्रकाश कुमार यादव
प्रधान संपादक, गंगा प्रकाश
आज देश और समाज के सामने अनेक चुनौतियां हैं, लेकिन इनमें एक चुनौती ऐसी है जो दिखाई कम देती है और आने वाली पीढ़ी को भीतर से कमजोर करने की क्षमता रखती है। वह चुनौती है—बढ़ता नशे का जाल। चिंता तब और बढ़ जाती है, जब इस जाल में किशोर और नाबालिग बच्चे भी फंसते नजर आने लगते हैं।
जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें, खेल का सामान और सपनों की उड़ान होनी चाहिए, उस उम्र में यदि उनके हाथ नशीले पदार्थ पहुंच रहे हैं, तो यह केवल परिवार की चिंता नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है।
सबसे बड़ा सवाल—बच्चों तक नशा पहुंच कैसे रहा है?
आज हर अभिभावक, शिक्षक, समाज और प्रशासन को यह सवाल खुद से पूछना चाहिए। आखिर नशीले पदार्थ बच्चों तक पहुंच कैसे रहे हैं? कौन उन्हें इसकी ओर आकर्षित कर रहा है? कौन उन्हें नशे की पहली खुराक दे रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—इस पूरे नेटवर्क के पीछे कौन लोग हैं?
किसी बच्चे का नशे की गिरफ्त में आ जाना केवल उस बच्चे की गलती मान लेना आसान है, लेकिन समस्या इतनी सरल नहीं है। नाबालिग उम्र में बच्चे कई बार संगति, जिज्ञासा, दबाव, अनुकरण या परिस्थितियों के कारण गलत आदतों की ओर बढ़ जाते हैं। ऐसे समय में उन्हें केवल डांटने या सामाजिक रूप से अलग करने के बजाय समझने और सही दिशा देने की जरूरत होती है।
लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि बच्चों को नशा उपलब्ध कराने वाले लोगों तक कानून की पहुंच हो। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक लाभ के लिए बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है, तो उसके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई होना आवश्यक है।
बच्चे अपराध की शुरुआत नहीं, समाज की जिम्मेदारी हैं
नशे की गिरफ्त में आए नाबालिगों को केवल अपराधी के नजरिए से देखना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। उनके पीछे परिवार है, स्कूल है, समाज है और एक पूरा वातावरण है।
कई बार बच्चे अपने आसपास के लोगों को देखकर आदतें सीखते हैं। कई बार गलत मित्र मंडली उन्हें ऐसी गतिविधियों की ओर ले जाती है। ऐसे में बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना बेहद जरूरी है।
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माता-पिता को बच्चों के व्यवहार में अचानक आने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। बच्चे का अकेले रहना, पढ़ाई से दूरी बनाना, चिड़चिड़ापन, संदिग्ध संगति या व्यवहार में अचानक परिवर्तन जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन निगरानी के साथ विश्वास और संवाद भी जरूरी है।
स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
स्कूल केवल शिक्षा देने की जगह नहीं हैं। वे बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र हैं। इसलिए शिक्षण संस्थानों में नशे के दुष्प्रभावों को लेकर नियमित जागरूकता कार्यक्रम, काउंसलिंग और बच्चों से खुलकर संवाद की व्यवस्था होनी चाहिए।
बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि नशा बुरा है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि नशे की शुरुआत किस तरह होती है, इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार और भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है और यदि कोई बच्चा पहले से इसकी गिरफ्त में है तो उसे सहायता कहां से मिल सकती है।
प्रशासन को जड़ तक पहुंचना होगा
नशे के खिलाफ अभियान केवल छापेमारी और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं होना चाहिए। कार्रवाई के साथ-साथ रोकथाम और पुनर्वास पर भी समान ध्यान देना होगा।
विशेष रूप से स्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थानों के आसपास संदिग्ध गतिविधियों पर निगरानी, नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री पर कार्रवाई, शिकायतों पर त्वरित जांच और बच्चों तक नशा पहुंचाने वाले नेटवर्क की पहचान जरूरी है।
यदि कोई नाबालिग नशे की गिरफ्त में मिलता है, तो उसके मामले में कानून के अनुरूप कार्रवाई के साथ-साथ उसकी काउंसलिंग और पुनर्वास की व्यवस्था भी होनी चाहिए। क्योंकि बच्चे को नशे से बाहर निकालना केवल एक कार्रवाई नहीं, बल्कि उसके जीवन को दोबारा पटरी पर लाने की प्रक्रिया है।
परिवार की चुप्पी भी समस्या को बढ़ा सकती है
कई परिवार सामाजिक बदनामी के डर से बच्चे की समस्या को छिपाने लगते हैं। यही चुप्पी कई बार समस्या को और गंभीर बना देती है। यदि बच्चे को समय रहते सहायता मिल जाए तो स्थिति को संभालना संभव है।
परिवार को यह समझना होगा कि बच्चे की गलती पर केवल गुस्सा करना समाधान नहीं है। उसे सुनना, समझना और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना भी उतना ही जरूरी है।
आज का बच्चा ही कल का भारत है
हम अक्सर कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य हैं। लेकिन भविष्य केवल कहने से सुरक्षित नहीं होगा। इसके लिए वर्तमान में बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना होगा।
जिस बच्चे के हाथ में आज किताब होनी चाहिए, यदि उसके हाथ में नशीला पदार्थ पहुंच रहा है तो यह हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय है। सवाल केवल उस बच्चे से नहीं पूछा जाना चाहिए कि उसने नशा क्यों किया। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस तक नशा पहुंचा कैसे और पहुंचाने वाला कौन था?
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यह लड़ाई किसी एक विभाग की नहीं है। पुलिस को अवैध कारोबार पर कार्रवाई करनी होगी, प्रशासन को निगरानी और जागरूकता बढ़ानी होगी, स्कूलों को काउंसलिंग की व्यवस्था करनी होगी, परिवारों को बच्चों से संवाद करना होगा और समाज को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
अब सवाल रोकथाम का है
नशे की समस्या को समाप्त करने के लिए केवल अभियान चलाकर तस्वीरें खिंचवाना पर्याप्त नहीं होगा। अभियान का असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए। बच्चों में जागरूकता बढ़े, नशा बेचने वालों पर कार्रवाई हो, प्रभावित बच्चों को उपचार और परामर्श मिले और अभिभावकों को भी सही मार्गदर्शन उपलब्ध हो—इन सभी स्तरों पर काम करना होगा।
क्योंकि नशे की गिरफ्त में आया हर बच्चा केवल एक परिवार की चिंता नहीं है, वह समाज के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
आज जरूरत है कि हम बच्चों को डराने के बजाय उन्हें समझाएं, दोष देने के बजाय उन्हें संभालें और नशा करने वाले नाबालिगों तक पहुंचने से पहले नशे की उस आपूर्ति व्यवस्था तक पहुंचें जो उन्हें यह नशीला पदार्थ उपलब्ध करा रही है।
बच्चों का बचपन बचाना होगा। उनके सपनों को बचाना होगा। क्योंकि यही बच्चे कल देश का भविष्य गढ़ेंगे।
और आने वाली पीढ़ी हमसे यही सवाल पूछेगी—
जब नशा उनके दरवाजे तक पहुंच रहा था, तब समाज और शासन-प्रशासन ने उसे रोकने के लिए क्या किया था?
संपादकीय लेखक – प्रकाश कुमार यादव
प्रधान संपादक, गंगा प्रकाश मो.नं.-9340038896
