रमेश दास महंत

सक्ती/सलनी (गंगा प्रकाश)। सक्ती जिले के तहसील भोथिया के अंतर्गत ग्राम पंचायत सलनी से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल पंचायती राज की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और शासकीय संपत्तियों की सुरक्षा को भी दांव पर लगा दिया है। आरोप है कि “शासकीय बड़े झाड़ के जंगल” की सुरक्षित भूमि पर एक निजी महाविद्यालय, कालिंद्री तिलकराम चंद्रा महाविद्यालय, का संचालन किया जा रहा है।

नियमों को ताक पर रखकर ‘निजी लाभ’ का खेल

स्थानीय नागरिकों द्वारा ग्राम पंचायत सचिव को सौंपे गए एक कड़े आवेदन पत्र ने इस विवाद को हवा दे दी है। आवेदन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शासकीय बड़े झाड़ जंगल की भूमि पर किसी व्यक्ति विशेष या निजी संस्था को लाभ पहुँचाने के लिए पंचायत द्वारा प्रस्ताव पारित करना पूरी तरह से गैर-संवैधानिक और वन विभाग के नियमों के विरुद्ध है।

कानूनी रूप से, बड़े झाड़ के जंगल की भूमि राज्य की संपत्ति होती है, जिसका संरक्षण वन एवं राजस्व विभाग के अधीन होता है। पंचायत के पास ऐसी भूमि को किसी निजी संस्था को हस्तांतरित करने या उस पर निर्माण का प्रस्ताव देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

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 बड़े सवाल: प्रशासन मौन क्यों?

समाचार रिपोर्ट के अनुसार, यदि इस सुरक्षित भूमि पर आलीशान भवन बनाकर निजी महाविद्यालय चलाया जा रहा है, तो यह सीधे तौर पर अतिक्रमण की श्रेणी में आता है। जनता अब प्रशासन से कुछ तीखे सवाल पूछ रही है:

  • क्या इस भूमि का विधिवत लीज़ या हस्तांतरण आदेश शासन द्वारा दिया गया है?
  • यदि नहीं, तो इतने वर्षों से प्रशासन की नाक के नीचे यह अवैध निर्माण कैसे फल-फूल रहा है?
  • ग्राम पंचायत ने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर निजी हित में प्रस्ताव क्यों दिए?

फीस वसूली और पारदर्शिता का संकट

महाविद्यालय की वैधता पर उठते सवालों के बीच छात्रों और पालकों की मेहनत की कमाई भी चर्चा में है। यदि संस्थान अवैध भूमि पर खड़ा है, तो वहां से की जा रही भारी-भरकम फीस वसूली की वैधानिकता भी संदिग्ध हो जाती है। क्या विद्यार्थियों के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ न्यायसंगत है?

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 जनता की मांग निष्कासन और जवाबदेही

ग्रामीणों ने अपने आवेदन में स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस प्रकार के प्रस्तावों पर रोक नहीं लगाई गई और शासकीय भूमि को मुक्त नहीं कराया गया, तो पंचायत प्रशासन स्वयं जिम्मेदार होगा। नागरिकों की मांग है कि:

  1.  निष्पक्ष जांच: जिला कलेक्टर सक्ती, वन विभाग और उच्च शिक्षा विभाग संयुक्त रूप से इसकी जांच करें।
  2.  भूमि मुक्तिकरण:यदि अतिक्रमण सिद्ध होता है, तो भवन का निष्कासन कर भूमि को पुनः शासकीय अभिलेखों के अनुसार मुक्त कराया जाए।
  3.  कठोर कार्यवाही: दोषियों पर अनुशासनात्मक और वैधानिक कार्यवाही की जाए ताकि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न हो।

शिक्षा समाज का आधार है, उसे निजी लाभ और अवैध कब्जों का जरिया बनाना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक न्याय के भी विरुद्ध है। अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन इस ‘बड़े झाड़ के जंगल’ की सुरक्षा सुनिश्चित करे और जनहित को सर्वोपरि रखे।


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