166 आरोपियों का दावा— टाइगर रिजर्व की भूमि नहीं, पूर्वजों की निजी जमीन पर कर रहे खेती

वन विभाग ने कहा— ISRO उपग्रह चित्र, GPS सर्वे और ड्रोन मैपिंग में कोर क्षेत्र में अतिक्रमण की पुष्टि

247 हेक्टेयर निजी भूमि पहले से होने के बावजूद कोर क्षेत्र में फैलाया गया कब्जा, जांच और कानूनी कार्रवाई तेज

गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। छत्तीसगढ़ के चर्चित उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में अवैध अतिक्रमण, वन कटाई और पर्यावरणीय क्षति से जुड़े मामले में अब नया मोड़ सामने आया है। सीतानदी कोर क्षेत्र अंतर्गत जैतपुरी ग्राम के 166 आरोपियों ने वन विभाग द्वारा की जा रही कार्रवाई के बीच अपने लिखित जवाब में दावा किया है कि वे टाइगर रिजर्व की वन भूमि पर नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों से प्राप्त निजी भूमि पर खेती कर रहे हैं। आरोपियों का कहना है कि संबंधित भूमि टाइगर रिजर्व क्षेत्र के बाहर स्थित है और वे वर्षों से वहां कृषि कार्य करते आ रहे हैं।

हालांकि वन विभाग ने आरोपियों के इस दावे को उपलब्ध अभिलेखों और तकनीकी जांच के विपरीत बताते हुए गंभीर आपत्ति जताई है। विभाग का कहना है कि अब तक की जांच में मिले वैज्ञानिक साक्ष्य स्पष्ट रूप से कोर क्षेत्र में अतिक्रमण और वन विनाश की पुष्टि करते हैं। विभाग के अनुसार ISRO के CARTOSAT उपग्रह चित्र, GPS सर्वेक्षण, ड्रोन मैपिंग और जमीनी निरीक्षण में यह प्रमाणित हुआ है कि वर्ष 2011 से लगातार संरक्षित वन क्षेत्र में अतिक्रमण बढ़ता गया और खेती के नाम पर जंगल की भूमि का विस्तारपूर्वक उपयोग किया गया।

106 हेक्टेयर क्षेत्र में अतिक्रमण, सैकड़ों पेड़ों की कटाई का दावा

वन विभाग की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के अनुसार लगभग 106 हेक्टेयर वन भूमि पर अतिक्रमण पाया गया है। जांच में यह भी सामने आया कि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वन संपदा को नुकसान पहुंचाया गया। विभाग के मुताबिक 237 वृक्ष काटे गए, 574 वृक्षों को चारों ओर से घेरकर सुखाया गया तथा कई स्थानों पर ठूंठ जलाने और जंगल साफ कर खेती योग्य भूमि तैयार करने के प्रमाण मिले हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां न केवल वन कानूनों का उल्लंघन हैं बल्कि इससे टाइगर रिजर्व की जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को भी गंभीर क्षति पहुंची है।

वन अधिकारियों के अनुसार यह मामला केवल अतिक्रमण तक सीमित नहीं है, बल्कि संरक्षित वन क्षेत्र में व्यवस्थित तरीके से पर्यावरणीय नुकसान पहुंचाने का गंभीर प्रकरण बन चुका है। विभाग का मानना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर व्यापक असर पड़ सकता है।

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पहले से 247 हेक्टेयर निजी भूमि होने की जानकारी

वन विभाग ने यह भी खुलासा किया है कि राजस्व विभाग से प्राप्त अभिलेखों के अनुसार संबंधित 166 आरोपियों के पास पहले से ही लगभग 247 हेक्टेयर यानी करीब 610 एकड़ निजी भूमि राजस्व क्षेत्र में उपलब्ध है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि पर्याप्त निजी भूमि होने के बावजूद संरक्षित वन क्षेत्र में खेती और कब्जे की आवश्यकता क्यों पड़ी।

विभागीय सूत्रों के अनुसार मामले के आर्थिक पहलुओं की भी जांच की जा रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि कहीं अवैध कब्जे और वन भूमि के दोहन से अर्जित आय के माध्यम से नई संपत्तियां तो नहीं खरीदी गईं। अधिकारियों का कहना है कि आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक अपराध और संपत्ति संबंधी पहलुओं की भी अलग से जांच कराई जा सकती है।

कई आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिकाएं हो चुकी निरस्त

वन विभाग ने बताया कि मामले में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, भारतीय वन अधिनियम और अन्य प्रासंगिक कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई की जा रही है। कई आरोपियों द्वारा जिला न्यायालय में दायर अग्रिम जमानत याचिकाएं पहले ही निरस्त की जा चुकी हैं। विभाग का कहना है कि पूरे प्रकरण की जांच वैज्ञानिक और कानूनी आधार पर की जा रही है तथा उपलब्ध सभी साक्ष्यों का परीक्षण जारी है।

अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच में किसी भी पक्ष के साथ पक्षपात नहीं किया जाएगा और तथ्य एवं दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। विभाग ने संकेत दिए हैं कि यदि भविष्य में और साक्ष्य सामने आते हैं तो कार्रवाई का दायरा और बढ़ाया जा सकता है।

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प्रभावित क्षेत्र में शुरू होगा फॉरेस्ट रेस्टोरेशन कार्य

वन विभाग ने बताया कि जिन क्षेत्रों में वन क्षति और अतिक्रमण के प्रमाण मिले हैं वहां बड़े स्तर पर फॉरेस्ट रेस्टोरेशन कार्य प्रारंभ किया जाएगा। इसके तहत जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण, कंटूर ट्रेंच, चेकडैम, मिट्टी संरक्षण कार्य तथा फेंसिंग के भीतर फलदार और स्थानीय प्रजातियों के पौधों का वृक्षारोपण किया जाएगा।

विभाग का कहना है कि इसका उद्देश्य केवल अतिक्रमण हटाना नहीं, बल्कि प्रभावित पारिस्थितिकी तंत्र को दोबारा विकसित करना और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित बनाना है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व राज्य की महत्वपूर्ण जैव विविधता धरोहरों में शामिल है और इसकी सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाना आवश्यक है।

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