योग शिक्षक नहीं, फिर भी हर साल करोड़ों की किताबें!

“शासन की दोहरी नीति से बर्बाद हो रही हैं बच्चों की शिक्षा और योग जैसे अमूल्य विषय की गरिमा” — योगाचार्य मिथलेश सिन्हा का गंभीर आरोप

छुरा (गंगा प्रकाश)। योग शिक्षक नहीं, फिर भी हर साल करोड़ों की किताबें! शिक्षा के क्षेत्र में योग को लेकर छत्तीसगढ़ शासन की नीतियां कहीं न कहीं नौकरशाही असंवेदनशीलता और नीति-निर्माण की खोखली सोच को उजागर कर रही हैं। शिक्षा के पाठ्यक्रम में भले ही योग विषय को शामिल कर दिया गया हो, लेकिन योग शिक्षकों की नियुक्ति न होना इस पूरे प्रयास को मजाक बना देता है। यही कहना है छुरा क्षेत्र के वरिष्ठ योगाचार्य और योग विषय में परास्नातक उपाधि प्राप्त मिथलेश कुमार सिन्हा का।

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योग की किताबें हैं, लेकिन शिक्षक नहीं!

हर साल छत्तीसगढ़ शासन द्वारा प्रदेश के सभी शासकीय स्कूलों में कक्षा तीसरी से दसवीं तक के विद्यार्थियों के लिए योग विषय की पुस्तकें तीन चरणों में वितरित की जाती हैं—

  1. भाग 1: कक्षा 3 से 5 तक
  2. भाग 2: कक्षा 6 से 8 तक
  3. भाग 3: कक्षा 9 से 10 तक

इन किताबों की छपाई, वितरण और भंडारण पर शासन द्वारा करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन किताबों को पढ़ाने के लिए कोई योग्य योग शिक्षक ही नहीं है। स्कूलों में गणित, विज्ञान, अंग्रेजी जैसे विषयों के लिए शिक्षकों की नियुक्ति होती है, लेकिन योग जैसे जीवनदायिनी विषय को पढ़ाने के लिए कोई इंतजाम नहीं।

“सरकार सिर्फ किताबें बांटकर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। जब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होगी, तब तक ये किताबें सिर्फ रद्दी में बदलती रहेंगी,” — योगाचार्य मिथलेश सिन्हा

भारत से निकले योग को भारत में ही नहीं मिल रही प्राथमिकता

जब पूरी दुनिया योग की महत्ता को समझकर अपना रही है — अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों में योग ट्रेनर की मांग बढ़ रही है, तब भारत में, विशेषकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में शासन की उदासीनता शर्मनाक है। योगाचार्य सिन्हा का मानना है कि भारत ने पूरी दुनिया को योग दिया, लेकिन आज वह अपनी ही धरोहर को सरकारी नीति की विफलता की वजह से भूलता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि योग न सिर्फ शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का माध्यम है, बल्कि यह बच्चों में संस्कार, अनुशासन, आत्मबल और देशभक्ति जैसे मूल्यों का भी विकास करता है।

क्यों जरूरी है योग शिक्षा?

योगाचार्य मिथलेश सिन्हा के अनुसार,

  • बच्चे देश का भविष्य हैं।
  • योग उन्हें नैतिक, चरित्रवान और अनुशासित नागरिक बनाता है।
  • आज के बच्चे तनाव, स्क्रीन की लत, और नशे की प्रवृत्तियों से जूझ रहे हैं।
  • योग से उन्हें संतुलन, एकाग्रता और मानसिक शांति मिलती है।
  • कक्षा में प्रदर्शन बेहतर होता है और व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

उन्होंने कहा कि योग कोई ‘फैंसी एक्स्ट्रा करिकुलर’ नहीं बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है।

छत्तीसगढ़ में योग आयोग बना, पर ठहरा रह गया

भारत का पहला राज्य योग आयोग गठन करने वाला राज्य छत्तीसगढ़ था। वर्ष 2017 में योग आयोग का गठन किया गया था। लेकिन 8 साल बाद भी न तो इसके क्रियान्वयन की कोई ठोस योजना दिखती है और न ही ज़मीनी असर। योगाचार्य सिन्हा कहते हैं कि आयोग केवल नाम मात्र का बनकर रह गया है। न इसके तहत प्रशिक्षक तैयार हुए, न पदस्थापन हुआ, न ही स्कूल-कॉलेजों में कोई ठोस बदलाव आया

पीएम-श्री, नवोदय और आत्मानंद स्कूलों में भी उपेक्षा!

यह स्थिति तब और दुर्भाग्यपूर्ण बन जाती है जब पीएम-श्री स्कूलों जैसे आधुनिक, मॉडल और अच्छी सुविधा संपन्न संस्थानों में भी योग शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है। नवोदय विद्यालय, एकलव्य मॉडल स्कूल और स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल जैसे आवासीय और उत्कृष्ट विद्यालयों में योग शिक्षा को प्राथमिकता नहीं मिल रही है। जबकि यह वे स्थान हैं जहाँ योग को अनुशासन, शारीरिक फिटनेस और मानसिक मजबूती के रूप में बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है।

शासन से सीधी अपील

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योगाचार्य सिन्हा ने मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और अधिकारियों से अपील करते हुए कहा है कि—

  • सभी विद्यालयों में योग को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए
  • योग शिक्षकों की नियुक्ति शीघ्र की जाए
  • योग आयोग को क्रियाशील और जवाबदेह बनाया जाए
  • बच्चों को केवल किताबें न देकर योग का व्यवहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाए

शासन को चाहिए कि वह केवल योजनाएं बनाकर प्रचार न करे, बल्कि जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव सुनिश्चित करे। जब तक योग को “गंभीर विषय” के रूप में नहीं लिया जाएगा, तब तक बच्चों का सर्वांगीण विकास और राष्ट्र निर्माण दोनों ही अधूरा रह जाएगा।


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