बीजापुर में सूचना के अधिकार का मजाक: आरटीआई कार्यकर्ता यदीन्द्रन नायर दर-दर भटकने को मजबूर, जनपद पंचायत भोपालपट्टनम और उसूर में विभागीय चुप्पी
बीजापुर (गंगा प्रकाश)। बीजापुर में सूचना के अधिकार का मजाक:छत्तीसगढ़ लोकतंत्र की रीढ़ कहे जाने वाले सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI Act) की दुर्दशा और सरकारी विभागों की लापरवाही एक बार फिर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में उजागर हो रही है। आरटीआई कार्यकर्ता यदीन्द्रन नायर द्वारा जनपद पंचायत भोपालपट्टनम और उसूर के खिलाफ दायर की गई जानकारी की मांग पर विभागीय स्तर पर चुप्पी और उपेक्षा का आलम है।
आरटीआई अधिनियम 2005, आम नागरिक को सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जवाबदेही तय करने का संवैधानिक अधिकार देता है। लेकिन जब यही कानून मज़ाक का विषय बना दिया जाए, तब सवाल उठना लाज़मी है — क्या सरकार खुद अपने कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही है?
यदीन्द्रन नायर की जंग: अधिकार मांगने पर अपमान
यदीन्द्रन नायर कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि वर्षों से आदिवासी अंचल में पारदर्शिता, सरकारी योजनाओं की निगरानी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते आ रहे हैं। नायर ने बीते महीनों में जनपद पंचायत भोपालपट्टनम और जनपद पंचायत उसूर में कई आरटीआई आवेदन लगाए थे। इन आवेदनों में पंचायतों में खर्च हुई राशि, मनरेगा के तहत हुए भुगतान, ठेकेदारों की सूची, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता रिपोर्ट, और सामाजिक योजनाओं की अद्यतन जानकारी मांगी गई थी।
लेकिन हैरत की बात यह है कि न तो समयसीमा के भीतर कोई जवाब मिला, न ही नायर को यह बताया गया कि उनकी अर्जियां किन कारणों से लंबित हैं। विभागीय चुप्पी ने न सिर्फ कानून की भावना को ठेंगा दिखाया है, बल्कि एक जागरूक नागरिक की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है।
मौन व्यवस्था या मुनाफाखोर तंत्र?
नायर का कहना है, “मैंने बार-बार जनपद कार्यालयों का दौरा किया। संबंधित अधिकारी या तो कार्यालय से नदारद रहे या जवाब टालते रहे। एक बार तो मुझे कहा गया कि ‘आप जैसे लोग ही काम में अड़ंगा डालते हैं।’ ये लहजा न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि बताता है कि अधिकारियों को आरटीआई से कितना डर और नफ़रत है।”
सूत्रों के अनुसार, इन पंचायतों में मनरेगा और पीएम आवास योजना जैसी स्कीमों में अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे हैं। ठेकेदारों और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से अधूरी निर्माण योजनाओं का पूरा भुगतान हो चुका है, और योजनाओं की फाइलों में सब कुछ ‘पूरा’ दिखाया गया है।
विभागीय चुप्पी: संविधान का अपमान
सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 7(1) के अनुसार, किसी भी आरटीआई आवेदन पर अधिकतम 30 दिनों के भीतर जवाब देना अनिवार्य है। इसके बाद सूचना न देना एक दंडनीय अपराध है। यदि जानकारी सार्वजनिक हित से जुड़ी हो तो जवाब 48 घंटे में देना चाहिए। लेकिन यहां महीनों बीत गए, और कोई जवाब नहीं।
आरटीआई के तहत जवाब न देने पर राज्य सूचना आयोग को संज्ञान लेकर संबंधित अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाने का अधिकार है। लेकिन दुर्भाग्यवश, आयोग भी कई बार कागज़ी कार्रवाई तक ही सीमित रह जाता है। इससे नौकरशाही को एक तरह से छूट मिल जाती है।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
इस मुद्दे पर जब जनपद पंचायत भोपालपट्टनम और उसूर के संबंधित अधिकारियों से प्रतिक्रिया मांगी गई, तो अधिकांश ने चुप्पी साध ली। कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि “ऊपरी दबाव” के चलते कुछ आरटीआई पर जवाब नहीं दिया जाता।
यह सवाल उठाता है कि क्या सरकार और प्रशासन खुद पारदर्शिता से भाग रहे हैं? जब एक आम नागरिक, वह भी प्रशिक्षित आरटीआई कार्यकर्ता, को इस तरह दर-दर भटकना पड़े, तो ग्रामीण, अशिक्षित और कमजोर वर्ग के लोगों को न्याय कैसे मिलेगा?
यदीन्द्रन की चेतावनी: सड़क से न्यायालय तक लड़ाई
यदीन्द्रन नायर ने कहा है कि वे अब इस मामले को राज्य सूचना आयोग, मानवाधिकार आयोग और न्यायालय तक लेकर जाएंगे। साथ ही इस मुद्दे को लेकर बीजापुर जिले में जनजागरण अभियान भी शुरू किया जाएगा, ताकि लोगों को जानकारी दी जा सके कि कैसे उनके अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
उन्होंने कहा, “ये सिर्फ मेरी लड़ाई नहीं, हर उस नागरिक की लड़ाई है जो यह जानना चाहता है कि जनता के पैसे से क्या काम हुआ। अगर पंचायतें जवाब नहीं देंगी, तो हम सड़कों पर उतरेंगे।”
यह मामला बीजापुर जैसे संवेदनशील और आदिवासी बहुल जिले की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है, जहां कानून किताबों में है, लेकिन ज़मीन पर नहीं। यदीन्द्रन नायर की यह लड़ाई, एक उदाहरण है कि कैसे लोकतंत्र में जागरूक नागरिक ही असली प्रहरी हैं — और उन्हें चुप कराना, दरअसल संविधान को चुप कराना है।
क्या छत्तीसगढ़ की सरकार इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेगी या फिर यह लड़ाई भी फाइलों के ढेर में दबी रह जाएगी?
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