गरियाबंद/छुरा(गंगा प्रकाश)। सरकारी खरीदी में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए जेम (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) पोर्टल की विश्वसनीयता पर गरियाबंद में गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिले के नगरीय निकायों द्वारा जेम पोर्टल के माध्यम से खरीदे गए लाखों रुपए के पानी टैंकर एक साल के भीतर ही जर्जर होने लगे हैं। हालात यह हैं कि कहीं टैंकर की बॉडी फट रही है तो कहीं लोहे की चादर उखड़ रही है। पानी भरने पर संतुलन बिगड़ने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। ऐसे में लोगों का सवाल है कि आखिर गुणवत्ता की गारंटी के नाम पर खरीदे गए टैंकर इतनी जल्दी कबाड़ कैसे बन गए?
जानकारी के अनुसार गरियाबंद नगरपालिका समेत जिले के कुछ नगरीय निकायों ने पेयजल आपूर्ति के लिए जेम पोर्टल से पानी टैंकर खरीदे थे। स्थानीय लोगों का दावा है कि बाजार में लगभग 3 लाख रुपए में मिलने वाले समान क्षमता के टैंकरों के लिए करीब 7 लाख रुपए तक खर्च किए गए। यानी सरकारी खरीदी में कीमत बाजार दर से कई गुना अधिक रही। इसके बावजूद गुणवत्ता ऐसी निकली कि टैंकर एक वर्ष भी ठीक से नहीं चल पाए।
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लोकार्पण के कुछ समय बाद ही खुलने लगी पोल
नगरवासियों के मुताबिक टैंकरों की तकनीकी खामियां शुरू से ही सामने आने लगी थीं। लोकार्पण के कुछ ही समय बाद चेसिस में वेल्डिंग कराने की नौबत आ गई थी। इसके बाद धीरे-धीरे टैंकर की बॉडी कमजोर पड़ती गई। वर्तमान में कई टैंकरों की चादरें जगह-जगह से उखड़ रही हैं और पानी का दबाव सहन नहीं कर पा रही हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण में उपयोग की गई लोहे की चादर बेहद पतली और निम्न गुणवत्ता की है। यही वजह है कि पानी भरने पर टैंकर की संरचना प्रभावित हो रही है। कुछ लोगों ने तो यहां तक आशंका जताई है कि यदि पूरी क्षमता से पानी भरा गया तो सड़क पर टैंकर पलटने जैसी स्थिति भी बन सकती है।
जेम पोर्टल का मकसद क्या था और हुआ क्या?
केंद्र सरकार ने जेम पोर्टल को सरकारी खरीदी में पारदर्शिता लाने, प्रतिस्पर्धी दरों पर सामग्री उपलब्ध कराने और बिचौलियों की भूमिका समाप्त करने के उद्देश्य से शुरू किया था। लेकिन गरियाबंद में सामने आए इस मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
लोगों का कहना है कि यदि बाजार में कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता के टैंकर उपलब्ध थे तो फिर अधिक कीमत देकर ऐसी सामग्री क्यों खरीदी गई जो एक साल भी नहीं टिक सकी? क्या खरीदी के दौरान केवल कागजी प्रक्रिया पूरी की गई या वास्तव में गुणवत्ता की जांच भी हुई थी?
गुणवत्ता परीक्षण पर उठ रहे सवाल
मामले में सबसे बड़ा सवाल खरीदी प्रक्रिया की तकनीकी जांच को लेकर है। यदि टैंकरों की सप्लाई से पहले गुणवत्ता परीक्षण हुआ था तो फिर इतनी जल्दी उनकी हालत खराब क्यों हो गई? यदि परीक्षण नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी है?
नागरिकों का कहना है कि सरकारी धन से खरीदी गई सामग्री का निरीक्षण और परीक्षण संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में यदि लाखों रुपए की संपत्ति एक वर्ष में ही जवाब देने लगे तो इसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
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जांच की मांग हुई तेज
मामले को लेकर अब स्थानीय जनप्रतिनिधियों और नागरिकों ने जांच की मांग तेज कर दी है। लोगों का कहना है कि खरीदी प्रक्रिया, तकनीकी स्वीकृति, सामग्री की गुणवत्ता और भुगतान संबंधी सभी दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए। यदि कहीं अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और सप्लायर के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
नागरिकों का आरोप है कि सरकारी खरीदी के नाम पर जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी की गई है। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो सरकारी योजनाओं और खरीदी प्रक्रियाओं पर लोगों का भरोसा और कमजोर होगा।
