CG: बीईओ की कार से टकरा कर आदिवासी भाई-बहन घायल, 36 घंटे बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं – पुलिस पर सवाल, गुप्तगूं जारी

 

छुरा (गंगा प्रकाश)।बीईओ की कार से टकरा कर आदिवासी भाई-बहन घायल – फिंगेश्वर-छुरा मुख्य मार्ग पर एक दिल दहला देने वाला सड़क हादसा सामने आया है, जिसमें बाइक सवार दो आदिवासी भाई-बहन गंभीर रूप से घायल हो गए। यह हादसा उस वक्त हुआ जब दोनों भाई-बहन गरियाबंद से अपने गांव कसेकेरा लौट रहे थे। हादसे को लेकर न सिर्फ घायल परिवार, बल्कि पूरे इलाके में रोष है, क्योंकि 36 घंटे बीतने के बाद भी पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की।

घायलों की पहचान शशि दीवान और प्रतिभा दीवान के रूप में हुई है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, छुरा ब्लॉक के शिक्षा अधिकारी (बीईओ) किशुनलाल मतावले की कार तेज रफ्तार में थी और चालक ने बेहद लापरवाहीपूर्वक बाइक को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि दोनों भाई-बहन सड़क पर दूर तक घिसटते चले गए। हादसे में शशि दीवान के सिर और पैरों में गंभीर चोटें आई हैं, जबकि प्रतिभा दीवान को भी गहरे जख्म आए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि दुर्घटना होते ही बीईओ की कार कुछ देर के लिए रुकी, जिसके बाद घटनास्थल पर भीड़ जमा हो गई। गुस्साए ग्रामीणों ने तत्काल 108 एम्बुलेंस को फोन किया, लेकिन एम्बुलेंस आने में देरी होते देख निजी वाहनों से दोनों घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र छुरा पहुंचाया गया। प्राथमिक इलाज के बाद हालत गंभीर देखते हुए उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी स्थिति अभी भी चिंताजनक बताई जा रही है।

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बीईओ ने कहा – कार का इंश्योरेंस है, इलाज का खर्च उठाऊंगा

हादसे के बाद घायल परिवार से बीईओ किशुनलाल मतावले ने कहा कि “मेरी कार का इंश्योरेंस जुलाई 2024 तक मान्य है, इलाज और बाइक की मरम्मत इंश्योरेंस से हो जाएगी। चिंता मत करो।” इस बयान के बाद परिजनों में और अधिक आक्रोश है। उनका कहना है कि इंसान की जान पर बात आई है, और बीईओ को अपनी जिम्मेदारी से बचने के बजाय अपराध स्वीकार कर तत्काल मदद करनी चाहिए थी।

पुलिस की निष्क्रियता पर उठ रहे सवाल

सबसे बड़ा सवाल छुरा पुलिस की भूमिका पर उठ रहा है। घटना को 36 घंटे बीत जाने के बाद भी न तो बीईओ के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, न ही उनका डाक्टरी परीक्षण (मुलाहिजा) कराया गया है। आम लोगों का कहना है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति ऐसा हादसा करता, तो पुलिस उसे तत्काल गिरफ्तार कर जेल भेज देती। लेकिन यहां मामला एक अधिकारी का है, इसलिए पुलिस कार्रवाई से बचती दिख रही है।

पुलिस थाना में गुप्तगूं, समझौते की कोशिश

खबर लिखे जाने तक छुरा पुलिस थाना परिसर में बीईओ किशुन मतावले, पुलिस अधिकारियों और घायलों के परिजनों के बीच ‘गुप्तगूं’ जारी थी। सूत्रों के मुताबिक, शिक्षा अधिकारी के प्रभाव और प्रशासनिक दबाव के चलते प्राथमिकी दर्ज नहीं हो रही है। वहीं परिजन आर्थिक तंगी और भय के कारण खुलकर कुछ भी कहने से बच रहे हैं।

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ग्रामीणों में आक्रोश – इंसाफ कब मिलेगा?

हादसे के बाद से ही कसेकेरा और छुरा क्षेत्र के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। गांव के युवा नेता का कहना है, “अगर आदिवासी गरीब परिवार का बेटा गलती से भी किसी अधिकारी की कार को छू लेता तो उसे जेल भेज दिया जाता। अब जब बीईओ की लापरवाही से दो जिंदगियां संकट में हैं, पुलिस खामोश क्यों है?”

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता  ने कहा, “यह सीधा आदिवासी परिवार के साथ अन्याय है। घायल बच्चों का इलाज तक प्राइवेट अस्पताल में करवाया जा रहा है, जबकि जिम्मेदार अधिकारी आराम से घूम रहा है। प्रशासन बताए कि गरीबों को इंसाफ कब मिलेगा?”

क्या कहते हैं पुलिस अधिकारी?

इस मामले में जब छुरा पुलिस से संपर्क किया गया तो एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “मामले की जांच जारी है, घायल पक्ष की ओर से शिकायत प्राप्त होते ही कार्रवाई की जाएगी।” हालांकि, स्थानीय लोग इस बयान को पुलिस की खानापूर्ति करार दे रहे हैं।

हादसे ने खोली पुलिस प्रशासन की पोल

इस हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्रशासनिक व्यवस्था में गरीब और आदिवासी समाज के लिए न्याय पाना आसान नहीं। सवाल यह भी है कि जब प्रत्यक्षदर्शियों ने साफ कहा कि कार तेज रफ्तार में थी, तो बीईओ पर अब तक लापरवाहीपूर्वक वाहन चलाने की धारा 279, 337, 338 के तहत केस दर्ज क्यों नहीं हुआ?

इलाके में दहशत का माहौल

घटना के बाद से फिंगेश्वर-छुरा मार्ग पर चलने वाले ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। लोग कह रहे हैं कि जब अधिकारियों की कारें रफ्तार से दौड़ेंगी और हादसों के बाद भी कार्रवाई नहीं होगी, तो आम नागरिक सड़क पर सुरक्षित कैसे रहेंगे?


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