मैनपुर (गंगा प्रकाश)। ग्राम छैला की एक जमीन का मामला अब राजस्व, जल संसाधन और पहचान संबंधी दस्तावेजों की जांच का विषय बनता जा रहा है। खसरा नंबर 298 की 1.90 हेक्टेयर भूमि वर्ष 1980 से राजस्व रिकॉर्ड में अंकुर पिता दुकालू (गोंड) के नाम दर्ज है, लेकिन वर्ष 2016 में जारी नई ऋण पुस्तिका के बाद रिकॉर्ड में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे पूरे प्रकरण पर सवाल खड़े हो गए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि राजस्व अभिलेखों में चार दशक से अधिक समय तक अंकुर पिता दुकालू का नाम दर्ज रहा, तो फिर भूमि से जुड़े दस्तावेजों और मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया में दूसरे व्यक्ति का नाम और पहचान कैसे जुड़ गई?

नई ऋण पुस्तिका से शुरू हुआ विवाद

जानकारी के अनुसार पुरानी ऋण पुस्तिका के स्थान पर वर्ष 2016 में नई ऋण पुस्तिका जारी की गई। आरोप है कि नई पुस्तिका में भूमि स्वामी के नाम के साथ किसी अन्य व्यक्ति की तस्वीर दर्ज हो गई। स्थानीय स्तर पर इसे लेकर लंबे समय से चर्चा थी, लेकिन मामला तब सुर्खियों में आया जब नहर निर्माण के लिए अधिग्रहित भूमि का मुआवजा सामने आया।

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नहर बनी, मुआवजा भी निकला, लेकिन मिला किसे?

जल संसाधन विभाग द्वारा खसरा नंबर 298 की करीब 0.14 हेक्टेयर भूमि पर नहर निर्माण कराया गया। इसके बदले 20 जुलाई 2022 को 3 लाख 11 हजार 220 रुपए की मुआवजा राशि जारी की गई।

दस्तावेजों में मुआवजा अंकुर पिता दुकालू के नाम स्वीकृत होना बताया गया है, लेकिन आरोप है कि वास्तविक भूमि स्वामी को राशि नहीं मिली। भुगतान के दौरान लिए गए अंगूठा निशान और पहचान सत्यापन की प्रक्रिया अब जांच के केंद्र में आ गई है।

यही वजह है कि क्षेत्र में यह सवाल सबसे ज्यादा उठ रहा है कि आखिर सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज व्यक्ति और मुआवजा लेने वाला व्यक्ति एक ही था या अलग-अलग।

आधार, पैन और जाति रिकॉर्ड पर भी उठे सवाल

मामले में आरोप है कि भूमि से जुड़े अभिलेखों के आधार पर पहचान संबंधी दस्तावेजों में भी बदलाव किए गए। वहीं उपलब्ध दस्तावेजों में एक तरफ भूमि स्वामी की जाति गोंड दर्ज बताई गई है, जबकि दूसरे पक्ष द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड में रावत जाति का उल्लेख सामने आया है।

नाम, पिता का नाम, जाति और पहचान से जुड़े अलग-अलग दस्तावेजों ने पूरे प्रकरण को और उलझा दिया है।

मुआवजा पहले, पंचनामा चार साल बाद

विवाद का एक और अहम पहलू वर्ष 2026 में तैयार किया गया पंचनामा है। दस्तावेजों के मुताबिक मुआवजा वर्ष 2022 में वितरित किया गया, जबकि भूमि स्वामी की पहचान से जुड़ा पंचनामा लगभग चार साल बाद तैयार किया गया।

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यहीं से प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। यदि पहचान स्पष्ट थी तो बाद में पंचनामा की जरूरत क्यों पड़ी और यदि विवाद था तो मुआवजा वितरण के समय उसका निराकरण क्यों नहीं किया गया?

पटवारी प्रतिवेदन भी घेरे में

राजस्व जांच में प्रस्तुत प्रतिवेदन में वर्ष 1980 से दर्ज नाम को अभिलेखीय त्रुटि बताया गया है। हालांकि पुराने रिकॉर्ड, भू-अर्जन दस्तावेज और अन्य अभिलेखों में मौजूद विवरण इस निष्कर्ष पर नए सवाल खड़े कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि मामले की गहराई से जांच किए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

निष्पक्ष जांच की मांग

अंकुर पिता दुकालू ने सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर पूरे मामले की जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि भूमि रिकॉर्ड, पहचान संबंधी दस्तावेजों और मुआवजा भुगतान प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।

अब यह मामला केवल एक जमीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता, पहचान सत्यापन व्यवस्था और मुआवजा वितरण प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है। क्षेत्र के लोगों की मांग है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि 46 वर्षों से दर्ज जमीन का असली हकदार कौन है और सरकारी मुआवजे की राशि आखिर पहुंची किसके हाथों में।

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