छुरा, कोपरा और देवभोग में सभी मनोनीत पार्षद पुरुष, महिला संगठनों ने बताया प्रतिनिधित्व की अनदेखी
गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। प्रदेश सरकार द्वारा नगर पंचायतों में मनोनीत पार्षदों की नियुक्ति के बाद गरियाबंद जिले में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। जिले की नगर पंचायत छुरा, कोपरा और देवभोग में जारी मनोनीत पार्षदों की सूची में एक भी महिला को स्थान नहीं मिलने पर महिला संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि सरकार एक ओर महिला सशक्तिकरण, नारी सम्मान और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय निकायों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के अवसर पर पूरी तरह उपेक्षित कर दिया गया है।
हाल ही में जारी सूची के अनुसार तीनों नगर पंचायतों में केवल पुरुष कार्यकर्ताओं को मनोनीत पार्षद बनाया गया है। इससे लंबे समय से संगठन और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी जा रही है। कई महिला नेताओं का कहना है कि वर्षों से पार्टी और समाज के लिए काम करने के बावजूद उन्हें अवसर नहीं दिया गया, जबकि मनोनयन जैसी व्यवस्था का उद्देश्य ही समाज के विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व देना होता है।
गरियाबंद जिले की नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में नामांकित पार्षदों की नियुक्ति, नगरीय प्रशासन विभाग ने जारी किया आदेश
महिला संगठनों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें “बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ”, “महिला सशक्तिकरण”, “लखपति दीदी”, “महिला स्व-सहायता समूह” और महिलाओं की आर्थिक एवं सामाजिक भागीदारी बढ़ाने जैसी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करती हैं। लेकिन जब राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने का अवसर आता है तो महिलाओं को पीछे कर दिया जाता है। उनका कहना है कि यदि महिलाओं को मनोनीत पार्षद बनाया जाता तो वे स्थानीय समस्याओं को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रख सकती थीं।
स्थानीय महिला नेताओं का कहना है कि पंचायत से लेकर संसद तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। देश में महिलाओं के लिए आरक्षण और नेतृत्व क्षमता विकसित करने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसके बावजूद नगर पंचायतों के मनोनयन में महिलाओं को पूरी तरह बाहर रखना कई सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि मनोनीत पार्षदों की व्यवस्था केवल राजनीतिक संतुलन के लिए नहीं, बल्कि समाज के उन वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए भी होती है जिनकी आवाज निर्वाचित व्यवस्था में पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाती।
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। महिलाओं के जुड़ने से शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, पेयजल, महिला सुरक्षा, बाल विकास तथा सामाजिक कल्याण जैसे विषयों को प्राथमिकता मिलने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में तीनों नगर पंचायतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त होना राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भीमसेनी एकादशी मेले में चाकूबाजी, नावाडीही के दो सगे भाई गंभीर रूप से घायल
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि भाजपा केवल चुनावी मंचों पर महिला सम्मान और नारी शक्ति की बात करती है, लेकिन जब निर्णय लेने वाले पदों पर नियुक्ति की बात आती है तो महिलाओं को पर्याप्त अवसर नहीं दिए जाते। विपक्ष ने इसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की अनदेखी बताते हुए भविष्य में मनोनयन प्रक्रिया में महिलाओं को प्राथमिकता देने की मांग की है।
महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिले में अनेक महिलाएं वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, स्व-सहायता समूह, सामाजिक सेवा और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इसके बावजूद उन्हें मनोनीत पार्षद बनने का अवसर नहीं दिया जाना निराशाजनक है। उनका मानना है कि यदि इन महिलाओं को स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व मिलता तो वे जनहित से जुड़े विषयों को अधिक मजबूती से उठा सकती थीं।
वहीं भाजपा के स्थानीय नेताओं का कहना है कि मनोनयन प्रक्रिया शासन द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार की गई है तथा संगठन में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान दिया जाता है। उनका यह भी कहना है कि पार्टी विभिन्न स्तरों पर महिलाओं को जिम्मेदारियां देती रही है। हालांकि नगर पंचायत छुरा, कोपरा और देवभोग में महिलाओं को स्थान नहीं मिलने के मुद्दे पर पार्टी की ओर से अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इधर महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से मांग की है कि भविष्य में मनोनीत पार्षदों की नियुक्ति के दौरान महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए, ताकि स्थानीय निकायों में महिला नेतृत्व को भी समान अवसर मिल सके। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में महिला सशक्तिकरण के अपने संकल्प को मजबूत करना चाहती है तो राजनीतिक नियुक्तियों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए ठोस और संतुलित कदम उठाने होंगे।
जिले में यह मुद्दा अब राजनीतिक चर्चाओं का प्रमुख विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में इस पर सत्ता और विपक्ष के बीच बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। वहीं महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के सवाल पर सामाजिक संगठनों की निगाहें अब सरकार और संबंधित विभागों की आगामी पहल पर टिकी हुई हैं।
