प्रकाश कुमार यादव

रायपुर(गंगा प्रकाश)।:-यूरोप के बड़े-बड़े देश अपने यहां इस वक्त राष्ट्रीयकरण की मुहिम चला रहे हैं और निजीकरण से दूरी बना रहे हैं।पिछले तीन माह पूर्व फ्रांस की प्रधानमंत्री ने मल्टिनेशनल इलेक्ट्रिक यूटिलिटी कंपनी इलेक्ट्रीसाइट डी फ्रांस एसए (EDF) का राष्ट्रीयकरण करने की योजना की घोषणा की। बोर्न ने फ्रांस की संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि-

‘अपने बिजली उत्पादन और प्रदर्शन पर पूरा नियंत्रण होना चाहिए. … हमें युद्ध के परिणामों (यूक्रेन में) और आने वाली भारी चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी संप्रभुता सुनिश्चित करनी चाहिए. … इसलिए मैं आपको पुष्टि करती हूं कि ईडीएफ की पूंजी का 100 प्रतिशत स्वामित्व सरकार का है,

जर्मनी भी देश में गज़प्रोम पीजेएससी की एक इकाई का नियंत्रण करने को तत्पर है, जो गैस आपूर्ति से जुड़ी हुई है।जर्मनी के वित्त मंत्री रॉबर्ट हैबेक ने बर्लिन में संवाददाताओं से कहा कि ‘फेडरल नेटवर्क एजेंसी एक शेयरधारक की भूमिका ग्रहण करेगी और आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक उपाय कर सकती है। इटली के मंत्री देश की लुकोइल रिफाइनरी का राष्ट्रीयकरण करना चाहते है।और भारत में इस वक्त क्या हो रहा है ? आप सब देख रहे हैं बड़े बड़े उद्योगों को बेचा जा रहा है, देश की तेल और गैस पाइपलाइन, एयरपोर्ट, बंदरगाह आदि का निजीकरण किया जा रहा है।अभी जो श्रीलंका में संकट चल रहा है उसकी एक बड़ी वजह निजीकरण ही है।श्रीलंका में बंदरगाहों के निजीकरण के विरोध में लंबे समय से एक मुहिम चल रही है।ट्रेड यूनियन, सिविल सोसाइटी और विपक्षी पार्टियां भी इस विरोध में शामिल है।श्रीलंका सरकार ने पहले हंबनटोटा बंदरगाह को कर्ज के बदले चीन को सौपा उसके बाद ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल का ठेका भारत के अदानी समूह को देने का फ़ैसला किया, बढ़ते दबाव के कारण इस फैसले को वापस लिया गया।

श्रीलंकाई सरकार ने देश में शिक्षा प्रणाली के निजीकरण की योजना भी बनाई थी, इसके विरोध में छात्र एकजुट हुए।आप जो सोशल मीडिया पर श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन पर जनता के कब्जा करने के वीडियो फुटेज देख रहे हैं, इस प्रदर्शन का नेतृत्व वहां के छात्र ही कर रहे हैं।देश की लंका लगने वाली है।लगातार बढ़ती मंहगाई श्रीलंका जैसे हालात पैदा कर देगी।18 जुलाई से अनब्रांडेड प्री-पैकेज्ड व प्री लेबल आटा, मैदा और सूजी, दाल, दही, गुड समेत अनेक खाद्य उत्पादों पर 5 फीसदी जीएसटी लग चुकी हैं।

23 मार्च 2017 को तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यसभा में कहा था कि ‘जिन खाने-पीने की वस्तुओं पर अभी तक कोई टैक्स नहीं लगता है, उन्हें जीएसटी से अलग रखा जाएगा लेकिन आज 2022 में इस निर्णय को पुरी तरह से पलट दिया गया है।सरकारें जब भी कोई कर या कर सुधारों से जुड़ी व्यवस्थाएं लेकर आती हैं, तो उसे ‘ग्लासनोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोइका’ के रूप में ही पेश करने की कोशिश करती हैं, लेकिन हकीकत कुछ सालों बाद नजर आती है, जैसा आज हमें जीएसटी के मामले में देखने को मिल रहा है।अनब्रांडेड प्री-पैकेज्ड व प्री लेबल खाद्यान पदार्थों पर जीएसटी लगाने के इस निर्णय का प्रभाव क्या होगा, इसे समझने का प्रयास करते हैं।

दरअसल, मल्टीनेशनल कंपनी अपना उत्पाद ऊंचे दाम पर रजिस्ट्रड ब्रांड से बेचती है, जबकि छोटे-छोटे एमएसएमई या छोटी-छोटी आटा चक्की, अपना उत्पादन कम दाम व कम लाभ पर बेचती है। बड़े उद्योगपतियों की गुलाम मोदी सरकार को शायद यही बात अखर रही है।पांच प्रतिशत जीएसटी लगाने से कुटीर उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हो रहा हैं वह अब बड़े ब्रांड से मुकाबला नहीं कर पाएंगे।

इससे महंगाई तो बढ़ना तय है कि क्योंकि जीएसटी लगने से रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली खाद्य वस्तुओं के भाव बढ़ रहें है।और साफ़ दिख रहा है कि असंगठित क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ने जा रही है।कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्ज़ (कैट) और अन्य खाद्यान्न संगठनों का मानना है कि-देश के सभी बड़े ब्रांड की कंपनियां देश की आबादी का 15 प्रतिशत उच्चतम वर्ग, उच्च वर्ग एवं उच्च मध्य वर्ग के लोगों की ही जरूरतों की पूर्ति करता है जबकि सभी राज्यों में छोटे निर्माता जिनका अपना लोकल लेबल का नेटवर्क होता है, वे देश की 85 प्रतिशत आबादी की मांग को पूरा करते हैं।ऐसे में इन वस्तुओं के जीएसटी कर दायरे में आने से छोटे निर्माताओं व व्यापारियों पर टैक्स अनुपालन का बोझ बढ़ रहा हैं। साथ ही दैनिक जरूरतों के सामान भी महंगे हो होने लगे हैं। यह भी खेद की बात है क‍ि देश में किसी भी व्यापारी संगठन से इस बारे में कोई परामर्श नहीं किया गया है।

सरकार के द्वारा इस प्री-पैकेज्ड व प्री-लेबल शब्द के इस्तेमाल से लग रहा हैं कि किसान भी इस निर्णय से प्रभावित हो सकता है क्योंकि किसान भी अपनी फसल बोरे में पैक करके लाता है तो क्या उस पर भी जीएसटी लगेगा ?

भारत के इतिहास में 18 जुलाई एक काले दिन के रुप में याद किया जाएगा, जब आम गरीब आदमी के उपयोग में आने वाले नॉन ब्रांडेड उत्पादों जैसे आटा, चावल, दूध, दही जैसी वस्तुओं पर टैक्स लगाया जा रहा है। आजादी के बाद ऐसा पहली बार है, जब बिना ब्रांड वाले खाद्य पदार्थों को जीएसटी के तहत लाया गया हैं।गौरतलब हो कि महंगाई ने आम आदमी को बेदम कर रखा है। खाद्य सामग्रियों पर जीएसटी लागू होने के बाद हालत और बिगड़े हैं। खाद्य सामाग्रियों के लगातार बढ़ते दाम के चलते हर घर का बजट बिगड़ चुका है। इसका इसका असर घरों के साथ ही होटलों में भी देखा जा रहा है। बीते कुछ महीनों में महंगाई 12 से 15 प्रतिशत तक बढ़ी है। इसके कम होने का असार भी नजर नहीं आ रहा है।रायपुर में लोकल ब्रांड का पांच किलो का आटा 150 रुपये में मिल रहा था। उसका मूल्य बढ़कर 175 रुपये हो गया है। चावल और गेंहू में पांच पांच रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा अरहर दाल, मूंग दाल व मसूर दाल के दाम भी 10 रुपये तक महंगे हो गए। थोक अनाज व्यापारी पबताते हैं कि अनाज में पांच प्रतिशत जीएसटी लगाने की वजह से खाद्य सामाग्रियों के दाम बढ़े हैं। जीएसटी की वजह से गेंहू और चावल में पांच पांच रुपये तथा दाल में दस रुपये की वृद्धि हुई है। इसकी वजह से लोगों की रसोई का बजट बढ़ गया है। पहले जो राशन चार हजार तक आ जाता था, वह बढ़कर छह रुपये हो गया है।थोक व्यापारी कहते हैं कि आटा के दाम गेंहू के दाम बढ़ने व खाद्य सामान में जीएसटी लगने से बढ़े हैं। कच्चा माल के दाम में इजाफे के कारण एफएमसीजी गुड्स के दाम में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा पैकेजिंग में बदलाव के कारण भी दाम बढ़े हैं।

रसोई के सामानों में दिनोंदिन वृद्धि देखने को मिल रही है। गरीब परिवार के लिए दाल खाना मुश्किल हो गया है।

एक आंकड़ा- डिपार्टमेंट आफ प्रमोशन आफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड के आंकड़ों के अनुसार थोक महंगाई दर में थोड़ी कमी आई है। इससे पहले जून महीने में थोक महंगाई 15.18 प्रतिशत थी। आंकड़ों के अनुसार मई में थोक महंगाई दर 15.88 प्रतिशत थी। वहीं अप्रैल में थोक महंगाई दर 15.08 प्रतिशत, मार्च में 14.55 प्रतिशत, फरवरी में 13.11 प्रतिशत, जनवरी में 12.96 प्रतिशत, दिसंबर 2021 में 13.56 प्रतिशत और नवंबर में 14.87 प्रतिशत थी। जुलाई माह में खाद्य महंगाई दर घटकर 10.77 प्रतिशत पर आ गई, जो जून में 14.39 प्रतिशत पर थी।

जीएसटी से महंगा हुआ खाना,महिलाओं की रसोई का बजट भी गड़बड़ाया

पहले खाद्य तेलों के दाम में बढ़ोतरी, फिर घरेलू गैस सिलिंडर, अब पैकेट बंद अनाजों को जीएसटी के दायरे में लाने पर महिलाओं ने ऐतराज जताया है। बढ़ती महंगाई से महिलाओं की रसोई का बजट भी गड़बड़ाएगा। वहीं व्यापारियों ने अनाज पर जीएसटी लगाने का विरोध किया है। जीएसटी काउंसिल की सिफारिशें के बाद से लागू होने के बाद आटा, चावल, दही और पनीर समेत रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ गए हैं इस नई व्यवस्था के दायरे में दुकानदार नहीं आ रहें लेकिन इसकी मार आम आदमी पर पड़ रही हैं हालांकि, जीएसटी के दायरे में डिब्बा बंद और पैकेट बंद फूड ही आएंगे, जिसकी वजह से कहीं न कहीं रसोई के बजट पर असर पड़ने लगा है।जीएसटी काउंसिल की सिफारिशों के दायरे में खुला दूध, दही और पनीर बेचने वाले नहीं आएंगे। उधर, व्यापारियों ने कहा कि ठीक है इसका असर हम पर नहीं पड़ेगा, लेकिन बिक्री जरूर प्रभावित होने लगीं हैं।केंद्र की मोदी सरकार ने पैकेट बंद, डिब्बा बंद, लेबल युक्त (फ्रोजन को छोड़कर) मछली, दही, पनीर, लस्सी, शहद, सूखा मखाना, सोयाबीन, मटर, गेहूं का आटा, गुड़ सहित अन्य अनाजों को जीएसटी के दायरे में लाया गया है। व्यापारियों ने अनाज पर जीएसटी लगाने का विरोध भी किया,व्यापारियों ने इसे वापस लेने की भी मांग की और कहा था कि इससे दोबारा से इंस्पेक्टर राज शुरू हो जाएगा और व्यापारियों का उत्पीड़न बढ़ेगा। 

व्यापारियों की जुबानी

केंद्र सरकार व्यापारियों के उत्पीड़न पर तुली है। सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है। अनाज पर जीएसटी लगने से उपभोक्ता पर महंगाई की मार पड़ रही हैं। 

जबकिं केंद्र की मोदी सरकार ने खाद्य वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में न लाने का वादा किया था। अब खाद्य वस्तुओं, अनाज को जीएसटी के दायरे में लाया जा रहा है जो कि वादा खिलाफी है। इससे आम उपभोक्ता पर असर पड़ने लगा है और  महंगाई आसमान छू रही हैं।


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