गरियाबंद (गंगा प्रकाश)। आगामी रबी फसलों की तैयारी के लिए कृषि विभाग द्वारा समसामयिक सलाह जारी की गई है। किसानों को वर्षा आधारित क्षेत्रों में धान के पश्चात उतेरा फसल के रूप में विभिन्न दलहनी फसलों- तिवड़ा, मसूर, बटरी, चना इत्यादि तिलहनी फसलों- अलसी, सरसों, इत्यादि को उपयुक्त समय में पर्याप्त नमी की उपलब्धता में बुआई करने की सलाह दी गई है। उतेरा फसल के लिए प्रायः अक्टूबर के आखिरी पखवाड़ा तक बुआई किया जाना अत्यंत आवश्यक रहता है, इस हेतु जिन खेतो में धान की मध्यम 120-125 दिन में पकने वाली किस्में जैसे महामाया, राजेश्वरी, दुर्गेश्वरी, एम.टी.यू. 1001; लगाई गयी है, उन्ही खेतो में उतेरा फसलों की बुआई करें। उतेरा फसल के लिए तिवड़ा की उपयुक्त प्रजाति महातिवड़ा एवं प्रतीक है। जिसका बीज दर 75-80 कि.ग्रा. प्रति हेक्ट है। चना की उपयुक्त प्रजाति छ.ग. चना – 2, इंदिरा चना-1, छ.ग. लोचन चना एवं बीज दर 80-100 कि.ग्रा. प्रति हेक्ट है। मसूर की उपयुक्त प्रजातियां छ.ग. मसूर – 1, आई.पी.ल- 316, आर. बी. एल. 31 एवं बीज दर 40-50 कि.ग्रा. प्रति हेक्ट है। अलसी की उपयुक्त प्रजातियां आर.एल. सी. – 143, आर. एल. सी. – 153, इंदिरा अलसी – 32, छ.ग. इत्यादि है एवं बीज दर 20 कि.ग्रा. प्रति हेक्ट है। सरसों की उपयुक्त प्रजातियां छ.ग. सरसों – 1, इंदिरा तोरिया – 1, पूसा बोल्ड, वरदान आदि है तथा बीज दर 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्ट. है। उक्त फसल किस्मों के प्रमाणित एवं उपचारित बीजों को धान की कटाई के 15 दिन पूर्व खड़ी फसल में पर्याप्त नमी होने की अवस्था में छिड़कवा बुआई करने की सलाह दी गई है।

     कृषि विभाग द्वारा जारी सलाह में कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां पर रबी फसलों के लिए खेत की तैयारी अच्छी तरह से करें, इस हेतु ट्रेक्टर चलित रोटावेटर अथवा कल्टीवेटर का प्रयोग कर खेतो की तैयारी करें। सीमित सिंचाई की उपलब्धता  होने पर रबी के मौसम में मसूर, चना, मटर, सरसों, अलसी, कुसुम इत्यादि फसलों को खेत को अच्छी तरह से तैयार कर नवम्बर के प्रथम पखवाड़ा तक कतारों में बुआई करें। कृषक जिनके पास पर्याप्त सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है वह खेत भलीभांति तैयार कर कतार में सीडड्रिल में माध्यम से गेंहू, मक्का, मटर, सरसों, सूरजमुखी, आलू, प्याज एवं सब्जियों की बुआई नवम्बर माह में पूर्ण कर लेवें तथा रागी फसल की बुआई जनवरी-फरवरी माह में की जा सकती है। छत्तीसगढ़ में पशुधन की समृध्दता है अतः सिंचित अवस्था में नवम्बर के मध्य में बरसीम एवं जई की फसल चारा हेतु लगाई जा सकती है। बरसीम फसल से चार से पांच कटाई एवं जई फसलों से दो से तीन कटाई चारा हेतु प्रदेश में ली जा सकती है। इन चारा फसलों को पशुपालक अपने पशुओं हेतु उपयोग में ला सकते है। चारा को डेयरी या अन्य पशु पालकों को बेचकर अतिरिक्त लाभ कमा सकते है ।

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